मंगलवार, 23 अगस्त 2016

घर का भेदी लंका ढहाए... / आनन्द किरण

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घर का भेदी लंका ढहाए। यह उक्ति समाज में गद्दार व्यक्ति को इंगित करती है, पर जिस व्यक्ति को क्रेन्द्रित कर यह उक्ति लिखी गई, वह एक अच्छा चरित्र था। जिसने सचाई की राह पर अपनत्व का परित्याग कर सत्य का साथ दिया। उस का त्याग स्वार्थ कर प्रतिक नहीं अपितु एक परमार्थ था। जब राम विभीषण को लंका का राजा घोषित कर रहे थे तब विभीषण बड़े विनति भरे शब्द में कहा था कि हे! प्रभु मेरी निष्ठा में कोई त्रुटी है या मेरी भक्ति में कोई भूल हो गई अथवा मेरे विश्वास पर कोई संदेह है, जो मुझे यह सजा दी जा रही। तब राम ने कहा कि न तुम्हारी निष्ठा में त्रुटी है, न ही भक्ति कोई कमी है तथा न ही विश्वास पर मुझे संदेह है। मैं यह राज्याभिषेक तो इस लिए कर रहा हूँ कि रावण की मृत्यु के बाद लंका राजा विहीन हो जाएगी। किसी भी नगरी का राजा विहिन होना, उस नगरी के शोक का विषय है। मैं लंका को अनाथ करने नहीं सुयोग्य राज देने आया हूँ। किसी भी नगरी का राजा विहीन होना या कमजोर राजा का होना पडोसियों की लालचा का शिकार बना है। वे लालची इसे भुखे भेडिये की तरह नोंच लेगे। इससे जनता की बेवस विधवा सी हो जाती है, जो मेरे नाम पर कलंक होगा। जब तक तुम मेरी सेवा में नहीं आये थे तब तक मैं तो धर्म संकट में था कि किसे यहां का राजा बनाऊ। यदि मैं लक्ष्मण का राज्याभिषेक करता हॅू तो इतिहास मुझे आक्रांता कहेगा। तुम इस पद को धारण कर मुझे भार मुक्त करो। दूसरी बात युद्ध से पहले तो यह भी तय नहीं था कि कौन युद्ध में जयी होगा? यदि देखा जाए तो शक्ति व पलड़ा रावण का राम से कई गुणा भारी था।

इस उक्ति ने विभिषण के साथ न्याय नहीं किया है। यदि आज विभिषण जिंदा होते तो आत्मा हत्या कर लेते। अपने इस अवस्था के लिए परमात्मा को धिक्कारता। आज यदि किसी दुर्जन पिता के पुत्रों को सत्पथ पर लाकर पिता में उपस्थित दुर्गणो से लडने कि प्रेरणा दे तो वे विभिषण को आदर्श मानकर कदापि इस कार्य को नहीं करेंगे। अतः इस उक्ति को जिन्दा रखना प्रासंगिक नहीं है पर इस उक्ति को गढ़ाने का सामर्थ्य भी तो किसी में नहीं है। इस धर्म संकट की घड़ी में बेवस होने से भी काम नहीं चलेगा। अतः समाज का यह दायत्व है कि इसकी दिशा मोडनी होगी। इसे नकारात्मक जगत से सकारात्मक जगत में लाना ही समाज का धर्म हैं। यही मर्यादा पुरुषोत्तम को सच्ची श्रृद्धान्जली है।

किसी भी भाषा में पयार्यवाची शब्दों के भावार्थ तो एक ही पर गुढ़ार्थ अवश्य ही अलग होगा यदि ऐसा न होता तो भाषाविद् इन नूतन शब्दों को आविष्कृत करने की जरूरत भी नहीं होती। घर, मकान व भवन पयार्य शब्दों के गुढार्थों पर विचार करे तो इस उक्ति के मूल भाव को स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा। भवन वह इमारत है जिसका निमार्ण मात्र मनुष्य के रहने के ही उद्देश्य से नहीं होता है। इसका कोई भी उद्देश्य हो सकता है। मकान के निर्माण का एकमात्र उद्देश्य मानव का रहने के लिए ही होता हैं। घर उस इमारत का नाम हैं जिसमें चैतन्यस्व व्यक्ति रहता है। ऐसी इमारत तब तक मकान है तब तक उसमें कोई व्यक्ति न रहता हो। यदि व्यक्ति रहता है। तो वह एक घर हो जाएगा। उपरोक्त उक्ति में घर शब्द का अर्थ मानव तन से जिसमें चैतन्य स्वरूप आत्मा का निवास है। इस उक्ति में शरीर के अर्थ में उक्ति को इस लिए लिया गया है कि मनुष्य का असली घर यहीं हैं। बाकि सभी तो अल्प काल का रहन बसेरा है जो वक्त के साथ किसी ओर को सौपना है। पर यह घर वह है जहां से प्राण पखेरू उड जाने के बाद परिजन इसे नष्ट कर देते है।

घर का भेदी - भेदी का माने हुआ रहस्य ज्ञाता। घर का भेदी माने इस मानव तन के जो रहस्य को जानता हो। वही है घर का भेदी जो इस शरीर व मन के रहस्य को जानता हो वह जानने वाला विश्वकर्मा स्वयं परमतत्त्व है। उस विश्वकर्मा ब्रह्म के व्यतिरेक्त कौन इस तन के रहस्य को जानता है। वहीं परमात्मा ने मानव को बनाया है, वहीं इसके रहस्य जानता है। वह तारक ब्रह्म जब गुरू रूप में मिल जाते है तो उस आत्मा का कल्याण हो जाता है।

लंका - लं बीज मंत्र जड़ता का है। जड़ता माने अंधकार, कुसंस्कारों का ढेरा। जिसे ढोहते-ढोहते मनुष्य थक गया हैं। इसे जब तक कोई ढहाने वाला नहीं मिल जाता है। तब तक मनुष्य को यह ढोहना ही पडता हैं। अतः कहा गया है कि घर का भेदी लंका ढहाए। यानी जब तक इस मानव तन मन के रहस्य जाने वाला वह परमात्मा गुरू रूप में नहीं मिल जाते तब तक इस लंका रूपी जड़ता को नहीं ढहाया जा सकता।

वह गुरू ही घर का भेदी है। जिसकी चरण में जाने से मनुष्य को परम शांति मिलती है। गुरू की कृपा से मनुष्य का त्राण है। इसी लिए संत जन व शास्त्र कहते है कि हे! मनुष्य तुम गुरू की चरण में जा। वहीं पर तुम्हार कल्याण है। हे! मानव तु अंधकार के माया जाल में मत उलझ तेरा एक ही कर्तव्य है तु उठ व पूर्ण गुरू की चरण में चला जा, वहीं तुम्हारा कल्याण है। वे तुम्हारे जन्मजन्मान्तर की माया को काट सकते हैं। तुझे इस अंधकार की लंका से आजाद करवा सकते है। घर का भेदी यानी गुरू ही लंका को ढहाना यानी माया के चक्र से मुक्त कर सकता है। उसके अतिरिक्त दुनिया में कोई बिरला नहीं है, जो मनुष्य को माया के हाथों से बचा सकता है। अत: उपरोक्त उक्ति को पूर्ण करके हम कह सकते हैं -

‘‘घर का भेदी लंका ढहाए।

इही विधि भवसागर तराए ।।‘‘

--ः-- आनन्द किरण

जो व्यक्ति इस सूत्र को अपने जीवन का अंग बना ले वह भव सागर तैर जाएगा। जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अत: मनुष्य का कर्तव्य है कि सद्गुरु की खोज में निकल पड़े। पूर्ण गुरु की बताई राह पर चलते रहे। चरैवेती चरैवेती के सूत्र को पकड़ चलने आनन्द की अवस्था को प्राप्त करेगा तथा आनन्द की उपलब्धि ब्रह्म है। आनन्द एवं ब्रह्म एक ही है। दर्शन में जिसे ब्रह्म कहा गया है, उसे कर्मधारा में आनन्द नाम से उपमित किया गया है। अत: आनन्द प्राप्त के मार्ग आनन्द मार्ग की ओर बढ़ चलो वही हमें हमारा राम मिलेगा। गीता की उक्ति - दैत्यों में, मैं विभीषण हूँ। उपरोक्त उक्ति का मूल व्यक्तित्व विभीषण भगवान के प्रतीक के रूप में लिया गया है। स्वयं राम को लंका का भेद बता सकता है, वह के व्यतिरेक दूसरा कौन हो सकता है। वह उस लोक या स्तर का साक्षी पुरुष हैं। दर्शन में हर स्तर की साक्षी पुरुष की व्याख्या की गई है। अत: मनुष्य का गुरु एक मात्र ब्रह्म ही है। उन्हीं आनन्दमूर्ति का शिष्यत्व स्वीकार करना बुद्धिमत्ता है। वे ही माया के हाथों से हमारा परित्राण करेंगे।

लेखक -- श्री आनन्द किरण (करण सिंह) शिवतलाव

Cell no. 9982322405,9660918134

Email-- anandkiran1971@gmai.com karansinghshivtalv@gmail.com

Address -- C/o- Raju bhai Genmal , J.D. Complex, Gandhi Chock, Jalore (Rajasthan)

- श्री आनन्द किरण

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