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परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - बाबओं के खेल / व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

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(परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

  आओ, बाबा-बाबा बने और खेलें।

व्यंग्य

अशोक जैन पोरवाल

मैं अपने घर में बिना ड्राइंग वाले ड्राइंग रूम में बैठा टी. वी. देख रहा था। 'तिल का पहाड़' बनाने वाले एक समाचार चैनल पर तथाकथित बाबाओं के संबंध में एक कार्यक्रम चल रहा था। जिसमे बतलाया और दिखलाया जा रहा था कि किस तरह से हमारे देश में बाबाओं की भूमिकाऍ रही है?.......तब सदियों पहले हमारा देश विश्व में महान हुआ करता था, देवी-देवताओं के अवतार लेने के कारण! बाद में महान रहा, अपने देश में सच्चे साधु-संतों एवं महापुरूषों के जन्म लेने के कारण। और अब........आज महान है, अपने देश में तथा-कथित बाबाओं के पैदा होने के कारण?

इधर, कार्यक्रम देखते-देखते मैं सोचने लगा सच है, वर्तमान में हमारे महान देश में जितने 'दादा' नहीं है, उससे कहीं अधिक 'बाबा' है। समान्यतः 'दादा' सिर्फ दो ही प्रकार के होते है। पहला, घर का 'दादा' यानि कि बड़ा भाई। दूसरा, गली का 'दादा' यानिकि गुंडा-मवाली। घर में 'दादाजी' को रिश्ते की दृष्टि से यदि देखा जाए तो जब किसी व्यक्ति को उसके पोता-पोती सम्बोंधित करते है, तो वो व्यक्ति स्वतः ही 'दादा जी ' बन जाता है। जबकि 'बाबा' बनने के लिए किसी रिश्ते की आवश्यकता नहीं पड़ती है। क्योंकि, बाबा स्वतः ही रातों-रात.........मौसम-बेमौसम .......बरसाती मेंढकों .......कुकरमुत्तों.....बेशरम की झाड़ियों की तरह गलीयों-मोहल्लों.......गॉवों शहरों.........जंगलों-पहाड़ों पर कहीं भी.........कभी भी पैदा हो जाते हैं।

''बाबा'' अपने विचित्र नामो-कारनामों......दशाओं-मनोदशाओं के अनुसार अपना नामकरण कर लेते हैं। जैसे.......रांई-बाबा, पहाड़-बाबा, जंगल-बाबा, लक्ष्मण-बाबा, नीर-बाबा, निर्मन-बाबा, निरंजन-बाबा, धूनीवाले-बाबा, भभूतवाले-बाबा, मौनी-बाबा, लंगड़े-बाबा, भेडे-बाबा, काने बाबा, चन्द्रमुखी-बाबा, कलमुंही-बाबा, ढौंगी-बाबा। आदि-इत्यादि।

''बाबा'' कई प्रकार के होते हैं अथवा हो सकते हैं। जो कि उनके नैतिक-अनैतिक व्यवहार अथवा आचरण.........उनके कद-काया और कोठी.....ग्रेड अथवा कैटेगिरी पर निर्भर करते हैं। नैतिक दृष्टि से-सामान्यतः किसी भी वृद्ध व्यक्ति को 'बाबा' का सम्बोधन दूसरे लोगों द्वारा दिया जाता है। व्यवहारिक दृष्टि से प्रायः वृद्ध एवं अंजान भिखारी से पीछा छुड़ाते हुए......कहा जाता है, ''बाबा'' माफ करो। ''ग्रेड अथवा कैटेगिरी या फिर एरिया के अनुसार जैसे-'' छुटभैय्या-बाबा''। ऐसे बाबा अपनी गली-मौहल्लें से लेकर अपने गॉव-शहर तक ही अपनी औकात रखते है। जो कि उसी स्तर पर लोगों की आम-परेशनियों जैसे- असफल दाम्पत्य जीवन, व्यापार में घाटा, नौकरी में रूकावटें आदि को दूर करने को दावा करते हैं। फिर ऐसे परेशान लोगों को मूर्ख बनाकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। इसी

प्रकार से प्रदेश अथवा देश स्तर के बाबा भी पाये जाते हैं। जो कि अपने-अपने स्टेन्डर्ड के अनुसार लोगों को ठग कर उनका आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक शोषण करते हैं। कुछ बाबा किस्म की नस्ल के प्राणी अपने-आपको अलग एवं विशेष मानते हुए अपने नाम के आगे ''स्वामी'' शब्द भी लगाते हैं जैसे-सूर्या-स्वामी........पट्ठा-स्वामी.....छपट्टा-स्वामी आदि-इत्यादी।

उधर मेरे ड्राइंग-रूम के बाहर छोटे से ऑगन में मेरा आठ वर्षीय पोता अपने कुछ मित्रों के साथ खेल रहा था। सभी की आवाजें मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थी। उसका बारह वर्षीय एक मित्र बल्लू अपने सभी मित्रों से कह रहा था............''आज हम-सभी लोग एक नया खेल खेलते है। जिसका नाम है, ''आओ, बाबा-बाबा बने और खेलें। ''यह सबसे सरल खेल है, क्योंकि इसे खेलने के लिए अब किसी भी प्रकार के मेकअप........गेटअप.........सेटअप की जरूरत नहीं पड़ती है......।'' ''बल्लू'' की बातें सुनकर मैंने उसे अपने पास बुलाया और इस खेल के संबंध में विस्तृत रूप से पूछने लगा। बल्लू ने उत्तर दिया ''दादाजी आप जो ये टी.वी. कार्यक्रम देख रहें है। उसे मै कल इसी चैनल पर पूरा देख चुका हॅू। मुझे यह कार्यक्रम इतना पंसद आया कि इसे आज ही खेलने और खिलाने लगा हॅू। दादाजी देखिये अभी दो मिनिट के बाद ही इसमें एक परिचर्चा दिखलाई जाएगी। जिससे बाबाओं के संबंध में बतलाया जायेगा''-कहते हुए बल्लू पुनः खेलने चल दिया।

थोड़ी ही देर में बाबाओं के संबंध में उस चैनल पर परिचर्चा शुरू हो गई। जिसमें एक समाज-शास्त्री, एक मनोविशेषज्ञ, एक राजनेता, एक पत्रकार एवं एक संत थे। जो कि क्रमशः अपने-अपने विचार रख रहे थे। सर्वप्रथम प्रसिद्ध समाजशास्त्री ने अपने विचार रखे। तदानुसार हमारे देश का आम-आदमी इतना अधिक अंधविश्वासी होता है, कि वो दूसरों के कहने पर रास्ते में पड़े पत्थर को भी भगवान समझकर पूजने लगता है..........'दर्जन-बाबा' को भी 'सज्जन-बाबा' मानकर उनकी जी-जान से सेवा करने लगता है। मनोविशेषज्ञ ने बोलते हुए कहा कि हमारे देश का आम आदमी गरीब अथवा मिडिल क्लास होता है। इसलिए वो रातों-रात करोड़पति बनना चाहता है। जिसके कारण वो बाबाओं की शरण में पहॅुच जाता है। राजनेता ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हमारे देश में आम-आदमी इतना लालची एवं चमत्कार को नमस्कार करने वाला होता है, कि वो अपना धन सोना-चांदी......रूपया.......पैसा आदि चमत्कार से दुगना-चौगुना होने के लालच में बाबाओं से लूट जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार ने एक आम-आदमी का भोलापन......उसका सीधापन को कारण बतलाया। जिसके कारण बाबाओं की हमेशा चॉदी ही रहती है। अतं में एक मठ के संत बोले-हमारे देश में आई बाबाओं की बाढ़ का प्रमुख कारण एक आम-आदमी का अपनी पुरानी मान्यताओं..........परम्पराओं.........रीति-रिवाजों में जकड़ा होना है। उसकी अशिक्षा भी प्रमुख कारण है। उपरोक्त विभिन्न विचारों को सुनकर मुझे तुरंत ही समझ में आ गया कि, क्यों 'बल्लू' जैसा एक बालक भविष्य में बाबा बनने के प्रति इतना आकर्षित हुआ है? और अभी से 'बाबा-बाबा' खेल रहा है।

समाप्त

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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