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परसाई हास्य-व्यंग्य पखवाड़ा / पटेल चौक से बबली चौक / हास्य-व्यंग्य / प्रमोद यादव

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(परसाई हास्य-व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

पटेल चौक से बबली चौक

व्यंग्य

प्रमोद यादव

 

‘ क्या जी..इतना बढ़िया सपना देख रही थी और आपने उठा दिया ..’ पत्नी आँखे मलती बोली.

‘ क्या देख रही थी पगली ? ‘

‘ देख रही थी कि वो जो कचहरी वाला चौक है न..पटेल चौक..वहां पटेल की मूर्ति की जगह मेरी आदमकद मूर्ति लग गई है..’

पति ने इतने जोरों से अट्ठाहस किया कि वो सहम - सी गई..थोड़े अंतराल के बाद हंसी कुछ थमी तो पत्नी की ओर मुखातिब हो बोला - ‘ तुम्हारी मूर्ति ? क्या तुम जानती नहीं कि चौक-चौराहों. बाग़-बगीचों..सरकारी इमारतों..शिक्सा-संस्थानों..मंदिर-देवालयों..आदि में किनकी प्रतिमांए लगती हैं ?

‘ बिलकुल जानती हूँ जी..सब जानती हूँ..स्वतंत्रता सेनानियों के..देश की खातिर शहीद होने वाले जांबाजों के.. विद्वान् विचारको..वैज्ञानिकों..महापुरुषों..देवी-देवताओं आदि के लगते हैं..’

‘ तो इन सबके साथ तुम कैसे शुमार हो गई भई ? आजादी के बाद की तो तुम्हारी पैदाइश है.. स्वतंत्रता सेनानी होने का तो सवाल ही नहीं उठता...शहीद कभी हुई नहीं..और ऐसा मौका आया भी तुम मुझे पहले “ पहले आप-पहले आप “ कह कुर्बान करती रही.. महापुरुष या महास्त्री के तुममें कोई लक्षण नहीं ..ना ही कोई स्वर्गलोक की देवी हो ..तुम तो केवल एक आम औरत हो..एकदम ही निपट घरेलू औरत..तुम्हारी मूर्ति लगने का तो कोई चांस ही नहीं बनता ..फिर भला कैसे लग गई ? पति ने सवाल किया .

‘ आप भी ना..अजीब इंसान हैं..अरे लग गई तो लग गई..सपना ही तो है..इसमें भी आपको ऐतराज है ? पत्नी थोडा झल्लाकर बोली.

‘ बात ऐतराज की नहीं है भागवान..मुझे भला क्यों ऐतराज होगा ? मुझे तो बड़ी ख़ुशी होगी अगर सचमुच चौक में तुम्हारी मूर्ति लगी तो ..पर पटेल चौक को एकाएक कोई “बबली चौक” कहे तो थोडा अटपटा नहीं लगेगा ?’

‘ क्यों अटपटा लगेगा ? क्या मुंबई में वी.टी.एस. को लोग अब सी.एस.टी. कहते है तो अटपटा लगता है ?

‘ हाँ..हमें तो लगता है भई.. हम तो आज भी उसे वी.टी. ही कहते हैं..शार्ट एंड स्वीट नेम..वी.टी..’ पति ने वी.टी. को लय से उच्चारित करते कहा.

‘ तो ठीक है.. आप पटेल चौक ही कहना..जानती हूँ..आप मेरा नाम लेना भी पसंद नहीं करते ..आपको मुझसे कोई मुहब्बत नहीं.. हाँ..मोना की मूर्ति लगती तो दिन भर “मोना चौक” के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते रहते ..’ पत्नी तुनककर बोली.’

‘ लो..इसमें मोना कहाँ से आ गई ? तुम्हें कई बार बताया है कि वो स्कूल के जमाने में मेरी गर्ल-फ्रेंड थी.. केवल गर्ल-फ्रेंड.. और कुछ नहीं.. पर तुम मानती ही नहीं..एक बार उसे तुम्हारे साथ “सौतन” पिक्चर क्या ले गया..गुनाह ही कर डाला..जब देखो तब वही राग आलापती हो..’ पति ने सफाई देते और थोडा बनावटी मुंह फुलाते कहा.

‘ ठीक है..अब मोना का नाम नहीं लूंगी..पर “बबली चौक” पर बहस जारी रखूँगी..मेरी मूर्ति किसी चौक में क्यों नहीं लग सकती बताईये ? केवल इसलिए कि मैं एक आम नागरिक हूँ ? इस देश में जब चोर-डाकू भी चौक-चौराहों..मंदिरों में अपनी प्रतिमाएं स्थापित कर सकते हैं तो एक आम नागरिक क्यों नहीं ? क्या दुर्दांत डाकू मोहर सिंग की मूर्ति आगरा जिले में नहीं लगी ? फतेहपुर में ददुआ की मूर्ति नहीं लगी ? उसने तो एक के साथ एक फ्री की तर्ज पर अपनी बीबी की मूर्ति भी बगल में खड़ा करवा लिया..अभी दस्यु सुंदरी फूलन देवी की मूर्ति भी पूरे यू.पी. के कई इलाकों में थोक के भाव में लगने वाली है..अरे इन सबसे तो मैं ठीक ही हूँ मैंने तो कभी मक्खी भी नहीं मारे ..ये सब तो सैकड़ों को भूनकर अब मूर्ति बने खड़े हैं..’ पत्नी आवेश के साथ बोली.

‘ तुम समझ नहीं रही हो यार..मूर्तियाँ केवल उनकी बनती और लगती है जो इस लोक से उस लोक में चले जाते हैं..जीवित व्यक्तियों की मूर्ति न बनती है न ही कहीं लगती है..’

‘ गलत....पिछले दिनों ही तो हमारे पी.एम. साहब विदेश में किसी मैडम के यहाँ अपनी मोम की मूर्ति बनवाएं हैं..इसके पहले शाहरुक, सचिन,एश्वर्या,अमिताभ के भी बने हैं..और आप कहते हैं-जीवित व्यक्तियों के बनते नहीं ? पत्नी ललकारने के अंदाज में बोली.

‘ अरे यार..उसे मूर्ति नहीं ,पुतला कहते हैं..वो उन पुतलों को किसी चौक चौराहों में तो नहीं लगाती न..’ पति ने समझाया.

बीच में बात काटती पत्नी बोली- ‘ हाँ..मालुम है..लगाएगी तो मोम पिघल न जाएगा ?’

‘ अरे पागल..वो एक म्युजियम चलाती है..दुनिया के सारे दिग्गजों के मोम के पुतले बना लोगों के दर्शनार्थ रखती है.. हाँ..यहाँ तुम्हारी मोम की पुतली बन सकती है..फिर भी एक दिक्कत है..’

‘ क्या ? ‘

‘ दिक्कत ये कि तुम दिग्गज नहीं....’ पति ने छेडते हुए कहा..

‘ हूँ..उड़ा लो मजाक..आपको तो सपनो वाली बातें बताना ही नहीं चाहिए था मुझे..चलिए..मुझे फिर नींद आ रही है..मैं सो रही हूँ..’

सुबह पतिदेव नाश्ता कर आफिस चला गया..दोपहर लंच के लिए घर पहुंचते ही उसने जोरों से चिल्लाया- ‘ बबली..बबली..’

 

‘ क्या है भई ? क्यों इतना चीख रहें है ‘

‘ अरे..गजब हो गया..अभी पटेल चौक से होते हुए लौटा तो देखा..पटेलजी की मूर्ति गायब है..’

‘ क्या ?..सचमुच ?.. तो किसकी लगी है वहां ? विस्मय से पत्नी पूछी.

‘ तुम्हारी नहीं लगी है भई..अभी तो मैंने मूर्ति का ऑर्डर भी नहीं दिया है..’ पति ने हंसते हुए कहा.

‘ अरे मैं समझी कि उनकी गायब है तो किसी और की लग गई होगी..’

 

‘ पगली कहीं की..जब साफ़ शब्दों में बता रहा हूँ कि मूर्ति गायब है यानी गायब है..केवल चबूतरा खड़ा है..’ पति ने समझाया. पत्नी चुप्पी साधे मौन खड़ी रही.

‘ ऐ..क्या सोच रही हो यार..एकदम से बुत कैसे बन गई.. किस चिंतन में खो गई ?’ पति ने पूछा.

‘ मैं सोच रही थी कि एक मूर्ति बनवाने में कितना खर्च आता होगा जी ..’ पत्नी मौन तोड़ते बोली.

‘ मैंने अखबार में पढ़ा था कि ददुआ दंपत्ति का करीब तीन करोड़ में बना था..एक का लो तो वही करीब डेढ़ करोड़..’ पति ने कहा.

‘ तो छोडो जी..बाद में देखेंगे..मैं लंच लेकर आती हूँ..’ इतना कहती पत्नी किचन की ओर बढ़ गई ..

पति अल्हड बीबी की बातों को सुन मुस्कुराए बिना न रह सका.

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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