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इलाहाबादी मिठाई और इलाहाबादी अखाड़ेबाज / संजय दुबे

संजय दुबे इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

मिठाइयों के शौकीन और इलाहाबादी अखाड़ेबाज
कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में इलाहाबादियों की कुछ खास आदतें मशहूर थीं। यूं तो स्वतंत्रता आंदोलन के पहले से ही इलाहाबाद राजनीति का केंद्र रहा है। परन्तु खाना-खिलाना व पहलवानी की इलाहाबादी परंपरा अपने आप में एक बेमिसाल आदत थी, जो यहां की एक विशिष्टता मानी जाती है। पुराने लोग अपने समय को याद करते हुए अपनी बुजुर्गियत भूलकर रोमानियत का अहसास करने लगते हैं।

अब से साठ-सत्तर साल पहले इलाहाबाद मुख्य रूप से चौक, घंटाघर, खुल्दाबाद, लोकनाथ (सरायमीर खां), शाहगंज, त्रिपौलिया, बहादुरगंज, मुट्ठीगंज, कीडगंज और दारागंज में बसता था। खलीफामंडी शहर का व्यापारिक केंद्र था। आसपास अतरसुइया, दरियाबाद, अहियापुर, सत्तीचौरा, मालवीय नगर, सदियापुर, मोहित्सिमगंज एवं कल्यानी देवी मोहल्ले फैले थे। अंग्रेजी आबादी मुख्य रूप से सिविल लाइन व कैंट क्षेत्र में रहा करती थी। उस जमाने में छककर खाना-खिलाना शान समझा जाता था। मिठाइयां खाने के मामले में इलाहाबादियों की कोई सानी नहीं थी। आज के समय में यह यकीन करना मुश्किल होगा, परन्तु यह सच है कि तब पांच-छह किलो मिठाइयां पचा जाने की कुव्वत रखने वाले सूरमा उपस्थित थे। इसी तरह पहलवानों की पूरी फौज ही यहां बसती थी। शहर के बुजुर्ग व सौ साल से भी ज्यादा पुरानी मिठाई के दुकानों का इतिहास इसका गवाह है।

हिंदू और मुसलमानों की संयुक्त आबादी वाला यह क्षेत्र सबेरे के पहले पहर से पूर्व जगता था और जमकर अखाड़ाबाजी करता और खाता था। अखाड़ा नादिर पहलवान की पहलवानी और चौधरी महादेव प्रसाद की खाने की दावत आज भी लोगों में भुलाए नहीं भूलती। सुबह-सुबह शहर के बीचोंबीच स्थित लोकनाथ (जिसे तब सरायमीर खां मोहल्ला कहा जाता था) पर भीड़ लगती थी और दही के साथ शुद्ध देसी घी की जलेबी व लुचुई हलवा का नाश्ता होता था। लुचुई हलवा मैदे की बनी कागज की तरह अत्यंत मुलायम पूड़ी को कहते थे, जो अब कहीं नहीं दिखती। सस्ती का जमाना था, दूध, दही घरों में इफरात रहता था।

मिठाइयां प्रायः केशर, बादाम, पिस्ता, काजू, किशमिश, चिरौंजी, इत्र व असली सोने-चांदी के वर्क लगाकर निर्मित होती थी। मेवे का समोसा, लखनउवा गिलौरी (पान की तरह मलाई की बनी मिठाई), कीडगंज में लल्लू हलवाई का सोहन हलवा, लोकनाथ के बचई गुरु की दुकान का पेड़ा, लड्डू दूर-दूर तक सरनाम थे। ढाई सौ ग्राम की परतदार बालूशाही (जिसमें रसगुल्ले की तरह सीरा भरा रहता था) खाने लोग मीलों दूर से आया करते थे। शहर से तीस किलोमीटर दक्षिण शंकरगढ़ का रसगुल्ला खाने वालों की भीड़ लगी रहती थी। जाड़े में इमरती, मूंग का मगदल, बरसात में अलग तरह से बनी सूतफेनी व अनारसा, गर्मी में खोए का गोल लड्डू लोग बड़े चाव से अतिरिक्त भोजन के रूप में खाते थे। मिठाइयां तब बांस की पिटारी व दोने में मिलती थीं। तब न तो आज की तरह पालीथीन था और न ही इससे उपजा प्रदूषण।

हलवाईगीरी के पेशे में कुछ ऐसे लोग थे, जिनके हाथ की कारीगरी का यश दूर-दूर तक फैला। शहर के कुछ माने हुए हलवाई व मिठाई बेचने वालों में लोकनाथ (सरायमीर खां) के श्रीराम मिष्ठान भंडार, बनारसी मिष्ठान भंडार, महाजनी टोला (जीरो रोड) के भगवानदास-प्रहलाददास इत्यादि शामिल थे। लोकनाथ के ही मातादीन की पुरानी दुकान की बनी रेवड़ी-सोहन हलुवा और गुड़ व चीनी की बनी गजक तथा हरीराम की दुकान के बने नमकीन व्यंजन दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।

एक तरफ खुल्दाबाद, नखास कोहना, शाहगंज, अतरसुइया जैसे मुस्लिमों व हिंदुओं की मिली-जुली आबादी वाला क्षेत्र था तो दूसरी तरफ मालवीय नगर, सत्ती चौरा, अहियापुर, मोहित्सिमगंज, कीडगंज, दारागंज जैसे क्षेत्र जहां तीर्थ-पुरोहितों, पंडों व प्रयागवालों की बहुलता थी। मुस्लिमों की नवाबी शान व पुरोहितों के अक्खड़पन के साथ-साथ शहर के व्यापारिक वर्ग के चौक पर जमावड़े से अंग्रेजी लोग भी खौफजदा रहते थे। ब्राह्मण वर्ग खाने व खिलाने का बहुत शौकीन था। जजमानी व पुरोहिती कर्म इसमें मददगार होता था। गंगागंज के 72 वर्षीय बुजुर्ग आचार्य पं. नवरंग प्रसाद तिवारी बताते हैं कि शहर में पं. शिव कुमार तिवारी (बन्ना जी), रुद्रमणि, काशी प्रसाद, विष्णु तिवारी, साधुराम तथा बबुवा गुरु दो से पांच किलो तक मिठाई रोज हजम करने के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे। उस जमाने में एक या आधा किलो मिठाई तो कम उम्र के नवजवान ही खा लिया करते थे। मिठाई के अभाव में लोग उसी मात्रा में देसी गुड़ ही खा जाया करते थे।

शहर के प्रतिष्ठित मोहल्लों में शुमार त्रिपौलिया में पं. पाते राम (पाते गुरु), काशी प्रसाद, भैरव, चंद्रशेखर, लक्ष्मण प्रसाद, अलोपी महराज जैसे धाकड़ मिठाई खाने वाले रहा करते थे। शहर में बाबू महादेव प्रसाद चौधरी तीज-त्योहारों पर अक्सर खाने वालों की दावत किया करते थे। इनकी खूबी यह थी कि ये प्रायः खाना खिलाने के बाद मिठाई परोसते थे। जो जितना मिठाई हजम कर लेता था, वह उतना ही इनाम पाता था। तब सस्ती का युग था। जब तौल में किलो को चलन शुरू हुआ तब पांच रुपये का एक सेर मिठाई व दो रुपये का एक सेर शुद्ध देसी घी की जलेबी मिला करती थी।

शहर भर में दर्जनों व्यायामशालाएं और अखाड़े थे, जिसमें सुविख्यात अखाड़ाबाज प्रशिक्षण दिया करते थे। अखाड़ा नादिर पहलवान, अखाड़ा चट्टू पहलवान, अखाड़ा साधु पहलवान (खलीफा मंडी) पहलवानी के लिए सरनाम थे। शहर के लोकप्रिय नेता 'छुन्नन गुरु' द्वारा स्थापित लोकनाथ व्यायामशाला आज भी विद्यमान है। यहां उस जमाने में एक भोला पहलवान पहलवानी सिखाया करते थे, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक थी।

अब जबकि पहलवानी जैसे खेल में लोगों का आकर्षण खत्म हो गया है, तब भी पुराने बड़े बुजुर्ग इसके प्रति अपना लगाव छिपा नहीं पाते हैं। जीवन की अंतिम वेला में पहुंच चुके कई बुजुर्ग अब भी अपने दिनों को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। वे याद करते हैं कि किस प्रकार पुराने पहलवान बाद में भोजन के अभाव में टूट गए और समय से पहले ही कालकवलित हो गए। आज के जमाने में अब न तो सेर-सेर मिठाइयां हजम कर जाने वाले सूरमा ही बचे हैं और न ही उस तरह के पहलवान।

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