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रेत में नहाए मन का कवि : हरीश भादानी - वीणा भाटिया

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हिन्दी में लोक कवियों की एक विराट परम्परा है। ऐसे कवियों की रचनाएँ लोक-मानस में अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं और श्रुति परम्परा के माध्यम से लोक-स्मृति का अंग बन जाती हैं। जनकवि और गीतकार हरीश भादानी के सम्बन्ध में यह बिल्कुल सच जान पड़ता है। अरुण माहेश्वरी ने 12 संक्षिप्त अध्यायों में हरीश भादानी के रचना-कर्म और जीवन-वृत्त को सामने लाया है। अरुण माहेश्वरी लिखते हैं – “हरीश भादानी को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति उनके बारे में एक जुमले का प्रयोग करता है – ‘आपाद मस्तक कवि’...कविता को ही जीने, खाने, पहनने, ओढ़ने वाला कवि।” हरीश भादानी को साहित्य का औलिया कहा गया। उनका कहा हर शब्द एक रचना होता था। ऐसे औलिया रचनाकार के जीवन और कृतित्व को एक छोटी-सी किताब में समेटना कोई आसान काम नहीं है।

पहले अध्याय ‘कवि की ज़मीन’ में लेखक ने हरीश भादानी की पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनके परिवेश के बारे में लिखा है। हरीश भादानी ने किशोरावस्था में ही गीतों की रचना शुरू कर दी थी। प्रेमपगे गीतों के कारण इनकी तुलना बच्चन से की जाने लगी। हरीश भादानी कॉलेज में राजनीति से जुड़े। 55-56 में वे छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गए। उसी दौरान वे लोहियावादी सोशलिस्टों के प्रभाव में आए।

इसके बाद उनके गीतों में एक नया तेवर सामने आया। 1959 में ‘अधूरे गीत’ संग्रह का प्रकाशन हुआ। इसके बारे में रांगेय राघव ने लिखा – “इस कवि की विशेषता है उसकी लोकपरकता। वह अकेला नहीं है, सारे देश को प्रफुल्लित करना चाहता है।” 1961 में ‘सपन की गली’ और 1963 में ‘हंसिनी यादों की’ संग्रह सामने आए। इसके बाद नया दौर शुरू हुआ ‘वातायन’ के सम्पादन के साथ। वातायन में उस समय के लगभग सभी प्रमुख लेखकों की रचनाएँ छपने लगीं। आगे चल कर वातायन को मासिक किया गया। लेकिन इस अव्यावसायिक प्रकाशन में हरीश भादानी की सारी संपत्ति लगती गई। वातायन का प्रकाशन सन् 74 तक हुआ। इसके माध्यम से हरीश जी कोलकाता के कम्युनिस्टों के संपर्क में आए और सर्वहारा के दर्शन मार्क्सवाद को अपना लिया। इस बीच, उनकी कई कृतियाँ सामने आ चुकी थीं। 1982 में जनवादी लेखक संघ का गठन हुआ और हरीश भादानी इस संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के साथ राजस्थान इकाई के महासिचव बने।

1979 में हरीश भादानी की एक लम्बी कविता प्रकाशित हुई – ‘नष्टोमोह’। यह उनकी काव्य-यात्रा में एक नया पड़ाव था। इसके बाद ‘रोटी नाम सत है’ संग्रह आया। पूरे देश में इस संग्रह के गीत जन-आन्दोलनों में गाए जाने लगे। हरीश भादानी पूरी तरह आन्दोलन के कवि बन गए। 1981 में ‘खुले अलाव पकाई घाटी’ का प्रकाशन हुआ। 1882 में ‘सन्नाटे के शिलाखंड पर’ संग्रह प्रकाश में आया, जिसमें उनके “रचना-संसार को रूपायित किया रेत के सौंदर्य ने, रेत के हाहाकार ने।” 1984 में उनका संग्रह ‘बाँथा में भूगोल’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उनके राजस्थानी गीत हैं। 1985 में उनके गीतों और कविताओं का नया संकलन आया ‘सड़कवासी राम’। हरीश भादानी ने अपना सारा जीवन आन्दोलन को समर्पित किया था और ‘घर फूँक तमाशा’ देखने वालों में थे, लेकिन बाद में स्थिति ऐसी आ गई कि दो जून की रोटी के भी लाले पड़ने लगे। हरीश भादानी कवि सम्मेलनों के बड़े कवि हुआ करते थे, लेकिन अरुण माहेश्वरी ने लिखा है- “व्यावसायिक कवि सम्मेलनों में न जाने का निर्णय उन्होंने उस समय लिया जब वे अपने जीवन के सबसे पीड़ादायी आर्थिक संकट से गुजर रहे थे।”

हरीश भादानी की सबसे महत्त्वपूर्ण कृति ‘सयुजा सखाया'’ का प्रकाशन 1998 में हुआ। इसे उनकी गीताजंलि कहा गया। यह वस्तुत: एक दार्शनिक रचना थी। इसमें उनकी रचनाशीलता का चरमोत्कर्ष दिखाई पड़ता है। हरीश भादानी पर लिखना, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्याँकन करना आसान नहीं है। लेकिन 116 पृष्ठों की इस छोटी-सी पुस्तक में अरुण माहेश्वरी ने जो लिखा है, वह गागर में सागर है। हरीश भादानी ने अपनी मृत्यु का अभिलेख भी स्वयं लिखा। उनका निधन गाँधी जयंती, 2 अक्टूबर, 2009 को हुआ। लेकिन अपनी मृत्यु से पाँच साल पहले 10 नवम्बर 2004 को अपनी तीनों बेटियों को पत्र लिख कर अपनी जड़ देह को आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, बीकानेर को देने को कहा था, ताकि वह मेडिकल छात्रों के प्रयोग में काम आ सके। उनकी यह इच्छा पूरी भी हुई।

हरीश भादानी के रचना कर्म के बारे में डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है कि उनका हजारों पन्नों में फैला विपुल साहित्य और उनका विशाल रचना संसार एक सर्जनात्मक विस्फोट की अनुभूति पैदा करता है। वे सिर्फ कवि नहीं, चिंतक, विचारक थे। मजदूरों, किसानों को उनके आंदोलनों में नेतृत्व देने वाला क्रांतिकारी कवि ऋगवेद के मर्म को आम लोगों की भाषा में नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है। हिंदी में कितने लोग हैं जिन्होंने ऋगवेद को इतनी गंभीरता से पढ़ा होगा। वे अनेकायामी कवि थे।

पुस्तक : हरीश भादानी

(भारतीय साहित्य के निर्माता सीरीज)

लेखक : अरुण माहेश्वरी

प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष : 2015

मूल्य : पचास रुपए

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वीणा भाटिया

Email – vinabhatia4@gmail.com

Mobile - 9013510023

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