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परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - मन तड़पत भ्रष्टाचार को आज / व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

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(परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

  मन तड़पत भ्रष्टाचार करने को आज

व्यंग्य

अशोक जैन पोरवाल

 

- नमस्कार बाबा गुरूदेव जी.........पॉव लागू आपके।

- कहो, कैसे आना हुआ यहॉ ?

- बाबाजी पिछले तीन-चार साल से मेरे मन में एक अजीब सी तड़प.......एक विचित्र सी बेचैनी हो रही है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है, कि उसे कैसे दूर करूं ?

- कैसी तड़प.............कैसी बेचैनी ?

- बाबाजी वैसे तो अपने देश में आजादी के बाद से ही अन्य फसलों की तरह भ्रष्टाचारों की फसलें भी बोई और काटी जाने लगी है। लेकिन मेरा ध्यान इस ओर कभी नहीं गया। किंतु, पिछले कुछ सालों से मेरे प्रदेश.........शहर........यहॉ तक कि मेरे पैतृक घर वाली कॉलोनी में रहने वाले मि. मित्तल के यहॉ भी भ्रष्टाचारों की बड़ी-बड़ी फसलें लहराने लगी और उनके द्वारा काटी जाने लगी तो उसे देखकर मेरे मन में भी ईर्ष्या की आग भड़कने लगी .......एक तड़प.........एक बेचैनी होने लगी।

- बस बस मैं समझ गया तेरी पूरी मनोदशा। तेरी यह इच्छा पूरी हो सकती है ? अथवा नहीं ? इस बात का पता लगाने के लिए तुझे मेरे निम्न पॉच प्रश्नों के ईमानदारी के साथ सही-सही उत्तर देने होंगे।

- ठीक है, बाबाजी आप प्रश्न पूछिये ?

प्रश्न क्र.(1) - तू कहॉ तक पढ़ा है ?

- गुरूदेव, मैंने एम. ए. किया है, 'हिन्दी-साहित्य' में।

- धत् तेरे की। तुझे और कोई विषय नहीं मिला, एम. ए. करने के लिए ? खैर, इसका मतलब हुआ कि तू सिर्फ आठवीं-दसवीं तक ही नहीं बल्कि आगे भी पढ़ा है। जिसका दूसरा मतलब यह भी हुआ कि तू चपरासी बनने लायक तो रहा नहीं, एक सरकारी विभाग में। सौभाग्य से यदि तू किसी मलाईदार सरकारी विभाग में चपरासी बन जाता तो तेरी भ्रष्टाचार करने वाली तड़प.........मनोकामना पूरी हो सकती थी। और तू करोड़ों की धन दौलतों का मालिक होता, आज। तू मेरे पहले प्रश्न के अनुसार अपनी यह मनोकामना पूरी नहीं कर सकता।

प्रश्न क्र (2) - क्या तेरी नियुक्ति भोपाल, उज्जैन, इन्दौर, ग्वालियर अथवा जबलपुर में से किसी एक जगह है ? वैसे इन सब में से उज्जैन में नियुक्ति अति शुभ मानी जाती है। क्योंकि, यहॉ धार्मिक नगरी होने के कारण.........सरकारी दान-दक्षिणा भी अधिक मिलने के साथ ही साथ यहॉ भ्रष्टाचार की फसलों के लिए उपयुक्त आवो हवा भी होती है। यहीं कारण है, कि यहॉ एक चपरासी से लेकर पटवारी तक....... एक ओवरसियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक.........एक राजस्व-निरीक्षक से लेकर मामूली ठेकेदार तक......कहने का मतलब यह है, कि यहॉ सभी लोग लाखों में नहीं बल्कि करोड़ों में खेलते है......खाते है और रहते है।

- सॉरी बाबाजी, मेरी नियुक्ति इन शहरों में नहीं है, बल्कि.........

- मेरे दूसरे प्रश्न के अनुसार भी तू भ्रष्टाचार करने के अयोग्य है।

प्रश्न क्र (3) - क्या तू प्रदेश सरकार के कुछ मलाईदार विभाग जैसे-स्वास्थ्य विभाग, सिंचाई विभाग, वन विभाग, लोक निमार्ण विभाग अथवा किसी भी शहरी विकास प्राधिकरण में सर्विस करता है ?

- नहीं बाबाजी, मैं तो दुग्ध संघ में नौकरी करता हॅू।

- मेरे इस तीसरे प्रश्न के अनुसार भी भ्रष्टाचार करने के मामले में तू फेल हुआ।

प्रश्न क्र (4) - क्या तूने कभी दुग्ध संघ में नौकरी करते समय चुपके से थोड़ा सा भी कभी दूध अथवा छाछ पिया है ? अथवा श्री खण्ड........पेड़े अथवा मावा खाया है, फ्री में ?

- सॉरी बाबाजी, मैने फ्री में चोरी से आज तक न कुछ खाया और न ही कुछ पिया है कार्यावधि में।

- मेरे चौथे प्रश्न के अनुसार भी तू इस मामले में फेल हुआ।

अंतिम प्रश्न क्र (5) - क्या तू अपनी यह नौकरी छौड़कर ठैकेदारी का काम कर सकता है ?

- नहीं बाबाजी, मैं एक साइकिल स्टैण्ड तक का ठेका नहीं ले सकता...........मैं क्या ठेकेदारी करूंगा ?

- तू मेरे पॉचों प्रश्नों के आधार पर भ्रष्टाचारी बनने में असफल रहा। चल जल्दी से भाग यहॉ से बड़ा आया। ''मन तड़पत भ्रष्टाचार करने को आज ''..........का ढ़िंढ़ोरा पीटने वाला........बल्कि तुझे तो गाना गाते हुए चलना चाहिये उस रास्ते पर जिसमें कि कहा जाता है, ''मन तड़पत हरि-दर्शन को आज........।

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संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

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