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निर्मल कविताएँ


1.हम और तुम

गाँठे भर आयी है
चल चलकर नंगे पाँव
पत्थर तोड़ते भर आए हैं मसल।

मसलना तो दूर
नहीं रहेगा मसलन भी शेष
हमारी छूअन मात्र से।
 
मगर , हम हम हैं
तुम तुम हो
नहीं चल सकते नंगे पाँव तुम
डगभर मंदिरों के फर्श पर भी ।

बस मसलना जानते हो
निर्दोष फूलों को
तलुआ चाँटते जूतों के नाल से।

2. सावधान !


मानवता
दुबकी बैठी है कमरे में
लाचारी की कुण्डी लगा
द्वार
खटखटा रही गरीबी
काँपते हाथों ।

हो गयी सूनी गलियाँ
राहतों की
गश्त लगाती है
उँची सेंडल पहनें
मौत मँहगाई की ।

आमसभा आयोजित करती /रोज
कहीं न कहीं
धरने पर बैठती
बीमारियाँ।

चीथते चौराहे पर
चील कौअें सत्य -शव
पता नहीं
पाप या पुण्य से
माँग रहा मौत या जिंदगी
मगर गिड़गिड़ा रहा है धर्म कुछ।

स्वार्थी श्रध्दालुओं की भीड़ बेकाबू
सीखते -सीखते तैरना
तरने तारने लगे
बारहों मास कुंभ मेले में
झूठ भ्रस्टाचार फरेब संगम पर।

इठला रहा है भय
अपनी अशेष जवानी पर
हो चुका पसीना श्रम पर मेहरबान
जब से टाँगा है दरवाजे पर
सुविधाओं ने बोर्ड
’’कुत्ते से सावधान।’’

3. महान

 
लोगों ने माँगी रोटियाँ
उसने बाँटी रोटियाँ
बाँटी रोटियाँ छीन सके ताकि
छोड़ दिये
वाचा मानने वाले
कुत्ते।

लोगों ने माँगे कपड़े
उसने ढाँके कंबल ताकि
ढँके कंबल से
देख न सके लोग
काली करतूत
उनकी।

लोगों ने माँगे घर
उसने दिये घर
दिये घर में
दीये की जगह
जलायी बत्तियाँ
उजड़ो को उजाड़कर
फिर से बसाने के लिए।

लोगों ने बजायी तालियाँ
उसने बटोर ली
गंभीर शान से
मुखौटी मुस्कान से
सह ली गालियाँ
यह कहकर कि
जो सहा न
वो महा न
और 
हो गए महान।

4. अभी अभी


अभी अभी
बहस शुरू हुई है
बस चलने ही वाला है
कोई आंदोलन
अमल में आने वाली है
कोई नयी योजना
फूटने ही वाली है
क्रांति कहीं
बस !
आ ही रहे हैं - अच्छे दिन
उँची हो रही है नाक
भारत की
एकाग्र -व्यग्र
देश मुँह फाड़े
ताक रहा है सूरज की ओर
उपर -नीचे
दाएँ - बाएँ
जैसे
अब आए तब आए छींक
और एक सुकून पसरे
मगर छींक है कि
आने से रही
सो रही।।

5. आओ


आओ हम सब मूरख
मिलकर
कोई एक
अधिक होशियार चुनें
जो भर सके पेट
काटकर निवाला
अपने अपनों का
अपनो को
बाँट सके जो
धूप -छाँव
हवा -पानी
बादल -बारिश
देश - दुनियाँ
और ये धरती

बखत परे
साँसे भी।

6. कोई कह दो अर्जुन को


आँखों पर पट्टी बाँध हस्तिनापुर
चौसर के दाँव- पेंच में
मस्त है
व्यस्त है गुरूकुल
एकलव्य का अंगूठा काट
अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सिध्द करने में।

ऐसे में कौन बचायेगा लाज
द्रौपदी और विराट देश की ?

कोई कह दो अर्जुन को कि
यह समय रंग महल में नाचने गाने का नहीं है
कि अब अज्ञातवास के लिए समय नहीं है
कि अब वह उठा ले अपना गांडीव
कि अब वह नहीं रहा बृहन्नला।

7. बढ़ता शहर


इस छोर से
उस छोर तक
फैल रहे परिसर लगातार
सूँड से

नित नये निकल रहे
चक्क से दूधिया दाँत
सफेद भवनों के

काले जादुओं के
एक से एक
कारनामों से
दिन ब दिन
विशालकाय होता
आम लोगों पर
भारी पड़ता जा रहा
मेरे कस्बे का हाथी।।

8. इतिहास की सड़कों पर


लद गये हैं दिन धूल से
पन्नों -सी कैलेण्डर के
फड़फड़ा रहीं विचार -शाखें
तारीखें रफ्तार से
आ जा रही
मोटर गाड़ियों की तरह
कोई चारा नहीं
अलावा आँख मींचने के
इतिहास की सड़कों पर आदमी
रह गया है -ठक्क से
पंथ छोर पेड़ सा।

9. सुनो


आज फिर देखा
चेहरा
हू -ब -हू तेरा
कह उठे
सब , यही
केवल मैं नहीं।

10. मुश्किल


कहो तो भी मुश्किल
न कहो तो भी मुश्किल
कहना भी मुश्किल
न कहना भी मुश्किल
कैसे कहे क्या बुरा क्या सही है
इस दिल से
दर्द का
इस दुनिया में
रिश्ता यही है।

  --

नदी पर 3 कविताएँ


1.    नदी और नदी का प्रेम
गुंडियाँ बच्चो की तरह बुड़बुड़ाना छोड़
जा बैठती है पनिहारिनों के सिर
और खनखनाना बंद कर देती हैं चूड़ियाँ
तब पनघट का सूनापन
आ बैठता है पत्थर पर
तन पर भभूत रमाए
दुनिया का मोह -माया त्याग
उदास चेहरा लिए
साधुओं का -सा

देखते रहता है एकटक
अभी -अभी मँजे , नहाए -धोए
पनिहारिनों के सिर पर सवार
मचलते चमकते विदा लेते गुंडियों को
जैसे कोई किस्मत का मारा
बिना किसी गिरेबान का गरीब प्रेमी
मन ही मन प्रेम करने लगे
संग खेले -खाए, बतियाए
अपनी प्रेमिका को ससुराल जाते देख रहा हो।

पसर पनघट में चुप्पियाँ
गाने लगती है विरह के गीत
जब जोर -जोर से
नदी प्रीत लगा बैठती है आसमान से
पानी का रंग प्रेम पगे
हो जाता है आसमानी।

नदी की तलहटी में बैठे काई को
अच्छी नहीं लगती
नदी और आसमान की आँखमिचैली
बुदबुदाते बूढ़ों की तरह
निकल आते हैं वे
पानी की तह से
पानी की सतह पर
मानो गुस्सा पैर से
चढ़कर
आ गया हो सिर तक।

दरवाजे के भीतर घूँघट में बखानती
बड़े घर की सभ्य और सुशील औरतों की तरह
मछलियाँ भी काइयों की ओट में आकर
बखानती घूरने लगती हैं आसमान को
और पानी की सतह पर
मुँह मार लौट जाती है
जैसे शरारती बच्चे जीभ निकाल चिढ़ाते है

तभी अचानक
टकराकर तरंगे तीर से
खो बैठती है अपना भरम
तब आस्था और हिम्मत के दीप जला जाती हैं
मेढकों की लंबी छलाँगे
डरी सहमी उन मछलियों के मन में।

तब कदाचित काँप उठता है आसमान
उस सूने पनघट में।

तब भी नहीं मानता वह हार
देखता है टुकुर -टुकुर
जोहता है बाट
सूने की
अनसुना कर दुनियावालों की बात।

2.    नदी और नदी का प्रेम
एक नदी
बहती रही निरन्तर
कहीं कलकलाती
कहीं बिल्कुल मौन
अबोध बच्चों की तरह
अल्हड़ और बेपरवाह।
तट घुलता रहा
मिलता रहा
मिलन की चाह में
सोचता रहा...
मेरी बाँहों में
सिमटी
पसरी नदी
मेरे रंग में रंगी
मेरे प्रेम में पगी
मेरी है

मगर नहीं
जब तक पास थी
तटिनी बनी रही
संगिनी बनी रही
जब तक साथ थी

एक धारा बहती रही
नदी के भीतर
जो उसे कहीं और ले जाना चाहती थी
नदी
तट
तटस्थ पेड़ -पौधे
सपाट धरातल
पसरी खेती
अमराई
सब कुछ छोड़ सकती है
लेकिन
उसे नहीं
जो उसके भीतर बह रही है
फिर भी चाहता रहा
तट
नदी में घुलता रहा
मिलता रहा
मिलन की चाह में।।

3.    नदी और नदी का प्रेम
पेड़
चाहते हैं
तट पर खड़े रहना
नदी नहीं चाहती
मोह ,
माटी का मगर
नहीं छोड़ पाते
पेड़ न पानी
हो जाते हैं
एक दूजे के
झूमते हैं
लिपटते हैं
चूमते इतराते हैं
कभी बरसते है
कभी उफनते है
प्रेम से सराबोर
पर रीते नहीं होते
मन से कभी।

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