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दाना मांझी के नाम एक पत्र - शशिकांत सिंह 'शशि'

दाना मांझी के नाम एक पत्र
भई दाना मांझी
       नमस्कार
       उम्मीद है कि अगले चुनावों तक तुम सुकशल रहोगे। रहना भी चाहिए आखिर चुनाव एक लोकपर्व है और गरीब आदमी पर्वों के बल पर ही जिंदा है। सबसे पहले तुम्हें सलाम कि तुमने कालाहांडी को एकबार फिर टी वी न्युज के लायक बना दिया। टी वी बेचारी गाय पर बहस करते-करते थक गई थी। भूख से हुई मौतों के कारण इसी कालाहांडी ने पूरी दुनिया में यश लूटा था। विदेशी लेखकों ने आकर गरीबी पर किताब लिखी थी। यही कालाहांडी है जिसके लिए कहा गया था कि वहां गरीबी नहीं है।

लोग आम की गुठली खाकर आराम से जी सकते हैं। यह तुमपर भी लागू होता है। गंभीरता से विचार करने पर तुम्हारी गलतियां सामने आती हैं। अस्पताल ने तो वही किया जिसके लिए वह जानी जाती है। एक बच्ची अस्पताल के लाईन में खड़ी थी। उसने दम तोड़ दिया। अस्पताल ने उसका नाम अपने रजिस्टर में दर्ज कर लिया। उसने तुम्हारी पत्नी का नाम भी रजिस्टर में दर्ज कर लिया होगा। उन्हें नाम रजिस्टर में दर्ज करने के एवज करोड़ों रुपये मिल जाते हैं। यह न समझना कि मैं अस्पतालों की निंदा कर रहा हूं।

अस्पताल का काम पोस्टामार्टम करना है। वह जिंदा आदमी को भी मुर्दा मानकर उसके ऑफिसियली डेड होने का इंतजार करते हैं ताकि सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में पोस्टमार्टम किया जा सके। वहां डॉक्टर नाम की मशीने होती हैं जिनका काम मरने के बाद बयान देना होता है। उन्होंने तुम्हारे मामले में भी बयान दिया कि भई गाड़ी के इंतजाम होने तक दाना रुका ही नहीं। बात भी सही है। पहली बात तो तुम्हारी पत्नी को गाड़ी के इंतजाम होने के बाद ही मरना चाहिए था। डॉक्टर आते, कहते, गाड़ी का इंतजाम हो गया तो अपने प्राण छोड़ देती। अस्पताल की गलती तो नहीं दिखती। तुम्हारा दूसरा आरोप कि अस्पताल ने तुमसे सारे पैसे ले लिये। प्रथम दृष्टया यह गलत लगता है क्योंकि तुम्हारे बदन पर कपड़ा है। तुम्हारी पत्नी भी कपड़ों में लिपटी है। तुम्हारी दस साल की बेटी के पांव में एक स्लीपर है। प्राप्त सबूतों से यह साफ हो जाता है कि सरकारी अस्पताल अभी भी संवेदनशील हैं। उनकी मानवता जिंदा है।

मानवता से याद आया कि जो आदमी इस पूरे प्रकरण की वीडियो बना रहा था जो बाद में मीडिया के काम आया। उस महामानव का अभिनंदन तो रामलीला मैदान में पूरी धूमधाम से किया जाना चाहिए। उसने जो वक्त वीडियो बनाने में लिया उतने में दस आदमी एकत्र कर सकता था। वीडियो से तो नहीं लगता कि तुम रात के अंधेरे में हो। यानी दिन के उजाले में राहगीरों के द्वारा तुम्हारी शूटिंग की जा रही थी। रोड के किनारे दर्जनों लोग दिखाई दे रहे हैं। उनका भी अभिनंदन। आज यदि दाना मांझी के नाम पर जुलूस निकालना हो तो हजारों लोग निकल पड़ेंगे लेकिन उस समय सिवा पुरुषोत्तम भाई के कोई आगे नहीं आया। यह जुलूशधर्मी देश है। कभी अभया के नाम पर तो कभी निर्भया के। रेप के समय तो बचाने कोई नहीं आयेगा लेकिन जुलूस में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे।


       तुम्हारी पत्नी ने मरकर एक बार फिर इस बहस का हवा दे दी कि आदिवासी वाकई गरीब ही होते हैं। उन्हें जंगलों में रहने और आम की गुठलियां खाने का शौक नहीं होता। सरकार बेचारी तो जानती ही है लेकिन क्या करे। आदिवासियो के नाम पर तो वोट मिलते नहीं हैं। वोट तो मिलते हैं गाय, तिरंगा, और राम के नाम पर। कांग्रेस की सरकार होती तो मगरमच्छ तुम्हारे साथ जाकर फोटो खिंचवाकर आंसू बहा आये होते। राजधानी में आते ही किसी न किसी परियोजना की शुरूआत तुम्हारे नाम पर किया जाता। वह तुम तक तो कभी नहीं पहुंचता लेकिन कांग्रेसी चुनाव प्रचार में तो काम आ जाता। कांग्रेस हाथ मलकर रह गई होगी। उसके हाथ से इतना हसीन मौका निकल गया।

बहरहाल, सत्ता और सरकार की कोई गलती नज़र नहीं आती। सत्तर साल के बाद एक आदमी की जेब में उसकी पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं है तो यह उसकी गलती है। यदि वह गरीब है तो उसने शादी क्यों की ? वह वोटर है वोटर की तरह रहे आदमी बनने की कोशिश न करे। यही सिस्टम के साथ बगावत माना जाता है। सिस्टम के साथ बगावत करने का अर्थ है कि माओवादियों की सूची में नाम दर्ज हो जायेगा। आदिवासी होने का अर्थ तो वैसे भी माओवादी होना ही होता है। आदिवासी गरीब हो तो स्वाभविक है। वह भूख से मरे तो नेचुरल है। वह बारह किलोमीटर अपनी पत्नी की लाश लेकर चले तो दुस्साहसी है।

यह दुस्साहस ,टीवी न्युज के लिए, समाचार बेचने के लिए, साहित्यिक सामग्री के लिए और चुनाव प्रचार के लिए तो ठीक है लेकिन सिस्टम के खिलाफ खड़ा होने की बात गलत है। सिस्टम आज न कल तो सुधर ही जायेगा। इंतजार करना ही सच्चा लोकतंत्र है। यह सरकार आई चली जायेगी। दूसरी आकर चली जायेगी। सत्तर साल गुजरे हैं। एक सौ सत्तर साल गुजर जायेंगे। धैर्य रखो दाना मांझी।

यह कथा तुम्हारी लोगों ने देख ली नहीं तो अनेक दाना होंगे जो चुपचाप अपनी पत्नी की लाश कंधे पर लिये चल रहे होंगे। खैर, पत्र लंबा हो रहा है। टी वी पर आने के लिए बधाई। अब सारी बहस दाना मांझी पर होगी आदिवासी जीवन या कालाहंडी पर नहीं। जय हिंद जय भारत।


                                                शशिकांत सिंह 'शशि'
                                                            जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल-skantsingh28@gmail.com

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धैर्य बहुत जरूरी है । मनुष्यता ने धैर्य रख लिया है क्या कम है ? सटीक ।

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

कमाल का व्यंग्य जो गहराई तक चुभता है और जो पीड़ा को आत्मसात करने पर ही लिखा जासकता है .

बेनामी

आपने बहुत सही बात कही है और एक गरीब की पीड़ा को बयां किया है सचमुच गरीब का कोई नही होता कोई भी नही

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