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भारत में खेल यानी तमाशा! / डॉ. रामवृक्ष सिंह

 

किसी काम को उत्तम तरीके से करना हो तो उसके लिए दिलो-जान से जुटने की ज़रूरत होती है। इसके लिए मैं ग़ालिब के इस शेर को किसी आर्ष-वाक्य की तरह उद्धृत करता हूँ- इश्क को दिल में जगह ग़ालिब, इल्म से शायरी नहीं आती। आपको लाख प्रशिक्षण मिला हो, किन्तु जब तक आपके कलेजे में आग नहीं धधकती हो, अपने उद्देश्य में सफल होना असंभव है। महाभारत में इसका उदाहरण है-एकलव्य, जिसने अपनी लगन और मेहनत के दम पर तीरंदाजी में ऐसी महारत हासिल कर ली कि कौरवों-पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य भी डर गए और अपने प्रिय शिष्य अर्जुन की श्रेष्ठता को चुनौती देने की क्षमता रखनेवाले भील-पुत्र एकलव्य का अंगूठा ही गुरुदक्षिणा में माँग लिया। एकलव्य को कौन-सी सुविधा, कौन-सी कोचिंग उपलब्ध थी? बस उसके पास तो एक ही पूँजी थी- परिश्रम, लगन और अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता।

हमारे सूरमां बड़े-बड़े वादे करके विभिन्न खेल-प्रतियोगिताओं में जाते हैं और वहाँ से टाँय-टाँय फिस्स होकर, पिट-पिटाकर लौटते हैं। खेल में हारना कोई बुरी बात नहीं है। दो प्रतिद्वंद्वियों में कोई एक ही जीतेगा, दूसरे को हारना पड़ेगा। किन्तु यह भी सच है कि कोई भी खिलाड़ी हारने के लिए नहीं खेलता। खिलाड़ी के लिए पहला नियम और पहला उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि वह जीते। हमारा देश, हमारा राज्य, हमारा जिला, हमारा समाज, हमारा परिवार हमें हारा हुआ नहीं देखना चाहता। वे सब चाहते हैं कि हम जीतकर लौटें। यदि तमाम कोशिशों के बाद भी हम हार जाएँ तो गरिमापूर्वक स्वीकार करें और फिर से तैयारी करने में जुट जाएँ। तब तक जुटे रहें जब तक कि विजयश्री हमारा वरण न कर ले। वास्तविक खेल-भावना यही है। पता नहीं, हमारे देश में इस मायने में तनिक भी खेल-भावना विद्यमान है या नहीं!

जब-जब हम खेल के मैदान में पिछड़ते हैं, तब-तब खिलाड़ी, उनके प्रशंसक, उनके प्रशिक्षक आदि एक ही राग अलापते हैं- हमारे यहाँ सुविधाएँ नहीं हैं। हमारे यहाँ खेलों में राजनीति बहुत है। हमारे देश में खेल का वातावरण नहीं है। हमारे देश की जलवायु खेलों के अनुरूप नहीं है। हमारे खिलाड़ियों को खाने को पौष्टिक भोजन नहीं मिलता। हमारे खेल के मैदान अच्छे नहीं हैं। हमारे उपकरण विश्व-स्तरीय नहीं हैं।

ये सारी बातें सही हैं। इनसे इनकार नहीं किया जा सकता। किन्तु क्या यही सब स्थितियाँ दुनिया के बहुत-से दूसरे देशों में नहीं हैं? क्या जमैका में खेल-कूद का वातावरण बहुत अच्छा है? क्या केन्या में उमस भरी गरमी नहीं पड़ती होगी? क्या अमेरिका का नीग्रो समाज बहुत उन्नत स्थितियों में रहता है? क्या चीन के खिलाड़ी मुँह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होते हैं? क्या दुनिया के अन्यान्य देशों के खिलाड़ियों को मानसिक संत्रास नहीं झेलना पड़ता? किसी भी स्पर्द्धा में उत्तम उपकरणों से ही जीत सुनिश्चित होती है? इन प्रश्नों में से शायद ही किसी का उत्तर ‘नहीं’ में दिया जा सके। पूरी दुनिया के खिलाड़ी कमोबेश वैसी ही कठिनाइयों का सामना करते हैं, जैसी भारत के खिलाड़ियों को झेलनी पड़ती हैं।

इन पंक्तियों का लेखक ऐसे स्कूल में पढ़ता था, जो नई दिल्ली के ज़ोन-9 में हुआ करता था। नौरोजी नगर, राजकीय बाल विद्यालय में 25 मीटर का तरण-ताल था। ताल का पानी काई के घुलने से हरा हो गया था, यानी बेहद गंदा, अपारदर्शी। उसी ताल में तैरते थे आपके चैंपियन तैराक- खजान सिंह टोकस। ताल गंदा था, लेकिन खजान सिंह को चैंपियन बनने से रोक नहीं सका। उनके साथ और भी कई तैराक थे, जिन्होंने राष्ट्र-स्तर पर जुगलासिंह तैराकी संघ का नाम रोशन किया। हमारे स्कूल में भी तरण-ताल था। उसका पानी खूब स्वच्छ-निर्मल होता था। किन्तु हमारा ध्यान तैराकी पर कम और पढ़ाई पर अधिक रहता था। तैरते तो हम भी थे, किन्तु यह काम हमारी प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे आता था। हमारे तैराकी कोच स्व. श्री सुधीर कुमार के पिता नैशनल स्टेडियम के तरण-ताल के चौकीदार हुआ करते थे। सुधीर कुमार और उनके छोटे भाई के वातावरण में ही तैराकी थी। वे बचपन से ही अच्छे तैराक थे। तैराकी के दम पर उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित मॉडर्न स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। सुधीर कुमार अच्छे गोताखोर थे, उनका भाई अच्छा तैराक। किन्तु दोनों में से कोई राष्ट्रीय स्तर तक नहीं जा सका। कारण? सुविधा तो उनके पास थी।

हमारे देश में बच्चों की खेल-प्रतिभा को कम उम्र में ही पहचानकर उन्हें विशेष छात्रावासों में रखा जाता है, उनके खेलने-कूदने, शारीरिक व्यायाम आदि की व्यवस्था की जाती है। वहाँ उनके रहने-खाने, पढ़ने और खेलने का पूरा इन्तज़ाम रहता है। यह व्यवस्था आज से नहीं, पिछले तीन-चार दशक से है। इसके बावज़ूद इन विशेष विद्यालयों और अकादमियों से कोई ऐसे विश्व-स्तरीय खिलाड़ी नहीं निकले, जिनके बारे में चर्चा करके देश-वासियों का सीना गर्व से तन जाए। ऐसा क्यों? वहाँ तो पूरी सुविधाएँ होती हैं।

रियो ओलंपिक में वॉल्ट पर डबल समरसॉल्ट करनेवाली त्रिपुरा की दीपा कर्माकर से किसी ने पूछा कि यह खतरनाक ईवेंट क्यों करती हो, जबकि दुनिया के ज्यादातर जिमनास्ट इससे बचते हैं। दीपा ने कहा- मुझे खतरों से खेलना अच्छा लगता है। कितना सही और अनुकरणीय उत्तर है! फ्रांस का एक पुरुष जिमनास्ट अपनी कसरत के दौरान घुटने से नीचे की हड्डी तुड़ा बैठा। प्रतियोगिता से बाहर जाते उस युवक ने कहा, चार साल बाद अगले ओलंपिक में फिर लौटूँगा। सर्वोत्तम परिणाम लाने की इस ज़िद के सहारे, जोखिम की आँख में आँख डालकर अपने शरीर और मस्तिष्क को साधते हुए, इन्सानी क्षमताओं को चरम तक पहुँचा सकें, तभी आप विजेता बन सकते हैं।

लम्बी दूरी का धावक और तैराक होने के नाते मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि दौड़ना या तैरना शुरु करने के कुछ ही मिनट बाद एक ऐसा मुकाम आता है, जब सीना धौंकनी की तरह फूलने-पिचकने लगता है, मन करता है कि कुछ देर रुककर विश्राम कर लें। यदि तैराक या ऐथलीट उस बाधा को पार कर ले, उसकी साँसों की लय बन जाए तो फिर वह मीलों तैरता या दौड़ता जा सकता है। पुरी के बाल ऐथलीट बुधिया ने यह कर दिखाया। हर मैराथन धावक और क्रॉस-कंट्री रनर यह जानता है। ट्रैक और फील्ड स्पर्धाओं में तकनीक चाहिए और चाहिए दम-खम। मैराथन, 10,000 मीटर, 5,000 मीटर आदि दौड़ों में उपकरणों का क्या काम है? आरामदेह जूते चाहिए, बस। फुटबॉल, हॉकी आदि मैदानी खेलों के लिए खिलाड़ियों के पास स्टेमिना, फुरती और कौशल का होना ज़रूरी है। दिमागी संतुलन भी निरंतर कायम रखना पड़ता है। इन सब गुणों के लिए चाहिए कड़ा अनुशासन, कड़ी मेहनत, बरसों का अभ्यास और तपस्या।

लखनऊ स्पोर्ट्स हॉस्टल का एक छात्र नगर बस में मिल गया। वेशभूषा खिलाड़ियों की, हाथ में स्टिक। मुँह में भरे था गुटका- कचर-कचर चबा रहा था। मुझसे रहा नहीं गया तो टोक ही दिया- ‘भइया हॉकी खेलते हो?’ युवक ने हाँ में उत्तर दिया। चट-से मैंने नसीहत दे डाली- ‘गुटका-तम्बाकू खाने वाले क्या हॉकी खेलेंगे! हम भी नेहरू हॉकी तक खेले हैं, लेकिन कभी कोई नशा नहीं किया। यदि खेल में ऊपर जाना है तो इन व्यसनों से दूर रहो।‘

हमारे बहुत-से खेल-संस्थान ऐय्याशी और भ्रष्टाचार का अड्डा हैं। कोच खुद ही नशेड़ी हैं। कुछ कोच अपनी युवा छात्राओं से यौन संबंध के लिए लालायित रहते हैं। कुछ खेल तो परिवार-वाद से ग्रस्त हो चले हैं। खिलाड़ी का बेटा खिलाड़ी, पहलवान का दामाद पहलवान। चाहे योग्यता हो या न हो, राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी होने का ठप्पा तो लगवा ही लेते हैं। उसी के सहारे कहीं अच्छी नौकरी मिल गई, ज़िन्दगी भर के लिए धंधे-पानी का जुगाड़ हो गया।

जिन राष्ट्रों के युवा खेलों में अच्छा कर रहे हैं, वहाँ की संस्कृति में, वहाँ की आबो-हवा में खेल है। हमारे देश में ऐसा नहीं है। हमारे देश की आबो-हवा में खेल से ज्यादा असर यौनाचार, भ्रष्टाचार, भूख, गरीबी, दंगे-फसाद, बात-बात की हुज्जत, बतोलेबाजी, बहसबाजी, वैमनस्य और टुच्चेपन का है। हमारे अंदर राष्ट्र-प्रेम की भावना का भी बहुत अभाव है। हमारे लिए राष्ट्र-प्रेम से अधिक महत्त्वपूर्ण है हमारी जाति, हमारा गोत्र, हमारा जिला, हमारा राज्य और हमारा स्वार्थ। यदि स्वार्थ सिद्ध होता हो तो हम जघन्य से जघन्य अपराध करने में गुरेज़ नहीं करेंगे। ओलंपिक खेलों में तो हम राष्ट्र के लिए ही खेलते हैं। यदि हमारे भीतर राष्ट्रीयता की उत्कट भावना नहीं है तो हम किस जज्बे से खेलेंगे?

आलस्य, कामचोरी, मुफ्तखोरी- ये हमारे देशवासियों के सर्वव्यापी गुण हैं। हमें हर मद में सब्सिडी चाहिए, हर क्षेत्र में कोटा और आरक्षण। खेलों में ऐसा कुछ नहीं चलता। वहाँ तो वही जीतेगा जो श्रेष्ठ होगा। लेकिन श्रेष्ठता कहीं शून्य से, अंतरिक्ष से नहीं आनेवाली। वह आएगी इसी बीच से। उसके लिए हमें अपने युवाओं के सामने अच्छे आदर्श रखने होंगे। पिछले दो-तीन वर्षों से हम ‘योगा’ दिवस मना रहे हैं। हमारे कितने नेता सही से पद्मासन लगाने में सक्षम हैं? सर्वांगासन और शीर्षासन की तो खैर बात ही न की जाए! जब देश के अधिसंख्यक नेता ही फिट नहीं हैं, स्कूलों-कॉलेजों के शिक्षक ही फिट नहीं हैं तो युवाओं के सामने वे क्या आदर्श प्रस्तुत करेंगे?

भारत में पुलिस के अधेड़वय कार्मिक अधिकांशतः स्थूलकाय, मोटे, थुलथुल और इस कारण अनफिट हैं, जबकि उनका तो काम ही फिट रहने का है। खेलों के लिए शारीरिक फिटनेस बहुत ज़रूरी है। किन्तु जब पूरे समाज में ही फिटनेस के लिए कोई रुझान नहीं है तो खेल के लिए कहाँ से होगा!

हमारे देश में खेल-तमाशा केवल मनोरंजन का काम है। खेल को तमाशे के साथ जोड़कर बोलने का यही कारण है। ज़ाहिर-सी बात है कि खेल को यहाँ किसी पेशे के तौर पर नहीं देखा जाता। खेल ही नहीं, लेखन, नाटक, नृत्य, गायन, वादन, विभिन्न ललित कलाओं आदि को भी अपने देश में केवल सतही मनोरंजन का साधन माना जाता है, न कि पेशा। इसलिए इनके प्रति पेशेवराना रवैया भी नहीं है किसी का। हमारे खेल संस्थानों, खेल अकादमियों में विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण ले रहे युवाओं को औपचारिक शैक्षणिक योग्यता अर्जित करने के लिए कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि के विषय लेकर बोर्ड की परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। क्यों नहीं, सीबीएसई और देश के अन्य सभी प्रादेशिक बोर्ड ऐसे छात्रों की बोर्ड की परीक्षा खेल की विविध विधाओं में लेते? यदि पाँच पर्चे उत्तीर्ण करके ही मैट्रिक अथवा इंटर की सनद मिलनी है तो खिलाड़ी छात्रों के लिए 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर, 800मीटर, 1500 मीटर, 3000 मीटर, 5000 मीटर, 10,000 मीटर और बाधा दौड़ आदि में से कोई एक विषय, लम्बी कूद, ऊँची कूद, ट्रिपल जम्प आदि में से कोई एक विषय, हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, बास्केट बॉल, हैंड बॉल आदि खेलों में से कोई एक विषय, तैराकी की चार शैलियों- फ्री स्टाइल, बैक स्ट्रोक, ब्रेस्ट स्ट्रोक, बटरफ्लाई में से किसी भी एक शैली में 50 मीटर, 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर, 800 मीटर, 1000 मीटर, 1500 मीटर आदि में एक विषय, डिस्कस थ्रो, शॉटपुट, जैवलिन थ्रो, हैमर थ्रो में से कोई एक विषय लेकर उनकी परीक्षा क्यों नहीं ली जा सकती? बहुत ज़रूरी हो तो बुनियादी हिन्दी (अथवा देश की 22 मान्यताप्राप्त भाषाओं में से एक), बुनियादी अंग्रेजी, बुनियादी गणित की परीक्षा भी ली जा सकती है, जो केवल क्वालिफाइंग हो। ये सभी विषय और विधाएँ केवल सांकेतिक हैं। देश, काल, स्थान के अनुसार इनमें परिवर्तन हो सकता है।

क्या देश के किसी शिक्षा मंत्री, किसी खेल मंत्री, किसी प्रधान मंत्री या किसी बड़े वेटरन खिलाड़ी ने ऐसा सोचा? यदि नहीं सोचा तो देश के किशोर और युवा खेल को कैरियर कैसे बना पाएँगे? कुछ चुनिंदा चैंपियन खिलाड़ियों को किसी सरकारी निकाय में नौकरी दे देने से क्या होगा? जो युवा खिलाड़ी चैंपियन नहीं बन सके, मेडल नहीं ला सके, उनके सिर पर तो बेरोजगारी की तलवार लटकती ही रहेगी। इसीलिए ये युवा खेल के साथ-साथ पढ़ाई को भी समय देते हैं, आर्ट्स, कॉमर्स, विज्ञान अथवा प्रौद्योगिकी की डिग्रियों के लिए खेल छोड़कर पढ़ाई करना उनकी मज़बूरी हो जाती है। पढ़-लिखकर नवाब और खेल-कूदकर खराब होने की जो कहावत इस देश में प्रचलित है, उसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि औसत दर्जे की पढ़ाई करके औसत अंक लाने वाला युवा जीविका का कोई साधन, किसी विभाग या प्रतिष्ठान की नौकरी पा जाता है, किन्तु खिलाड़ी के औसत रह जाने से काम नहीं चलेगा। उसे तो अव्वल तीन-चार प्रतिस्पर्द्धियों में ही जगह बनानी होगी। फिर बाकी का क्या होगा? यह अनिश्चितता तभी कम होगी जब खिलाड़ी को उसकी खेल-विधा में ही मैट्रिक, इंटर और स्नातक, स्नातकोत्तर डिग्री मिले और उस डिग्री के आधार यानी खेल के आधार पर उसे काम मिले। सुनने में यह अटपटा लग सकता है कि खेलने वाला युवा दफ्तर में काम कैसे करेगा? सच कहें तो ऐसे युवाओं को पढ़ाई-लिखाई का जटिल काम करने की ज़रूरत भी कहाँ है! वे तो पुलिसबलों, अर्ध सैनिक बल्, सेना आदि में भी खपाए जा सकते हैं।

क्या देश ऐसी व्यवस्था के लिए तैयार है? यदि नहीं, तो देश में खेलों के लिए कभी भी सकारात्मक माहौल नहीं बन सकेगा और हम दुनिया भर के बड़े-बड़े टूर्नामेंटों में महज पर्यटन के लिए अधिकारियों व खिलाड़ियों के बड़े-बड़े दल भेजते रहेंगे और कभी एकाध कांस्य अथवा रजत पदक जीतकर देश-वासियों का दिल तोड़ते रहेंगे। खेल हमारे लिए तमाशा ही बने रहेंगे और भारत, यानी दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश खेल के नाम पर बस तमाशा करता रह जाएगा।

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