---प्रायोजक---

---***---

रु. 30,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु लघुकथाएँ आमंत्रित हैं.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ [लिंक] देखें. आयोजन में अब तक प्रकाशित लघुकथाएँ यहाँ [लिंक] पढ़ें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

भारत में खेल यानी तमाशा! / डॉ. रामवृक्ष सिंह

साझा करें:

  किसी काम को उत्तम तरीके से करना हो तो उसके लिए दिलो-जान से जुटने की ज़रूरत होती है। इसके लिए मैं ग़ालिब के इस शेर को किसी आर्ष-वाक्य की त...

 

किसी काम को उत्तम तरीके से करना हो तो उसके लिए दिलो-जान से जुटने की ज़रूरत होती है। इसके लिए मैं ग़ालिब के इस शेर को किसी आर्ष-वाक्य की तरह उद्धृत करता हूँ- इश्क को दिल में जगह ग़ालिब, इल्म से शायरी नहीं आती। आपको लाख प्रशिक्षण मिला हो, किन्तु जब तक आपके कलेजे में आग नहीं धधकती हो, अपने उद्देश्य में सफल होना असंभव है। महाभारत में इसका उदाहरण है-एकलव्य, जिसने अपनी लगन और मेहनत के दम पर तीरंदाजी में ऐसी महारत हासिल कर ली कि कौरवों-पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य भी डर गए और अपने प्रिय शिष्य अर्जुन की श्रेष्ठता को चुनौती देने की क्षमता रखनेवाले भील-पुत्र एकलव्य का अंगूठा ही गुरुदक्षिणा में माँग लिया। एकलव्य को कौन-सी सुविधा, कौन-सी कोचिंग उपलब्ध थी? बस उसके पास तो एक ही पूँजी थी- परिश्रम, लगन और अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता।

हमारे सूरमां बड़े-बड़े वादे करके विभिन्न खेल-प्रतियोगिताओं में जाते हैं और वहाँ से टाँय-टाँय फिस्स होकर, पिट-पिटाकर लौटते हैं। खेल में हारना कोई बुरी बात नहीं है। दो प्रतिद्वंद्वियों में कोई एक ही जीतेगा, दूसरे को हारना पड़ेगा। किन्तु यह भी सच है कि कोई भी खिलाड़ी हारने के लिए नहीं खेलता। खिलाड़ी के लिए पहला नियम और पहला उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि वह जीते। हमारा देश, हमारा राज्य, हमारा जिला, हमारा समाज, हमारा परिवार हमें हारा हुआ नहीं देखना चाहता। वे सब चाहते हैं कि हम जीतकर लौटें। यदि तमाम कोशिशों के बाद भी हम हार जाएँ तो गरिमापूर्वक स्वीकार करें और फिर से तैयारी करने में जुट जाएँ। तब तक जुटे रहें जब तक कि विजयश्री हमारा वरण न कर ले। वास्तविक खेल-भावना यही है। पता नहीं, हमारे देश में इस मायने में तनिक भी खेल-भावना विद्यमान है या नहीं!

जब-जब हम खेल के मैदान में पिछड़ते हैं, तब-तब खिलाड़ी, उनके प्रशंसक, उनके प्रशिक्षक आदि एक ही राग अलापते हैं- हमारे यहाँ सुविधाएँ नहीं हैं। हमारे यहाँ खेलों में राजनीति बहुत है। हमारे देश में खेल का वातावरण नहीं है। हमारे देश की जलवायु खेलों के अनुरूप नहीं है। हमारे खिलाड़ियों को खाने को पौष्टिक भोजन नहीं मिलता। हमारे खेल के मैदान अच्छे नहीं हैं। हमारे उपकरण विश्व-स्तरीय नहीं हैं।

ये सारी बातें सही हैं। इनसे इनकार नहीं किया जा सकता। किन्तु क्या यही सब स्थितियाँ दुनिया के बहुत-से दूसरे देशों में नहीं हैं? क्या जमैका में खेल-कूद का वातावरण बहुत अच्छा है? क्या केन्या में उमस भरी गरमी नहीं पड़ती होगी? क्या अमेरिका का नीग्रो समाज बहुत उन्नत स्थितियों में रहता है? क्या चीन के खिलाड़ी मुँह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होते हैं? क्या दुनिया के अन्यान्य देशों के खिलाड़ियों को मानसिक संत्रास नहीं झेलना पड़ता? किसी भी स्पर्द्धा में उत्तम उपकरणों से ही जीत सुनिश्चित होती है? इन प्रश्नों में से शायद ही किसी का उत्तर ‘नहीं’ में दिया जा सके। पूरी दुनिया के खिलाड़ी कमोबेश वैसी ही कठिनाइयों का सामना करते हैं, जैसी भारत के खिलाड़ियों को झेलनी पड़ती हैं।

इन पंक्तियों का लेखक ऐसे स्कूल में पढ़ता था, जो नई दिल्ली के ज़ोन-9 में हुआ करता था। नौरोजी नगर, राजकीय बाल विद्यालय में 25 मीटर का तरण-ताल था। ताल का पानी काई के घुलने से हरा हो गया था, यानी बेहद गंदा, अपारदर्शी। उसी ताल में तैरते थे आपके चैंपियन तैराक- खजान सिंह टोकस। ताल गंदा था, लेकिन खजान सिंह को चैंपियन बनने से रोक नहीं सका। उनके साथ और भी कई तैराक थे, जिन्होंने राष्ट्र-स्तर पर जुगलासिंह तैराकी संघ का नाम रोशन किया। हमारे स्कूल में भी तरण-ताल था। उसका पानी खूब स्वच्छ-निर्मल होता था। किन्तु हमारा ध्यान तैराकी पर कम और पढ़ाई पर अधिक रहता था। तैरते तो हम भी थे, किन्तु यह काम हमारी प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे आता था। हमारे तैराकी कोच स्व. श्री सुधीर कुमार के पिता नैशनल स्टेडियम के तरण-ताल के चौकीदार हुआ करते थे। सुधीर कुमार और उनके छोटे भाई के वातावरण में ही तैराकी थी। वे बचपन से ही अच्छे तैराक थे। तैराकी के दम पर उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित मॉडर्न स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। सुधीर कुमार अच्छे गोताखोर थे, उनका भाई अच्छा तैराक। किन्तु दोनों में से कोई राष्ट्रीय स्तर तक नहीं जा सका। कारण? सुविधा तो उनके पास थी।

हमारे देश में बच्चों की खेल-प्रतिभा को कम उम्र में ही पहचानकर उन्हें विशेष छात्रावासों में रखा जाता है, उनके खेलने-कूदने, शारीरिक व्यायाम आदि की व्यवस्था की जाती है। वहाँ उनके रहने-खाने, पढ़ने और खेलने का पूरा इन्तज़ाम रहता है। यह व्यवस्था आज से नहीं, पिछले तीन-चार दशक से है। इसके बावज़ूद इन विशेष विद्यालयों और अकादमियों से कोई ऐसे विश्व-स्तरीय खिलाड़ी नहीं निकले, जिनके बारे में चर्चा करके देश-वासियों का सीना गर्व से तन जाए। ऐसा क्यों? वहाँ तो पूरी सुविधाएँ होती हैं।

रियो ओलंपिक में वॉल्ट पर डबल समरसॉल्ट करनेवाली त्रिपुरा की दीपा कर्माकर से किसी ने पूछा कि यह खतरनाक ईवेंट क्यों करती हो, जबकि दुनिया के ज्यादातर जिमनास्ट इससे बचते हैं। दीपा ने कहा- मुझे खतरों से खेलना अच्छा लगता है। कितना सही और अनुकरणीय उत्तर है! फ्रांस का एक पुरुष जिमनास्ट अपनी कसरत के दौरान घुटने से नीचे की हड्डी तुड़ा बैठा। प्रतियोगिता से बाहर जाते उस युवक ने कहा, चार साल बाद अगले ओलंपिक में फिर लौटूँगा। सर्वोत्तम परिणाम लाने की इस ज़िद के सहारे, जोखिम की आँख में आँख डालकर अपने शरीर और मस्तिष्क को साधते हुए, इन्सानी क्षमताओं को चरम तक पहुँचा सकें, तभी आप विजेता बन सकते हैं।

लम्बी दूरी का धावक और तैराक होने के नाते मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि दौड़ना या तैरना शुरु करने के कुछ ही मिनट बाद एक ऐसा मुकाम आता है, जब सीना धौंकनी की तरह फूलने-पिचकने लगता है, मन करता है कि कुछ देर रुककर विश्राम कर लें। यदि तैराक या ऐथलीट उस बाधा को पार कर ले, उसकी साँसों की लय बन जाए तो फिर वह मीलों तैरता या दौड़ता जा सकता है। पुरी के बाल ऐथलीट बुधिया ने यह कर दिखाया। हर मैराथन धावक और क्रॉस-कंट्री रनर यह जानता है। ट्रैक और फील्ड स्पर्धाओं में तकनीक चाहिए और चाहिए दम-खम। मैराथन, 10,000 मीटर, 5,000 मीटर आदि दौड़ों में उपकरणों का क्या काम है? आरामदेह जूते चाहिए, बस। फुटबॉल, हॉकी आदि मैदानी खेलों के लिए खिलाड़ियों के पास स्टेमिना, फुरती और कौशल का होना ज़रूरी है। दिमागी संतुलन भी निरंतर कायम रखना पड़ता है। इन सब गुणों के लिए चाहिए कड़ा अनुशासन, कड़ी मेहनत, बरसों का अभ्यास और तपस्या।

लखनऊ स्पोर्ट्स हॉस्टल का एक छात्र नगर बस में मिल गया। वेशभूषा खिलाड़ियों की, हाथ में स्टिक। मुँह में भरे था गुटका- कचर-कचर चबा रहा था। मुझसे रहा नहीं गया तो टोक ही दिया- ‘भइया हॉकी खेलते हो?’ युवक ने हाँ में उत्तर दिया। चट-से मैंने नसीहत दे डाली- ‘गुटका-तम्बाकू खाने वाले क्या हॉकी खेलेंगे! हम भी नेहरू हॉकी तक खेले हैं, लेकिन कभी कोई नशा नहीं किया। यदि खेल में ऊपर जाना है तो इन व्यसनों से दूर रहो।‘

हमारे बहुत-से खेल-संस्थान ऐय्याशी और भ्रष्टाचार का अड्डा हैं। कोच खुद ही नशेड़ी हैं। कुछ कोच अपनी युवा छात्राओं से यौन संबंध के लिए लालायित रहते हैं। कुछ खेल तो परिवार-वाद से ग्रस्त हो चले हैं। खिलाड़ी का बेटा खिलाड़ी, पहलवान का दामाद पहलवान। चाहे योग्यता हो या न हो, राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी होने का ठप्पा तो लगवा ही लेते हैं। उसी के सहारे कहीं अच्छी नौकरी मिल गई, ज़िन्दगी भर के लिए धंधे-पानी का जुगाड़ हो गया।

जिन राष्ट्रों के युवा खेलों में अच्छा कर रहे हैं, वहाँ की संस्कृति में, वहाँ की आबो-हवा में खेल है। हमारे देश में ऐसा नहीं है। हमारे देश की आबो-हवा में खेल से ज्यादा असर यौनाचार, भ्रष्टाचार, भूख, गरीबी, दंगे-फसाद, बात-बात की हुज्जत, बतोलेबाजी, बहसबाजी, वैमनस्य और टुच्चेपन का है। हमारे अंदर राष्ट्र-प्रेम की भावना का भी बहुत अभाव है। हमारे लिए राष्ट्र-प्रेम से अधिक महत्त्वपूर्ण है हमारी जाति, हमारा गोत्र, हमारा जिला, हमारा राज्य और हमारा स्वार्थ। यदि स्वार्थ सिद्ध होता हो तो हम जघन्य से जघन्य अपराध करने में गुरेज़ नहीं करेंगे। ओलंपिक खेलों में तो हम राष्ट्र के लिए ही खेलते हैं। यदि हमारे भीतर राष्ट्रीयता की उत्कट भावना नहीं है तो हम किस जज्बे से खेलेंगे?

आलस्य, कामचोरी, मुफ्तखोरी- ये हमारे देशवासियों के सर्वव्यापी गुण हैं। हमें हर मद में सब्सिडी चाहिए, हर क्षेत्र में कोटा और आरक्षण। खेलों में ऐसा कुछ नहीं चलता। वहाँ तो वही जीतेगा जो श्रेष्ठ होगा। लेकिन श्रेष्ठता कहीं शून्य से, अंतरिक्ष से नहीं आनेवाली। वह आएगी इसी बीच से। उसके लिए हमें अपने युवाओं के सामने अच्छे आदर्श रखने होंगे। पिछले दो-तीन वर्षों से हम ‘योगा’ दिवस मना रहे हैं। हमारे कितने नेता सही से पद्मासन लगाने में सक्षम हैं? सर्वांगासन और शीर्षासन की तो खैर बात ही न की जाए! जब देश के अधिसंख्यक नेता ही फिट नहीं हैं, स्कूलों-कॉलेजों के शिक्षक ही फिट नहीं हैं तो युवाओं के सामने वे क्या आदर्श प्रस्तुत करेंगे?

भारत में पुलिस के अधेड़वय कार्मिक अधिकांशतः स्थूलकाय, मोटे, थुलथुल और इस कारण अनफिट हैं, जबकि उनका तो काम ही फिट रहने का है। खेलों के लिए शारीरिक फिटनेस बहुत ज़रूरी है। किन्तु जब पूरे समाज में ही फिटनेस के लिए कोई रुझान नहीं है तो खेल के लिए कहाँ से होगा!

हमारे देश में खेल-तमाशा केवल मनोरंजन का काम है। खेल को तमाशे के साथ जोड़कर बोलने का यही कारण है। ज़ाहिर-सी बात है कि खेल को यहाँ किसी पेशे के तौर पर नहीं देखा जाता। खेल ही नहीं, लेखन, नाटक, नृत्य, गायन, वादन, विभिन्न ललित कलाओं आदि को भी अपने देश में केवल सतही मनोरंजन का साधन माना जाता है, न कि पेशा। इसलिए इनके प्रति पेशेवराना रवैया भी नहीं है किसी का। हमारे खेल संस्थानों, खेल अकादमियों में विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण ले रहे युवाओं को औपचारिक शैक्षणिक योग्यता अर्जित करने के लिए कला, विज्ञान, वाणिज्य आदि के विषय लेकर बोर्ड की परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। क्यों नहीं, सीबीएसई और देश के अन्य सभी प्रादेशिक बोर्ड ऐसे छात्रों की बोर्ड की परीक्षा खेल की विविध विधाओं में लेते? यदि पाँच पर्चे उत्तीर्ण करके ही मैट्रिक अथवा इंटर की सनद मिलनी है तो खिलाड़ी छात्रों के लिए 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर, 800मीटर, 1500 मीटर, 3000 मीटर, 5000 मीटर, 10,000 मीटर और बाधा दौड़ आदि में से कोई एक विषय, लम्बी कूद, ऊँची कूद, ट्रिपल जम्प आदि में से कोई एक विषय, हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, बास्केट बॉल, हैंड बॉल आदि खेलों में से कोई एक विषय, तैराकी की चार शैलियों- फ्री स्टाइल, बैक स्ट्रोक, ब्रेस्ट स्ट्रोक, बटरफ्लाई में से किसी भी एक शैली में 50 मीटर, 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर, 800 मीटर, 1000 मीटर, 1500 मीटर आदि में एक विषय, डिस्कस थ्रो, शॉटपुट, जैवलिन थ्रो, हैमर थ्रो में से कोई एक विषय लेकर उनकी परीक्षा क्यों नहीं ली जा सकती? बहुत ज़रूरी हो तो बुनियादी हिन्दी (अथवा देश की 22 मान्यताप्राप्त भाषाओं में से एक), बुनियादी अंग्रेजी, बुनियादी गणित की परीक्षा भी ली जा सकती है, जो केवल क्वालिफाइंग हो। ये सभी विषय और विधाएँ केवल सांकेतिक हैं। देश, काल, स्थान के अनुसार इनमें परिवर्तन हो सकता है।

क्या देश के किसी शिक्षा मंत्री, किसी खेल मंत्री, किसी प्रधान मंत्री या किसी बड़े वेटरन खिलाड़ी ने ऐसा सोचा? यदि नहीं सोचा तो देश के किशोर और युवा खेल को कैरियर कैसे बना पाएँगे? कुछ चुनिंदा चैंपियन खिलाड़ियों को किसी सरकारी निकाय में नौकरी दे देने से क्या होगा? जो युवा खिलाड़ी चैंपियन नहीं बन सके, मेडल नहीं ला सके, उनके सिर पर तो बेरोजगारी की तलवार लटकती ही रहेगी। इसीलिए ये युवा खेल के साथ-साथ पढ़ाई को भी समय देते हैं, आर्ट्स, कॉमर्स, विज्ञान अथवा प्रौद्योगिकी की डिग्रियों के लिए खेल छोड़कर पढ़ाई करना उनकी मज़बूरी हो जाती है। पढ़-लिखकर नवाब और खेल-कूदकर खराब होने की जो कहावत इस देश में प्रचलित है, उसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि औसत दर्जे की पढ़ाई करके औसत अंक लाने वाला युवा जीविका का कोई साधन, किसी विभाग या प्रतिष्ठान की नौकरी पा जाता है, किन्तु खिलाड़ी के औसत रह जाने से काम नहीं चलेगा। उसे तो अव्वल तीन-चार प्रतिस्पर्द्धियों में ही जगह बनानी होगी। फिर बाकी का क्या होगा? यह अनिश्चितता तभी कम होगी जब खिलाड़ी को उसकी खेल-विधा में ही मैट्रिक, इंटर और स्नातक, स्नातकोत्तर डिग्री मिले और उस डिग्री के आधार यानी खेल के आधार पर उसे काम मिले। सुनने में यह अटपटा लग सकता है कि खेलने वाला युवा दफ्तर में काम कैसे करेगा? सच कहें तो ऐसे युवाओं को पढ़ाई-लिखाई का जटिल काम करने की ज़रूरत भी कहाँ है! वे तो पुलिसबलों, अर्ध सैनिक बल्, सेना आदि में भी खपाए जा सकते हैं।

क्या देश ऐसी व्यवस्था के लिए तैयार है? यदि नहीं, तो देश में खेलों के लिए कभी भी सकारात्मक माहौल नहीं बन सकेगा और हम दुनिया भर के बड़े-बड़े टूर्नामेंटों में महज पर्यटन के लिए अधिकारियों व खिलाड़ियों के बड़े-बड़े दल भेजते रहेंगे और कभी एकाध कांस्य अथवा रजत पदक जीतकर देश-वासियों का दिल तोड़ते रहेंगे। खेल हमारे लिए तमाशा ही बने रहेंगे और भारत, यानी दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश खेल के नाम पर बस तमाशा करता रह जाएगा।

---0---

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच करें : ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3865,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2814,कहानी,2137,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,91,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,348,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,18,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,874,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,32,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,660,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,704,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,187,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: भारत में खेल यानी तमाशा! / डॉ. रामवृक्ष सिंह
भारत में खेल यानी तमाशा! / डॉ. रामवृक्ष सिंह
http://lh6.ggpht.com/-j-Oh_TF4mng/TlM5_36baJI/AAAAAAAAKho/we8lmwlDK1Y/ramvriksh_singh%25255B2%25255D.jpg?imgmax=200
http://lh6.ggpht.com/-j-Oh_TF4mng/TlM5_36baJI/AAAAAAAAKho/we8lmwlDK1Y/s72-c/ramvriksh_singh%25255B2%25255D.jpg?imgmax=200
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/08/blog-post_9.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/08/blog-post_9.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ