गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कान्हा की कविताएँ

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष

हमारा कान्हा कहां खो गया


हमारा कान्हा कहां खो गया,
खूब मस्तियां हुईं,
खूब रंग उडे,
लेकिन जिंदगी का ठहराव कहां खो गया,
हमारा कान्हा कहा खो गया ।

गोपियों का इंतज़ार आज भी,
राधा की मुस्कान आज भी,
लेकिन वो सच्चा प्यार कहाँ खो गया,
हमारा कान्हा कहाँ खो गया ।

यशोदा की चिंता आज वही,
नंदा का विश्वास आज वही,
लेकिन माता पिता का सम्मान कहां खो गया,
हमारा कान्हा कहां खो गया ।

दोस्तों की टोलियां आज भी,
मर मिटने की बाते आज भी,
लेकिन वो सच्चा दोस्त कहां खो गया,
हमारा कान्हा कहां खो गया ।

बाते तो बहुत हो गयी कान्हा की,
लेकिन कल के कंस और
आज के कान्हा में
अंतर क्या रह गया ।।

दीप्ति सक्सेना
जयपुर।
9024081336
8432474935
--


 

राधा प्रेम(सार छंद)


मोर मुकट पीताम्बर पहने,जबसे घनश्याम दिखा
साँसों के मनके राधा ने,बस कान्हा नाम लिखा

राधा से जब पूँछी सखियाँ,कान्हा क्यों न आता
मैं उनमें वो मुझमे रहते,दूर कोई न जाता

द्वेत कहाँ राधा मोहन में,यों ह्रदय में समाया
जग क्या मैं खुद को भी भूली,तब ही उसको पाया।

वो पहनावे चूड़ी मोहे,बेंदी भाल लगावे
रोज श्याम अपनी राधा से,निधिवन मिलवे आवे

धन्य हुईं सखियाँ सुन बतियाँ,जाकी दुनिया सारी
उंगली पे नचे राधा की,वश में है  गिरधारी

चंचल चितवन मीठी वाणी,बंशी होँठ पे टिका
रीझा ही कब धन दौलत पे,श्याम प्रेम दाम बिका

नेत्र सजल राधा से बोले,भाव विभोर मुरारी
अब मोहन से पहले राधा,पूजे दुनिया सारी।

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सपना मांगलिक

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