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अंगुलिमाल डाकू / कहानी / व्यथित हृदय

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(ऊपर की कलाकृति - आलोक कुमार)

 

प्रसेनजित्‌ के राज में चारों ओर हाहाकार मचा था । नगर उजड़ गए थे, गाँव लुट गये थे, न किसी के मन में शांति और न किसी के मन में संतोष । जिसको देखिए वही भय से समाकुल । बच्चे- जवान-बूढ़े सभी का कलेजा अंगुलिमाल डाकू का नाम सुनते ही पत्ते की भाँति काँप उठता था ।

उस समय गौतम श्रावस्ती के जेतवन में निवास कर रहे थे । गौतम के कानों में भी अंगुलिमाल के अत्याचारों की आवाज पड़ी बस फिर क्या था, खूँखार सिंह को भी तोते की तरह मीठी बोली बोलना सिखा देने वाले योगी, गौतम पात्र और चीवर लेकर आश्रम से निकल पड़े ।

मार्ग में, चरवाहों, किसानों और राहगीरों ने देखा-श्रमण गौतम उसी ओर अकेले बड़े जा रहे हैं, जहाँ दुर्दान्त अंगुलिमाल निवास करता है ।

सबों का कलेजा जैसे ओंठ पर आ गया । एक सूखी हुई हड्‌डियों का मनुष्य, अकेले, अंगुलिमाल के रास्ते पर! इधर से तो सैकड़ों मनुष्यों के मिले हुए दल को भी जाने की हिम्मत नहीं पड़ती शायद श्रमण गौतम को डाकू के दुर्दान्त प्रताप की खबर नहीं । सबों ने बारी-बारी से गौतम को टोककर कहा-न जाओ भाई इस रास्ते से! आगे अंगुलिमाल डाकू का निवासस्थान है ।

वह बड़े-बड़े शस्त्रधारियों को भी केवल क्षणमात्र में अपने काबू में कर लेता है । उसके सामने जाते हुए बड़े-बड़े सूरमा सिपाही तक काँपा करते हैं ।''

पर गौतम कब मानने लगे? वह बराबर उसी ओर आगे बढ़ते गये ।

जंगल के सघन भाग में अंगुलिमाल का स्थान है! कोई वहाँ जाने का नाम भी नहीं लेता । एक दुबले-पतले संन्यासी को अपने स्थान की ओर आते हुए देखकर अंगुलिमाल के विस्मय का ठिकाना न रहा । साथ ही उसके क्रोध की आग भी भड़क उठी- 'एक दुबले-पतले, निर्जीव संन्यासी का इतना साहस कि वह अकेला इठलाता हुआ अंगुलिमाल के स्थान की राह से आगे निकल जाय! नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता । मैं अभी उसे एक क्षण में मारकर भूमि पर गिरा दूंगा! '

. ' अंगुलिमाल धनुष पर तीर चढ़ाकर गौतम के पीछे चल पड़ा । उसे क्या मालूम था कि मेरे इस धनुष-बाण से गौतम के योग अस्त्र कहीं अधिक तीखे हैं । गौतम ने अंगुलिमाल को धनुष पर बाण चढ़ाये हुए अपने पीछे आते देखा । बस, योग का एक अस्त्र फेंका और अंगुलिमाल की गति रुक गई ।

अंगुलिमाल घबड़ाया । उसे विस्मय हुआ-ओह, यह क्या? मैं इतनी तेजी के साथ दौड़ने पर भी उस संन्यासी तक क्यों नहीं पहुंच-रहा हूँ? आज मुझे क्या हो गया है? मैं तो तेज दौड़ने वाले हाथियों को भी क्षणमात्र में अपना शिकार बनाता था?'

अंगुलिमाल अपनी शक्ति का हर एक तरह से प्रयोग करके लाचार हो गया । अब उससे न रहा गया,। उसने गौतम को पुकारकर कहा-''सन्यासी, खड़ा रह ।''

''मैं तो खड़ा हूँ अंगुलिमाल.! '' गौतम ने उत्तर दिया-और तू चल रहा है । फिर तू मुझ तक क्यों नहीं पहुँच रहा है? कैसे आश्चर्य की बात है-! ''

. अंगुलिमाल चौंका, उःसे विस्मय हुआ- संन्यासी तो झूठ नहीं बोलते-! मगर यह झूठ बोल रहा है । आगे दौड़ा जा रहा है और कहता है, मैं तो खड़ा हूँ ।' अंगुलिमाल, ने विस्मय के स्वर में कहा-''संन्यासी, तू झूठ बोल रहा है । तू तो आगे भागा जा रहा है और फिर कहता है मैं खड़ा हूँ।

हाँ, मैं खड़ा हूँ अंगुलिमाल'! गौतम ने उत्तर दिया-

''तुम्हारी आँखें हिंसा, लोभ, पाप और असत्य की भावनाओं से भरी हुई हैं । इसीलिए तुम्हें सच्ची बात भी झूठी मालूम होती है ।'' गौतम की इस बात का डाकू के हृदय पर गहरा प्रभाव पड़ा । उसने धनुष-बाण नाले में फेंक दिया .और वह उनके चरणों की वन्दना करके कहने लगा-''भगवन्! मैं आपकी शरण में-हूं! मेरा उद्धार कीजिए ।''

गौतम ने उसके सिर पर अपनी कृपा का हाथ रखकर उसे भिक्षु बना लिया । इधर गौतम अंगुलिमाल को भिक्षु-रूप में लेकर श्रावस्ती लौटे और उधर प्रसेनजित् के राज-निवासियों ने राज- धानी में एकत्रित होकर यह कोलाहल मचाया कि अंगुलिमाल डाकू के उद्दण्ड अत्याचार से प्रजा मरी जा रही है । अनेक नगर बर्बाद हो गये है । सैकड़ों गाँव लूट लिये गये हैं । करोड़ों मनुष्यों को तलवार के घाट उतार दिया गया । अब हम लोग कहाँ जाएं, किसकी शरण ढूंढें उसने अपने राक्षसी काण्डों से चारों ओर कुहराम मचा दिया है

प्रजा की यह पुकार सुनकर प्रसेनजित् के कोप की सीमा न रही । वह पाँच सौ घुड़सवारों के साथ अंगुलिमाल के दमन के लिए निकल पड़ा । इस समय भिक्षु-रूप अंगुलिमाल के साथ गौतम श्रावती के_ जेतवन में ठहरे हुए थे । प्रसेनजित् ने उसी बगीचे में पहुँचकर डेरा डाला ।

गौतम ने प्रसेनजित् को पाँच सौ घुड़सवारों के साथ यात्रा के लिए निकला हुआ देखकर कहा-''राजन्! आप इस वेश में कहाँ जा .रहे हैं? किसी. प्रचण्ड शत्रु ने राजा की सीमा पर आक्रमण तो नहीं किया है ?''

''नहीं भगवन्! '' प्रसेनजित् ने उत्तर दिया-''किसी शत्रु ने आक्रमण नहीं किया है, बल्कि अंगुलिमाल नामक एक डाकू के अत्याचारों से इस समय राज में चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है । इस समय उसी का सर्वनाश करने के लिए अपने धर से निकला हुआ हूँ ।''

गौतम मुस्कुराये । कुछ देर तक चुप रहे, फिर बोल उठे- ''राजन्! यदि अंगुलिमाल आपके सामने बौद्ध भिक्षु के रूप में उपस्थित हो तो आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगेँ ?''

मैं उस समय उसकी पूजा करूँगा भगवन्! '' प्रसेनजित् ने उत्तर दिया-''मैं उसे घर पर सप्रेम निमंत्रित कर भोजन कराऊंगा । मगर यह विश्वास नहीं होता कि अंगुलिमाल ऐसा दुर्दान्त और हिंसक मनुष्य भी कभी बौद्ध भिक्षु हो सकता है ।'' ''संसार में कोई काम असम्भव नहीं राजन्! '' गौतम ने कहा-भिक्षु-वेश में बैठा हुआ नया श्रमण अंगुलिमाल ही है ।'' राजा के आश्चर्य की सीमा न रही । उसने भिक्षु' के पास जाकर कहा-''महाभाग क्या तुम्हीं अंगुलिमाल हो?

''हाँ राजन्! '' भिक्षु ने उत्तर दिया-''मैं ही डाकू अंगुलिमाल हूँ ।''

राजा प्रसेनजित् श्रद्धापूर्वक अंगुलिमाल की परिक्रमा कर राजधानी लौट-गया ।

कुछ ही दिन बीत पाये थे । एक दिन अंगुलिमाल पात्र और चीवर लेकर भिक्षा-वृत्ति: के लिए श्रावस्ती में गया । वह नगर में घूम रहा था, सहसा एक कंकड़ आकर उसके सिर में लगा । सिर फट गया, रक्त की धारा-सी बह चली । अभी उस चोट को अंगुलिमाल सँभाल भी न पाया था कि दूसरी ओर से एक.पत्थर का टुकड़ा सनसनाता हुआ आया और उसके सिर में एक और घाव हो गया । अंगुलिमाल लहू से सन गया । उसके सारे कपड़े रक्त से लाल हो गये । जिसने उसे इस वेश में देखा, उसी ने कहा-आह, बड़ी चोट लगी! '' पर अंगुलिमाल के मुख से आह और कराह का एक शब्द भी न निकला 1

रक्त में सना अंगुलिमाल हाथ में टूटा हुआ पात्र लेकर गौतम के पास पहुँचा । गौतम ने उसे देखकर कहा-''भिक्षु! आज तुम्हारा प्रायश्चित्त पूरा हुआ ।''

''प्रायश्चित्त पूरा हुआ! '' गौतम के मुख से यह शब्द सुनकर अंगुलिमाल ऐसा प्रफुल्लित हुआ मानो उसके हाथों में किसी ने मुक्ति की माला रख दी हो!

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(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

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