रविवार, 28 अगस्त 2016

'अकाल में उत्सव ' पंकज सुबीर के उपन्यास की समीक्षा

समीक्षा

'अकाल में उत्सव '

उपन्यास

उपन्यासकार - पंकज सुबीर

समीक्षक – सरस दरबारी

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पंकज सुबीर जी की अब तक की सारी कृतियाँ पढ़ चुकी हूँ . हर कृति को एक ही सिटिंग में ख़त्म किया. उनकी गठी हुई शैली और मारक बिंब उनके लेखन को इतना रोचक बना देते हैं कि किताब के पन्ने खुद ब खुद पलटते जाते हैं .


अकाल में उत्सव पढ़ते वक़्त शुरुआत में दिमाग कई बार भटका, और उसे बार बार बाँधकर फिर पात्रों के बीच घसीट कर लाना पड़ा , पर जब कहानी ने गति पकड़ी, तो फिर किताब हाथ से नहीं छूटी. कहानी ख़त्म होते होते नौकरशाहों की पूरी कौम से नफरत हो गयी. नीचता की हर पराकाष्ठा लाँघकर भी यह कैसे सर उठाकर समाज में सम्माननीय व्यक्तियों की तरह जीते हैं, देखकर, पूरे सिस्टम से आस्था उठ गयी.


एक पूरी बिसात बिछी हुई है, सबके खाने तय हैं और सत्ता करती है सुनिश्चित किसे हाथी बनाना है, किसे घोडा , किसे ऊँट - और एक आम आदमी, एक गरीब किसान, उनकी चालों में फँसकर, अपनी जान से हाथ धोकर , उनकी शह और मात का बायस बनता रहता है. न जाने कितने किसान इस सियासी खेल में, काल का ग्रास बन गए , बनते जा रहे हैं .
इस किताब की विशेषता है, इसके मारक वाक्य, जो लेखक बीच बीच में धीरे से कह जाते हैं, और यही वाक्य इस पूरी कहानी का मर्म हैं .
" छोटा किसान जब तक लड़ सकता है, तब तक किसान रहता है और फिर हारकर मज़दूर हो जाता है"


जब बीवी के शरीर से वह आखरी गहना भी उत्तर जाता है, तब किसान पूरी तरह से टूट जाता है। जब परंपराएं मजबूरी की भेंट चढ़ जाती हैं, जब कोई सहारा शेष नहीं बचता, जब फसल भी ओले और बेमौसम बरसात की भेंट चढ़ जाती है , जब क़र्ज़ की सिल्ली के बोझ से साँसें उखड़ने लगती हैं, तब वह किसानी छोड़, मज़दूर बनने पर विवश हो जाता है , क्योंकि पेट की आग कभी किसी की सगी नहीं होती. एक ऐसा सच जो गले में दर्द की गाँठ सा अटक जाता है .


" किसान के जीवन में बढ़ते दुःख उसकी पत्नी के शरीर पर घटते ज़ेवरों से आँक लिए जाते हैं”.
बदहाली में यही गहने तो उसके और उसके भूखे परिवार के लिए एकमात्र सहारा होते हैं, भूखे पेट में निवाला होते हैं . हर गहना, फसल कटने पर , फिर छुड़वा लेने की मंशा से गिरवी रखा जाता है, पर अंतत: उसी साहूकार की तिजोरी का निवाला बन जाता है. और दोहरी तिहरी मार से बेदम होता किसान टुकड़े टुकड़े बिखरता जाता है.
"धृतराष्ट्र को हर युग में देखने के लिए संजय की आवश्यकता पड़ती थी, पड़ती है और पड़ती रहेगी".


ओले और बेमौसम बारिश से नष्ट हुई फसल के नुक्सान का आंकलन राजधानी में बैठी सरकार, अपने नियुक्त किये लालची , घुरघों द्वारा – करती है। बिना सच झूठ जाने। सही तो है , बगैर तंत्र के सत्ता पंगु थी और सदा रहेगी.
" क्रूरता आपको बहुत सारी इमोशनल मूर्खताओं से बचा लेती है ".


एक बहुत ही दुखद मोड़ कहानी का, जब अपनी पत्नी का आखरी ज़ेवर उसके पाँव की तोड़ी , वह सुनार के पास बैठा पिघलवा रहा है. चाँदी की हर रिसती बूँद के साथ उससे जुडी मीठी यादें धुआं होती जा रही है, एक गरीब किसान की भावनाओं का भी कोई मोल नहीं. सुनार जानता है , कि किसान बहुत मजबूरी में ही गहना तुड़वाता है , उसके आँसू भी उससे छिपे नहीं रहते. पर उसे क्रूर होना पड़ता है, हर इमोशनल मूर्खता से बचे रहने के लिए। एक और निष्ठुर सच।


दो दृश्य इस कहानी में लेखक ने अपने कौशल से कालजयी कर दिए हैं.
एक जब वह अपनी पत्नी कमला का आखरी गहना गलवाने सुनार के पास जाता है. उस गहने से जुडी अनगिनत मीठी यादें आँसू बनकर उसके कुर्ते की आस्तीन में जज़्ब होती जाती हैं, उस दर्द की तरह जो उसके भीतर एक आग सा सब कुछ जलाता जाता है। चाँदी की तोड़ी की हर रिसती बूँद, राम प्रसाद का सीना छेदती जाती है , और वह दुखों के महासागर में डूबता उतराता विलाप करता जाता है . कितना करुण है वह दृश्य.


और दूसरा जब वह अपनी पत्नी को बैठाकर, कलेक्टर के दफ्तर से माँगकर लाये हुए पकवान खिलाता है. दुनिया के मशहूर रोमांटिक सीन्स भी इस एक दृश्य के आगे फीके पड़ जाएंगे . लेखक की कलम ने स्याह रंगों में भी ऐसे रंग भर दिए हैं जो दुरूह है, उस लिपि कुटिया में इतने पुखराज बिखेर दिए हैं , जिनकी आभा कभी फीकी नहीं हो सकती. लेखक ने उस प्रेम मय पल को अमर कर दिया है.


एक बदसूरत सच्चाई को कितनी खूबसूरती से पेश किया जा सकता है, वह ‘अकाल में उत्सव’ को पढ़कर जाना।

इस खूबसूरत कलाकृति के लिए पंकज सुबीर जी को अनंत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।

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सरस दरबारी (https://www.facebook.com/saras.darbari)

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