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समीक्षा / कविता में इस जटिल समय का आख्यान / वीणा भाटिया

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हिन्दी कविता में एक नाम इधर प्रमुखता से उभर कर सामने आया है सरला माहेश्वरी का। सरला माहेश्वरी वैसे तो पहले राजनीति में सक्रिय रही हैं और राजनीति, समाज, संस्कृति पर इनकी कई किताबें आ चुकी हैं, पर कविता के क्षेत्र में इन्होंने हाल ही में प्रवेश किया है और अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है। इनकी कविताएँ लगातार कई मंचों पर पढ़ने को मिलती रही हैं। कविता में जिस तरह से उन्होंने आम आदमी के जीवन के विविध पहलुओं और खासकर आज की राजनीति के कपटपूर्ण जनविरोधी चेहरे को उजागर किया है, वह उल्लेखनीय है। अपने पहले संग्रह ‘आसमान के घर की खुली खिड़कियाँ में उन्होंने कविता का जो नया स्वरूप प्रस्तुत किया, उसने सुधी पाठकों के साथ विद्वानों का ध्यान भी आकृष्ट किया। सरला जी की खासियत है कि वे लगातार लिखती हैं और जनता से जुड़े जितने भी मुद्दे हैं, लगभग सब पर लिखती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो लगता है कि इनकी कविताएँ हमारे समय का एक दस्तावेज़ हैं, उस समय का जो लगातार भयावह होता जा रहा है, यद्यपि उसी में बदलाव के बीज भी छुपे हैं। सरला जी की कविता इस जटिल समय का आख्यान तो है ही, उसमें बीज-मंत्र भी है बदलाव का, इसे रेखांकित करना ज़रूरी है। सरला जी के लिए कविता-लेखन कलात्मक विनोद नहीं, एक अनिवार्य कर्म की तरह है जो उन्हें सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर एक एक्टिविस्ट की भूमिका में ले आता है।

अपने दूसरे कविता-संग्रह ‘तुम्हें सोने नहीं देगी’ में वे लिखती हैं – “कविता मेरे लिए अपने समय में प्रवेश के हजार दरवाजों में एक दरवाजा ही है।” वे कविता को सामाजिक सक्रियता का ही एक रूप मानती हैं। उन्होंने लिखा है – “कविता को अपनी दूसरी किसी भी सामाजिक सक्रियता से अलग कर के देखना मेरे लिए संभव नहीं है। समय में प्रवेश का यह उपक्रम समय को बदलने के आगे के उपक्रमों से अभिन्न रूप से जुड़ा है।” इससे समझा जा सकता है कि उनकी काव्य-दृष्टि क्या है और वे कविता को मूलगामी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया का एक अनिवार्य उपकरण मान कर चलती हैं। इस समय के सबसे चुनौतीपूर्ण सवाल उनकी कविताओं में बार-बार सामने आते हैं, खास कर साम्प्रदायिकता का जहरीला उभार जो आज भारतीय राजनीति में चरम पर पहुँच गया है, उनके मन को मथता रहा है। इस संग्रह में इससे जुड़ी घटनाओं और अनुभवों पर कई कविताएँ हैं। सरला माहेश्वरी ने अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में जो संकेत दिया है, वह महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है – “इस डरावने, उदास, रूह को बेचैन करने वाले वक्त में, हर रोज के दर्दनाक दृश्यों से मन में जो चीख पैदा होती है, मैं अपनी कविता में उसे ही व्यक्त करने की कोशिश करती रही हूँ। क्या सांस्कृतिक हादसों और आहत भावनाओं के इस दौर में कविता इस डर को तोड़ कर विचारों को बचाने और साथ ही व्यापक लोकतांत्रिक लड़ाई में एक वैचारिक सेनानी नहीं बन सकती है?” कविता को वैचारिक सेनानी की भूमिका में देखने की बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। संभवत: इसी चेतना ने सरला जी की कविताओं में वह धार पैदा की है, जो उनकी विशिष्ट पहचान बनती है। जिस यथार्थ को सामने लाने की कोशिश कविता के माध्यम से उन्होंने की है, वह आज के समय में दुर्लभ ही है, क्योंकि कुल मिलाकर कविता आज भी अभिजन विधा ही बनी हुई है। कविता को जन से जोड़ने का कोई प्रयास तभी सार्थक हो सकता है, जब जनता के मुद्दे उसमें सामने आएं और जनता की भाषा-बोली में आएं।

सरला जी की कविताओं की ये खासियत है कि साहित्य का कोई ज्ञान नहीं रखने वाला पाठक भी जब उन्हें पढ़ना शुरू करता है, तो पढ़ता ही चला जाता है। विषय और भाव से उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है। उसे लगता है कि यह तो उसकी ही बात कही जा रही है, कविताएँ पढ़ते हुए समाज-व्यवस्था और राजनीति का छल-छद्म उसके सामने खुलता चला जाता है। सरला माहेश्वरी के इस संग्रह में शामिल कविताओं का कथ्य इतना ठोस है, इतना वास्तविक और जीवंत है कि उन्हें शिल्प के नाम पर रंग-रोगन और पच्चीकारी की कोई ज़रूरत नहीं। कविता शब्द-दर-शब्द अपने संपूर्ण अर्थों के साथ खुलती जाती है और पाठक के साथ उसका सामान्यीकरण सहज हो जाता है।

इस संग्रह में कुल इक्यावन कविताएँ हैं। पहली ही कविता ‘कुम्भकर्ण जागा हुआ है’ वर्तमान पाखंडी सत्ता पर जोरदार प्रहार करती है। ‘शार्टकट वर्णमाला’, ‘हत्यारे समय में’, ‘शानदार, ज़बर्जस्त, ज़िन्दाबाद! ’, ‘हट जाइए हमारे रास्ते से!’, ‘अब ख़बरदार! ये सब नहीं चलेगा!’, ‘नया नाम’, ‘मुर्दाबाद’, ‘संजय उवाच’, ‘यह समय भक्तों का है’, ‘तुम्हारी तरह’ प्रखर राजनीतिक कविताएँ हैं जो व्यवस्था पर मारक प्रहार करने के साथ एक चुनौती भी पेश करती हैं। कहीं इनमें आक्रोश है तो कहीं व्यंग्य और कहीं कटाक्ष, पर एक बात सबमें है और वह है वर्तमान सत्ता के असली राक्षसी चेहरे को सामने लाना, उसे बेनकाब करना। कलबुर्गी की हत्या पर ‘सुनो! मैं कलबुर्गी बोल रहा हूँ’ एक ऐसी कविता है जो अपने खास तेवर और निहितार्थ के लिए हिन्दी साहित्य के इतिहास में अवश्य रेखांकित की जाएगी। रोहित वेमूला पर लिखी गई कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं। ‘बर्बादी की कहानी’ और ‘एंगर रेप’ कविता वाकई विदग्ध कर देने वाली हैं। ऐसी कविताएँ हिन्दी में कम ही लिखी गई हैं। संग्रह की प्रतिनिधि कविताएँ हैं ‘तुम्हें सोने नहीं देगी ये आवाज’ और ‘हिटलर सिर्फ़ हिटलर में नहीं होता’। हिटलर वाली कविता आज की मनुष्य-विरोधी विश्व राजनीति के पूरे परिदृश्य से ही हमारा सामना कराती है। यह इतिहास की विडम्बना को दिखाने के साथ ही युगीन चुनौती को प्रबल रूप में हमारे सामने रखती है। ‘तुम्हें सोने नहीं देगी ये आवाज’ वाकई समकालीन संघर्ष की चेतना के इतिहास का आख्यान है। यह एक पुकार है, जिसे अनसुना कर पाना असंभव होगा। यह कविता पूरी दुनिया में अमानवीय शोषण के विरोध और संघर्ष का नया ही सौन्दर्यशास्त्र रचती है। सरला माहेश्वरी की कविताओं के बारे में कुमार वीरेन्द्र ने सच लिखा है – “एक बेहतरीन कविता की एक पहचान यह भी है कि वह अपनी सभ्यता के दौर में न सिर्फ़ खड़ी हो, बल्कि विमर्श भी करे, आह्वान करे करने के लिए या अपने स्रोतों के साथ गति में इस तरह शामिल हो कि उसका चुम्बकत्व बचा रहे...।” उम्मीद है, व्यापक पाठक समुदाय के बीच इस संग्रह का स्वागत होगा।

 

तुम्हें सोने नहीं देगी (कविता-संग्रह)

सरला माहेश्वरी

प्रकाशक – सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर

प्रकाशन वर्ष – 2016

मूल्य – चार सौ रुपए

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समीक्षक - वीणा भाटिया

Email- vinabhatia4@gmail.com

Mobile - 9013510023

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