शनिवार, 20 अगस्त 2016

परसाई हास्य व्यंग्य पखवाड़ा–उधार प्रेम का फैवीकोल / भूतनाथ

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(परसाई हास्य-व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

व्यंग्य

उधार : प्रेम का फैवीकोल

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--भूतनाथ

 

आपने भी देखी होंगी छोटी-छोटी संदेश-पट्टियाँ दूकानों में कहीं भीतर किन्तु ऐसी जगह जहाँ हर एक की नज़र पडे। जी हाँ! वही जिन पर लिखारहता है — ‘आज नगद] कल उधार’, उधार प्रेम की कैंची है, आदि] आदि। हमें पता है कि दुनियां के बडे-बडे धन्धे ही नहीं देश तक भी उधार देव की कृपा पर हीचलते हैं अतः प्रथम दृष्टया तो हमें लगा कि ऐसी संदेश-पट्टियाँ तो किसी मन्दबुद्धि दुकानदार ने कभी किसी कारणवश उधार मिलने पर खिसिया कर यह पट्टिकाबनवा दी होगी। बस तभी से सारी दुनिया बिना सोचे समझे टाँकती रही है।

हमने तो इससे बडा और चीखता चिल्लाता झूठ और कहीं देखा नहीं। भला उधार जैसी बंधन बांधने वाली और प्रेम बढाने वाली बात भी कभी प्रेमकी कैंची हो सकती है? हमने बहुत सोचा और निराश होने से ठीक पहले वाले क्षण में उत्तर बिजली की तरह कौंध गया। हो हो यह किसी बडे उधार देने वाले कीसाजिश है कि छोटे उधार देने वाले कहीं प्रगति कर उसके बराबर हो जाएं। उनके विकास को रोकने के छोटे से किन्तु कारगर उपाय के रूप में ही इन संदेश-पट्टियों का आविष्कार हुआ लगता है।

सच पूछिए तो इस सारी सृष्टि के स्नेह संबंध जिस आधार पर टिके हैं वह उधार ही है। माता-पिता ने जन्म देकर अहसान किया हो या नहीं]उनका यह उधार चुकाने के लिए आदमी खून-पसीना एक कर देता है। कहाँ कटता है प्रेम? जीवनभर जनक-जननी की सेवा नहीं करता क्या? यह सब उधार की हीतो महिमा है।

                 और माता-पिता] वे बेचारे तो कर्ज के लेन-देन से उबर ही नहीं पाते। सन्तान को पढा-लिखा कर आदमी बनाने में भी तो उधार की दुधारी धारका योगदान है। धन का कर्ज लेना और स्नेह का तथा उत्तरदायित्व का कर्ज देना। सन्तान यदि लडका हो तो उसकी शादी के लिए लडकी के बाप को उधार लेने कोमजबूर करना। और यदि लडकी हो तो ख़ुद कर्ज लेने को मजबूर हो जाना। बहू पर अत्याचार के जो मामले सामने आते हैं वे असल में इसी तथ्य के तो साक्षी हैं किवहाँ किसी किसी मजबूरी के चलते उधार देवता अनुपस्थित हो गए और चल गई प्रेम पर कैंची।

नेता जनता के बीच प्रेम की गाडी भी तो उधार के बिना नहीं चलती। सच पूछें तो नेता बनने की प्रेरणा के स्रोतों की सूचि में उधार का भी नामहै। हमें किसी ने बताया कि कई लोग तो अपने बोहरों से तंग आकर ही नेता बनते हैं। राजनीति में तो कर्ज इतना व्याप्त है कि उसका दूसरा नाम उधार रख दें तोकोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जनता से वोट लिए जाते हैं ब्याज समेत लौटाने के नाम पर। किन्तु इस आश्वासन का कोई भरोसा नहीं है। कइयों का तो मूल धन हीडूब गया। यही देखकर कई स्थानों पर ब्याज पहले ले लिया जाता है और तब वोट रूपी मूलधन उधार दिया जाता है। जनता और नेता के बीच अटूट प्रेम की सबसेमज़बूत कडी ही उधार है और लोग हैं कि उसे ही कैंची बताते हैं।

व्यवसाई का व्यवसाय उधार पर टिका है। उधार की मात्रा जितनी बढती है उतना ही लेने और देने वाले के बीच प्रेम बढता है। यहाँ तक भी देखागया है कि उधार का प्रभाव क्षेत्र लेने-देने वालों के बीच ही सीमित नहीं रहता। वह अन्यों के बीच भी प्रेम संबंध स्थापित कर देता है। मसलन जब आपका और हमाराउधार-प्रेम बढता है] बढते-बढते इतना बढ जाता है कि आप हमारे घर प्रातः छः बजे भी चले आते हैं और रात बारह बजे भी। हम मिलें तो आपकी चिन्ता इतनीबढती है कि कहाँ] क्यों] कब] कैसे आदि सभी प्रकार के प्रश्न आप हमारे घर वालों से ही नहीं पास-पडोस वालों से भी कर लेते हैं। मान लीजिए कि प्रेम की उस चरमस्थिति में आपको यह ज्ञात हो जाए कि हमें किसी और को भी कर्जा चुकाना है। फिर देखिए कितनी आत्मीयता आपके और उन किसी और के बीच क्षण मात्र में बिनाकिसी उर्वरक के पनपने लगती है। और यदि ऐसा कोई और मिल जाए जिसे गलती से हमने उधार दिया हो तो प्रेम की लहरों की हिलोरें बादलों के कितने नज़दीक जापहुँचेंगी कहना कठिन है।

उधार प्रेम की कैंची हो हो] मस्तिष्क के लिए टानिक अवश्य है। उधार लेने के प्रथम क्षण से ही दोनों बुद्धियां सक्रिय हो जाती हैं समय परवापस लेने देने के विषय में। उधारदाता लेने वाले से तकाज़े के तरीकों पर बौद्धिक व्ययाम करते हैं और लेने वाला चुकाने के उपायों और चुकाने के बहानों पर।ज्यों-ज्यों चुकाने की तिथि निकट आती जाती है यह दिमागी कसरत सख़्त से सख़्ततर होती जाती है। बुद्धि का पैनापन बढता जाता है और बहानों तथा जोरजबर्दस्ती के तौर तरीकों के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार होने लगते हैं। हमारी विनम्र राय है कि सरकार को इन्नोवेशन के क्षेत्र में उधार आधारित प्रयोग करने परगंभीरता से विचार करना चाहिए। एक इन्नोवेशन का उदाहरण प्रस्तुत है।

राष्ट्रप्रेम के प्रस्फुटन के लिए उधार जैसी कोई खाद नहीं। एक दिन हम एक मित्र के यहाँ बैठे थे। हँसी-मज़ाक चल रहा था कि अचानक मित्रमहोदय की मुखमुद्रा झट से गंभीर हुई और फिर पट से उदास हो गई। इस झटपट गिरगिटीय बदलाव का कारण था एक नए महानुभाव का प्रवेश। हम भौंचक सेताक रहे थे! आने वाले ने पहले तो उनके उदास चेहरे को देखा। फिर उदासी की गहराई को देख खुद भी उदास हो गया। अब वहाँ दो भौंचक हो गए थे] हम और वह!कुछ देर के बाद वह आगे झुक कर हमारे मित्र से बोले ‘अग्रवाल जी! वह चैक मिल जाता।’

यह सुनते ही अग्रवाल जी की चितवन पहले तो गुस्से से तमतमा गई फिर तत्काल ही उनकी आंखें भर आईं] गला रुंध गया। गुस्से में तो उनकीबुलन्द आवाज़ में निकला] ‘आप आज चैक मांगने गए।’ सामने वाला फिर भौंचक कि उससे क्या भूल हो गई या कौनसा पाप हो गया। आज ऐसा कौन सा विशेषदिन है? वह कुछ पूछने की हिम्मत कर पाते उससे पहले ही श्री गिरगिटिया अग्रवाल जी ने रुंधे गले से कहा] ‘देश के राष्ट्रपति को गए तीन दिन भी नहीं हुए और आपचैक मांगने चले आए।’ कुछ आंसू टपके और फिर मुंह पोंछ कर] उदासी को और भी गहरा बना कर अग्रवाल जी उवाच्] ‘भाई साहेब! अपनी ही अपनी सोचते हैं याकभी देश की भी? देशप्रेम भी कोई चीज होती है। सारा देश शोक में डूबा है और आप हैं कि तकाज़े पर निकल पडे।’

मांगने वाले महानुभाव अपने उधार के डूबने की संभावना को दूर करने की भावना से प्रेरित हो शोकग्रस्त की सहानुभूति से तर हो गए। अपनेस्वर को सानुपातिक रूप से रुआंसा बना कर बोले] ‘अरे! अरे! धीरज धरिये अग्रवाल जी! आप ही कमज़ोर पड गए तो बाज़ार को कौन संभालेगा। मैं तो इधर से गुज़ररहा था] आप से दुआ-सलाम हो जाए इस लिए चला आया। चैक कहां जाता है] अगले सप्ताह जाएगा। आप तो अपने आपको संभालिए।’ और वे नमस्कार कर चलेगए और हम एक ही झटके में ओढी हुई उदासी से तारीफ की मानसिकता में फिसल गए। वाह! अग्रवाल जी] कमाल का इन्नोवेशन किया है बहानों के क्षेत्र में!

लेनदार आंखों से ओझल हुए और अग्रवाल जी तत्काल अपने आप संभल गए। हमारी ओर देख कर हॅंसते हुए बोले] ‘आप क्यों उदास हो गए] यहसब तो धन्धे का लेन-देन था।’ और उन्होंने निर्विलम्ब चाय-समोसा मंगा लिया। अन्ततः दो जने प्रसन्नचित्त। वे यों कि तकाज़ा आसानी से टल गया और हम यों किहमारी अवधारणा और भी पुष्ट हो गई कि उधार प्रेम की कैंची नहीं है वह तो फैवीकोल है] प्रेम के लिए ही नहीं देशप्रेम के लिए भी। और हमें लग रहा है कि वे चैक कातकाज़ा करने वाले महानुभाव अब दर-दर भटक रहे होंगे कि कहीं से देशप्रेम उधार मिल जाए!!!

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सुरेन्द्र ¨थरा, 3968 रास्ता ¨ती सिंह ¨मियान, जयपुर&302003

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Surendra Bothra

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