विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

गर्दिश के दिन / फिक्र तौंसवी

image

मेरे जन्म पर देवताओं ने आकाश से फूल नहीं बरसाए, क्योंकि वे हबशा के राजमहल पर फ्‌ल बरसाने में व्यस्त थे । वहां एक राजकुमार ने जन्म लिया था । यानी जन्म से ही मेरे और देवताओं के सम्बन्ध बिगड़ गए और अब तक बिगड़े हुए हैं ।

यह ठीक है कि राजकुमार और साहित्यकार को एक ही तिथि पर और एक ही नक्षत्र में पैदा नहीं होना चाहिए । इसे आप विधि के विधान की एक त्रुटि भी कह सकते हैं । लेकिन देवताओं का 'रोल' भी गैर-शरीफाना नहीं होना चाहिए था । उन्हें फूलों के उपयोग का समुचित ढंग आना चाहिए था और अगर नहीं आता, तो भगवान को कुछ इंटैलिजेंट' देवता पैदा करने चाहिए ।

मैं तौंसा में पैदा हुआ; अगर तौंसा में पैदा न होता तो लड़काना में पैदा हो जाता । टिंबकटू भी कोई बुरी जगह नहीं थी, लेकिन हर जगह मुझे फिक्र ही कहा जाता और हर जगह मेरा बाप चौधरी नारायणसिंह का मीर-मुंशी धनपतराय ही होता, जिसके घर आशा के विपरीत एक साहित्यकार जन्म लेता और देवता फूल न बरसाते, केवल इसी 'टेक्नीकल' वजह से कि मीर-मुंशी की छत के नीचे डेढ़ सौ कमरे नहीं हैं, सिर्फ डेढ़ कमरा है ।

बीस वर्ष बाद मेरे बाप ने मुझपर रहस्योद्‌घाटन किया-तुम्हारे जन्म की सूचना मुझे जीतू सारबान ने दी थी, तो मेरे मुंह से केवल इतना निकला था, 'यह सातवां बच्चा है और शायद भाइयों की तरह भूखों मरने के लिए पैदा हुआ है!'

अर्थात मेरे (पूज्य) पिता के लिए मेरे जन्म की महत्ता केवल अंकों तक सीमित थी-पांचवां, छठा, सातवां । परिणाम यह हुआ कि देवताओं के साथ-साथ अंकों से भी मेरे सम्बन्ध बिगड़ गए और आज तक बिगड़े हुए हैं ।

अंकों को तो इन्सान का भाग्य नहीं बनना चाहिए ।

मगर जीतू सारबान मुझे अंक नहीं समझता था, बल्कि एक बच्चा समझता था, जिसमें मासूमियत होती है । वह गांव का एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जिसने मुझे प्यार से देखा, मोहल्ले में गुड की टांगरी बांटी और इतना सोचना भी निरर्थक समझा कि वह एक सस्ती और घटिया चीज बांट रहा है । वह केवल इस बात का कायल था कि खुशी बांटनी चाहिए, चाहे वह सस्ती और घटिया ही क्यों न हो ।

और फिर एक दिन मुझे यूं लगा जैसे जीतू सारबान की बेटी फातो जवान हो गई है । और फातो को देखते ही मैंने भी छलांग लगाई और जवान हो गया । इस छलांग पर मुझे हैरानी हुई और खुशी भी हुई । और यह खुशी 'नेचुरल' थी । 'नेचर' ने हम दोनों के होंठों पर गुलाब खिलाए और मेरे पिता और जीतू सारबान की दाढ़ी में सफेद बाल उग आए । और मैंने फातो के घड़े पर एक हल्का-सा 'टन' करता हुआ कंकड़ फेंका, जिसे उठाए वह कुएं से आ रही थी । इस 'टन' सें उसके सिर और छाती में एक आकर्षक तनाव आ गया ।

-तुम्हें शरम नहीं आती! फातो ने तनतनाती छाती को पल्लू से ढांपकर कहा ।

-आती है । मैं मुस्कराया ।

वह मुंह फेर कर शरमा गई ताकि शरमाने की ओट में मुस्करा सके । और फिर कई दिन तक हम अपने दिल की धड़कनों की भाषा समझते रहे और फिर दिल ही दिल में घोषणा की कि यह प्यार की भाषा है और इस प्यार में जीतू सारबान को वही मासूमियत नजर आई जो एक बच्चे में होती है । और उसने मेरे बाप से कहा-मीर मुंशी! तुम्हारा बेटा मेरी फातो के घड़े पर कंकर फेंकता है.. ..

- उसे ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारा खानदान शरीफ है । मेरे बाप का खयाल था कि जिन बच्चों को बासी सूखे टुकड़े पानी में भिगोकर खिलाए जाएं वे भी शरीफ खानदान के बच्चे कहला सकते हैं! शराफत बासी टुकड़ों की खरीदी हुई दासी नहीं होती ।

मेरा बाप भ्रम में खुश रहना बेहतर समझता था । मगर उस खुशी को नंबरदार के लड़के दाऊद खान ने एक दिन जबरदस्त झटका दिया । जब फातो शबाब का सरे-गरूर बुलंद किए कुएं से आ रही थी और मेरे कंकर का इंतजार कर रही थी, तो दाऊद खान ने अपनी कालीनी कमीज के बाजू फातो के रास्ते में फैला दिए । वे बाजू कंकर नहीं थे, बल्कि दाऊद उन्हें प्रेमालिंगन का आधार समझ रहा था । उसने फातो को 'चैलेंज' दिया-मुझसे इश्क करो, वरना...

-वरना? फातो ने वरना 'हूं' के लहजे में कहा । ऐसी ‘हूँ' वह गांव में सिवा मेरे हर एक से कह सकती थी । किन्तु जीतू सारवान के पास सिर्फ दो ऊंट थे और नंबरदार के पास तीन घोड़ियां, पांच बैल और छह शिकारी कुत्ते थे । इन सबने मिलकर फातो को सोते में उठा लिया और एक पहाड़ी कंदरा में ले गए और फिर पहाड़ी कंदरा से कुछ चीखें सुनाई दीं । और उल्लुओं ने मनहूस आवाजें निकालीं । और पहाड़ी कौवे कुरलाते हुए कंदरा से भाग आए और मेरी छत पर 'आ गए । यह इश्क की और मासूमियत की और उस रूह की तौहीन थी, जिसे आगे चलकर शायर और साहित्यकार के चोले में ढलना था ।

-ऐसा क्यों? आखिर क्यों? मैंने बाप से पूछा, जीतू सारवान से पूछा । दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया-बेटा, यह जग की रीत है, जिसमें नंबरदार और थानेदार एक दस्तरखान पर बैठकर मर्गी खाते हैं । और जिनके बच्चे बासी टुकड़े खाते हैं, मुर्गी उनकी फरियाद नहीं सुनती ।

और फिर मैं रातों-रात गांव से भाग गया । और गांव में किसी- को भी नहीं बताया कि मैं ऐसे जग को बदल दूंगा । और मुर्गी तथा बासी रोटी की दूरी को मिटा दूंगा । फातो को भी नहीं बताया । कैसे बताता? उसने तो कुएं में छलांग लगा दी थी । बासी टुकड़े ने अपने अपमान के बदले आत्महत्या कर ली थी ।

अत: आत्महत्या से भी मेरे सम्बन्ध बिगड़ गए । ऐसी फातो से भी बिगड़ गए, जो आत्महत्या करके समझती है कि इससे थानेदार और नंबरदार के दस्तरखान से मुर्गी भाग जाएगी ।

और फिर एक दिन यों हुआ कि मेरी नन्हीं मासूम बच्ची राजरानी जिसके पास न राज था और न वह रानी थी, सिर्फ एक गला-सड़ा केला, और पुस्तकें थीं, जिन्हें वह बस्ते में बांधे स्कूल जा रही थी, कि अचानक खतरे का हॉर्न बजा। आकाश में विमान मंडराने लगे। उन विमानों में कोई बस्ता, केला और पुस्तक न थी बल्कि बम थे। और उन्होंने कहा कि यह जंग है । और अगर तुम स्कूल जाओगी, तो बम फेंककर तुम्हें खत्म कर देंगे क्योंकि हमने पुस्तकें पढ़कर ही ये बम बनाए हैं ।

और मासूमियत पर यह बम मुझे यों लगा जैसे नंबरदार का लड़का दाऊद खान फातो के घड़े पर अपने घोड़े का सुम मारकर कह रहा हो-मुझसे इश्क करो, वरना...

और मुझे क्रोध आ गया । मुझे मालूम न था कि क्रोध मनुष्य को अंधा बना देता है । फिर मैंने 'लाउडस्पीकर' अपने कंधे पर रख लिया और गांव-गांव घूमने लगा--हम शांति चाहते हैं, शांति! किसके लिए? नन्हीं राजरानी के लिए । मासूम आखों में गुनगुनाते टैगोर और कालिदास के लिए''

और गांव के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर मुझे कांटे चुभे, झाडियों ने उलझाया कीचड़ ने लथपथ किया । सूखी-सड़ी चाय, उबलती भूख और होंठों की पपड़ियों ने मुझे झांसे दिए कि यह पवित्र कर्तव्य है । इतिहास पलटा खाएगा और मुर्गी तथा बासी रोटी की दूरी मिट जाएगी ' और किसी फातो का घड़ा आत्महत्या नहीं करेगा । और फिर विमान का बम शरम से पिघल जाएगा और मासूम राजरानी का गला-सड़ा केला, एक सेब में बदल जाएगा ।

और उस सेब पर टैगोर की 'गीतांजलि' लिखी जाएगी ।

लेकिन जब मैं शांति का लाउडस्पीकर कंधे पर रखे चल रहा था, तो एक टीले पर मुझे बाबा गोवर्धन सिंह मिला, जो पन्द्रह वर्ष तक केले को सेब में बदलने की खातिर जेल में रहा था । उसकी मासूम फातो को भी किसी ने बम से मार दिया था और वह आवेश में आकर विद्रोही बाबा बन गया था और अमरीका भाग गया था । वहां से दुखानी जहाज- में बंदूकें भर लाया था । परंतु जहाज को बाबा और बंदूकों समेत अंडमन जेल के दलदल में फेंक दिया गया था ।

ऐसा था वाबा गोवर्धन सिंह! उसने मेरे कंधे पर शांति की फाख्ता- को बैठे देखकर उपहासपूर्ण कहकहा लगाया और कहा-तुम मूर्ख हो,. यंगमैन!

त्रै

--क्या शांति का आह्वान मूर्खता है, बाबा

-कैसी शांति? किसके साथ शांति? वह नथुने फड़काकर बोला-जो लोग शिकारी कुत्ते छोड्‌कर टैगोर के गीतों को झंझोड़ते हैं,. उनके साथ हम शांति से कैसे रह सकते हैं? मुर्गी को तुमने पाला है । परतु उसे नंबरदार का बेटा थानेदार के साथ बैठकर खा जाता है! क्या हम उसके साथ शांति से रहें! तुम्हारा बाप क्या काम करता है?

-चौधरी नारायण सिंह का मीर-मुंशी था ।

-बस वही! उसने शांति का लाउडस्पीकर जोर से गिरा दिया । तुम्हारे चेहरे पर जवानी में जो झुर्रियां हैं, ये उसी नारायण सिंह ने- डाली हैं । ये झुर्रियां तभी मिट सकती हैं, जब हम नारायण सिंह से युद्ध करेंगे, शांति नहीं ।

क्या बाबा गोवर्धन सिंह मेरे पिता की तरह संभ्रम में खुश रहना जानता था? कुछ माह बाद सुना कि बाबा गोवर्धन सिंह का पीछा करते हुए पुलिस ने उसकी रीढ़ की हड्डी पर गोली चला दी । आरोप यह था कि उसने किसी चौधरी नारायण सिंह की जागीर में अग्नास्त्र दबा रखा था ताकि उसकी फसल भक से उड़ जाए. उस समय से शांति से भी मेरे सम्बन्ध बिगड़ गए ।

क्या मैं सम्बन्धों में बिगाड़ पैदा करने के लिए ही इस दुनिया में आया था? नम्रतापूर्वक यह प्रश्न मैंने जैमिनीदास रंगसाज से किया, जो मुझसे आठ घंटे प्रतिदिन काम लेता था और दो आने प्रतिदिन देता था । मैं उसकी 'भारत रंगसाज कंपनी में हसीनाओं के दुपट्टे और प्रतिष्ठित लोगों की पगड़ियां, नारंगी, गुलाबी सुरमई रंग में रंगता था । क्योंकि मुझे भूख लगती थी और कंपनी को इस भूख की जानकारी थी । दो आने मैं दाल-रोटी तो मिलती थी, लेकिन आलू-गोभी की स्पेशल सब्जी नहीं मिलती थी । ढाबे के मालिक श्रीचंद को मैंने लाख समझाया कि 'स्पेशल' सब्जी के लिए मेरा मन बेहद ललचाता है, 'लेकिन वह कहता- लालच बुरी बला हे । शास्त्रों में इसे पाप कहा गया है ।

मैंने सोचा शास्त्र शायद दो आने प्रतिदिन पाने वालों के लिए नहीं लिखे गए ।

निरंतर लालच से बोर होकर एक दिन मैंने जैमिनीदास से कह दिया -मास्टरजी! कभी-कभी यों लगता है जैसे मेरे और आपके सम्बन्ध बिगड जाएंगे ।

वह बोला-कोई हर्ज नहीं । मेरे सम्बन्ध तो उस सिपाही से भी बिगड़ गए हैं, जो मुझसे पांच रुपये प्रतिमास रिश्वत लेता है । तुम क्या हो? तुमको तो इतना भी ज्ञान नहीं कि नारंगी और नीला रंग मिलने से कौन-सा रंग जन्म लेता है?

मैंने कहा-मैं तो इतना जानता हूं कि थानेदार का रंग जब करंसी नोट के रंग में मिलता है, तो मछली का रंग जन्म लेता है, जिसे आप हर शाम शामू मछलीफरोश से खरीद कर खाते हैं । यह सुनकर जैमिनीदास ने मुझे अत्यंत भद्दी गाली दी और नौकरी से निकाल दिया और कहा--तुम दुपट्टे रंगने की कला कभी नहीं जान सकते । अधिक से अधिक तुम पगड़ी और दुपट्टे के इंद्रधनुष पर एक कविता लिख सकते हो । अत: हूं और फूं!

मैंने थानेदार से रिपोर्ट की । उसने कहा-अगरचे अभी जैमिनीदास से मेरे सम्बन्ध अच्छे नहीं, फिर भी रंगों के बारे में उसका दृष्टिकोण सही है । वह रंगों की भाषा अधिक समझता है, तभी तो मछली खाता है ।

मैंने दिल ही दिल में थानेदार पर अपनी 'हूं' उंडेली और भाग गया, भागता गया...यहां तक कि मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।

वास्तव में भागते-भागते मैं 'तेल चमेली स्पेशल' की फर्म के पास से गुजरा था, जिसके मालिक धूमीमल ने मुझे पिछड़ेपन से हांफते देखकर मेरे हाथ में ब्रश और स्याही का डिब्बा पकड़ा दिया कि हमारा तेल का इश्तहार शहर भर की दीवारों पर लिख आओ, तुम बहुत उन्नति कर जाओगे । जिस व्यक्ति को दो ग्रास मिल जाएं, उसे उन्नति कहते हैं । लेकिन मैंने सोचा कि दो ग्रास बांटने का श्रेय उन्हें मिलता है, जो तेल बनाने में ग्राहकों से फ्रॉड' करते हैं । एक दिन मैंने धूमीमल फ्रॉड' से कहा-मुझे चार आने प्रदान कर दीजिए, क्योंकि आज खतरा है कि इश्तहार लिखते-लिखते मुझे भूख लग जाएगी ।

वह बोला-मेरे 'बिजनेस' का उसूल है कि मजदूर को जब पसीना आए, उसे उजरत दे दो । इसलिए जाओ पसीना पैदा करो ।

मैंने कहा बड़ा सुनहरी उसूल है । अत: ही-ही-ही

ही-ही ही उसने मेरा समर्थन किया ।

और फिर दिन-भर मई महीने की अंगारे उबलती धूप में दीवारें लिखते-लिखते मुझ पर भारत भर की निर्धनता गुजर गई । मुझे पसीना आया, पपड़ियां जमीं, आखों में चिनगारियां तड्‌तडाई, शरीर में बार-बार तरेलियां आईं । हर मुसाम से भूख के फूल उगे । नर्वस सिस्टम को सैकड़ों झकोले आए और मैं धूमीमल की फर्म से दस-बारह गज की दूरी पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ा । मेरा पसीना धूमीमल ने देखा या नहीं, लेकिन जब छत्तीस घंटे बाद मुझे होश आया, तो मैं एक पलैट में लेटा था और हिमाचल देश की एक हसीना मुझे पंखा कर रही थी ।

मैंने पूछा-क्या तुम जीतू सारबान की बेटी फातो हो?

वह पहाड़ी छैल से अपनी पथरीली छातियां छुपाते हुए बोली- पहले तुम बताओ, तुम्हारा घर कहां है? मुझे तुमपर प्यार आ रहा है । मुझे दुल्हन बनाकर घर ले जा सकते हो?

मैंने कहा-इस दुनिया में जन्म लेते ही मेरा घर खो गया । जब तक मैं उसे ढूंढ न लूं, उस समय तक तुम मेरी दुल्हन बनना स्थगित कर दो ।

लेकिन उसने बताया कि वह बहुत जल्दी में है । दो-चार मिनट में किसी की दुल्हन बनना चाहती है, वरना वह हरामी नौसरबाज आ जाएगा, जो मुझे बहकाकर लाया है कि मैं तुम्हें शहर की राजकुमारी बना दूंगा । लेकिन यहां लाकर उसने मेरे कुंवारेपन का 'रेट' निश्चित कर दिया । इसलिए आओ ..आओ, 'रेट' की इस टुनिया से भाग चलें और किसी पहाड़ी कंदरा में बैठकर दूल्हा-दुल्हन का अनन्त गीत गाएं । और मेरे पूछने पर उसने बताया कि कल जब वह नौसरबाज -शराब के नशे में गालों को गंडेरी समझकर चूस रहा था तो कह रहा था-मैं इनसानियत परस्त हूं । इस बेहोश छोकरे को सड़क से उठा लाया, क्योंकि इसकी नाक बड़ी मासूम है । मुझे धोखा नहीं देगी । मैं -इसे अपना शागिर्द बनाऊंगा ।

लेकिन फिर दूल्हा-दुल्हन के भागने से पहले छापामार पुलिस आ गई और नौसरबाज के शागिर्द को गिरफ्तार करके ले गई । और फिर नौसरबाज को जीवन-भर न पकड़ सकी । पुलिस को उसकी और मेरी नाक की पहचान नहीं थी । तभी से। नाक और पुलिस से मेरे सम्बन्ध बिगड़ गए और अब तक बिगड़े आ रहे हैं ।

और फिर मुझे याद नहीं मैं कब रुक गया और जैसे मुझपर सदियां .गुजर गईं । आदि से अंत तक फैलने वाला इन्सानी कारवां गुजर गया और मैंने देखा कि कुछ घाव हैं, कुछ पपड़ियां हैं, कुछ अंगारे हैं, जो मेरा निरंतर पीछा कर रहे हैं । उन्होंने मुझे गया के एक जंगल में रोक लिया । वहां शायद एक घना पेड़ था और एक बौद्ध, ज्ञानी बैठा तपस्या कर रहा था । और फिर गया के आकाश से एक लेखनी गिरी और आवाज आई- जहां-जहां से भागे हो, वहां-वहां वापस जाओ और इस लेखनी से तपस्या करो । और इस तपस्या से घाव को और पपड़ी को और अंगारे को रूप, भाव और शब्द प्रदान करो । और यह भगवान का आदेश है और याद रखो भगवान का आदेश अटल होता है...

और इस आवाज में हर्ष था जो मुसामों से फूल की तरह खिल उठा ले

और मैंने लेखनी हाथ में पकड़ ली, जिससे ये फूल सुगंध देने लगे और मुझे यों लगा जैसे यह मेरे उद्देश्यों की सुगंध है । केले और सेव की दूरी को .समाप्त करने वाली सुगंध है और इसी सुगंध पर तैरते-तैरते मैं दुनिया को यह बताने में समर्थ हो सका कि देवताओं ने मेरे जन्म पर फूल क्यों न बरसाए और कि भगवान केवल एक शर्त पर इंटैलिजेंट देवता पैदा कर सकता है, अगर फातो आत्महत्या न करे, बल्कि गोवर्धन सिंह बाबा -की तरह नौसरबाजों से युद्ध करे ।

--

(संस्मरणों की किताब - गर्दिश के दिन - संपादक - कमलेश्वर  - से साभार)

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget