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सत्तर वर्ष में विस्तृत नहीं, विकृत हुई आजादी / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

सत्तर वर्ष में विस्तृत नहीं, विकृत हुई आजादी

० क्योंकि अब हम आजाद हैं!

सन् 1947 की वह अर्धरात्रि का जज्बा न जाने कहां खो गया, जब हमने भाईचारे की भावना के साथ जीने मरने की कसमें खाई थी। हमने यह प्रतिज्ञा ली थी कि अपने प्यारे हिन्दुस्तान में किसी का अहित नहीं होने देंगे। भ्रष्टाचार नामक शब्द की तो उत्पत्ति ही शायद नहीं हुई थी। एक दूसरे के प्रति सहयोग और समर्पण की भावना ही सर्वोपरि थी। हमने अपने देश की सरहदों पर शांति और अमन कायम रखने एक साथ मिलकर बैठकर फैसला किया था। स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस लेने हमारे वीर शहीदों का पुण्य स्मरण और उनके संदेशों को जीवन में उतारने बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले हमारे भारतीयों के मन में न जाने कौन सा संक्रमण प्रवेश कर गया है कि हम अपने वतन के प्रति ईमानदारी नहीं बरत पा रहे है। क्या है स्वतंत्रता? क्या आजादी को कहते है स्वतंत्रता? क्या मायने है प्रत्येक भारतवासी के लिए इस महान शब्द स्वतंत्रता के? ऐसे ही अनेक प्रश्न मेरे अपने देश के नागरिकों के मन मस्तिष्क में कुलांचे मारते होंगे। इतने सारे प्रश्नों के पीछे एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता का स्थान अर्जित कर पायी है? या फिर यह व्यक्तिगत बनकर रह गयी है? आज के माहौल में स्वतंत्रता या आजादी के अलग-अलग मायने बन गये है।

एक लंबी गुलामी के बाद आखिरकार अंग्रेजों ने 15 अगस्त 1947 को भारत को आजाद कर दिया। सारे गोरे अपने वतन इंग्लैंड लौट गए। अक्षुण्ण भारतवर्ष पर भारतवासियों का साम्राज्य स्थापित हो गया। देश के कोने कोने में आजादी का जश्न मनाया जाने लगा। रोशनियों से हर गली चौराहा जगमगा उठा। हर गरीब, अमीर एक-दूसरे को गले लगाकर मिठाईयां खिलाने लगा। आजादी के जश्र में अपने अपने स्तर पर सभी ने कोई न कोई आयोजन कर खुशियां मनायी। कुल मिलाकर पूरे देश में खुशियों के अलावा कुछ नहीं था। इन सारी खुशियों के पीछे एक ही वजह थी और वह यह कि हमनें परतंत्रता की बेडिय़ां तोडक़र आजाद परिंदों की तरह स्वतंत्रता का स्वाद चखा था। आजादी की वह खुशियां हम सभी के लिए अब लुप्त होने लगी है। हमारा सपना भी काफूर हो गया है। कारण यह कि गांवों, कस्बों, शहरों, नगरों तथा महानगरों में अब भारतवासी यह कहते नहीं थकते कि इससे तो अच्छा अंग्रेजों का शासन ही था। हर देशवासी यह मानने और समझने लगा था कि अब सभी खुश होंगे, धन धान्य की कमी नहीं होगी, बेकारी दूर होगी, गरीबी मिटेगी और विषमता की खाई को समानता की विचारधारा पाट देगी। अब स्वतंत्रता मिले 70 वर्ष हो चुके है किंतु हमारी सभी कल्पनाओं ने लगभग दम तोड़ दिया है। आजादी की 70वीं सुबह का जश्न मनाने से पूर्व मुझे कुछ पंक्तियां अदम गोंडवी जी की लिखी हुई अपनी ओर खींचने लगी है। उन्होंने कहा था कि-

काजू भुनी प्लेट में, व्हिस्की गिलास में, उतरा है राम राज्य विधायक निवास में।

पक्के समाजवादी है चाहे तस्कर हों या डकैत, इतना असर है खादी के उजले लिबास में।।

पैसे से आप चाहे तो सरकार गिरा दे, संसद यहां की बदल गयी है नख्खास में।

आजादी का जश्न मनाए तो किस तरह, जो फुटफाथ पर आ गए, घर की तलाश में।।

देश भर में 70वां स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने की तैयारी जोर शोर से शुरू हो चुकी है। हर भारतवासी के दिल में अचानक ही देशभक्ति का जज्बा जाग उठा है। सुबह से शाम और देर रात तक मोबाईल वाट्सएप तक एक से बढक़र एक देशभक्ति के भाषण और सलाहें आने लगी है। हम में से अधिकांश के लिए आजादी ठीक उसी तरह आई है, जैसे ‘अंधे के हाथ में बटेर।’ आजाद भारत में अपनी आंखें खोलने और होश संभालने के साथ ही हर किसी ने आजादी का अर्थ अपने-अपने तरीके से निकाला। हम हर अवसर पर यह कहने से पीछे नहीं रहते कि अब हम आजाद है। देश में बनायी गयी कानून व्यवस्था भी हमारी आजादी के नारे से द्रवित होती रही है। हम बिना लायसेंस के वाहन चलाना चाहते है, क्योंकि हम आजाद है। हम ट्रेन में सफर भी बिना टिकट करना चाहते है, क्योंकि यह देश हमारा है और सरकारी संपत्ति हमारी अपनी है। लाईन में लगकर कोई सामान खरीदना या फिर किसी काम के लिए इंतजार करना हमारी शान के खिलाफ है, क्योंकि हम आजाद है। सार्वजनिक उत्सव से लेकर व्यक्तिगत आयोजन में हम सडक़ों को घेरकर बड़े बड़े पंडाल लगाकर सडक़ों के सीने पर सब्बल चलाने से भी बाज नहीं आ रहे है, क्योंकि यह देश हमारा है और सड़क़ों पर हमारा अधिकार है। हम पान और गुटखा खाकर अच्छे खासे सरकारी दफ्तरों से लेकर सार्वजनिक सड़क़ों, बाग बगीचों आदि को थूकदान बनाने में भी पीछे नहीं है, क्योंकि हम आजाद है।

आज की परिस्थिति में एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है कि वास्तव में हमें अपनी आजादी को किसी तरह एवं किससे बचाना है? नि:संदेह सबसे पहले हमें अपने युवा पीढ़ी को पश्चिमीकरण से बचाना होगा। भ्रष्टाचार और भारत विरोधी शक्ति को समूल नष्ट करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। आज भी हमारे ऐसे दुश्मनों की कमी नहीं जो कि यही चाहते है कि हमारे किशोर और युवा पश्चिमी सभ्यता के ही गुलाम बने रहे। वे नशे में डुबे रहे और राष्ट्रीयता का उदय उनके हृदय में न होने पाये। मेरे मन में जब जब आजादी की बात उठती है, तब-तब मुझे चंद्रशेखर आजाद की जीवनी ‘दीया सलाई’ के महत्वपूर्ण अंश सहसा ही अपनी ओर खींचने लगते है। उन्होंने कहा था कि ‘आजादी किसे अच्छी नहीं लगती। चाहे वह रस्सी में बंधा पशु हो, या पिंजरे में कैद पंछी। सभी अपनी गुलामी की जंजीर तोड़ फेंकना चाहते है। फिर हम तो इस मृत्यु लोक में बुद्धि से तर-बतर मनुष्य है।’ जिस दिन गुलाम को अपनी गुलामी का अहसास हो जाता है, उसी दिन से उसमें आजादी की भूख दिखाई देने लगती है। लगभग 90 वर्षों का संघर्ष, अनगिनत शहीद, सैकड़ों आंदोलन बेजोड़ आक्रोश तथा संगठित राजनीति के परिणाम स्वरूप हमें यह आजादी नसीब हुई। 70 वर्षों में कितना कुछ बदल गया-रघुपति राघव राजाराम की जगह...पी-ले, पी-ले ओ मोरे राजा..., तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा..., दुनिया क्या चाहे पैसा-पैसा..., राष्ट्रीय प्रतीक तिरंगा से अब...भगवा झंडा, लाल झंडा, हरा झंडा और न जाने क्या-क्या? अब आजादी का मतलब जश्न नहीं, बल्कि सरकारी छुट्टी के रूप में दिखाई पड़ता है। आजादी कितनी विस्तृत हुई या कितनी विकृत हुई? यह विवेचना का विषय है। यह तो अच्छा हुआ कि देश में कानून बदलने के लिए संविधान और संसद तथा विधानसभाएं है। अन्यथा खुद फैसले लेने की स्वतंत्रता हमें किस मुश्किल में डालती उसका अंदाज लगाना भी नामुमकिन है।

सामाजिक न्याय के मामले में भी हमने अभी वह स्थान अर्जित नहीं किया है, जिसकी बातें की जाती थी। यह हमारे वैदिक धर्म का मूल अंग है। सामाजिक न्याय की व्यवस्था ‘श्रीमद् भगवत गीता में’ दिखाई पड़ती है। इसी तरह ‘रामचरित मानस’ में भी दूसरे के हित को सबसे बड़ा धर्म तथा दूसरे को पीड़ा देना सबसे बड़ा अधर्म बताया गया है-

परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमायी।

सामाजिक न्याय को ध्यान में रखते हुए सामाजिक पुनर्गठन के कार्यक्रम और योजनाएं तो बनायी जाती है, किंतु उन योजनाओं पर अमल किन अंशों तक हो रहा है, इसे नजर अंदाज कर दिया जाता है। समाज में इस बात की व्यवस्था का ढोल ही पीटा जा रहा है, जो समाज विरोधी काम करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। वास्तव में हो इसका उल्टा रहा है। लोगों का शोषण करने वाला समाज में सम्मान का पद पा रहा है, पीडि़त और अधिक शोषित हो रहा है। सामाजिक न्याय की व्यवस्था तो तभी दिखाई पड़ सकती है, जब प्रत्येक व्यक्ति खुद को सभी ओर से सुरक्षित महसूस करें। सभी वर्गों को उनकी योग्यता के अनुसार अवसर मिलना चाहिए। संविधान में भी इस बात का उल्लेख है कि सरकार किसी के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं करेगी। फिर कोई 80 प्रतिशत में भी डाक्टर नहीं बन पा रहा है और कोई महज 8 से 10 प्रतिशत पाकर भी इसका हकदार कैसे हो रहा है? बड़ी चिंता का विषय यह है कि हमनें बीते 69 वर्षों में इस वेद वाक्य को कहीं खो दिया है।

न राज्यं न च राजासीत, न दण्डो न च दाण्डिक।

स्वयमेव प्रजा: सर्वा:, रक्षन्ति स्म परस्परम।।

अर्थात पहले न राज्य था और न राजा था, न दंड था और न ही दंड देने वाला। स्वयं सारी प्रजा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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