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परसाई हास्य व्यंग्य पखवाड़ा : तीसरी उपलब्धि / हास्य-व्यंग्य कहानी / प्रमोद यादव

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(परसाई हास्य-व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

 

तीसरी उपलब्धि

हास्य-व्यंग्य कहानी

प्रमोद यादव

अनुदास नाम था उसका..पूरा नाम अनुभव दास..पर किसी भी चीज का उसे अनुभव नहीं था..जो काम हाथ में लेता..उसका बेडा गर्क होना तय होता..बुद्धि से थोडा जड़ और भोकवा किस्म का था अनुदास इसलिए घरवाले उसे भोकुदास कहते और गाँव वाले अक्सर “गोबरदास”..उसकी एकमात्र उपलब्धि ये थी कि वो पूरे गाँव में अकेला ही मेट्रिकुलेट था..ये और बात कि थर्ड डिविजन था..और दो अटेम्प्ट में निकला था..पर इस बात का उसे जरा भी घमंड नहीं था.. इस पढ़ाई से उसे उम्मीद थी कि कोई न कोई सरकारी नौकरी जरूर मिल जायेगी..नौकरी से भी ज्यादा इस बात की तसल्ली थी कि नौकरी मिले न मिले, छोकरी तो मिल ही जायेगी..नौकरी का क्या ? बाप-दादों की चालीस एकड़ खेती-किसानी से जिंदगी गुजर ही जायेगी..पर किसी का कुछ सोचा हुआ भला सब कब सच हुआ ? उसका भी नहीं हुआ..न नौकरी मिली न छोकरी..

तैंतीसवें साल में पाँव धरते ही उसे लगा कि उसके अच्छे दिन आ रहे ..पहली बार में ही लड़की वालों ने उसे देख हामी भर दी..उसे लगा, मेट्रिक के बाद यह उसकी दूसरी बड़ी उपलब्धि थी..इसके पूर्व जितने भी रिश्ते आये ,सबने एकसुर से कहा – “लड़के की उमर कुछ ज्यादा है..अतः क्षमा करें..” इस बार वह अपने आप पर गौरवान्वित हुए बिना नहीं रह सका कि तैंतीसवें साल में भी उसका जलवा बरकरार है..तभी तो लड़कीवाले लड़की देने तैयार हैं.. उसका बाप लड़कीवालों के आमंत्रण पर शहर जाकर लड़की और उसका घर-द्वार,परिवार देख अपनी ओर से भी “हामी” भर आया...फिर अनुदास को बताया कि लड़की अच्छी-गोरी ,तीखे नैन-नक्शोंवाली पढ़ी-लिखी है..ग्रेजुएट है..बस..उम्र में थोड़ी बडी है..केवल चार साल.. और सरकारी प्रायमरी स्कूल में टीचर है..अनुदास को तब समझ आया कि लड़कीवाले क्यों तैयार हुए..इतनी उम्रदराज लड़की को भला कौन महाबली उठाता ? पर ये सोचकर कि रिश्ते तो ऊपर से ही बनकर आते हैं,उसने इस पर ज्यादा चिंतन-मनन नहीं किया ..छोकरी और नौकरी दोनों एक साथ उस पर मेहरबान थे..उसने इसे अपना अहोभाग्य मान स्वीकार कर लिया..फिर आनन्-फानन में चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर उनकी शादी हो गई..

शादी की पहली रात तो ठीक गुजरी..पर वह जान गया कि शहर की ये छोरी ,छोरी नहीं छुरी है..पर उसे उम्मीद थी कि आगे सब कुछ ठीक हो जाएगा..पर आगे कुछ भी ठीक न हुआ..उसने पहली ही रात जब कहा कि अपना ट्रांसफर गाँव में करवा लो..वहीं सब साथ-साथ रहेंगे तो वह बिफरते हुए बोली-‘ दोबारा ये बातें जुबान पर कभी मत लाना..मुझे गाँवों से सख्त चिढ है..तुम्हें वहां रहना है तो रहो..मुझे कोई आपत्ति नहीं..’ सुनकर अनुदास की बोलती बंद हो गई..मरता क्या न करता ? शादी के बाद कुछ दिन वह गाँव में रहता तो कुछ दिन ससुराल में..शादी के बाद कुछ महीने तो यूं गुजरे की पता ही न चला..ससुराल में होता तो पूरे शबाब में होता.. आवभगत में होता..सम्मानके साथ छप्पन भोगों में होता.. पर जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, हालात भी बदलते गए.. आवभगत और सम्मान ,दोनों के ग्राफ तेजी से गिरने लगे ..अब ससुराल वाले उसे खाने-पीने के साथ कुछ काम-धाम करने की सलाह भी परोसने लगे.. सबसे ज्यादा परेशान वह बड़े वाले साले से रहता जो बाहर सर्विस में कहीं रहता, वह जब भी घर आता तो अपनी बहन को सुनाकर ही जाता कि ये मियाँ कब तक यहाँ मुफ्त की रोटी तोड़ते रहेगा ?..घरजवाई बनकर रहने का इरादा है क्या ? जब भी आता हूँ,उसे यहीं पाता हूँ..

इन सब बातों को सुनकर उसे बुरा तो बहुत लगता पर क्या करता ? कहाँ जाता ? अब महीने-पंद्रह दिन की जगह वह पांच-सात दिन ही ससुराल में रूकता..और जब भी पता चलता कि बड़ा साला आने वाला है,वह तुरंत ही अपना झोला ले नौ दो ग्यारह हो जाता..गाँव भाग जाता..फिर सालेसाहब के जाने के बाद ही लौटता..कई महीने तक तक ये आँख-मिचौली चली..फिर किस्मत को उस पर रहम आया और उसकी पत्नी ने किराए पर एक खोली उठा ली..गाँव में उसने ये खबर सुनी तो राहत की सांस ली..उसे लगा कि दुःख भरे दिन बीते रे भैया..अब सुख आयो रे.. उसे लगा कि अब “अपने घर” में बैठकर वह कोई काम-धंधा या नौकरी पर ध्यान केन्द्रित कर पायेगा..पर किराये की खोली को देखते ही वह पगला गया..पत्नी ने अपने घर के बिलकुल सामनेवाले मकान की एक खोली को किराये पर लिया था..दोनों घरों के बीच एक छः फीट की गली का ही फासला था..दिन भर तो वो स्कूल में रहती फिर शाम को आते ही चाय पी माँ के घर फुदक जाती..फिर देर रात लौटती तो कभी खाना बनाती,कभी नहीं भी बनाती.. तो कभी वहीँ से दोनों का खाना ले आती.. इस बात पर वह एतराज करता तो कहती -ठीक है..मेरे मायके का खाना नहीं खाना तो सुबह-शाम तुम यहीं बना लिया करो..मेरे पास तो समय नहीं..और फिर दिन भर घर में बैठे करोगे भी क्या ? कोई काम-धंधा तो है नहीं ? पत्नी के ताने तो वह पचा भी लेता..पर बड़े साले का खौफ हमेशा उसके सिर पर सवार रहता..अब भी वह जब आता तो जोर-जोर से अपने कमरे से चिल्ला-चिल्ला कर सुनाता- “साला कोई काम-धंधा करता नहीं तो यहाँ रहता ही क्यों है ? गाँव क्यों नहीं चला जाता ?” सुनकर भी अनसुना करना उसकी मजबूरी थी..फिर भी कोशिश करता कि ऐसे अवसर ही न आये..जब भी उसे मालूम पड़ता कि खलनायक साला आ रहा तो वह झोला ले पहले ही गाँव भाग जाता..

फिर एक दिन उसे काम मिल गया..वह एक बेटी का बाप बन गया..फुल टाईम जॉब था..पत्नी केवल बच्ची को दूध भर पिलाती बाकी सब सेवा-सुश्रुषा अनुदास करता..बच्ची के आने से ससुराल वालों से तना-तनी, गिले-शिकवे कम हो गए..अब कोई उसे कुछ न कहता..बच्ची बड़ी होने लगी तो घर का खर्चा भी बढ़ने लगा..उसे लगा कि अब तो जरूर कुछ न कुछ काम-धंधा करना ही चाहिए..उसने पत्नी से दिल की बात कही तो उसने “देर आयद,दुरुस्त आयद” की तर्ज पर खुश होते पांच हजार का लोन ले उसके लिए पास की ही गली में एक सायकल स्टोर्स खोल दी..वह सीरियसली धंधे में रमने लगा..अच्छा कमाई करने लगा..सारे सायकल किराये पर हाथों-हाथ उठ जाते..कुल जमा छः तो सायकल थे..तीन तो अक्सर पूरे माह के लिए किराये पर उठते..बाकी के तीन भी दिन भर अच्छा किराया देते..बामुश्किल छः महीने ही बीते होंगे कि एक दिन स्टोर्स में ताला लग गया..हुआ यूं कि एक दिन उसके तीन सायकल किराये से उठे तो फिर लौटकर ही नहीं आये..दरअसल जब भी वह भोजन के लिए घर जाता , पास-पड़ोस के किसी न किसी बच्चे को दूकान में बिठा जाता..उस दिन भी इसी दौरान ये हादसा हुआ..तीन अजनबी आये और अनुदास के दोस्त होने का हवाला देते बच्चे से तीन सायकल किराए पर ले उड़े.. पुलिस में रपट लिखाई तो अभियुक्त तो बरामद हुए पर सायकल नहीं..उन लोगों ने सायकल किसी दूसरे शहर में बेच दी थी..मालुम हुआ कि बिना कोर्ट-कचहरी के सायकल मिलने वाला नहीं..कोर्ट- कचहरी के चक्कर में बाकी के तीन सायकल भी बिक गए..अनुभव दास का यह पहला अनुभव था काम-धंधे का..इसके बाद उसने कसम खा ली कि अब कोई काम-धंधा नहीं करेगा..हाँ..कोई अच्छी सी नौकरी मिले तो जरुर कर लेगा..

किस्मत का धनी था अनुदास..इधर दुकान बंद हुई और उधर नगरपालिका में उसकी नौकरी लग गई..संविदा वाली नौकरी थी..पर साल भर बाद परमानेंट होने के पूरे चांस थे ..उसकी पत्नी के कोई करीबी रिश्तेदार पालिका में थे जिसने उसे काम पर लगाया..उसने साफ़ कहा कि अधिक पढ़ा-लिखा होता तो आफिस में रख लेते पर मेट्रिकुलेट है इसलिए उसे फील्ड जॉब ही करना होगा..बरसात के दिन थे इसलिए उसे पहला जॉब दिया कि पालिका अंतर्गत जितने भी कुंए हैं,उसमें बारी-बारी से पोटेशियम परमेंगनेट दवा डालना ताकि कुंए का पानी साफ़ और वार्ड-वासियों के पीने योग्य रहे..बस, इतना ही काम था और छुट्टी..वह बड़ा ही खुश हुआ कि बहुत ही आसान काम मिला..पहले दिन जब पालिका में पचास वार्डों की लिस्ट दी गई और बताया गया कि कुल चालीस कुंए हैं तब भी उसे लगा कि दोपहर तक वह पूरा निबटा देगा..पर पहले ही दिन उसे जोर का झटका बड़े ही जोरों से लगा.. सायकल के पीछे कैरियर में दवा की बोरी लिए इस वार्ड से उस वार्ड घूमते वो पसीना-पसीना हो गया..हांफ सा गया..कुंआ खोजते-खोजते उसे नानी याद आ गई..रात के आठ बजे वह अपने काम से निवृत्त हो घर पहुंचा....पत्नी को बताया तो बोली- “नए नए हो.. कोई भी काम अभी थोडा भारी ही लगेगा पर धीरे-धीरे आदत पड जायेगी..और फिर कौन सा तुम्हें रोज-रोज ये काम करना है ? हफ्ते में तीन दिन ही तो दवा डालनी है..हमें देखो...पूरे छहों दिन बैलों की तरह जुते रहते हैं..भई ,इससे अच्छी नौकरी कुछ हो ही नहीं सकती..अब धैर्यपूर्वक इसे करो..और चार पैसे कमाओ..”

“ जो आज्ञा ” वाली सूरत लिए उस दिन वह सो गया...उसके बाद वह पूरी निष्ठां के साथ हफ्ते में तीन दिन चालीस कुंओं के दर्शन कर, पसीने से तर-बतर हो घर लौटता तो उसे लगता कि कोई तीरथ-धाम करके लौटा हो..बड़ी ही थकावट हो जाती..बदन चूर-चूर हो जाता पर नौकरी तो हर हालत में करनी ही थी और फिर पगार भी बढ़िया मिल रहा था..सो वह चुपचाप बिना आहें भरे धैर्यपूर्वक काम करता रहा..उसे उम्मीद थी कि परमानेंट होने पर शायद कोई दूसरा काम मिल जाए..

एक दिन पोटेशियम पावडर की बोरी कैरियर में बांधे वह सिकोला वार्ड की तरफ पसीना-पसीना हुए जा रहा था कि बल्लू मिल गया.. बल्लू पालिका में परमानेंट एम्प्लाई था और बड़े पोस्ट पर काम करता था..उसने उसे पसीने से तर-बतर देखते कहा-‘ क्या कर रहे हो अनुदास ? इतने पसीने-पसीने क्यों हो रहे हो भई ?’ तब उसने अपने जॉब के विषय में बताया तो कल्लू तपाक से बोला- ‘बुद्धू कहीं के..तुम्हारा दिमाग भी है या नहीं ? अरे..रोज-रोज सब कुंए में डालने की क्या जरुरत पगले..किसी एक दिन डाल दिया तो काफी..बाकी दिन पूरी बोरी किसी एक कुंए में डाल बाकी वार्डों में भटकने से छुट्टी पाओ न ..इतनी ईमानदारी अच्छी नहीं..और फिर ये सब देखता कौन है ? किसको फुर्सत है पालिका में ? समझे कि अब भी नहीं समझे ?’

उसने सिर हिलाया कि समझ गया..

और सचमुच ही वह समझ गया..अगले ही दिन वह पोटेशियम की बोरी एक वार्ड के कुंए में डाल दस मिनट में ही घर लौट इत्मीनान से बिस्तर में पसर गया..पहली बार उसे लगा कि वह सचमुच ही गोबरदास है..वह दुखी था कि ये आईडिया उसे पहले क्यों नहीं आया ? खैर..जब जागे,तभी सबेरा..वह करवट बदल सोने जा ही रहा था कि पालिका से एक चपरासी दौड़ा-दौड़ा आया और बताया कि बड़े साहब ने तुरंत बुलाया है..काफी गुस्से में हैं साहब..न मालूम क्या हुआ है ?

उसे भी समझ नहीं आया कि इतने बड़े साहब को उससे क्या काम आन पड़ा ? कपडे पहन दफ्तर पहुंचा तो देखा-बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा थी..उसे देखते ही सब चिल्लाने लगे-“यही है..यही है..” वह घबरा गया..तभी पालिका के दो कर्मचारी उसे झटके से उठाकर भीतर साहब के कमरे में ले गए..साहब ने सीधे ही सवाल किया- ‘ सिकोला वाले कुंए में दवा तुमने डाली है ?’ उसने हामी भरते सिर हिलाया..” क्या पूरी की पूरी बोरी ही डाल दी थी ? “ उसने फिर हामी भरी...साहब चिल्लाया-‘ बेवकूफ..पूरे कुंए का पानी लाल हो गया है..वार्ड के लोग घबरा गए कि किसी आतंकवादी ने कुंए में जहर तो नहीं मिला दिया ?..गनीमत कि मोहल्ले वाले पकड़कर तुम्हें पीटे नहीं...और फिर भला पूरी बोरी डालने किसने कहा था तुम्हें ? “ उसने कनखियों से बल्लू की ओर देखा पर कहा कुछ नहीं.. साहब ने अनुदास को उसी वक्त काम में लापरवाही बरतने के कारण पालिका से निष्काषित कर दिया..वह मुंह लटकाए ”लौट के बुद्धू घर को आये “ को चरितार्थ करते घर लौट आया.

पत्नी को इस बात की खबर लगी तो बिफर गई, बोली- ‘ लोग सच ही कहते हैं..तुम सचमुच गोबरदास हो.. न तुम कोई काम-धंधा कर सकते न ही कोई नौकरी.. तुम गाँव में ही रहो तो बेहतर..’ फिर एकाएक थोडा नरम हो बोली- ‘ अब इस बुरी खबर के बाद तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर भी है.. खबर ये है कि आज ही मेरा ट्रांसफर तुम्हारे गाँव के पासवाले कस्बे मे हो गया है..अब जल्दी से अपने झोले के साथ मेरा ट्रंक भी तैयार कर लो..सुबह की बस से ससुराल जाना है..’

पत्नी की बातें सुन उसे विश्वास ही न हुआ..वह ख़ुशी से उछल गया..उसे लगा..ये ट्रांसफर उसकी जिंदगी की तीसरी बड़ी उब्लब्धि है..वह बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब बार-बार-झोला ले भागना नहीं पड़ेगा..भाग-दौड़ से वह थक गया था.. सबसे ज्यादा ख़ुशी उसे इस बात की थी कि अब बड़े साले के कड़वे वचनों से उसके कान कोसों दूर रहेंगे...

वह जल्दी-जल्दी पत्नी का ट्रंक जमाने लगा..झोला तो उसका हमेशा तैयार रहता ही था...

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़

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