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खेल संघों में न हो नौकरशाही और राजनीति ० ठोस और पारदर्शी रणनीति की जरूरत / सूर्यकांत मिश्रा

29 अगस्त खेल दिवस पर विशेष...
खेल संघों में न हो नौकरशाही और राजनीति
० ठोस और पारदर्शी रणनीति की जरूरत


ओलंपिक खेलों के 31वें आयोजन ने हमें इस चिंतन में डाल दिया है कि क्या वास्तव में इस लायक भी नहीं रहे कि एक स्वर्ण पदक पाकर भी गर्व का अनुभव कर सकें! इससे पूर्व सन 2012 में संपन्न ग्रेड ब्रिटेन ओलंपिक ने हमने पहली बार दो रजत और चार कांस्य पदक के साथ कुल 6 पदक पाकर आगामी ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करने की कसमें खाई थी। इससे एक कदम और पूर्व 2008 में 29वें ओलंपिक आयोजन में बीजिंग में हमने निशानेबाजी में स्वर्ण जीतकर एक नई उम्मीद की जगाई थी। अभिनव बिंद्रा ने अपने निशानेबाजी का लोहा मनवाते हुए स्वर्ण पदक प्राप्त देशों की सूची में भारत वर्ष का नाम जुड़वा दिया। पिछले दो ओलंपिक की तुलना में रियो का 31वां ओलंपिक आयोजन हमारे के लिए शर्मनाक स्थिति का पर्याय रहा है। वह तो थोड़ी किस्मत अच्छी थी कि पीवी सिंधु और साक्षी मलिक ने क्रमश: बैडमिंटन और कुश्ती में रजत और कांस्य जीतकर देश की मिट्टी पलीद होने से बचा लिया। पिछले 3 आयेाजनों में हमने लगातार अपने खेलों और खिलाडिय़ों की कमर टूटते ही देखा है। अब पुन: उस राग को अलाप रहे है कि 2020 के 32वें ओलंपिक टोक्यो में अपनी गलतियों को सुधारते हुए अच्छा प्रदर्शन करेंगे।


भारतवर्ष में खेलों को महत्व देने और खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के उद्देश्य से ही सन 1982 में ‘खेल एवं युवक कल्याण मंत्रालय’ की स्थापना की गयी थी। मुझे नहीं लगता कि अपनी स्थापना के 34 वर्षों बाद भी हम मंत्रालय सरकार की मंशा पर खरा उतरा हो। इस मंत्रालय के अस्तित्व में आने से पूर्व 1970-71 में भारत सरकार के युवा मामले एवं खेल विभाग द्वारा ‘ग्रामीण खेल कार्यक्रम योजना’ ने भी अमलीजामा पहना था। 46 वर्ष बाद उक्त योजना का योगदान खेलों के निखारने में कितना रहा है। इसे ज्यादा बताने की जरूरत शायद नहीं है। कारण यह कि स्थिति आईने की तरह साफ है। खेलों में विशेष कुछ न कर पाने का दर्द समय समय पर योजनाकारों को कुरेदता रहा है। खेलों को वास्तव में संस्कारों की कड़ी मानते हुए सन 1984 में बनायी गयी ‘राष्ट्रीय खेल नीति’ को संशोधित और पुष्ट करते हुए सन 2001 में नई राष्ट्रीय खेल नीति बनायी गयी। इस खेल नीति ने भी खेलों को कितना बढ़ावा दिया, अथवा कितने प्रतिभाशाली खिलाड़ी पैदा किये यह भी स्पष्ट है। इतना जरूर हुआ कि खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए बनायी गयी इन योजनाओं ने खिलाडिय़ों के हौसले जरूर बढ़ाए किंतु लक्ष्य को पाने में हम हर क्षेत्र में असफल ही रहे हैं।


अत्याधुनिक युग में जीवन यापन कर रहे आम लोगों को इस बात पर विश्वास करना होगा कि खेलों का महत्व न तो पहले कम था, और न ही आज। वर्तमान में परिवेश में व बदली जीवन शैली में आज मनुष्य अनेक रोगों से ग्रसित हो रहा है। खेलों द्वारा न केवल हमारी दिनचर्या नियमित होती है, बल्कि उच्च रक्तचाप, ब्लड शुगर, मोटापा, हृदय रोग जैसी बीमारियों की संभावनाएं भी कम होती है। खेल ही एक ऐसी विधा है जिससे हम स्वयं को चुस्त दुरूस्त रख पाते है। साथ ही खेलों कें हमारे अंदर सामूहिक चेतना का विकास होता है। कोई भी खेल अकेले ही नहीं खेला जा सकता है, अन्य साथियों का साथ जरूरी होने से ‘एकला चलो’ की आधुनिक मनोवृत्ति को खारिज कर हमें लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने में खेल का बड़ा सहयोग मिलता रहा है। खेलों के महत्व को समझने के बावजूद वर्तमान समय में खेलों का नकारात्मक पहलू यह है कि मनोरंजन के नये साधनों और भविष्य निर्माण की भाग दौड़ ने खेल मैदानों में उमडऩे वाली खिलाडिय़ों की भीड़ से लेकर दर्शकों तक की संख्या को कम कर दिया है। बच्चे हो या युवा घंटों वीडियो गेम या मोबाईल अथवा कम्प्यूटर पर खेल खेलना पसंद कर रहे है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और घटती नौकरियों ने हमारे युवाओं के माथों पर चिंता की लकीरों को गाढ़ा कर दिया है।


खेल संघों के गैर व्यवसायिक रवैय्ये से आधारभुत ढांचे का विकास नहीं हो रहा है। विकास हो भी तो कैसे? जिन खेल संघों, समितियों तथा संस्थाओं की बागडोर तपे हुए खिलाडिय़ों के हाथों सौंपी जानी चाहिए, वहां नौकरशाह तथा राजनेताओं का बोलबाला है, जिन्हें न तो खेलों की ‘एबीसीडी’ ही आती है और न ही वे यह जानते है कि खेलों की आत्मा क्या होती है? अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न तो हमारे पास संसाधन है और न ही अधोसंरचना। यही कारण है कि ओलंपिक जैसी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में हम एकमात्र स्वर्ण के लिए भी तरस जाते है। खेलों से जुड़ी डोपिंग जैसी विद्रूपताओं ने भी हमारी छवि को धुमिल किया है। शायद इन सारी कमियों को देखते हुए ही सन 1984 में एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में ‘भारतीय खेल प्राधिकारण’ ‘साई’ का गठन खेलों में सुविधाएं बढ़ाने एवं बेहतर प्रबंधन के उद्देश्य से किया गया था, किंतु उसकी भी दुर्दशा या राजनीतिकरण किसी से छिपी नहीं है। खेलों के विकसित करने में जहां सरकारी स्तर पर उदासीनता है, वहीं निजी क्षेत्र भी अपने दायित्वों से भाग रहे हैं।


हमारे देश में खेलों की स्थिति नहीं सुधारी जा सकती, ऐसा मैं नहीं मानता। जहां तक मैं समझता हूं हर खेल विधा में अपना लोहा मनवाने हमें सबसे पहले खेल संघों को राजनीति और नौकरशाहों के शिकंजे से मुक्त करना होगा। वास्तव में देखा जाए तो खेलों को समस्या के जाल में केंद्रीय खेल संघों के गैर जवाबदेह रवैये ने ही उलझाया है। इसे दूर करने के लिए  सूक्ष्म निगरानी एवं सुधारों के उद्देश्य से एक केंद्रीय मॉनिटरिंग संस्थान की स्थापना जरूरी दिखाई पड़ रही है, जो हम अब तक नहीं कर पाये है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए आगामी प्रतिस्पर्धाओं में निराशाजनक प्रदर्शन से बचने के लिए हमें ठोस पारदर्शी और दीर्घावधिक रणनीति के तहत योजनाएं बनानी होगी। यदि हमने अपने ऐसे ही प्रयासों अथवा संकल्पों को पंख लगाने का काम पूरा कर लिया, तो निश्चित रूप से विश्व मंच पर अपने देश की प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा पाऐंगे।

                                            
                                                   (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                               जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                                मो. नंबर 94255-59291

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