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एक अदने की, तनिक साहित्यिक किस्म की बात ... सुशील कुमार शर्मा

सुशील कुमार की कविताएँ

एक अदने की बात

 

हे महान साहित्य सम्राटो ।

मत रौंदो अपने अहंकार के तले।

नन्हे पौधों की कोपलों को।

 

तुम्हारे ताज में अकादमी ,पद्मश्री,नोबल सजे हैं।

सम्मानों से लदा है तुम्हारा अहंकार।

साहित्य तुम से शुरू होकर तुम पर ही ख़त्म हो रहा है।

 

तुम्हारी सैकड़ों पुरुस्कृत किताबों के नीचे।

मेरे दबे शब्द निकलने की कोशिश करते हैं।

लेकिन तुम्हारी बरगद सी शाखाएं।

फुंफकार कर सहमा देती हैं मेरे अस्तित्व को।

 

एक फुनगे की तरह निकलने की मेरी कोशिश को।

कुचल देती है तुम्हारी हाथी पदचाप।

तुम नहीं सुनना चाहते एक छोटे फूल की बात।

क्योंकि तुम्हारे अहंकार के बगीचे में।

 

फैली नागफनी लहूलुहान कर देती हैं स्वयं तुम्हें भी।

अपने कृतित्व के पिंजरे में कैद ,वंचित हो तुम।

बाहर खुली फ़िज़ाओं की भीनी खुश्बुओं से।

पथ प्रदर्शन करने वाला तुम्हारा व्यक्तित्व।

आज पहाड़ की तरह खड़ा है रास्ते में।

 

(यह भाव किसी के लिए व्यक्तिगत नहीं है वर्तमान व्यवस्थाओं पर एक व्यंग है।  )

---.

image

भूख

 

(रामेन्द्र कुमार की कहानी END and MEANS के हिस्से का काव्य रूपांतरण )

 

बिरजू।

एक चोर।

सिद्ध स्वामी अरवसु।

प्रवचन का पड़ा प्रभाव।

बन गया स्वामी का शिष्य।

एक दिन स्वामी के आदेश पर रात में।

ढूंढ़ने गया लकड़ी एक गांव में कड़कड़ाती ठण्ड थी।

बंद थे दरवाजे सभी घरों के सिर्फ एक झोपड़ी से रोशनी आ रही थी।

देखा एक अजीब दृश्य एक औरत चूल्हे के सामने बैठी थी।

और गर्म तवे पर छिड़क रही थी पानी बार बार।

एक कोने में भूखे नंगे बच्चे सिमटे सो रहे थे।

बिरजू ने पूछा देवी यह क्या कर रही हो।

बोली घर में नहीं है अन्न का दाना।

तवे पर पानी छिड़क कर।

उन्हें आभास दिला रही हूँ।

कि खाना पक रहा है।

और वो सो जायेंगे।

इस आभास में।

भूखे पेट।

निःशब्द।

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*दाना दुःख है मुझे*

 

प्रश्नों पर प्रश्नचिन्ह।
उत्तरो पर पहरे हैं।
देश मेरा आगे बढ़ रहा है।
दाना मांझी गिड़गिड़ा रहा है।
अस्पताल के भेड़िये लगा रहे हैं ठहाका।
बेटी माँ की लाश के पास बैठी रो रही है।
अमंग देई की लाश कैसे जायेगी साठ मील दूर।
दाना के पास जेब में नहीं है फूटी कौड़ी।
लाश को कपडे में लपेट कर ।
रस्सी से बांध कर कंधे पर उठा कर।
रोती बेटी का हाथ थाम कर।
चल पड़ता है दाना अपने गांव की ओर।
सभ्य समाज के ठेकेदार सड़क के दोनों ओर से।
देख रहे थे उस ठठरी को कांधे पर।
थोथी संवेदनाओं का लगा था अम्बार।
दाना का निस्पृह भावहीन चेहरा
तिल तिल कर खोल रहा था पोल।
मरती हुई मानवी संवेदनाओं की।
ख़बरों के ठेकेदार खींच रहे थे फोटो।
अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये।
कोस रहे थे सोतीे सरकारों को।
दे रहे थे दुहाई सत्य बोलने की।
बारह किलो मीटर तक एक गरीब की लाश।
बनी रही थियेटर सब देख रहे थे तमाशा।
सरकारें सोती रहीं ।
मीडिया चिल्लाता रहा।
सभ्य समाज हँसता रहा।
बेटी रोती रही।
दाना कंधे पर लाश ढोता रहा।
मेरा देश आगे बढ़ता रहा।

* दाना मांझी

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एक अदने की बात साहित्यिक बात एकदम सटीक और सही बात है .

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