मंगलवार, 23 अगस्त 2016

मेट्रो का मारा ,शहर बेचारा / व्यंग्य / यशवंत कोठारी

 

इस खूबसूरत शहर को किसी की नज़र लग गई है .सुबह सुबह ही कवि कुलशिरोमणि सायंकालीन आचमन का प्रातकालीन सेवन कर बड़बडा रहे थे. पूछने पर बताया –मेट्रो ने इस आबाद शहर को बर्बाद कर दिया है . शहर कहीं से भी रहने लायक नहीं रह गया है. शहर में कहीं से घुसो, सब रस्ते बंद, कहीं से निकलो , यातायात जाम, अतिक्रमण की भेट चढ़ गया है शहर. चांदपोल से बड़ी चोपड़ जाना मुश्किल ,बड़ी चोपड़ से छोटी चोपड़ का रास्ता बंद. सड़कें ख़राब, रस्ते जाम व्यापार बंद ,राहगीर परेशां , पैदल यात्री के लिए कोई जगह नहीं , यातायात पुलिस के साथ साथ सिविल पुलिस भी आपकी खातिर दारी करने को तैयार, शाम को सब की हिस्सेदारी. सच में शहर का सत्यानाश कर दिया है मेट्रो के इस ढोल धमाके ने, चाँद पोल से चला रही है लेकिन सवारियां नहीं है फिर भी मेट्रो को आगे ले गए , इस पुराने सुंदर शहर का सत्यानाश करने पर उतारू है सरकार .कवि जी अपने मन का गुबार निकल कर चलते बने.

वास्तव में शहर का कोई धनि धोरी है ही नहीं ,विदेशी मेहमान सरगा सूली जाना चाहते हैं ,नहीं जा सकते , हवामहल, जंतर मन्तर, सिटी पैलेस ,नहीं जा सकते . हर तरफ मेट्रो की कृपा, सेकुरिटी वाले तुरंत सिट्टी बजाते हैं , बहस करने पर पुलिस का डर, चालन का डर.

मेट्रो शहर के जी का जंजाल बन कर रह गया है .पता नहीं विकास की कितनी कीमत देनी पड़ेगी , यह विकास हें या विनाश ? क्या विकास की परिभाषा यही हे की एक तीनसौ साल पुराने शहर को खंडहर में बदल दो. मैंने विदेशों में भी डाउन टाउन देखे हैं , हेरिटेज को पूरा बचा कर रखते हैं , तीन तीन लेयर की मेट्रो चलती हे लेकिन शहर का सौंदर्य बना रखा है , कहीं से भी आपको नहीं लगता की शहर के साथ छेड़ छाड़ हुई है लेकिन यहाँ पुराना शहर ढूँढना पड़ता है .बंगलोर, लखनऊ , इलाहाबाद में भी मेट्रो बन रही हैं ,मगर ऐसा सत्य नाश वहां भी नहीं हो रहा है, सुनो केरा सुनो क्या मेरी आवाज तुम तक पहुँचती है , आने वाली पीढियां तुम से पूछेगी जवाब मांगेगी तुम क्या जवाब दोगे?

इस मेट्रो को चांदपोल से आगे शहर की रिंग पर बनाया जा सकता था , मगर कौन सुने, सब को अपने अपने कमीशन की चिंता है .यातायात वाले शहर को एक प्रयोगशाला समझते हैं , जब मन किया रास्ता बंद , जब मन किया रास्ता खुला , जब मन किया रूट बदला. चारदीवारी में लाखों लोगों की साँस अटकी रहती हैं, घर से गया बच्चा कब आएगा? कायदे कानून केवल गरीब गुरबो के लिए हैं. सफ़ेद हाथियों के लिए नहीं .रोज काम पर जाने वाले दुखी हैं ,रिक्शा बंद , ऑटो वाले नाराज, जनता दुखी पर मेट्रो चलेगी.

मेट्रो से पाइप लाइनें टूट जाती है , घरों में पानी नहीं आ रहा है बिजली बंद है , मंदिर हटा दिए गए हैं ,ठाकुरजी की सेवा पूजा बंद है , ये कैसी दूसरी काशी है मेरे भाई .

मेट्रो को शहर की सवारी न आज मिले न कल . पचास साल बाद शायद कुछ हो जाये, तब तक इस मेट्रो को लाल सलाम .

००००००००००००००

यशवंत कोठारी

८६, लक्ष्मी नगर

ब्रह्मपुरी

जयपुर

मो-९४१४४६१२०७

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------