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जरूरी है स्वाध्याय / हरदेव कृष्ण

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हिन्दी साहित्य के संदर्भ में इस बात का रोना रोया जाता है कि पाठक नहीं है। खासकर बालकों के संदर्भ में। लेकिन यह धारणा पूरी तरह सत्य नहीं है। अध्ययन की वृति कम अवश्य हो रही है, लेकिन हालात ऐसे नहीं है कि यह बिल्कुल मर चुकी है। अच्छा लिखा जाए और उसे विद्यालयों, पुस्तकालयों की मदद से सर्वसुलभ करवाया जाए तो परिणाम बहुत अच्छे आ सकते हैं। ईमानदार और योग्य प्रकाशक उचित दामों में इसे जनता व छात्रों तक पहुंचा सकते हैं। सब के सहयोग से एक जमीन तैयार करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए व्यवसाय करने वालों को देखिए। वे जनता की आवश्यकताओं और रुचियों को पहचानते हैं। फिर उन के अनुकूल उत्पाद तैयार करके बाजार में उतारते हैं। यह सब एक संगठित तरीके से करते हैं। पाठ्यप्रेमी एकजुट हो जाएं तो इस दिशा में अच्छा काम हो सकता है। हमारे किसी सुदूर गाँव में एकाध शराब की (वैध-अवैध) दुकान अवश्य मिल जाएगी, पान-बीड़ी और कोल्ड ड्रिंक्स की दुकानें मिल जाएगी पर पुस्तक-पत्रिका तो क्या किसी अच्छे अखबार की झलक पाने के लिए भी तरस जाएंगें। क्योंकि हमने पठन-पाठन का वातावरण तैयार करने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया है। न सरकार ने न सामाजिक संगठनों ने।

मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि सतसाहित्य का अध्ययन करने पर कई प्रकार के विकार दूर रहते हैं। अच्छी सामग्री पढ़ने का मतलब है - लाभ ही लाभ। सही अध्ययन के लिए उचित साहित्य परम आवश्यक है, वरना साहित्य के नाम पर स्तरहीन सामग्री भी बहुलता में पसरी हुई है। बात अगर बच्चों को ध्यान में रख कर की जाए तो बहुत सावधानी की आवश्यकता है। उन्हें सारहीन, ऊबाऊ और गैर जरुरी चीजें पढ़ने को मिली तो उनके अध्ययन की रुचि नष्ट होना स्वाभाविक है। उनकी मनोदशा के अनुकूल साहित्य उपलब्ध करवाना हम सब का कर्तव्य है, यानि अभिभावक, अध्यापक और लेखक-प्रकाशक। माता पिता का फर्ज़ होना चाहिए कि वे अपने बच्चों को अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करें।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है उसकी रुचियों में भिन्नता आती जाती है। वह जिज्ञासु होने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक परिवर्तनों से भी गुजरता है। तदअनुसार उसे अध्ययन सामग्री मिलनी चाहिए। अगर हमने पढ़ने-पढ़ाने को गैरजरुरी कार्य समझा तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। बच्चों में यह आदत डालने का अर्थ है कि हम एक अच्छे जीवन की नींव तैयार कर रहे हैं। दैनिक अनुशीलन से उनकी एकाग्रता में वृद्धि होगी, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में उसे सफलता दिलाएगी। प्रसिद्ध लेखिका मृदुला गर्ग ने कहा है कि साहित्य को जीवित रखने के लिए सबसे जरुरी है, किशोरों में उसे लोकप्रिय बनाना। इस बात का भी ध्यान रखना है कि स्कूलों में जो साहित्य पढ़ाया जा रहा है , वह बोझिल न हो और अप्रासांगिक कथ्यों पर न हो कर आज के जीवन पर हो, जिससे उसमें बच्चों की रुचि बने। किशोर अवस्था में ही साहित्य पढ़ने की नींव पड़ती है। वरना ताउम्र यह दिलचस्पी आदत नहीं बन पाती।

हिन्दी साहित्य को पढ़ने वाले पहले भी थे , आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। बस शर्त यही है कि लेखन प्रभावशाली हो। पाठक की रुचियों का परिष्कार हो, उसे प्रेरणा मिले, स्वस्थ मंनोरजन मिले। बोझिल, पहेलीनुमा और अत्यधिक विद्वता से लदा लेखन आम पाठकों को साहित्य से बांध नहीं सकता। उसमे यदि पढ़ने की आदत का विकास नहीं होगा तो वह पूरी तरह गुणवान और अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी नहीं बन सकता। नेहरु ,गांधी जैसे शताब्दी पुरुषों की घोरत्तम सफलता के पीछे उनकी अध्ययन प्रवृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अधिकाँश विद्वानों के अनुसार साहित्य का कोई न कोई उद्देश्य होता है। और उसका सर्वप्रथम लक्ष्य यही है कि मानव उसका साथ पा कर अपनी रुचियों, जीवनशैली और कार्यशैली को सुधारे। ऐसे साहित्य का स्वागत अवश्य होता है, इसी कारण प्रेमचन्द, शरतचन्द्र , जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार आज भी खूब पढ़े जाते हैं। अच्छा साहित्य रचने वालों को आज भी पढ़ा जाता है। एक लेखिका ने सही कहा है कि कुछ पन्ने पढ़ लेने पर आगे पढ़ना ही न चाहे या हिन्दी के कुछ लेखकों को पढ़ लेने पर हिन्दी साहित्य के प्रति अरुचि हो जाए तो क्या लेखक दीमकों के लिए लिखेंगे?

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हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक-मल्लाह -134102

जिला पंचकूला (हरियाणा)

m 9896547266

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