मंगलवार, 30 अगस्त 2016

दुख का मनका / कहानी / भरत त्रिवेदी

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सूरज सर पर चढ़ आया है। चमचमाती धूप की किरणें फर्श, दीवान, बिस्तर से आगे बढ़ते बढ़ते त्यागी जी के लौकिक और पारलौकिक ज्ञान, सम्पन्नता और वैभव से दमकते चेहरे पे पड़ने लगी हैं। “उर्मिला; ज़रा गुनगुना पानी लेकर आना, पीने के लिए”। त्यागी जी ने उठते ही अपनी धर्मपत्नी को आवाज लगायी।

रामेश्वर दास त्यागी, एक ऐसा नाम जिसकी पूरे शहर में एक प्रतिष्ठा है। इनके समाज परक लेख और वक्तव्य कई लोगों के लिए जीवन का फलसफ़ा बन चुके हैं। इनकी लिखी पिछली किताब “जातिवाद - राष्ट्रोन्नति में प्रधान बाधा” को तो पाठको के बीच हाथों हाथ लिया गया, आज भी देश के हर कोने से उस किताब के लिए बधाई संदेश और धन्यवाद पत्र आते हैं इनके घर।

कल रात त्यागी जी अपनी नयी किताब “हम में समाज और समाज में हम” के प्रकाशक से मिलकर घर काफी देर से लौटे; इसी वजह से आज देर तक सोते रहे। वैसे त्यागी जी अमूमन सुबह 7 बजे तक तो जाग ही जाया करते हैं।

श्रीमती जी के लाये हुये पानी को पीने के बाद त्यागी जी पूर्व की दीवार में बनी बड़ी सी खिड़की का ग्लास खोलकर बाहर देखने लगे हैं। बाहर वही धीरे धीरे रेंगता छोटी बड़ी गाड़ियों का मेला और उनके हॉर्न्स की न रुकने वाली आवाजें जैसे एक दूसरे से तेज हॉर्न बजाने की प्रतियोगिता चल रही हो।

त्यागी जी खिड़की का ग्लास और पर्दा बन्द कर डाइनिंग रूम में आ गये हैं जहाँ सोफे पे बैठा उनका 15 साल का इकलौता बेटा ललित पढ़ाई कर रहा है। ललित भी अपनी पूरी क्लास में अव्वल आता है जो त्यागी जी के आत्म गौरव को और बढ़ा देने के लिए पर्याप्त है।

ललित के सर पे हाथ फेरते हुये त्यागी जी स्नानागार को ओर बढ़ जाते हैं। लौटते ही वो अपने छोटे भाई को फोन लगाते हैं, और उससे कहते हैं कि वो ज्यादा परेशान न हो वो स्वयं परसों इन्दौर आकर स्वाती बिटिया से बात कंरेगे और उनको यकीन है कि वो अपने ताऊ जी की बात नहीं टालेगी। असल में त्यागी जी के छोटे भाई की बड़ी बेटी स्वाती जो वनस्पति विज्ञान से एम.एस.सी. कर रही है, ने दो दिन पहले ही अपने पिता को बताया कि वो सुमित नाम के एक लड़के से प्यार करती है जो उसके ही साथ पढ़ा है और अभी हाल ही में उसने आईएएस का मेंस क्वालीफाई कर लिया है और इन्टरव्यू की तैयारी कर रहा है। त्यागी जी और उनके छोटे भाई को इस शादी से कोई समस्या न होती अगर सुमित उनसे नीची जाति का न होता। त्यागी जी भोजन करते हुये घड़ी की तरफ देखते हैं जो 11:45 बजा रही है। त्यागी जी का ड्राइवर नीचे गाड़ी में बैठा उनका इंतज़ार कर रहा है। आज दोपहर 12:30 बजे विश्वविद्यालय में पुरस्कार वितरण कार्यक्रम से पहले त्यागी जी का भाषण रखा गया है।

“उर्मिला, ललित कहाँ है, अपने रूम में पढ़ रहा है क्या?” त्यागी जी ने घर से निकलते निकलते उन्हें दरवाजे तक छोड़ने आई अपनी पत्नी से पूछा। “वो अपने दोस्तों के साथ खेलने निकल गया है साइकिल लेकर” पत्नी का जवाब आते ही त्यागी जी ने अपनी चाल तेज करते हुये घड़ी देखी, 12:10 बज रहे थे।

दोपहर का वक्त है सड़क पे उतनी भीड़ नहीं जितनी 9 बजे से 11 बजे तक रही थी। 4 मिनट की ड्राइविंग के बाद हाईवे आ गया है इस हाईवे पे 7-8 मिनट के सफर की दूरी पर विश्वविद्यालय है।

ड्राईवर ने अचानक गाड़ी की रफ्तार धीमी कर दी है, ये देखते हुये की हाईवे के बाईं ओर 4-6 गाड़ियां और 20-22 लोगों की भीड़ इकट्ठी है। “अरे दिनेश, गाड़ी मत रोको। हम वैसे भी लेट हो रहे हैं। देखो! ये संसार है। ये सब तो होता ही रहता है। संसार के हाथ में पड़ी समय की माला में सुख - दुख रूपी मनके पड़े हुये हैं, और कुछ नहीं।” त्यागी जी ने ड्राइवर से कहा।

दरअसल त्यागी जी किसी भी भाषण से पहले मन की एकाग्रता चाहते हैं, इसीलिए उन्होंने गाड़ी में बैठते ही अपना फोन भी साइलेण्ट मोड पे कर लिया था।

विश्वविद्यालय का सभागार कुलपति, अध्यापकों, पत्रकारों और करीब 3500 विद्यार्थियों से भरा हुआ।

हमेशा की तरह त्यागी जी के भाषण ने पूरे सभागार को जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो। हर किसी पे उनकी ओजपूर्ण, तार्किक वाणी और अद्भुत शाब्दिक ज्ञान से भरी भाषाशैली का एक सा असर हो रहा है।

भाषण के दौरान ही त्यागी जी ने पानी पीने के बाद अपना मोबाइल अपनी जेब से निकाल कर पोडियम पे रखा, देखा 4 मिस्ड कॉल्स पड़ी हुई है। इससे पहले वो देख पाते कि ये मिस्ड कॉल्स किसकी हैं, उनके मोबाइल में डिसप्ले हुआ “उर्मिला कालिंग..” वो फोन काट देते हैं और अपनी बात पूरी करते हैं। दो मिनट के बाद उनकी दायीं तरफ के दरवाजे से उनका ड्राइवर दिनेश उनकी तरफ दौड़ता हुआ आता है। उसके दायें हाथ में उसका मोबाइल और चेहरे पे अजीब सी कई पर्तें हैं। कुछ विषाद की, कुछ विस्मय की, कुछ आत्म ग्लानि की, कुछ भय की भी। वो आकर त्यागी जी से कहता है..“सर... सर वो, ललित बाबा की हाईवे पे एक्सीडेण्ट में डेथ हो गई है।” त्यागी जी निढाल होकर मंच से जमीन पर गिर पड़े हैं; कभी न उठने के लिए। शायद समय की माला में पड़ा दुख का ये मनका त्यागी जी को बहुत भारी पड़ गया है।

- “भरत त्रिवेदी”

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