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संजय दुबे के 2 लघु आलेख

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चलो फिर जाग जाएं

उस रात हम सभी भाई-बहन सो रहे थे। आधी रात के बाद अचानक मेरे सिर की तरफ से किसी के टक-टक करने की आवाज आई। मैं कुछ नींद और कुछ जागी अवस्था में थी, इसलिए समझ नहीं पाई। आवाज कई बार आने पर मेरी नींद खुल गई। मैं एकदम से उठकर बैठ गई। देखा तो मां खड़ी थी।

मैं चौंकी, बोल पड़ी, यह क्या मां, तुम खड़ी क्यों हो, सोई क्यों नहीं, तबियत तो ठीक है ना? कुछ बात है क्या, बोलो-बोलो, क्या बात है?

मां चुप रही, बहुत जोर देने पर बोली, कुछ नहीं बेटा, बस यूं ही नींद नहीं आ रही थी, तो कमरे में टहलने लगी।

पर हुआ क्या? मैंने पूछा। मां बोली, कुछ नहीं बेटा। मैंने कहा, कुछ तो है, बताओ ना, मां, मैं रोने लगूंगी।

यह सुनकर मां बोली, बेटा तुझे बास्केटबाल का खिलाड़ी बनना है ना?

मैं बोली-हां मां। ठीक है, तू मेहनत कर, मैं तेरी पूरी मदद करूंगी, मां बोली।

लेकिन मां-तुम इतनी रात गए इस तरह क्यों पूछ रही हो, मैंने पूछा।

वह बोली, कुछ नहीं, मैं सोच रही थी कि वह दिन कब आएगा, जब मेरी रानी बेटी नेशनल गेम्स में हिस्सा लेगी और मैं टीवी के स्क्रीन पर उसे खेलते हुए देखूंगी।

बस इतनी सी बात है मां।

हां बेटी, वह बोली।

पर मां, अभी तुम सो जाओ, सुबह हम अपने कालेज के बास्केटबाल के कोच से बात करूंगी और उनसे कहूंगी वो मुझे कोचिंग दें। सच वो कोचिंग देंगे तो मैं तुम्हारे सपने सच कर सकूंगी, पर अभी तुम सो जाओ।

मां बोली, बेटा सपने सच करने के लिए सोना जरूरी नहीं है, सपने तो सोने में आते हैं, लेकिन पूरे करने के लिए जगना पड़ता है। क्यों न हम अभी से जागें। मां-मां, मैं बोल पड़ी, प्लीज सो जाओ।

मां ने कहा, नहीं बेटा, मैं नहीं सोऊंगी। तुम्हें भी उठना पड़ेगा। मेरे लिए, मेरे सपनों के लिए, अपने लिए और अपनी ख्वाहिशों के लिए। मां ने कहा, बेटा-तू बड़ी होनहार है। एक दिन तू अपनी मंजिल को जरूर पा लेगी, पर बेटी मंजिल के रास्ते थोड़े गड्ढेदार हैं, उन्हें पार करने के लिए अपने को मजबूत बनाना पड़ता है। क्यों न हम अपनी नींद से जागें और गड्ढों को पाट दें।

ये क्या कह रही हो मां, मैंने पूछा।

बेटा हम सब लोग सपने देखते हैं, सपने देखते हैं और फिर सपने देखते हैं। सपने देखते-देखते उम्र निकल जाती है, लेकिन सपना सच नहीं होता है। क्योंकि हम सिर्फ देखते हैं, उसको पाने की कोशिश नहीं करते हैं। क्यों न हम इसे बदल दें। यूं तो कई लोग बदलने की भी कोशिश करते हैं, लेकिन वे खुद को नहीं, कठिनाइयां देखकर सपने को ही बदल देते हैं।

मां की बातें अब रोचक लगने लगी थीं। मैंने कहा, हां मां तुम ठीक कहती हो।

वह बोलीं ये बातें तुमको हम दिन में भी बता सकते थे, लेकिन तुम दिन में सपने नहीं, कई दूसरी चीजें भी देखती रहती हो। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि तुम्हें रात में बताऊंगी, सच रात में, जब तुम सो रही हो, सपने देख रही हो। यानि कि उस समय जब तुम जिंदगी को कुछ बनाने के लिए सपने देखती हो।

लेकिन मां, मैंने पूछा, तुम कैसे जानती हो कि मैं इस समय क्या सपना देख रही थी। हां मैं नहीं जानती कि तुम क्या सपना देख रही थी। लेकिन ये जानती हूं कि तुम कुछ न कुछ देख रही हो।

मां बोलीं, सपने तो रात में सोकर ही देखे जाते हैं, लेकिन उस पर अमल तो दिन में जागकर करते हैं। रात के अंधेरे में सपने आते हैं, लेकिन दिन के उजाले में वह हकीकत में बदलते हैं। मैं सिर्फ इतना बताना चाहती हूं कि तुम खूब सोओ, पूरी नींद लो, भरपूर सपने देखो, लेकिन जब तुम जागो तो सपना सिर्फ सपना न रहे वह अपना होना चाहिए। आज की रात तुम संकल्प लो कि कल तुम वह करोगी, जो तुम अभी चाहोगी। मेरी रानी बेटी, हमें सपने के लिए सोना पड़ता है लेकिन उसे पाने के लिए जागना भी पड़ता है। जब तुम सोओ तो हर पल, हर क्षण सपने देखो, लेकिन जब तुम जागो तो हर पल, हर क्षण उसे पाओ, पाओ और तब तक पाती रहो जब तक कि तुम उसे सच में न पा लो, यानि उसी में डूबी रहो। 

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अजूबों से भरी दुनिया की सच्चाई है विविधता 

प्रकृति का खेल भी निराला है। रहस्यमयी दुनिया में सब कुछ बदलाव के दौर में है। अलग-अलग रूप, रंग, भाषा, संस्कृति, पहनावा, नदी, पहाड़, हवा, पानी आदि अजीबोगरीब इस दुनिया में सब कुछ अजूबा है।

इन दिनों दुनिया भर में व्यवस्था बदलने को लेकर एक अघोषित आंदोलन चल रहा है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। यह पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। बस उसका रूप, रंग, व्यवहार और प्रकृति बदलता रहेगा। सृष्टि अपने आरंभ से ही सापेक्षिक रही है। कुछ भी एकांगी या इकहरा नहीं हो सकता है।

अगर दिन है तो रात भी है, धूप है तो छांव भी है, पहाड़ है तो खाई भी है, नदी है तो स्थल भी है, समंदर है तो रेगिस्तान भी है, हवा है तो पानी भी है, सूखा है तो गीला भी है; अच्छा है तो बुरा भी होगा, सुख है तो दुख भी है, समस्या है तो समाधान भी है; भाषा है तो लिखावट भी है, वाचाल है तो मूक भी है, सुंदरता है तो कुरूपता भी है; पुरुष है तो महिला भी है, बच्चे हैं तो बूढ़े भी हैं, पशु हैं तो पक्षी भी हैं। कोई भी एक अकेले का अस्तित्व नहीं है। वैसे भी इकहरापन अपने आप में नीरस होता है।

दुनिया के सभी सुखों से आबाद लोग भी उस सुख से ऊब जाते हैं और ऐसी जगह और स्थिति की तलाश में रहते हैं, जहां वह सुख और उसका संसार न रहे। विविधता हमेशा अच्छी लगती है, आकर्षित करती है और भावनाओं को बढ़ावा देती है। एकरूपता टिकाऊ नहीं होती है। वह अपने आप में ही बोझिल लगती है। ऐसे में क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि कभी दुनिया से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म किया जा सकता है या सभी दुखों का निवारण हो सकता है। मुझे ऐसा नहीं लगता है।

वजह साफ है कि सदाचार है इसीलिए भष्टाचार भी है। वह दिन कैसा होगा जब सभी लोग ईमानदार होंगे। कहीं भी कुछ गलत नहीं होगा। तब कहीं लड़ाई-झगड़ा नहीं होगा। कोई विवाद नहीं होगा। तब न तो न्यायालय की जरूरत पड़ेगी और न ही सरकार और व्यवस्थापिका की।

व्यवस्थापिका तो कानून बनाने के लिए है, सरकार उसको लागू कराने के लिए और न्यायालय उसकी अवहेलना करने पर सजा देने के लिए है, पन्तु जब कहीं भ्रष्टाचार होगा ही नहीं तो कानून की अवहेलना की स्थिति ही कहां से आएगी। तब न्यायालय क्या करेंगे। जब यह स्थिति होगी तो सरकार को कानून पालन कराने की जरूरत ही क्यों पड़ेगी और जब उसकी जरूरत ही नहीं रहेगी तब व्यवस्थापिका को उसे बनाने में अपना समय नष्ट करने की आवश्यकता ही कहां रहेगी। इस व्यवस्था में तीनों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जब ऐसा होगा तब क्या वह स्थिति सामाजिक रहेगी।


मेडिकल साइंस में बताया जाता है कि इंसान को कभी-कभी बीमार भी पड़ना चाहिए। इससे बॉडी के सभी दूषित चीजें बाहर हो जाती हैं। इसको बताकर हम गलत चीजों को बढ़ावा देने की मंशा नहीं रखते हैं। हम तो सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि दुनिया बहुरंगी, वैविध्यपूर्ण, तमाम सभ्यताओं, संस्कृतियों को अपने में समेटे हुए है। वही अच्छा है। एकरूपता नीरस लगती है। इस प्रवचन के बाद जो मौलिक सवाल है, वह यह है कि क्या इसको इसी रूप में चलते देते रहना चाहिए। यानी भ्रष्टाचार, दुख, संकट, परेशानी का हल नहीं खोजना चाहिए। बिल्कुल खोजना चाहिए, पर यह तथ्यतः सच है कि समस्या का निदान होगा तो नई समस्याएं भी जन्म लेती रहेंगी। इसका यही अजूबापन दुनिया की सच्चाई है।

संजय दुबे
इलाहाबाद।
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