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किस्सा - ए - रिन्द / कहानी / गणेश सिंह

(किस्सा - ए - रिन्द )

मधेसर बाबा अपने ज़माने के मशहूर पियक्कड़ रह चुके हैं। उम्र अस्सी साल के करीब है और हालत यह की कब गांववालों को ब्रह्म-भोज का सरप्राइज दें दे ये पंडी जी का पंचांग भी परफेक्टली अनुमान नहीं लगा सकता। बिहार में शराबबंदी क्या हुई मानो पियक्कड़ों के कंठों की नसबंदी कर दी गई । गले को जो तराई शराब से मिलती थी वो किसी और दूसरी चीज से मिल सकती है भला क्या ?

आज के चार माह पूर्व जैसे ही उनके तिलक में मिली तिरसठ साल पुरानी फिलिप्स के रेडियो पर शराब बंदी की आकाशवाणी हुई वैसे ही वो रेडियो समेत अपने खटिया से लोघड़ाकर गिर पड़े । गिरने का 'मंजर' इतना भयावह था की उनका समस्त 'अस्थि-पंजर' विस्थापित हो गया। उसी दुर्घटना में उनका दाहिना हाथ भी चार जगह से फ्रैक्चर हो गया और तीन-चार दांत भी जो बचे थे वो भी उदर में समाहित हो गए । मतलब अस्सी के उम्र में उनको टोटल अस्सी फ्रैक्चर हुआ ।

कहा गया है कि बुढ़ापे में टूटी हुई हड्डी और जवानी में टूटे हुये दिल,ये दोनों का कभी भी सही से मरम्मत नहीं होता। कोई डॉक्टर या शायर कितना भी जतन कर ले वो जुड़कर अपने पहले वाले रूप में नहीं आते और उम्र भर के लिए अपने टूटन का दर्द छोड़ जाते हैं l

शराबबंदी वाले दिन से ही मधेसर बाबा मरणासन्न में हैं और हरिबंस जी की मधुशाला पढ़-पढ़कर अपने दिल को बहला रहे हैं। दुनिया में सौ किसिम के धर्म हैं,पांच सौ किसिम के धार्मिक स्थल और हजार प्रकार की धार्मिक ग्रन्थें। लेकिन मेरे गाँव के समस्त पियक्कड़ों का सिर्फ एक ही धर्म है पियांकी और उनका एक ही ग्रन्थ है हरिबंस जी की "मधुशाला"।

मधेसर बाबा अपने दलान में खटिया पर लेटे हैं।दर्द से कराह रहे हैं और मधुशाला की पंक्ति लगातार सुर-ताल में गाते जा रहे हैं " अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला"।आसपास कोई नहीं है सिवाय उनके शेरुआ कुत्ते के। कुत्ते की हालत भी लगभग मधेसर बाबा जैसी ही हो गई हैं क्योंकि उसे भी आजकल शराब नसीब नहीं हो रहा है । मधेसर बाबा अपने बचे बोतल में से दो-चार बून्द उसके मुंह में चुआ देते थे तो वो भी टनटन रहता था। लेकिन वह भी आजकल मूर्छित रहता है पिछले दस दिन से भौंकना बंद कर दिया है और इसी कारण परसों रात में जादो जी का भैंस जो उनके बेटे को दहेज़ में मिली थी उसको कोई बच्चा समेत चुरा ले गया। किसी चोर का क्या मजाल था की शेरुआ के रहते गाँव में घुंस जाये और चोरी हो जाए।

मुझे गली से गुजरते हुए देख मधेसर बाबा "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" का गायन पाठ बीच में ही स्थगित कर पूरे फेफड़े का जोर लगा के कहते हैं अरे गनेसबा! सुनो इधर जरा। अब वो बुला लिए तो जाना लाजिमी है क्योंकि वो मेरे बचपन के लंगोटिया इयार हैं। मैं उनके पास जाता हूँ। प्रणाम-पाति करके खटिया के सिरहाने बैठकर उनका सर सहलाने लगता हूँ। बचपन में जब भी सर सहलाता था वो रुपया- दो रुपया दे दिया करते थे पतंग-धागे के लिए।

मैं सर सहलाने लगता हूँ वो फिर से वही पंक्ति "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" गाना शुरू कर देते हैं। मैं झुंझलाकर कह बैठता हूँ, क्या बाबा आप भी एक साधारण सी पंक्ति को बार-बार पढ़ रहे हैं। आगे की पंक्तियाँ पढ़िए न !
मधेसर बाबा लंबी उम्र की थकान आँखों में भरते हुए गहरी साँस तानकर कहते हैं अब" न रहे वो पीनेवाले,अब न रही मधुशाला"। इसी पंक्ति में पूरी मधुशाला और मेरी जिनगी का सार छुपा है बेटा। मैंने कहा, अच्छा ऐसा भी क्या है इस पंक्ति में?
वो कहते हैं ध्यान से सुनो क्या ख़ास है इस पंक्ति में l हरिबंस बचन जी कहते हैं, "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला" l

मतलब अब पहिले जैसा पीनेवाले नहीं रहे। हमारे जमाना के लोग गजब पियांकी करते थे। अब हमहिं को देख लो पुरे सौ बीघा हमको जमीन मिला था बाँट के अपने पूर्वजों से लेकिन पी-पी के हम तीस बीघा कर दिए। पुरे सत्तर बीघा बेचकर अपने किडनी-लिवर का दारु से पटवन कर दिए ।तुम आजकल के लौंडे क्या पियांकी करोगे! अरे, बहुत कमाओगे तो तीस-पैंतीस हजार इसी रुपया में तुमको शहर के घर का किराया देना होगा,अपने बाइक का पेट्रोल भरबाना होगा ,बीबी के ब्यूटी-पार्लर का खर्च भी मेंटेन करना होगा और बच्चा लोग के स्कूल का फ़ीस भी देना होगा।

अब तुम्हीं हिसाब लगा लो महीना में कितना का पियांकी कर पाओगे सही से । बहुत एक्सेस कर पाओगे तो तीन हजार न चार हजार। इतना तो हमरा रोज का डोज था। क्योंकि हम अपने बेटे के पढाई-लिखाई और पत्नी के सिंगार-पटार जैसे फालतू चीजों पर कभी एक कौड़ी भी नहीं खर्च किये। सम्पूर्ण जिंदगी तन-मन-धन सबकुछ पियांकी पर न्योछावर किये। चखना में हमेशा केसर-बादाम ही खाये।

एक बात और है बेटा! तुम युवाओं में दारु पचाने का क्षमता भी नहीं है। एक बोतल बियर या छोटा पउआ में घोलट जाते हो,सुध ही नहीं रहता और फेसबुक पर गाली-गलौच कर बैठते हो। एक हम थे जो अपना बियाह में मड़वा पर फुल पी के बैठे थे। सिंदूर भी दिए थे उस समय फुल पी के टुन्न थे और सबसे मजेदार बात की किसी को भनक तक नहीं लगने दिए थे की पिये हुए हैं। अपने तीनों बेटे और सातों बेटियों का समधी मिलन भी फुल टुन्न होके किये थे। मुंह तक नहीं महका था हमारा क्योंकि तुमलोग की तरह गंध छुपाने के लिए हम क्लोरोमिंट-विक्स का चॉकलेट नहीं खाते थे बल्कि भर मुंह केसर फांकते थे। तुम्हारा केसर फांकने का औकात ही नहीं है ।

आज के तुम युवाओं का शरीर भी नहीं रहा पहले के लोगों जैसा। एक महीना सही से पीया नहीं की लिवर-किडनी सब में डिफेक्ट आने लगता है। एक हम हैं जिसका शरीर भले ही लचर-पचर हो गया है लेकिन गुर्दा-लिवर अभी भी अस्सी के उम्र में सलामत है।

अब "मधुशाला" भी नहीं रहा पहिले जैसा। जगह-जगह मधुशाला के नाम पर बियर-बार खुल गया है। बीयर-बारों में पियांकी के नाम पर जिस्म-फरोशी का अवैध धंधा चल रहा है। हमारे ज़माने में मधुशाला में शुद्ध पियांकी होता था। किसी का क्या मजाल था की साकी को कोई टच भी कर दे।

इसीलिए कहते हैं "अब न रहे वो पीनेवाले,अब न रही वह मधुशाला"।

उनकी बात खत्म होते ही मैंने कहा हाँ बाबा आप सही कहे, अब न रहे वो पीनेवाले ... अचानक पीछे से मेरे पिताजी दस्तक देते हुए कहते हैं क्या रे नालायक, क्या बात हो रही है? अब न रहे वो पीनेवाले? :O

मैंने झट से टॉपिक चेंज किया और बोला जी पिताजी वो गु .... गु ...
( मैंने बोलते हुए अक्सर फंस जाता हूँ :( )

पिताजी ने कहा, छी!!! ... छी!!!! "गू" पीने की बात हो रही है निठाह बुड़बक हो?
मैंने कहा नहीं वो गू ... गू .. गुस्सा पीने की बात हो रही है " अब न रहे वो पीनेवाले" मतलब अब के युवा पहले के लोग जैसा गुस्सा पीने में असक्षम हैं और बात-बात पर अपना आपा खो बैठते हैं। पहले वाले लोगों की तरह सहिष्णु और  संस्कारी नहीं हैं।

पिताजी खुश होते हुए बोले, वाह! तुम बहुत समझदार हो मैं हमेशा तुमपर गलत संदेह करता हूँ। वैसे अभी घर जाओ मम्मी भात पीने के लिए कब से बुला रही है।
मैंने कहा भात पीने के लिए? भात तो खाया जाता है न!

पिताजी बोले, हाँ! भात आजतक खाया ही जाता था लेकिन आज दस दिन बाद गाँव में बिजली आई और तुम्हारी मम्मी टीवी देखने के चक्कर में तीन सिटी की जगह सात सिटी लगबा दी। कूकर में पूरा भात लस्सी बन गया है । जाओ जाकर पीओ l

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