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साहित्य के बे-जोड़ प्राण वायु रहे है गोस्वामी तुलसीदास / डा. सूर्यकांत मिश्रा

10 अगस्त जयंती पर विशेष



पूरे विश्व में हिंदी साहित्य का इतिहास मुर्धन्य साहित्यकारों और काव्य रचयिताओं से गौरवान्वित होता रहा है। ऐसे ही साहित्यकारों में मानस ममज्र्ञ गोस्वामी तुलसीदास का नाम अग्रणी रहा है। रामचरित मानस जैसे महाग्रंथ के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास ने जब इस संसार में जन्म लिया तब हमारा देश अंग्रेजों की जप्त में था। वह समय पूर्णत: विरोधी संस्कृतियों, साधनाओं तथा जातियों का संधिकाल था। देश की सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियां भी कराहने की स्थिति में थी। हिंदी साहित्य में भक्तिकालीन साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। धर्म की ठोस भूमि पर स्थिति यह साहित्य शाश्वत होने के साथ ही लोकहित की सिद्धि के कारण सार्वभौमिक भी है। भक्तिकाल के इसी युग में गोस्वामी तुलसीदास ने जन्म लेकर साहित्य की वृद्धि कर हिंदी साहित्य के स्वर्णकाल की स्थापना की। हमें यह कहने में संकोच नहीं कि तुलसी ने मर्यादित आचरण के द्वारा आदर्श जीवन व्यवहार की सृष्टि की, जिसके कारण ही स्वार्थ और परार्थ के द्वंद्व को समाप्त किया जा सका। तुलसीदास के मानस में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का आदर्श चरित्र चित्रण तो हुआ ही घर-घर लोक शिक्षण का प्रचार-प्रसार भी हुआ।


ईश्वर अंश जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी।
सो माया बस भयऊ गोसाई, बंधऊ कीट मरकट की नाई।।


मानस में कर्म और उपासना का सुंदर समन्वय भी गोस्वामी जी द्वारा अत्यंत सरलता से किया गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी की वाणी में भारतीय दर्शन एवं कला का अद्भुत संयोजन है। वहीं अनास्था के सिंधु में आस्था का समुद्र है। तुलसीदास जी का संपूर्ण साहित्य अतीत के पुनराख्यान से बढक़र आगत का बोध व अनागत का दिशा सूचक भी है। इसे हम दूसरे शब्दों में भारतीय संस्कृति का विश्वकोश भी कह सकते है। तुलसीकृत रचना का एकमात्र उद्देश्य स्वांत: सुखाय, लोक मंगल और जनमोह का निराकरण ही है। तुलसीदास जी की लोक चिंतन की भावना रामचरित मानस में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।


मंगल करनि कलि मल हरनि, तुलसी कथा रघुनाथ की।
कीरति भनिति भूति मलि सोई।
सूरसरि सम सब कहं हित होई।।


तुलसीदास जी का मानना था कि सच्चा काव्य वही है, जो कवि के हृदय से निकलकर पाठक हृदय को आल्हादित कर दे। गोस्वामी जी में लोकमंगल और काव्य कौशल का चरम किसी अन्य कवि की तुलना में कहीं अधिक कूट-कूट कर भरा हुआ था। यह भी कहा जा सकता है कि तुलसीदास जी की प्रतिष्ठा रामजी जैसे लोक नायक का चरित्र वर्णन करने पर पुष्ट नहीं हुई, वरन यह कहने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि रामजी का जीवन भले ही काव्य का प्रेरणा हो, किंतु प्रत्येक रामकथा का व्याख्यानकर्ता या कवि तुलसी नहीं बन सकता।
तुलसीदास जी तात्कालीन प्रचलित संकीर्ण साहित्यिक मान्यताओं को सिरे से नकार कर एक समर्पित लोक चिंतन की भूमिका का निर्वाह करते है, जो मानव मात्र के लिए अपनी प्रतिभा का सद्पयोग करता है। तुलसीदास जी हिंदी के ऐसे कवि रहे है जिन्होंने प्रबंध काव्य एवं मुक्तक काव्य दोनों प्रकार के ग्रंथों की रचना की और दोनों ही काव्य रूपों के प्रणयन में विशेषज्ञता प्राप्त की। तुलसीदास ही वे महाकाव्यकार है, जिन्होंने हिंदी साहित्य में मर्यादावाद की स्थापना की। उनकी मान्यता थी कि लोक मर्यादा का पालन करने से ही समाज कल्याण संभव है। उनके श्रृंगार वर्णन भी मर्यादित प्रवृत्ति व्याप्त है। कहीं भी छीटा कसी अथवा अमर्यादित शब्दों का नामोनिशान नहीं है। पुष्प वाटिका में राम और सीता के प्रथम मिलन के प्रसंगों में श्रृंगार का मर्यादा पूर्ण आलंबन अद्भुत है।
कंकन किंकिन नूपुर धुन सुनि।
कहत लखन सन राम मनहिं गुन।।
मानहु मदन दुन्दुभी दीन्ही।
मानस विश्व विजय करि लीन्हीं।।


रामचरित मानस में सर्वथा मर्यादा पालन पर जोर दिया गया है। तुलसीदास जी के मर्यादावाद में न तो एकांगिता है, और न ही धार्मिक मजहबीपन। राम के चरित्र वर्णन में भक्ति को मर्यादा के साथ स्थापित कर नई पहल की गयी है। तुलसी के श्रीराम ने भी निषादराज को भी अपना मित्र बनाकर तथा शबरी के झुठे बेर खाकर इस बात की पुष्टि कर दी।


तुलसीदास जी के गीतों में शास्त्रीय संगीत का पूर्णत: निर्वाह हुआ है। विनय पत्रिका, और गीतावली में कई प्रकार की राग रागनियों का प्रयोग हुआ है। संगीत शास्त्र की दृष्टि से तुलसीदास जी के गीत शब्द प्रधान ही है। उनमें स्वर प्रधानता की कमी है। गीतावली में उन्होंने माता कौसल्या के हृदय में उपजते वात्सल्य का बड़ा सुंदर चित्रण किया है, वे लिखते हैं-


सुभग सेज शोभित कौसल्या, रूचित ताप शिशु गोद लिये।
बार-बार विधुवदनि विलोकति, लोचन चारू चकोर किये।।

तुलसीदास जी ने अपने गीतों में अलंकारिक एवं व्यवहारिक दोनों प्रकार के भाषाओं का भावानुकुल प्रयोग किया है। नि:संदेह रूप से हम कह सकते है कि गोस्वामी तुलसीदास जी अपने समय के महान समन्वयवादी कवि थे। आत्ममुग्धता उनके लेखांकन को छू भी नहीं सकी है। समाज और साहित्य जगत में व्याप्त कटुता, विषमता, विद्वेष और वैमन्सय को दूर कर पारस्परिक स्नेह, सहानुभूति, सौहार्द्र, समता का वातावरण स्थापित कर साहित्य को अनूठी गरिमा गोस्वामी जी ने ही प्रदान की है।

 

                                                    प्रस्तुतकर्ता
                                                   (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                               जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                                मो. नंबर 94255-59291

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