सावन की कविताएँ

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अर्जुन सिंह नेगी

ऋतु सावन की

मेघ जल बरसा रहे

धरती की अग्न मिटा रहे

कलि कलि मुस्का रही

किसान ख़ुशी से झूम रहे

अपने खेतों को चूम रहे

पशुओं की आवाज आ रही

इन्द्रधनुष की छटा देखो

काली काली घटा देखो

हवा कोना कोना महका रही

वर्षा की चर चर लगी

मेंढकों की टर टर लगी

कोयल भी गीत गा रही

बादलों की गर्जन कहीं दूर

नाच रहे वन में मयूर

प्रकृति स्वयं को सजा रही

ऋतु सावन की सुहानी है

ये ऋतुओं की रानी है

‘अर्जुन’ को अत्यंत भा रही

अर्जुन सिंह नेगी

नारायण निवास, ग्राम व डाकघर कटगाँव

तहसील निचार जिला किन्नौर (हि० प्र०)

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प्रिया देवांगन "प्रियू"

रिमझिम रिमझिम गिरता पानी

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रिमझिम रिमझिम गिरता पानी
छमछम नाचे गुड़िया रानी
चमक रही है चमचम बिजली
छिप गईं है प्यारी तितली
घनघोर घटा बादल में छाई
सबके मन में खुशियाँ लाई
नाच रहे हैं वन में मोर
चातक पपीहा करते शोर
चारों तरफ हरियाली छाई
सब किसान के मन को भाई
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रचना
प्रिया देवांगन "प्रियू"
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )
मो नं -- 7697282458
Email -- priyadewangan1997@gmail.com

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राकेश रौशन

प्रेम का मौसम

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बहे पवन पुरवाई सिहर-सिहर बदन
सिहर जाती है!
हो कौन सा देश बसे प्रियतम मेरे
बहुत याद तुम्हारी आती है!

नदिया नाले घाट टटोले
बंद दिल के दरवाजे खोले!
बंजारे की जीवन बन गई
आह निकलती पर जुबां ना बोले!
लोग कहे बौराना हो गई
देख-देख मुस्काती है
हो कौन सा - - - - -

बसंत गई बीत गई अदरा
ग्रीष्म बीती बीत गई बदरा!
बारह मास छः ऋतु बीती
रंगोली गीली छोर दी भीती!
हमें भी आस है तुम आओगे
ऐसा सब समझाती है
हो कौन सा - - - - -

नीर पराई हो गई मेरी
किसे साथ अब कहूं!
बिस्तर छुट्टी बिरह में तेरे
तुम ही बताओ अब कैसे रहूं!
सौतन बन गई रात हमारी
नींद कहां अब आती है
हो कौन सा देश - - - - -

राकेश रौशन  ( मनेर पोस्ट ऑफिस पटना )

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1 टिप्पणी "सावन की कविताएँ"

  1. बहुत सुन्दर नवांकुर की सावनी कविताएँ ..
    प्रस्तुति हेतु आभार

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