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समीक्षा बालसाहित्य में बाल पत्रिकाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता उमेश चन्द्र सिरसवारी

पहाड़ों के प्रदेश उत्तराखण्ड का नाम जेहन में आते ही एक नाम स्वतः ही जबान पर आ जाता है और वो नाम है उदय किरौला। उदय किरौला मुख्यतयः अल्मोड़ा के निवासी है। उन्होंने देशभर में घूम-घूमकर बालसाहित्य की अलख जगा दी है। बालसाहित्य में पत्रकारिता, बच्चों की कार्यशालाओं का आयोजन, और बालसाहित्य को लेकर बात होगी तो निश्चित ही उदय किरौला का नाम सबसे ऊपर आएगा। बालप्रहरी पत्रिका के बैनर तले दर्जनों बाल साहित्यकारों को सम्मान, बालसाहित्य की पुस्तकों क प्रकाशन और साथ ही बालसाहित्य की दो महत्वपूर्ण बाल पत्रिकाओं का सम्पादन भी स्वयं बड़ी ही कुशलता से कर रहे हैं।

कौन हैं उदय किरौला

उदय किरौला का जन्म 1960 ई. में अल्मोड़ा में हुआ था। इन्होंने एम. ए., एम. कॉम. तक की शिक्षा ग्रहण की तथा पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया। उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के पॉलीटैक्निकों के पाठ्यक्रमानुसार इनकी तीन पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। इन्होंने उत्तराखण्ड के सामान्य ज्ञान पर आधारित आधा दर्जन पुस्तकों की रचना की तथा स्मारिकाओं का सम्पादन भी किया है। वर्ष 1982 से 1991 तक साप्ताहिक समाचार पत्र ''द्रोणांचल टाइम्स'' का सम्पादन भी किया। सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर बच्चों के लिए काम करना शुरू किया जो आज तक जारी है। पिछले कई सालों से उदय किरौला बच्चों की प्रसिद्ध बाल पत्रिका ''बालप्रहरी'' (त्रैमासिक) पत्रिका का अल्मोड़ा से सफल सम्पादन कर रहे हैं। उदय किरौला की रचनायें बालवाणी, बालवाटिका, अमर उजाला तथा उत्तर उजाला समेत देशभर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। बालसाहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय, सराहनीय और अविस्मरणीय योगदान के लिए किरौला जी को 'बाल साहित्य सम्मान, ज्ञान-विज्ञान सम्मान, सम्पादक शिरोमणि' सम्मान आदि से सम्मानित किया जा चुका है।

1- ''ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन' मासिक पत्रिका'' का जून 2016 का अंक बालसाहित्य विशेषांक

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'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' का जून 2016 का बालसाहित्य विशेषांक मिला। बच्चों में विज्ञान की समझ बढ़ाने के उद्देश्य से ज्ञान विज्ञान का 11 वर्षों से नियमित प्रकाशन किया जा रहा है। इसके संपादक उदय किरौला हैं। चालीस पृष्ठ की बहुरंगी 'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' पत्रिका का यह अंक बालसाहित्य विशेषांक होने से यह बेहद रोचक और पठनीय बन पड़ा है। इस अंक में कुल 22 आलेख, 18 बाल कविताएं, विशेष व्यक्तित्व पर एक आलेख और देशभर से प्रकाशित मुख्य बाल पत्रिकाओं की जानकारी दी गई है।

सम्पादकीय में श्री उदय किरौला जी ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के प्रकाशन पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि 'भारत ज्ञान विज्ञान समिति' उत्तराखण्ड के सक्रिय साथियों की पहल पर अल्मोड़ा से 2004 से बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका बालप्रहरी का प्रकाशन किया जा रहा है। वे आगे कहते है कि भारत ज्ञान विज्ञान समिति एवं बालप्रहरी ने मिलकर लगभग 200 स्थानों पर बच्चों के लिए बाल मेलों, बाल विज्ञान मेलों, बाल पर्यावरण मेलों तथा बच्चों की लेखन कार्यशाला का भी आयोजन किया है।' नवंबर 2010 से प्रतिवर्ष नवंबर माह में 'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' का बालसाहित्य विशेषांक प्रकाशित किया जा रहा है। जून 2013 एवं जून 2014 में बालप्रहरी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी के अवसर पर भी 'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' के बालसाहित्य विशेषांक प्रकाशित किए गए। इसी क्रम में 'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' का यह जून 2016 का अंक भी उसी की एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।

पत्रिका का पहला आलेख 'बच्चे और बाल साहित्य' के रूप में किरौला जी पाठकों से रूबरू हुए हैं। आज का समाज बच्चों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन का असर बच्चों पर पड़ा है, किरौला जी इस पर चिंता जाहिर करते हैं। वे आगे कहते हैं कि संयुक्त परिवारों के विघटन के वर्तमान दौर में बच्चे दादा-दादी व नाना-नानी से दूर हैं। रोजगार की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बढ़ती मंहगाई के दौर में माता-पिता दोनों रोजी-रोटी के लिए घर से बाहर निकलने के लिए मजबूर हैं। बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी एवं माता-पिता से मिलने वाले प्रा.तिक प्यार से वंचित हो रहे हैं। भारी बस्ते का बोझ, होमवर्क एवं ट्यूशन के दौर में बच्चे के पास खेलने तक का समय नहीं है। आज बच्चों के लिए वीडियो गेम, कंप्यूटर एवं मोबाइल पर ढिसम-ढिसम, मार-धाड़ वाले हिंसक खेलों को खेलता है। वीडियो गेम से जहां बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति पनप रही है वहीं वह प्र.ति व समाज से दूर होता जा रहा है जो एक गंभीर समस्या है। आज के दौर में जहां समाज को जाति, धर्म, लिंग एवं क्षेत्र के आधार पर बांटने वाली ताकतें सक्रिय हैं, वहीं बच्चों के लिए भूत-प्रेत, जादू-टोने वाली अवैज्ञानिक सामग्री परोसी जा रही है। इन परिस्थितियों में जरूरत है कि बच्चों में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक मूल्यों एवं वैज्ञानिक सोच जाग्रत करने के उद्देश्य से बालसाहित्य तैयार किया जाना चाहिए।

अगले आलेख ''बालसाहित्य तथा बच्चे' में विमला जोशी ने बच्चों के साहित्य को लेकर अभिभावकों से वही सवाल किए हैं। उनका मानना है कि आज बच्चे, बच्चे न रहकर रोबोट बन गए हैं, उनकी आजादी छिन गई है। उनका हँसना, खिलखिलाना, मस्ती करना, घूमना, एक-दूसरे से खुलकर बातचीत करना व नाराजगी व्यक्त करना, खुशियां बांटना, ये सब दिन पर दिन खत्म होते जा रहे हैं। बचपन का वो स्वर्णिम समय भविष्य फिक्र में जुट जाता है। बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा जाने वाला साहित्य ही बालसाहित्य है। बच्चे बड़ों से भिन्न होते हैं। बच्चों के लिए साहित्य लिखते समय हमें यह ध्यान रखना पड़ेगा कि बच्चों की रूचि, समझ, रुझान, जरुरतें, अनुभव व संज्ञान तथा उनका स्तर उन सभी में अन्तर होता है। उन अंतरों को ध्यान में रखते हुए उसके स्तरानुसार साहित्य रचना करनी होगी। बच्चों में नैतिकता व मूल्यों को थोपने हेतु साहित्य रचना नहीं होनी चाहिए। साथ ही बालसाहित्य के लिए जरुरी है कि बच्चों को किताबों से जोड़ने की, उनके लिए लेखन कार्यशाला आयोजन करने की, विद्यालयों में सृजनात्मकता व रचनात्मकता को बढ़ावा देने की आज विशेष जरुरत है और इसमें शिक्षक, लेखक व अभिभावक अपना महती योगदान दे सकते हैं।

अगला आलेख 'बालसाहित्य के समक्ष चुनौतियां' डॉ. हरिसिंह पाल का है। वे विश्वविद्यालयों में बालसाहित्य को शामिल किए जाने की वकालत करते हैं। वे कहते हैं कि आज भी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया है। किंतु विश्व का कोई कोना और किसी भी कालखंड की सभ्यता और संस्कृति बालसाहित्य की उपस्थिति से अछूती नहीं रही है। लोरी, गीत, खेलगीत, लोककथा-कहानियों के बिना किसी का भी बचपन वंचित नहीं रहा है। बासाहित्य का प्रारिम्भक रूप इसी प्रकार से प्रभावी रहा है। कालांतर में माताएं अपने शिशुओं और बच्चों के मनोरंजन के लिए देशकाल के अनुरूप लोरीगीत और बालगीत तथा किस्से-कहानियां गढ़ते रहे हैं। बच्चों के लिए माताएं ही सर्वप्रथम बाल रचनाकार की भूमिका निभाती रही हैं।

बालक के मन मस्तिष्क पर अपना कब्जा जन संचार ने पूरी तरह से कर लिया है। शिशु बच्चे को लोरी के स्थान पर मोबाइल पर गाने और फिल्म, टी. वी. पर कार्टून फिल्में दिखाकर उसका मनोरंजन किया जा रहा है। अब माता-पिता या अन्य परिजनों के पास इतना समय नहीं बचता कि वे अपने बच्चे के लिए नए-नए लोरीगीत या खेल गीत रच सकें। यह आलेख बाल साहित्यकारों के समक्ष विभिन्न चुनौतियों से रूबरू कराता है। आज के समय में समाज में बड़ी विसंगतियां, विरोधाभास देखने को मिलता है। आज जो बालसाहित्य लिखा जा रहा है वह आदर्शवाद का बोझ लिए हुए है। सुसंस्कार के नाम पर दिखावटी नैतिकता और जीवन मूल्यों की घुट्टी पिलाई जा रही है। बच्चा जिस तथाकथित बालसाहित्य को पढ़ रहा होता है, व्यवहारिक जीवन में उसे कोसों तक उसे कुछ हासिल नहीं होता है। घर से लेकर विद्यालय तक और पड़ौस से लेकर गाँव, मुहल्ले और शहर तक, हर जगह उसे तिकड़मी लोगों से वास्ता पड़ता है। फिर बालक को कहां से सुसंस्कार देखने को मिलें ? इसके लिए जरूरी है कि हम बच्चों के बढ़ते शारीरिक एवं मानसिक विकास के अनुरूप अलग-अलग स्तरों वाला बालसाहित्य लिखना चाहिए। शिशु, बालक और किशोर जीवन के गड्डम-गड्ड वाले साहित्य से बचना होगा। बच्चों की दौलत है उनकी मासूमियत, शरारतें, अटखेलियां, खेलकूद, मस्तमौलापन और तनावयुक्त जीवन।

अगला आलेख है डॉ. रवि शर्मा का 'हिंदी बालसाहित्य से बिछुड़ते बच्चे'। रवि शर्मा हिंदी बालसाहित्य की शुरूआत हिंदी साहित्य के प्राख्यात कवि, लेखक अमीर खुसरो से मानते हैं। उनकी लोकप्रिय पहेली से सिद्ध करने की कोशिश की हैं- ''एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर ओंधा गिरा। चारों ओर वह थाल फिरे, मोती उससे एक ना गिरे।।'' रवि शर्मा का यह आलेख बेहद रोचक और पठनीय बन पड़ा है। वे मानते हैं कि रचनाकार अपने लेखन के लिए, भावाभिव्यक्ति के लिए, सामग्री समाज तथा अपने परिवेश से ही तो लेता है। परिवार में सर्वाधिक जीवंत, उत्साह, सरस, सक्रिय तथा सबका ध्यान आ.ष्ट करने वाले भोले-भाले, सरल हृदय, नटखट, उत्पाती बच्चे ही तो होते हैं। उनकी क्रियाएँ, प्रतिक्रियाएँ, उपद्रव, उछलकूद को सर्जक मन अनदेखा कैसे कर सकता है ? उसका ध्यान सहज ही इनकी ओर आ.ष्ट होता है, तभी जन्म लेता है- बालसाहित्य।

'बालसाहित्य : दशा एवं चुनौतियां' में कमलेश चौधरी ने आज के बाल साहित्य का विश्लेषण बहुत ही सुन्दर ढंग से किया है। वह आदिकाल से बालसाहित्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। लेखिका आज बच्चों के जीवन में हुए बदलाव पर चिंता जाहिर करती हैं। वे कहती हैं कि नाना-नानी, दादा-दादी की कहानियों की जगह अब मोबाइल, इंटरनेट व अन्य संचार के माध्यमों ने ले ली है जो एक गंभीर समस्या बन गई है, इसके लिए बालसाहित्यकारों की जिम्मेदारी तो बनती ही है साथ ही अभिभावकों को भी आगे आना होगा।

'बच्चे और बाल कहानी' आलेख में लेखिका डॉ. सुधा गुप्ता बच्चों को कहानी कैसी होनी चाहिए और कैसे विषय पर ? इस पर वे गंभीरता से चर्चा करती हैं तो 'बच्चे और बालसाहित्य' आलेख में डॉ. राजकिशोर सिंह बालकों को ईश्वर की अनमोल .ति घोषित करते हैं। 'बच्चे और बाल कविता' में अश्वनी कुमार पाठक शिशु को किस तरह का मनोरंजन किया जाना चाहिए, इस पर चर्चा करते हैं। उनकी यह पंक्ति पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है कि 'बालक का मन एक स्वच्छ पट्टी टेबुलारेसा की तरह है। बाल्यकाल में उसमें जो भी अंकित किया जाता है, वह उसके सारे जीवन पर असर डालता है।'

दर्शन सिंह आशट का आलेख 'बालसाहित्य का अटूट अंग : लोरियां', गोपीनाथ का आलेख 'बालसाहित्य : युगानुरूप हो', डॉ. बानो सरताज का आलेख 'कहानी विज्ञान कथा और विज्ञान फंतासी की', अखिलेश निगम का 'बालसाहित्य में विज्ञान की भूमिका', पुष्पा पाल का 'बाल अधिकार : कल से आज तक', डॉ. उषा यादव का आलेख 'बाल अधिकार और बालसाहित्य', 'डॉ. गार्गीशरण मिश्र का आलेख 'बालसाहित्य के प्रेरक तत्व', जगदीश गुप्त का आलेख 'बच्चों में पठनीयता की समस्या' बहुत ही पठनीय और सुन्दर बन पड़े हैं। वंदना सक्सैना का आलेख 'बाल पत्रकारिता' पत्र-पत्रिकाओं के बारे में जानकारी देता है। इसी अंक में उमेशचन्द्र सिरसवारी का शोध आलेख 'हिंदी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना भी है जिसमें उन्होंने देशभर के बाल साहित्यकारों की रचनाओं का अवलोकन किया है। डॉ. मोहम्मद साजिद खान का आलेख 'आधुनिक बाल-कविताओं में नैतिकता' है जिसमें उन्होंने बाल कविताओं के विभिन्न मुद्दों पर खुलकर चर्चा की है। बालसाहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. हरिकृष्ण देवसरे का विशेष आलेख 'आज के परिवारों में बालक' बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। बालसाहित्य की रचना करने वाले प्रत्येक बालसाहित्यकार को यह आलेख पढ़ना चाहिए। दिल्ली की सुप्रसिद्ध बाल रचनाकार डॉ. सुधा शर्मा का आलेख 'बच्चों में हिंदी की रूचि का विकास और हिंदी बाल पत्रिकाएँ' बेहद रोचक और पठनीय है। पत्रिका के अंत में प्रकाश तातेड़ का आलेख 'बच्चों की लेखन कार्यशाला विशेष है। वास्तव में आज बच्चों के लिए लेखन कार्यशालाओं का आयोजन किया ही जाना चाहिए। इस अंक में बाल कविताओं में भालचन्द्र सेठिया की कविता 'डॉ. राष्ट्रबंधु के प्रति' बहुत ही मार्मिक और प्रेरणादायक है। राजकुमार जैन 'राजन' की कविता 'पेड़ बचाएं' पेड़ बचाने का संदेश देती है तो घमंडीलाल अग्रवाल की कविता 'मक्खियां' खाद्य सामग्री को मक्खियों से बचाने का संदेश देती है। हमें अपनी खाद्य सामग्री को गंदगी से बचाना बेहद जरूरी है, इससे तमाम बीमारियां पनपती हैं। लक्ष्मी खन्ना 'सुमन' की कविता 'छुट्टी' बच्चों के कोमल भावों को प्रस्तुत करती है, तो आशा भट्ट की कविता 'रेल' बच्चों के लिए मनोरंजन का काम करती है। 'अच्छी बातें' कविता नवीन डिमरी 'बादल' की है जिसमें वे बच्चों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाते हैं। डॉ. रामनिवास मानव बालसाहित्य के कुशल चितेरे रचनाकार हैं। इस अंक में उनकी कविता 'इंद्रधनुष' बारिश के मौसम का सुन्दर वर्णन करती है। सूर्यप्रसाद शर्मा की कविता 'पौधे लगाएंगे', डॉ. अल्का अग्रवाल की कविता 'सब्जियों से प्यार', विजयलक्ष्मी की कविता 'पंख', रमेशचन्द्र पंत की कविता 'पापा प्यार जताना जी', महेन्द्र कपिल की कविता 'पेड़' और 'डॉ. अमित कुमार की कविता 'कंप्यूटर' बेहद रोचक और पूरी तरह बच्चों के लिए लिखी गई हैं जो बालसाहित्य की कसौटी पर खरा उतरती हैं। बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के 'गर्मी के दोहे' बेहद रोचक और पठनीय हैं। डॉ. परशुराम शुक्ल की कविता 'जंगल टाइम्स', सीताराम चौहान की कविता 'वीर बच्चे', सुरेश चन्द्र की कविता 'पुस्तक का महत्व' पुस्तकों के महत्व को बताती है। सपना मांगलिक की 'लड्डू' कविता ने अंत में मुँह मीठा करने का काम किया।

'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' पत्रिका के माध्यम से श्री उदय किरौला जी का प्रयास सराहनीय है। बच्चों में ज्ञान विज्ञान की सोच बढ़ाने का जो बीड़ा उन्होंने उठाया है, इसमें वे काफी हद तक सफल हुए हैं। 'ज्ञान विज्ञान बुलेटिन' पत्रिका टीम को इस महान कार्य के लिए साधुवाद देता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि बालसाहित्य की यह 'लौ' यूँ ही जलती-चमकती रहे और यह देश इससे लाभान्वित हो, यही कामना है।

'ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन' मासिक पत्रिका

जून 2016, 'बालसाहित्य विशेषांक'

एक अंक का मूल्य 5 रुपये

3 वर्ष का शुल्क 160 रुपय

आजीवन सदस्यता 1000 रुपये

पता- मोहल्ला- खोल्टा, अल्मोड़ा- 263601

Email- bulatingv123@gmail.com

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2- साहित्य समीर दस्तक, जुलाई 2016

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'साहित्य समीर दस्तक' का जुलाई 2016 का अंक प्राप्त हुआ। इसके प्रबंध सम्पादक 'राजकुमार जैन राजन' हैं, जबकि मुख्य सम्पादक 'कीर्ति श्रीवास्तव' हैं। 'साहित्य समीर दस्तक' भोपाल, मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका है। इस पत्रिका ने युवा रचनाकारों को अच्छा मंच उपलब्ध कराया है, जो काबिलेतारीफ है।

यह पत्रिका अपने प्रकाशनकाल से ही बाल साहित्य के लिए जागरूक है। पूर्व में इस पत्रिका के बाल विशेषांक प्रकाशित हुए हैं, इसके अलावा हर अंक में पत्रिका टीम ने बाल साहित्य देने का फैसला किया है, जिसका बालसाहित्य जगत स्वागत करता है। 'साहित्य समीर दस्तक' के जुलाई 2016 के इस अंक के 'बाल जगत' में कीर्ति श्रीवास्तव ने 'साहित्य का सितारा' आलेख में मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य को याद किया है। विज्ञान के बढ़ते कदम में सचिन व्यास ने सुन्दर जानकारी दी है। सुधा गुप्ता अमृता की बाल कहानी 'धचाक्' बेहद रोचक कहानी है। बाल कविताओं में डॉ. फहीम अहमद, प्रमोद सनाड्य, डॉ. मुकेश गुप्त 'राज', की सुन्दर और रोचक कविताएं हैं। साथ ही इस अंक में बाल रचनाकारों के विभिन्न प्रदेशों, जगहों पर सम्मान किए जाने का सुन्दर समाचार चित्र के साथ हैं। इस अंक में एक सूचना भी है, राजकुमार जैन 'राजन' ने पूर्व की भांति अपने सम्पादन में निकले बाल विशेषांकों की तरह अगले बाल विशेषांकों के लिए बाल साहित्यकारों से रचनाएं आमंत्रित की हैं। साथ ही इस अंक में मेरे द्वारा बाल विशेषांकों की, की गई समीक्षा भी प्रकाशित हुई है। वास्तव में राजकुमार जैन 'राजन' और पत्रिका की सम्पादक कीर्ति श्रीवास्तव बालसाहित्य के लिए जो कार्य कर रहे हैं, वह अतुलनीय है। इसके लिए पत्रिका टीम बधाई की पात्र है। मैं 'साहित्य समीर दस्तक' पत्रिका की सोच, भावना और टीम को बधाई देता हूँ।

पत्रिका साहित्य समीर, मासिक

इस अंक का मूल्य- 50 रुपए

सम्पादक- कीर्ति श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक राजकुमार जैन 'राजन'

पता- चित्रा प्रकाशन, आकोला- 312205, (चित्तौड़गढ, राजस्थान)

Email- sahityasameer25@gmail.com

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3- 'चिरैया' बाल पत्रिका का जून 2016 अंक

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उस दिन मैं घर पर ही था। डाकिया बाबू आए और मेरी डाक मुझे दी। 'चिरैया' पत्रिका हाथ में मिलते ही मैं चौंक पड़ा। मुँह से निकला- वाह ! चिरैया... नाम जेहन में पड़ते ही एक ही बार तो हँसी छूट गयी 'चिरैया'..., लेकिन यह सच था। जी, हां... 'चिरैया' पत्रिका से मैं पहली बार रूबरू हुआ और पहली बार में मन को भा गई। मैंने व्हाट्स एप पर 'बालसाहित्य प्रसार संस्थान' ग्रुप में शेयर किया और बाल साहित्यकारों में यह पत्रिका छा गई। कई हमारे साथी इस पत्रिका से पहली बार रूबरू हो रहे थे।

'चिरैया' बाल मासिक पत्रिका का जून 2016 का अंक प्राप्त हुआ, इस पर एक नजर। पत्रिका पहली नजर में ही दिल को छू गई। इस अंक में कुल चार कहानी, सात कविताएँ और विभिन्न जानकारी देते नौ आलेख हैं। यह पत्रिका बच्चों में ज्ञान-विज्ञान की जानकारी बढ़ाने का भरपूर मनोरंजन का साधन है। पत्रिका की संपादक बेला जैन अपने संपादकीय में बच्चों से रूबरू होती हैं और पर्यावरण के प्रति बच्चों को जागरूक करती हैं। वे पर्यावरण को समाज का अभिन्न अंग बताती हैं और इसके बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है, इस नफा-नुकसान से भी अवगत कराती हैं। फुहार कॉलम में बच्चों के लिए हँसने के लिए सुन्दर-सुन्दर चुटकुले हैं जो बच्चों को हँसाने में सक्षम हैं। स्वास्थ्य जगत कॉलम के अंतर्गत 'बच्चों को मिले हेल्दी स्टार्ट' पठनीय और महत्त्वपूर्ण आलेख है। डॉ. शशि गोयल की बाल कविता 'गुलगुली सी चुहिया' बालमन को छूने वाला बालगीत है। बद्री प्रसाद वर्मा 'अनजान' की बाल कहानी 'बादलों का गुस्सा' मानव के लिए चेतावनी है। मानव को आपनी भूल सुधारनी होगी और पर्यावरण को हो रही क्षति की भरपाई करनी होगी अन्यथा परिणाम भयंकर होंगे, यह कहानी सुन्दर संदेश देती है। डॉ. जयराम आनन्द के बालगीत 'कैसा चित्र बनाऊँ' और 'बतला गुड़िया रानी' बेहद सुन्दर और रोचक हैं। ज्ञान-विज्ञान की जानकारी कॉलम के अंतर्गत है 'प्याज की आत्मकथा' जो बड़े ही अनोखे अंदाज में प्रस्तुत की गई है। मैंने इसे अपने बच्चों को पढ़वाया, उन्हें यह बहुत पसंद आई और कहने लगे कि क्या प्याज भी ऐसा सोचती है

इस पत्रिका में एक कॉलम विशेष रखा गया है, इसके अंतर्गत पचतंत्र की कविताएँ, कहानियों को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इस अंक में महामुनि और एक चुहिया की प्रसिद्ध रोचक कथा है जो बच्चों के दिल को छूने वाली है। पक्षी-जगत कॉलम के अंतर्गत 'महोख और सैंड पाइपर' पक्षी के बारे में जानकारी दी गई है। यह नाम मैंने भी पहली बार सुने और एक नजर में ही इसे पढ़ डाला। इसमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है। फूलचोर, सच्ची जीत, चक्कर टाइमटेबल का' बहुत ही सुन्दर और रोचक कहानियां हैं। मध्य प्रदेश में हुए 'सिंहस्थ' कार्यक्रम की झलकियां इस अंक में दी गई हैं जो आस्था और भक्ति से जोड़ने का काम करता है। बालसाहित्य में विशिष्ट लेखन के लिए जाने-जाने वाले और हिंदी बालविज्ञान कथा पर विशेष पकड़ रखने वाले बालसाहित्य के कुशल चितेरे डॉ. परशुराम शुक्ल जी का सुन्दर बालगीत 'पर्यावरण बचाओ' बेहद रोचक और सुन्दर बन पड़ा है। इसके माध्यम से शुक्ल जी ने बच्चों को पर्यावरण की रक्षा करने की वकालत की है। पहेलियां भी इस अंक में दी गई हैं। मुझे 'चिरैया' टीम का बालसाहित्य का यह खजाना रोचक लगा। मैं पत्रिका टीम को बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि यह पत्रिका जिन लोगों तक नहीं गई है, उनके पास भी जाए, घर-घर जाकर बच्चों में बालसाहित्य की अलख जगाए। मेरी शुभकामनाएँ।

'चिरैया' मासिक पत्रिका

प्रधान संपादक- डॉ. तपन भट्टाचार्य

संपादक- बेला जैन

एक अंक का मूल्य- 10 रुपये

वार्षिक मूल्य- 100 रुपये

डाक खर्च सहित- 200 रुपये

संपर्क- फ्लैट नं. 301, ईशान अपार्टमेंट, 13/2 स्नेहलतागंज, इन्दौर- 03 (म.प्र.)

Email- chiraiyaa@rediffmail.com

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'बाल साहित्य समीक्षा' पत्रिका का अप्रैल-जून 2016 अंक

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'बाल साहित्य समीक्षा' पत्रिका डॉ. .ष्ण चन्द्र तिवारी 'राष्ट्रबंधु' जी के सपनों को साकार कर रही है। राष्ट्रबंधु जी के सम्पादन में यह पत्रिका 37 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही थी लेकिन कुछ परिस्थितियों के चलते यह बंद हो गई थी। कई कार्यक्रमों में उन्होंने इस पत्रिका को निकालने के लिए मित्रों को आमंत्रित किया था, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। वे इस पत्रिका को प्रकाशित होते देख पाते कि पिछले दिनों वे पंजाब से एक कार्यक्रम से शिरकत करके लौट रहे थे कि अचानक ट्रेन में ही उनका देहान्त हो गया, यह बालसाहित्य के लिए अपूर्णनीय क्षति थी। मैं दादा जी से तीन बार, बालवाटिका और बालप्रहरी के कार्यक्रमों में मिला था और उनका सानिध्य मुझे मिला था। कभी उन पर विस्तृत से चर्चा की जाएगी। राष्ट्रबंधु की स्मृतियों से निकलने का मन तो नहीं हो रहा परन्तु जिस बात की चर्चा यहाँ हो रही है, पहले उस पर बात करना जरूरी है। डॉ. राष्ट्रबंधु के मरणोपरांत लखनऊ निवासी और प्राख्यात बालसाहित्यकार नीलम राकेश ने यह जिम्मा संभाला और 'बाल साहित्य समीक्षा' पत्रिका पुनः अपने अस्तित्व में आ गई। मुझे पत्रिका का पहला और यह दूसरा, दोनों अंक मिले। पत्रिका का जैसा नाम है 'बाल साहित्य समीक्षा' वैसा काम भी कर रही है। बाल पत्रिकाओं की समीक्षा, बालसाहित्य की पुस्तकों, बालसाहित्य संगोष्ठियों की जानकारी बखूबी जुटा रही है। पत्रिका को एक नजर देखते ही मुँह से निकला कि वास्तव में 'बाल साहित्य समीक्षा' डॉ. राष्ट्रबंधु के सपनों को साकार कर रही है। इसके लिए मैं समीक्षा करने से पहले ही पत्रिका टीम और उससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े सभी बाल रचनोकार मित्रों को बधाई और साधुवाद ज्ञापित करता हूँ।

इस पत्रिका की वर्तमान संपादक बालसाहित्यकार नीलम राकेश हैं जो लखनऊ में रहती हैं। अपने संपादकीय में नीलम जी ने राष्ट्रबंधु जी के कार्यों को याद किया है और बाल रचनाकारों से बालसाहित्य के उत्थान के लिए आगे आने का आह्वान किया है। पत्रिका का पहला अंक पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है, ऐसा पत्र कॉलम में आई प्रतिक्रियाओं से पता चलता है। नवांकुर कॉलम में डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' जी की बिटिया सृष्टि पांडे के प्यारे बालगीत 'चूहेराजा बहुत बुरे' और 'चुनमुन भैया' बेहद रोचक और पठनीय हैं। प्रतिभाशाली पिता की प्रतिभाशाली बिटिया 'सृष्टि' की यह बाल कविताएँ बालमन को छूने वाली हैं। बिटिया को मेरी ओर से ढेर सारी बधाई। बालसाहित्यकार शिव अवतार रस्तोगी 'सरस' ने अपनी कविता में 'बाल साहित्य समीक्षा' पत्रिका के प्रकाशन का स्वागत किया है। इस पत्रिका में डॉ. प्रीति प्रवीण खरे द्वारा डॉ. राष्ट्रबंधु जी का लिया गया साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है। इसे पढ़कर मन भावुक हो उठा। दादा की यादें ताजा हो उठीं। पढ़कर लगा कि दादा सामने बैठे हैं और हम सब उनको सुन रहे हैं। नीलम जी और प्रीति जी का आभार, दादा राष्ट्रबंधु जी के विचारों को पढ़ने का अवसर उपलब्ध कराया। इसी क्रम में डॉ. राष्ट्रबंधु जी से संबंधित दो संस्मरण और हैं जो बहुत अच्छे लगे। कमल सिंह चौहान की बाल कविताएं 'पेड़ की छाया' और 'गरमी की खुशबू' रोचक लगीं। प्राख्यात बालसाहित्यकार डॉ. श्याम सिंह शशि का आलेख 'हिंदी का बालसाहित्य तथा विश्व-परिदृश्य' विचरणीय और संग्रहणीय है। इसी अंक में एक विशेष आलेख 'लोक जीवन में प्रचलित लोक शैली में खेलगीत' है जो मध्य प्रदेश के संदर्भ में लिखा गया है। इस लेख में बहुत अच्छी-अच्छी जानकारी दी गई हैं। अशोक त्रिपाठी का आलेख 'ऐसे थे बच्चों के हरिवंश राय बच्चन' जानकारी से परिपूर्ण है। अन्त में विभिन्न रचनाकारों द्वारा बालसाहित्य की पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित हुई है और जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। अन्त में बालसाहित्य से संबंधित कार्यक्रमों की जानकारी दी गई है। कवर पृष्ठ पर बालसाहित्यकारों के सम्मान की सुन्दर झलकियां हैं जो मनमोहक लग रही हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि 'बाल साहित्य समीक्षा' ने अपने इस दूसरे अंक से ही बालसाहित्य पर अपनी पकड़ बना ली है और बालसाहित्य में धमक पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में 'बाल साहित्य समीक्षा' का मूल्यांकन श्रेष्ठ 'बाल पत्रिका समीक्षाओं' में शामिल किया जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं पत्रिका टीम की सोच, भावना को सलाम करता हूँ, साथ ही आशा करता हूँ कि इस पत्रिका के माध्यम से इसी तरह हमें प्रकाशित हो रहे बालसाहित्य की जानकारी मिलती रहेगी। पुनः पत्रिका टीम को साधुवाद।

'बाल साहित्य समीक्षा' बाल पत्रिका

संपादक- नीलम राकेश

एक अंक का मूल्य- 25 रुपये

वार्षिक मूल्य- 100 रुपये

पंचवार्षिक मूल्य- 500 रुपये

आजीवन- 2500 रुपये

संरक्षक- 5000 रुपये

पता- बाल साहित्य समीक्षा, 610/60, केशव नगर कालोनी,

सीतापुर रोड, लखनऊ- 226020

Email- neelamrakeshchandra@gmail.com

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समीक्षक- उमेशचन्द्र सिरसवारी

पिता- श्री प्रेमपाल सिंह पाल

ग्रा. आटा, पो. मौलागढ़, तह. चन्दौसी

जि. सम्भल, (उ.प्र.)- 244412

ईमेल- umeshchandra.261@gmail.com

+919410852655, +919720899620, +918171510093

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