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लम्हे जिंदगी के - काव्य संग्रह / प्रेम मंगल

               
अवतरणिका

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जिंदगी को करीब से देखते हुए 67 साल हो गए है कभी हसाती है कभी रुलाती है कभी बड़ी हसीन हो जाती है कभी गम में डूबा देती है अपने परायों की पहचान करा देती है जिंदगी बड़ी हसीन है जिंदगी की हकीकत को मैंने शब्दों में पिरोया है वो लम्हे जो अविस्मरणीय है उन्हें मैंने इस पुस्तक में दर्शाया है अपने भावों को पूर्णरूपेण शब्दों में उतारने का अथक प्रयास किया है

 

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प्रेम मंगल


प्रेरणा स्रोत :-
श्री कृष्ण गोपाल जी मेहरा
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उत्साह वर्धक:
श्री अनिल कुमार जी मंगल, ऋत्विक मंगल तथा आयुष मंगल
 

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सहयोग कर्ता:-
नमन मेहरा
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अनुक्रम
1.         बच्चों को सीख
2.         माँ और बेटे का रिश्ता
3.         समय
4.               पुकार विधाता से
5.         प्रभु मिलने की चाह
6.         ताकत की होड़
7.         जज्बात
8.                केन्द्रीयकरण
9.         बूढ़ी माँ
10.    होली
11.    मेरा देश भारत
12.    मुक्तक
13.    अश्कों की व्यथा
14.    भ्रष्टाचार नजरों का खेल
15.    नारी
16.    हम है हिंदुस्तानी
17.    मैं का भाव मिटा
18.    नुक्स निकलने वाले अधिकारी
19.    मानव जीवन
20.    मन और वाणी
21.    माँ
 


बच्चों को सीख

आलोचना , प्रत्यालोचना और समालोचना,
तीनों की ही होनी चाहिए सराहना ।
आलोचना कमियों को है प्रदर्शित करती
प्रत्यालोचना कमियों का है विश्लेषण करती
समालोचना कमियों को है सही रूप देती


आलोचनाओं से निराश कभी न होना,
मन अपने को कमजोर कभी न करना,
दृढ़ निश्चय से सदा तुम लड़ते रहना,
हर गलती से शिक्षा तुम हमेशा लेना ।
मानव स्वभाव त्रुटि करना है,
महानता उसे स्वीकार करना है,


त्रुटियों को अपना शिक्षण स्थल तुम समझो,
सदाचार से अपना आँचल तू भर लो,
तभी यशकीर्ति इस जग में प्राप्त कर पाओगे,
उज्जवल भविष्य तुम अपना बना पाओगे ।

 

 

 

 

माँ और बेटे का रिश्ता

माँ और बेटे का रिश्ता मानव हो तो कभी ना तोड़ो,
माता की ममता को देखो, तो बच्चों का लाड़ न छोड़ो,
माता को तुम त्याग ना भूलो ।

माँ  है धरा , पिता गगन है , इस तथ्य को तुम कभी न भूलो,
कल्पना की लंबी उडाने , जितनी चाहे उतनी तुम भर लो,
गगनचुंबी ऊंचाइयों तक , किसने पहुंचाया इसे मत भूलो,
गोद माँ की न होगी खाली, जितना चाहे उतना सो लो,
बेटे का भी प्यार मत भूलो ।

गगन का तारा, जग की ज्योति बेटा तुम्हारा है यह न भूलो,
जीवन की यथार्थता और जीने का उद्देश्य है, यह मत भूलो,
सपनों का संसार बनाकर , उसे पूर्ण ज्ञान देना तुम मत भूलो ,
सतह धरा की छोड़ , गगन में उड़ने की शिक्षा देना न सीखो,
सच्चा त्याग करना तुम सीखो ।

जीवन की पहचान करो और मादकता , विषपान है समझो,
कटुता की छोड़ो परिभाषा , सहज भाव अपनाना तू सीखो,
    प्रेम , त्याग बलिदान है जीवन , मूलमंत्र इसको ही तुम समझो,
ज्ञानवान हो , ज्ञान अपने से हर राह को सुगम करना जानो
जीवन की सहजता तुम सीखो ।

 

 

अपना कोई नहीं जहां में, बस स्वविवेक तुम साथ रखो,
अंगारों से जल न सके, जो ऐसा कवच तुम धारण करो,
झंझावातों से झंकृत ना हो, ऐसा जीवन जीना तुम सीखो,
कंटकाकीर्ण जग का आँगन है, बुद्धिमत्ता से पर उसे करो,
माता पिता का त्याग न भूलो ।

माँ और बेटे का रिश्ता मानव हो तो कभी ना तोड़ो
माता की ममता को देखो तो बच्चे का लाड़ ना छोड़ो ।

 

 

 

समय
समय प्रतीक्षा करता नहीं किसी की,
घड़ियां सदा चलती रहती है उसकी,
वर्षा , धूप , सर्दी , गर्मी सब रुक जाती है,
समय की गति कभी नहीं रुक सकती ।

गम भी आते रहते , खुशियां भी आती रहती,
अपना अपना जोर दिखाकर सब चली जाती ,
समय की गति है, जो कभी भी नहीं रुक सकती,
गतिमान है वह जो तीव्र गति से चलती है रहती ।

सखा मित्र आते और जाते हैं रहते ,
सुख दुख तो छाया बनाकर ही रहते,
दिन रात कभी अपना वक्त नहीं बदलते,
वक्त के हाथों वक्त को ही छुपाये है रखते ।
                                         एक एक बून्द से है रीता घट भर जाता,
इक पल , मानव की जिंदगी है बदल देता,
मत करो गुमान इस मनुष्य योनी का भ्राता,
हर सुख- दुख देने वाला है केवल इक विधाता ।


पुकार विधाता से

हे विधाता , तूने ऐसा क्यों बनाया,
जो भी आता , गुर्रा के चला जाता,
मन जब जिसका होता , मीठी मीठी बाते वह बोलता ,
जब जी चाहता , मुंह वह मोड़ लेता, दिल क्या है हमारा ,
परवाह कोई इसकी न करना , मतलब जब भी हो किसी का,
अपना वह बन जाता ।
पिघलकर बर्फ की तरह , दिल पानी पानी हो जाता ,
काम होने पर पूरा जब वह धिक्कारता , दिल तो दिल है सिर्फ बैठ कर रह जाता,
दुनिया का दस्तूर हमें न भाता , क्या करे यह दुनिया है ,
हर व्यक्ति धर्म अपना पूरा करता , कर्मों का फल अपना ,
भुगतान खुद को ही पड़ता , अब तो दिल है बैठ गया ,
बुरा लगता है न कुछ भला , कर्तव्य अपना है पूरा हम करना,
समय का चक्र जब तक है चलना ।

 

 

प्रभु मिलने की चाह

राहें इतनी आसान नहीं, की जल्दी से उनको मैं लांघ सकूं,
कंटकाकीर्ण देखती जब राहे को हूं, कांटे निकालने बैठ जाती हूं,
कंटक जैसे ही  दूर हटते, जमीन कीचड़ से लबालब हो जाती है,
कीचड़ को दूर करने हेतु , पत्थर जमीन से बिछाने की जो कोशिश करती,
चहुं ओर से विषैले जानवर आ जाते हैं, जानवर हटाने का प्रबंध जैसे करती ,
अन्य विपदा आ कर घेर लेती मुझको है, प्रभु मैं कैसे तेरे पास जाती,
राहे इतनी आसान नहीं , की जल्दी से उनको लांघ जाऊं,
हालांकि यह भी सच है, बहती धारायें केवल भ्रम की है,
भ्रम में पड़कर खो जाती हूं, मायामोह के विषम जाल में,
विपदाओं को आमंत्रित करती स्वयं हूं, दोष देती हूं प्रभु तुझको ,
प्रयास करुँगी , राहो को आसान बनाऊं,
प्रभु तुझ से मिलकर इस जन्म को धन्य बनाऊं ।

 


ताकत की होड़

सूरज कहे चंदा से मेरी ताकत तुझसे ज्यादा,
चंदा कहे तू क्या समझे मेरे आगे तू है प्यादा,
हवा कहे तुम दोनों चुप हो , मैं ताकतवर हूं सबसे,
बादल कहे तुम क्या जानो , मेरी ताकत आगे है सबसे ।
मची होड़ सब मैं भयंकर चले सभी ताकत आजमाने,
सूरज ने दिखलाई प्रचण्डता लगे सभी बौखलाने,
चंदा ने दी जब भरपूर शीतलता लगे सभी जन ठिठुरने,
क्रोधित होकर ताकत अपनी दिखलाई जब बादल ने,
कही बाढ़ और कही गर्जना डूबे असंख्य बच पाये नहीं मौत से ।
मेरी ताकत , तेरी ताकत , किसकी ज्यादा , किसकी कम है,
सारी धरा पर सुन लो सब जन , इसी बात का ही इक गम है,
किसी को कम मत तुम समझो, सबको होशियार समझो अपने से ,
अपने ज्ञान को दूजों को बाटो, अच्छी-अच्छी बाते सीखो दूजों से,


ताकत की इस होड़ मैं बंधुओं अपने आपको नष्ट मत करो,
मिलकर रहो इस धरा पर, मानव का जीवन सार्थक तुम करो,
ईर्षा, क्रोध, मद और लोभ को दूर भाग के, जीवन में सद कर्म करो,
ताकत की इस होड़ में  बंधुओं अपने आपको नष्ट मत करो,

 

 

ताकत की इस होड़ में बंधुओ, व्यर्थ तुम बर्बादी को न बुलाओ,
तकनीकों का ज्ञान बढ़ाओ , रूस और अमेरिका से आगे तुम जाओ,
बड़ों आगे बुद्धि और दिमाग से, आतंकवाद, लूटपाट को दूर भगाओ,
भारत की पावन भूमि को, अपने पावन संस्कारों से तुम सजाओ ।  

 

 
जज्बात

जज्बात शब्द बहुत छोटा है, अर्थ छुपे उसमें बहुत ही गहरे है,
जज्बातों  को समझना भी अमानवीय जनो की बुद्धि से कही परे है,
जज्बातों से खेलना तो आसान है, समझने में उनको पढ़ते दौरे है,
कद्र करे जो सबके जज्बातों  की, उसके लिए मोहरे ही मोहरे है ।

मोहरे से तात्पर्य सुख शांति धैर्य और संतोष से है,
जिसे पा सकना बहुत ही कठिन दिखाई देता है,
जो पा लेता है धन्य खुद को वही समझ सकता है,
कद्र करे जज्बातों दूजों की जो धन्य वही हो सकता है ।

जज्बात नहीं मिटटी का ढेला , खेले कूदे और फेंक दे उसे अकेला,
जज्बात नहीं है चाट का ठेला , खाया पिया फेंक दिया इक भेला,
जज्बातों की कद्र करे गर सहेला, जीवन बन जाये एक सुन्दर मेला,
जज्बातों को ठेस लगे गर, जीवन बन जाये इक मौत का झूला ।  

 


केन्द्रीयकरण


केन्द्रीयकरण एक़ मंत्र है गर वो फूंका जाये
सब जन स्वकेन्द्रित हो जाये, हृदय शून्य हो जाये
हृदय शून्य हो जाये तबाह सब कुछ हो जाये
हवा पानी जो बंद हो जाये  इंसान भूखा मर जाये 
 
सूरज गर रश्मियां न फैलाये सितारे गर न टिमटिमाये
चंदा शांति गर न देव, सागर प्रतिबंधित जल को करले
वसु भार ढोना जो छोड़ दे, मानव अस्तित्व विहीन हो जाये
केन्द्रीकरण वह मंत्र है जो सबके हृदयहीन करता जाये

केन्द्रीकरण को दूर भगा, मिल-जुलकर हे मानव तुम जियो,
प्यार बाटो तुम दिल खोल कर भाई भाई को तुम समझो,
सुख-दुख बाट सब इक दूजे का, पर पीड़ा का हरण करो,
मानव की योनी है मुश्किल, कीमत सद्कर्मों से उसकी अदा करो ।

 


बूढ़ी माँ

फैलाकर आँचल बोठी रहना, दो शब्द प्रेम के सुनने को तुम तरसती रहना,
रैना बीते लाल मेरो मिलान मोहे आये, खिड़कियों से निहारत बैठी रहना,

गर क्रोधित हो दो बोल बोल दिए , पापिन दुष्टता कहलाओगी,
जहर का चुपचाप कड़वा घूंट पीकर सहनशील कहलाओगी,

यह जीवन इक व्यस्त जीवन है समय कहा किसी को तुम्हारी सुनने का,
पागलपन है कुछ अपनी कहने का समय तुम्हारा है सिर्फ चुप रहने का,

घर आँगन गर महकना चाहो, दिल पर पत्थर अपने रख लो,
हर कारज में ख़ुशी दिखाओ, सलाह-मशविरा दूर भगाओ,

नहीं जीवन है इतना सस्ता, सुखी रहने का तुम अब ढूंढो रास्ता,
चाहत से सुख कभी न मिलता, अंतः स्तल में ही सुख है बसता ।

 

 

होली

हाय हाय हाय होली आई रे आई रे होली आई रे
तरह तरह के रंग भरे है मेरी अद्भुत पिचकारी में   
तरह तरह के रंग भरे है मेरी अद्भुत पिचकारी में 
आई रे आई होली आई रे आई रे आई होली आई रे
क्षितिज कहे इक छत के नीचे, क्षितिज कहे एक छत के नीचे,
सारे इकठ्ठे हो जाओ रे , भैया सारे इकठ्ठे हो जाओ रे,
गंगा बोले , जमना बोले , सारे मेरे रंग में मस्ती से रंग जाओ रे,
पानी का कोई रंग नहीं होता , मानव कोई अलग नहीं होता रे ।
बैर-भाव को दूर ह टाके , मन के सरे मैल मिटाके,
प्यार के रंग से भर के पिचकारी रंग दो चुनरिया सारी रे
ईर्षा, क्रोध और बैर भगाके ईर्षा, क्रोध और बैर भगाके
             प्यार भरा एक जाम यू पीके रंग दो चुनरिया सारी रे
इक दिन होली ब्रज में होवे, एक दिन वृन्दावन में,
कृष्ण रंग में  मगन हो जाए बड़े प्रेम से होली खेले,
खूब पिटे है, नर नारियों से लंबी लंबी छडियों से,
बच्चे बूढे सब एक रंग में रंग  जाए मन से खेले होली रे
हाय हाय होली आई रे आई रे होली आई रे,
तरह तरह के रंग भरे है मेरी अद्भुत पिचकारी में
तरह तरह के रंग भरे है मेरी अद्भुत पिचकारी में
आई रे आई होली आई रे आई रे आई होली आई रे


मेरा देश भारत

मेरा देश भारत है, जो समस्याओं का देश है
समस्याओं की लहरें, आती है तीव्रगति  से
एक समस्या ख़त्म होती है, दूजी आ जाती है,
राम मंदिर समस्या, थी जटिल समस्या
निराकरण में उसके, लग गयी साडी शक्तियां
आँखें गढ़ी रही, सबकी उसके निर्णय पर
आखिर निर्णय हुआ जून 10  में, प्रसन्न हो गए सब
पटाखे चल गए, मिठाईयां बट गई
खूब शंखनाद हुआ, अल्हाद का संचार हुआ
परंतु समस्या तो समस्या है, फिर वह आ गई सबके मन में 
2011 में मस्तिष्क घिर गया, फिर इस समस्या में
राम मंदिर मुद्दे को फिर, बना दिया गया भीषण मुद्दे
कोशिश की जा रही है, भुनाने की उसको
उससे भी भीषण आ गई, एक घोर समस्या
नाम है उसका लोकपाल विधेयक, लोकपाल या लोकनाश है ये विधेयक
कुछ भी हो फ़िलहाल बन गयी है, बहुत बड़ी एक मुश्किल

 


बाबा रामदेव ने लगाई पूरी ताकत, सरकार ने कर दी
ख़राब यूं उनकी ही हालत , अन्नाहजारे भी आ गए उग्रता में
अनशन का तैयार किया, भयानक मसविदा उन्होंने  
मनमोहन सिंह जी ने भी दिखाई सख्ती, लोकपाल विधेयक में शामिल
होने में दिखाई नहीं बेरुखी,  देखिए आप इन समस्याओं का अंत क्या होगा
अंत होगा भी या नहीं होगा, पर यह निश्चित है
अन्य समस्याएं आएंगी, घबराईए नहीं
स्वागतार्थ तैयार रहिये, आपको भी अपने में मिला के ले जाएगी ।

 


मुक्तक


पत्थर की दीवारों में भी, सीना हुआ करता है,
सुंदर महल काँच का, नाजुक बहुत ही होता है,
पत्थर की दीवारों में, सीने में दिल छुपा होता है,
जिसके महल में, दिल पत्थर का हुआ करता है ।

दीवारें पत्थर की, समझती जज्बातों को तो है,
महल शीश के कुचलते, जज्बातों को ही तो है,
पत्थर की दीवारों में, सच्चे दिल से आतिथ्य सत्कार हुआ करता है,
शीशे के महल में दिखावे से भरा मखमली सत्कार हुआ करता है ।

पत्थर के घरों में मस्तिष्क वाले रहा करते हैं,
महल शीशों वाले मस्तिष्क का कारोबार करते हैं,
उपयोग कर, चांदी के टुकड़ों का धंधा बढ़ाते हैं,
उपभोग करके उनका दिल तो दिया करते हैं ।

 

 

अश्कों की व्यथा


मासूम चेहरों को, भीषण अत्याचारों को, सहते खूब देखा है,
मधु मुस्कानों को, अश्कों में , बदलते हुए तो खूब देखा है,
दीनों पर धनवानों को, यंत्रणायें देते हुए तो बहुत देखा है,
अफ़सोस से कभी अश्कों को, मुस्कानों में बदलते नहीं देखा है ।
यूं तो हंसते सभी दिखाने को इस जग में है,
मखमल में लिपटे हुए दिखावा हंसी हंस लेते हैं,
अंतस्तल में दर्द को बिठाये कितना बैठे सब है,
कुछ तो अपने कर्मों से कुछ मज़बूरी से हंसते हैं ।
हर इंसान समझता इस जग में चतुर अपने आपको है,
भूल जाता वह जहां में रहने वालों असंख्य चतुरों को है,
जो भी आया यहाँ, मस्तिष्क तो दिया भगवन ने सबको है,
कोई उससे सिरजन करता कोई बढ़ावा देता आतंक को है l
सीता का करके हरण रावण ने, जहां में मिटा दिया नाम अपने को है,
राम ने वध करके रावण का, पहुंचा दिया स्वर्ग मार्ग उनको है,
राम ने अग्नि परीक्षा लेकर सीता की किया सार्थक नाम अपने को है,
थे जो मर्यादा पुरषोत्तम वे राम, गिरने नहीं दिया अपनी मर्यादा को है,
राजपाट को त्याग कुटिया में रह कर भी सबने उनको हंसते देखा है,
मत दो गम किसी को भैया , मुफ्त में ही मिलता पिटारा वह सबको है,
अश्कों को पोंछ सको तो पोंछो छुपाने मत दो अपने अंतःस्थल में तुम उनको,
बदल सको तो  मुस्कान में बदलो तुम इन लाचार व्यथित अवाक अश्कों को,
मासूम चेहरों को , भीषण अत्याचारों को, सहते खूब देखा है,
मधु मुस्कानों को, अश्कों में, बदलते हुए तो खूब देखा है,
दीनों पर धनवानों को, यंत्रणायें देते हुए तो बहुत देखा है,
अफ़सोस कभी अश्कों को, मुस्कानों में बदलते नहीं देखा है । 

 

 


भ्रष्टाचार नजरों का खेल

इधर उधर जहां कहीं, नजर पड़े जहां भी कहीं,
भ्रष्टाचारी यह भी भ्रष्टाचारी वह भी, दादागिरी है खूब सबकी चल रही ।

कहां से पैसे कहा से लूट, कहा से गहना कहा से घूस ,
कहां से नोट, कहा से वोट, कहां-कहां से मारे शाट ।  

क्या कठिन है पैसा कमाना, क्या कठिन है धनवान बनना,
कॉलर ऊँची सदा अपनी रखो, जुंबा में रॉब अपना बनाये रखो ।
व्यापारी हो तो कम तुम तोलो, जितना हो सके मिलावट कर लो,
जितना चाहे उधारी कर लो, मांगे गर कोई तो हलाली कर दो ।

अकेला नहीं होता है भ्रष्टाचारी, संग रहती है सदा उसके दादागिरी,
सीना ताने भौंहे ताने वह चलता है, गाली की बौछारों से सुप्रभात वह करता है ।

रातें अँधेरी उसकी कदापि नहीं होती, उजाले से चमकती दुनिया उसकी होती,
संस्कार सदाचार का अर्थ नहीं उसे मालूम, डरता रहता उससे हर सीधा- सादा मासूम ।

आंखें नाम नहीं उसकी कभी होती, अश्कों की व्यथा महसूस न होती,
मधुशाला में मदमस्त वह रहता, नहीं कभी किसी से वह डरता ।

दूर भगाओ इस भ्रष्टाचार को, छह ओर फैलाओ सदाचार को,
सार्थक बनाओ मनुष्य जन्म को , धन्य करो इस जगतीतल को ।

 

नारी

प्रेरणादायिनी , सह्रदया, कोमलता की प्रतीक हो तुम,
तेजस्विनी, महिमामयी, कर्तव्यनिष्ठावान हो तुम,
स्वरूपिणी, विश्वेश्वरी, अखिलेश्वरी  भी हो तुम,
दीनों का दुःख हराने वाली मदर टेरेसा हो तुम ।

राष्ट्रीय निर्माता, शासन चालक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी हो तुम ,
अन्वेषणकर्ता व्यवसायी और समंदर जाकर ध्वज को फहराने वाली,
एवरेस्ट चोटी चढ़ने वाली, मंगल गृह तक जाने वाली, भी हो तुम,
मानव संसाधन, विश्वविद्यालय और संस्थाएं चलाने वाली भी हो तुम,

फोटोग्राफी करने वाली मीडिया कर्मी ऊर्जास्त्रोत भी हो तुम,
प्रेम, क्रोध और पथ प्रदर्शक सब रूपों में दिखने वाली हो तुम,

प्रथम रूप में बेटी बनकर प्यार सभी का पाती हो तुम,
द्वितीय रूप में बहना बन कर सच्चा प्यार लुटाती हो तुम,
तृतीय रूप में पत्नी बन कर संसार चलती हो तुम,
चतुर्थ रूप में माँ बन कर सबको गले लगाती हो तुम ।

कौन क्षेत्र वंचित है तुमसे कहा नहीं पहुंच पाई हो तुम,
गरिमा बनकर अपनी मर्यादा में रहकर सबसे आगे बढ़ने वाली हो तुम,
द्रढनिश्चय अटूट तुम्हारा कभी न धोखा खाने वाली हो तुम,
दुआ प्रेम की सबसे यह है नित नये स्त्रोत से ऊंचाइयों को छुओ तुम ।

 

हम है हिंदुस्तानी

कर्णों से सुनता नहीं जिसको मूक है जिसकी वाणी,
वो है हिंदुस्तानी भैया वो है हिंदुस्तानी,
नित नये कानून जहां बनाते, चलती खूब मनमानी,
चुप रहकर जो सह लेता वो है हिंदुस्तानी,

वो है हिंदुस्तानी ओ भैया हम है हिंदुस्तानी,
वो है हिंदुस्तानी ओ भैया हम है हिंदुस्तानी,

कानूनों की लंबी सूची याद है जिसे जुबानी,
मूक और बघिर बनकर सबको मनाने की है ठानी,
भ्रष्टाचार गुंडागर्दी की भाषा नहीं जिसने जानी,
अत्याचार, अनाचार और दुराचार से भरा है जीवन,

नेताओं की भीड़ जहां है करते जो कारस्तानी,
वो है हिंदुस्तानी ओ भैया हम है हिंदुस्तानी,

व्यक्ति यहाँ का सीधा सच्चा होती फिर भी बेईमानी,
भगत सिंह राजगुरु सुखदेव ने दी थी जहां कुर्बानी,
भूली नहीं जा सकती यहाँ के पूर्वजों की बलिदानी,
हमने तो बस श्रद्धांजलि अर्पित करने की है जानी,

वो है हिंदुस्तानी ओ भैया हम है हिंदुस्तानी,
वो है हिंदुस्तानी ओ भैया हम है हिंदुस्तानी,

सरहद हमारी पर कब्ज़ा कर ले चाहे आ के चीनी,
फिर भी बने रहेंगे हम तो भाई-भाई हिंदी चीनी,
सरबजीत जैसे युवाओं की पाक कर दे ख़त्म जिंदगी,
फिर भी हमने माफ़ करने की है सबको दिल से ठानी,

हम है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,
भैया हम तो है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,

पहले बनाया गोरों ने क्लर्क हम को , ये हम ने जानी,
फिर भी बच्चों को हमने विदेश भेजने की है ठानी,
झांसे में आकर गोरों के मरवा दी हमने झांसी की रानी,
सितारों की अपने फिर भी हॉलीवुड भेजने की है ठानी,

हम है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,
भैया हम तो है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,

मीडिया करती  है सच्चे दिल से बहुत खूब कुर्बानी,
बड़ा चढ़ाकर लगा मसाले हर खबर को देने की है उसने ठानी,
सजा चाहे संजय दत्त की हो या ही जिया की आशिकी कुर्बानी,
उत्तराखण्ड का दर्द हो या हो पी.एम. पद की हैरानी और बेचैनी,


हम है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,
भैया हम तो है हिंदुस्तानी भैया हम है हिंदुस्तानी,

आतंकवाद हो या नक्सलवादी पहचान नहीं किसी ने जानी,
खून चूस कर मासूम जनता का यहाँ राज करने की है ठानी,
महंगाई की मखमली चादर ओढ़कर कर रहे हँसी ठिठलानी,
आपस में लड़कर , मरकर, बर्बाद कर रहे सब की जिंदगानी,

कर्णों से सुनता नहीं जिसको मूक है जिनकी वाणी,
वो है हिंदुस्तानी भैया वो है हिंदुस्तानी,

तिरंगा झंडा है शान हमारी, आन बान इसकी है बचानी,
देश भक्ति के भावों से जय जयकार उसकी है बुलानी,
15 अगस्त 26 जनवरी को ही हमने यहाँ आने की ठानी,
क्योंकि हमको एक दिन की तनख्वाह नहीं है कटानी

 

 

 


मैं का भाव मिटा  मन से

मैं का भाव मिटा  मन से, जब हम को है मानव तू अपनायेगा,
तू को दूर भगा दिल से, तुम्हारा जब तू मानने लग जावेगा,
सच कहती हूं तभी इस धरा का सच्चा मानव तू बन पायेगा,
स्वर्ग जैसे चमन इस वसु को बनाने में समर्थ तू हो जायेगा ।

हम और तुम मिलकर इस जगती में कुछ कर दिखा सकते हैं,
असंभव को भी संभव बनाने की अद्भुत शक्ति संजो सकते हैं,
गाँधी जी गर मैं को रखते , तो स्वतंत्र क्या तुम हो सकते थे,
मैं से भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु कभी कुर्बानी नहीं दे सकते थे ।

यह जग खाली मेरा है, यह मात्र लोभी भुलावा केवल एक तेरा है,
यह जग हमारा तुम्हारा है मिलकर हर कार्य करना धर्म हमारा है,
खाली हाथ आया था जग, खाली हाथ तुझे यह से जाना है,
मोह माया के जाल में फंसकर, यूं ही मन का मेला करते रहना है ।

 

 


बमुश्किल यह मनुष्य जन्म पाया है, व्यर्थ ना तुझे उसे गवाना है,
त्याग, परिश्रम और बलिदान के असंख्य वृक्ष तुझे यह लगाना है,
जिनके फल से धरा, समुन्दर और गगन को मंत्रमुग्ध तुझे करना है,
मैल मिटाकर अंतर स्थल की, विचरण शुद्ध हवा में तुझको करना है l


इसलिए हे मानव यदि तू राम और कृष्ण के आदर्शों को अपनायेगा,
रावण और कंस की अधमियों को सचमुच सुदूर धरा से कर पाएगा,
में और तू का भेद मिटा जब हम और तुम को हे मानव तू  अपनायेगा,
तब ही तो तेरा यह जन्म सार्थक होगा और मानव कहला पायेगा ।

 

 

 

 

नुक्स निकलने वाले अधिकारी

नुक्स निकलने वालों अधिकारी हूं मैं,
मीन मेख में दक्षता की डिग्री धारी हूं मैं,
कर्तव्यों को नहीं, अधिकारों को पहचानता हूं,
स्वयं सुखी भवः के सिद्धांत को अपनाता हूं । 

यह भी ठीक नहीं, वह भी ठीक नहीं, ऐसा नहीं, वैसा नहीं,
तुम्हारा कोई काम ठीक नहीं की रट लगाए रहता हूं,
मीन मेख मैं  पूर्णरूपेण दक्षता रख स्नातकोत्तर डिग्रीधारी हूं,
नुक्स अधिकारी नाम है मेरे, नुक्स निकलना करता हूं ।

मक्खी बनकर गुमटा हूं, सबसे नुक्स निकलता हूं,
नुक्स अधिकारी नाम है मेरा, खुद ऐश से जीत हूं,
जरुरत नहीं समझता, मेहनत और मशक्कत करने की,
पारखी हूं मीन मेख निकालने का सबको मैं खटकता हूं ।

 

चींटी बनकर लगे रहो कारज में,
मक्खी बनकर में हँसी उडाता हूं,
याद रखो चींटी कितनी भी तेज चले,
मक्खी का उससे कोई मुकाबला नहीं,

खुशफहमी है मुझको मैं अत्यधिक अक़लमंद व्यक्ति हूं,
कितना करे कोई काम अच्छा मैं नुस्खे निकल देता हूं,
बीवी कहना कितना अच्छा पकाये, मैं नुस्खे निकल देता हूं,
सजा धजा घर कितना हो, डस्टबिन देख शोर मचाता हूं ।

सरकार बनाए कुछ भी नियम, विरोध बेहिचक करता हूं,
कोई प्रपोजल कुछ भी बनाये, मैं कमी निकल देता हूं,
जब प्रपोजल में खुद बनाता, वैसे  ही पेश कर देता हूं,
अपने अंदर नहीं झांकता औरों को देखता रहता हूं ।

झूठ बोलने धर्म है मेरा दूजों को झूठ नहीं बोलने देता हूं,
चौकन्ने रहते सभी है मुझसे, क्योंकि सभी की पोल में खोल देता हूं,
मीन मेख में पूर्णरूपेण दक्षता स्नातकोत्तर डिग्री धारी हूं,
नुक्स अधिकारी नाम है मेरा, नुक्स निकलना करता हूं ।

 

मानव जीवन

क्या सोचा क्या किया और क्या पाया,
मानव जीवन है मनवा तूने यूं ही गंवाया,
खुद ही खुद में मस्त रहा जीवन का अर्थ तू समझ न पाया,
लेता रहा जिंदगी भर सबसे देने को हाथ कभी बढ़ा न सका ।

अपनी तो क्या बात है तेरी, घर अपने का बना रहा तू प्रहरी
'पर' निकल अपने मन से तू 'स्व' पर सदा करता रहा सवारी

आदर्श और सिद्धांतों का चोला पहनकर लूट मचायी तूने अंतःस्थल से,
मन का टोका तूने न जाना, दुखी हुआ चाहे अंतर्मन से,
लोभ, मोह माया के जाल में फंस कर जलता रहा भाई बंधु से,
इस लोक को तू सवार न सका, गिला क्या कर सकेगा पर लोक से ।

चकाचौंध इस जग की देख भटक रहा तू बीच राह में,
सही गलत का भेद न जाना छला जा रहा अपने आप से,
पर बिगाड़ा कुछ अभी भी नहीं है गर मुक्ति पाले पापी मन से,
परोपकार की सीढी चढ़कर जरूरतमंद की झोली भरदे दान से ।

जो बोयेगा वही काटेगा नहीं तो मानव फिर पछतायेगा,
सद्कर्म से लोक सुधरेगा, परलोक में भी लेखा लिखा जायेगा ।

 


मन और वाणी
 
अवाक रहकर जमाने को देखते ही रहिये,
अन्दर की बात होठों तक आने न दीजिये,
मन और जिगर की भाषा पहचान में आने न दीजिये,
अपनी हर बात को अन्तःस्थल में  समा के ही रखिये ।

जमाना इतना अच्छा नहीं, कद्र तुम्हारे विचारो की करे,
फुर्सत कहां किसी को, बात जिगर तुम्हारे की वो सुने,
लाभ पर आकर को बात, क्यों ठिठोली जग की यूं बने ,
जहां मेला है मखमली, बात क्यों कोई सज्जनता की सुने ।

नयनों में रखो स्थिरता, चलने उनको न यूं दीजिये,
चलकर दूजों के हाथ में बिकने का मौका न दीजिये,
अभिराम, विराम की भाषा को अंतरज्योति में समेटे रहिये,
नयनों के अश्क नयनों से बाहर कभी आने न दीजिये ।

 

 

जालिम है यह दुनिया, लूट लेगी कब किसकी जिन्दगी,
हस्ती मिट जायगी, डूबे जायेगी तुम्हारी जीवन किश्ती,
जियो न तुम जिन्दगी, यूं बन कटी हुई इक पतंग सी,
जो भी मिले भर दो प्यारे मीठे बोल से उसकी झोली ।
मिश्री प्यार की घोलिये, मत उसमें अपने आपको डुबाइये,
सराबोर होकर भी अपने आपको अलग ही बनाये रखिये ।

 

 

 


माँ

सारे दर्दों को अपने अंदर समाहित करने वाली है केवल माँ,
तभी तो हर दुःख दर्द में मुख से निकलता है केवल इक माँ,
ऊर्जा को देने वाली, सच्ची पथ प्रदर्शक है इक माँ,
तभी तो, तभी तो जड़ को भी चेतन बना देती है माँ  ।

समंदर बनकर अश्रुरूपी सरिता को अपने अंदर समेट लेती है बस माँ,
सहनशीलता, वसुंधरा सी गंभीरता आकाश सी रखती है केवल इक माँ,
समंदर सी लहरो सी कल कल कर बहती रहती है केवल इक माँ,
तभी तो बच्चों को संघर्षों में जीवन जीना सिखाती है बस इक माँ ।

खुद भूखी रहकर भी बड़े प्यार से बच्चों को खिलाती है केवल इक माँ,
सुखकर्ता, दुखहर्ता , पथगामिनी , सुभाषिणी, सुहासिनी है केवल इक माँ,
माँ जानकी , माँ यशोदा , माँ पार्वती, माँ टेरेसा जैसी बने जहाँ की हर इक माँ,
धैर्यशील, मृदुलतामयी, वात्सल्यमयी, कर्मठी और शक्तिशाली बने रहे हर इक माँ ।

हर बाधा को चूर चूर कर अग्निपथ में कूद कर,
जग को  कठिन परीक्षा देकर, सफलता को चूमे हर माँ,
सुनामी लहरे बनकर घातक रूप धारण ना करना कोई माँ,
कैकई बनकर राम रूपी बच्चों की खुशियां न छीनना कोई माँ ।

जो है मायें, जो नहीं है वे भी बनेगी इक दिन मायें,
सबके अंदर सब गुण है, बहुत प्रतिभाशाली है, सहनशील है ये मायें,
दुआ प्रेम की सबसे है , मायें सच्चे दिल से प्यार करे बच्चों को,
सभी माताओं के लाल रोशन करे नाम अपनी माओं के ।

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