शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

रिंकी मिश्रा के हाइकु

image

हाइकु

अनमोल है
ये कड़ी प्रेम की लड़ी
रक्षाबन्धन।

भाई कलाई
सजाई प्रेम धागा
बहना प्यारी।

बरगद हो
तुम कड़ी धूप में
शीतल छाँव।

नवरंग से
रंगा प्रेम तुम्हारा
मैं दिल हारी।

ताल ना मेल
बोझ ढोती जिंदगी
रिश्तों की रेल।

कंक्रीट पथ
जीवन पर रहा
अडिग खड़ा।

शोर बरपा
रुदन का चला ना
इश्क का जोर।

फुला ना फला
चढ़ अटारी बैठा
इश्क निगोड़ा।

पहाड़ काट
बनी लम्बी सड़क
दौड़ी आपदा||

ताल-तलैया
प्रकृति धरोहर
हुआ आघात

भीड़ सफ़र
सुनसान डगर
आया साथ

पाषाण मन
मानवता विराम
व्यर्थ विलाप।।

बरसी बूंदे
सोख गई दरारे
भूमि तड़पी

दो खानदान
बेटी बनती पुल
झरते फूल

प्यारी सी बिटियाँ
खाली घर-आँगन
रौनक देती।

मैल मन का
हृदय परत चढ़ा
वैर आबाद।

साफ बदन
मैल जकड़े मन
अकड़े दम्भ।

बबूल मन
संवेदना से शून्य
चिंतन न्यून।।

ओस की बूंद
मोती सा अनमोल
चमके दूब।

ओस की बूंदे
गिरे धरती गोद
मोती दमके

टपके ओस
किसलय बेहोश
जीवन प्राण

उमड़ आते
स्मृति के तलछट
यादों के घास

पेड़ काट के
मोबाइल टावर
चि-चि प्रलाप

दूर चिड़िया
सुना आँगन आज
साँझ के पास

सुंदरी धूप
झांकती झुरमुट
बैठी आँगन।

कटते वृक्ष
सहमा है जंगल
गिद्ध दृष्टि से

केसर क्यारी
चमके बूंद ओस
नन्ही बिटियाँ

हुआ शोर
गली चौराहे तक
रोया मौन

चटकी धूप
जले आँगन धूल
उगले शूल

आमिया झूमी
कोयल कुक उठी
बाग बोराया।

चटकी धूप
जले आँगन धूल
उगले शूल

झरते दिव्य
पुष्प धरा के आँगन
भू का श्रृंगार।

धरा के गोद
स्वंय समर्पित है
हरसिंगार।

दर्द का वादा
बांट लें आधा-आधा
निर्वाह ज्यादा।।

हुआ शोर
गली चौराहे तक
रोया है मौन।

कटते वृक्ष
सहमा है जंगल
गिद्ध दृष्टि से

बरसे बूँद
हर्षित रोम-रोम
खिला चमन।


रिंकी मिश्रा

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------