रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

चंद्रलेखा की लंबी कविता - वह तस्वीर

image

वह तस्वीर ...


चटकीले नीले आसमान पर
तैरते छोटे-छोटे स्वप्नों से बादल
प्राची की सुनहली सतरंगी आभा में
स्वच्छंद विचरते पंछी
श्वेत हिमाच्छादित  गिरिशिख्ररों से
बहती एक नदी भी बनायीं है मैंने
शांत निश्छल चीड़ और देवदारों से
झांकती सुनहली आभा 
सरिता का लहराता स्वर्णिम
नीलाभ चंचल जल
 
गोबर मिट्टी से लिपे हुए
घर भी बनाये हैं मैंने
धुएं और रोटी की सोंधी महक
तस्वीर से निकल समां रही है
मेरे नथुनों में ...
किसानों के साथ कदमताल करते
बैलों की घंटियाँ सुनाती हैं 
अज़ान और मंत्रों के छन्द
पनघट से आती, घूंघट में लजाती, सुकुमार गोरियाँ
सर पर अपने भार उठाये हों जैसे
देश की सभ्यता औ 'संस्कृति का...
उछलता कूदता चौकड़ी भरता
हिरणों का वह नटखट झुंड,
नाचते मयूरों का रूपाभ गर्वीला स्वर
हरे नीले पीले रंगों से सजी धरा और 
हवाओं  में बहती सीली मादक सुगंध को
रंग में  रंग दिया  मैंने 
अपनी इस तस्वीर में ...
तभी अचानक; काँप उठी कूंची 
होने लगा तिरोहित
पीला हरा और नीला रंग
घुलने लगा नया रक्ताभ काला रंग
गायब होने लगे वे स्वप्नदर्शी बादल
मिटने लगी स्वर्णिम आभा 
मधुर घंटियाँ वे ?? नहीं, नहीं,
चीख, पुकार ,कराहटों के स्वर
सुनाई दे रहे थे
हरे- भरे खेत, वन ,बाग़
गायब हो रहे थे
उभरने लगे थे
पत्ते, फल, फूल, तितलियों  से रहित
कंक्रीट के जंगल ठूंठे
शेष रह गया अब
गाड़ियों, कौवों और मोबाइलों का शोर
रोटी की सोंधी महक भी
बदबूदार मैली हो चुकी थी
बदल रही थी तस्वीर ;
अब तक जो मैंने बनायीं थी
 
मैं हैरान और परेशान
खोने लगी नियंत्रण
अपनी ही कूंची पर
बना रही थी कुछ...
बन जाता था कुछ और ही...
धुंधला और भयानक-सा नया एक चेहरा
उभरने लगा था 
दहकते अंगारों -सी बड़ी-बड़ी लाल आँखें ,
वीभत्स ,टेढ़े मेढ़े होठों से
टपकता लहू जैसा एक  रंग
अचंभित, डरी हुई मैं,
मिटा लगी तेजी से
अपने ही इन अजनबी रंगों को ;
 
तभी उसके होठ हिले,
कुछ अनजाने स्वर कहने लगे ;
''रे नादान! आसान नहीं ,
मानव को मानव बनाना,
सृष्टि के रंगों को
सुन्दर सतरंगी बनाना;
भ्रम है, सिर्फ भ्रम है तुम्हारा;“
खौफनाक हंसी हंसा रहा  था वह
मानव ! सर्व शक्तिमान ?
''ह्रदय की बातें, मिथ्या बातें,
शक्तिशाली है उसके भीतर बैठा पशु;
नुकीले दांत, पैने पंजे
फाड़ डालेंगे, न बनने देंगे कभी
सुहानी तस्वीर ये तुम्हारी "
 
तेजी से रंग भरने लगी
मैं अपनी तस्वीर में 
हरा नीला पीला सफ़ेद और गुलाबी
लेकिन;
उभर रहा था केवल...
बस केवल... एक लाल रंग
अथक परिश्रम मेरा
सब व्यर्थ हो रहा था
पसीने से तर ब तर मैं;
चुपचाप खड़ी  देखती  रही 
तस्वीर अपनी 
जो मैंने नहीं बनायीं थी ...

  =================
      चंद्रलेखा,
M-S/16, सेन्ट्रल गवर्नमेंट क्वाटर्स, टाइप-5, आठवां तल, 21- रिची रोड   कोलकाता -700019 I

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget