दुःस्वप्न / कविता / मोहन वर्मा

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ऐसा अक्सर ही होता है
रात देर गए मैं सो नहीं पाता हूँ
घर से बाहर निकल आता हूँ
सांय-सांय करते अँधियारे में दूर तलक
मृतप्राय सड़क चुपचाप लेटी है
अचानक कहीं से एक मोटर कार आ खड़ी होती है
कुछ धुँधली परछाइयाँ
चार दलित युवकों को नंगा कर
बाँध रही हैं उनको पीछे जंजीरों से
और बाकी परछाइयाँ
गऊ चमड़े से बनी पेटी से
उन पर कर रहीं हैं वार
मैं इन परछाइयों को पहचानता हूँ, जानता हूँ
कल ही तो इन्होंने एक बूढ़े आदमी को मार डाला था
उसके फ्रिज़ में रखा था मांस, कौन जाने किस का था 
रेंगती हुयी मोटर कार घसीट रही है युवकों को
और मैं नंगे पाँव दौड़ रहा हूँ उनके पीछे
परन्तु घर्र-घर्र करती मोटर कार तुरन्त अदृश्य हो जाती है।

मैं अभी ठीक से साँस भी नहीं ले पाया हूँ
तूफान की तरह आती हुयी एक बस
फुर्र से मेरी बग़ल से निकल जाती है
और फेंक जाती है सड़क पर
दो अधमरे शव
एक युवक, एक युवती का
सड़क उनके खून से भर जाती है
रक्त का दरिया बन जाती है
वे लोथड़े बन कभी डूबते हैं, कभी उभरते हैं
मैं तैर कर उन तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ 
मगर उस रक्त के सागर में
नीचे और नीचे डूबता चला जाता हूँ।

ऐसा अक्सर ही होता है
रात देर गए मैं सो नहीं पाता हूँ
घर से बाहर निकल आता हूँ
ऊजड़ खेत पटे पड़े हैं
युद्ध पीड़ित सीरियन शरणार्थियों से
जो भारी कदम धरते
किसी आश्रय की तलाश में बढ़ रहे हैं आगे
और मैं एक घायल बालक को बांहों में थामे
रेंग रहा हूँ उनके बीच आगे और आगे।

ऐसा अक्सर ही होता है
रात देर गए मैं सो नहीं पाता हूँ
घर से बाहर निकल आता हूँ
भागता रहता हूँ
भाएँ-भाएँ करती तंग गलियों में
कोई भी तो नहीं है कहीं
सिवाय एक ड्रोन के
जो तेज़ी से कर रहा है मेरा पीछा
मैं जानता हूँ - उनके लिए मैं एक ख़तरा हूँ
आरोप है -
भड़काने वाली बातें जो करता हूँ
ठायं-ठायं एक साथ दाग़ी जाती हैं बंदूकें  
पर मैं मरने वाला कहाँ हूँ
पहाड़ की चोटी पर अविचल खड़ा हूँ।

ऐसा अक्सर ही होता है
रात देर गए मैं सो नहीं पाता हूँ। 

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बद्री वर्मा (मोहन वर्मा)
प्रोफेसर एमेरिटस, मैथेमेटिक्स डिपार्टमेंट, यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन, फॉक्स वैली, अमेरिका                                                    टेलीफोन: (920) 731-0834
फैक्स: (920) 832-2674
Email: bvarma@uwc.edu
1478 Midway Road, Menasha WI 54952-1297

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