रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - दरोगाजी, साइकिल और एफआईआर / हास्य-व्यंग्य / अशोक जैन पोरवाल

image

(परसाई व्यंग्य पखवाड़ा - 10 - 21 अगस्त के दौरान विशेष रूप से हास्य-व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. आपकी  सक्रिय भागीदारी अपेक्षित है.  )

  दरोगाजी, साइकिल की रपट लिखवानी थी ?

व्यंग्य

अशोक जैन पोरवाल

 

'दरोगाजी..........राम-राम। हुजूर म्हारे साइकिल की रपट लिखवानी थी।' एक आम-आदमी एक छोटे से कस्बे के एक मात्र थाने में दरोगा के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला। वो आम-आदमी ग्रामीण, अनपढ़ और गरीब किंतु, समझदार दिख रहा था। दरोगा एक टुटी हुई कुर्सी पर बैठा चैन से चने चबा रहा था। उसने एक चना अपने मुहॅ में फेंका और उस आदमी को उसकी सभी जेबों सहित ऊपर से नीचे तक मन ही मन देखा और टटोला। टटोलने के बाद उसकी सभी जेबें खाली अथवा फटी हुई नजर आई। जिसके कारण दरोगा ने अपनी नाक-भौं सिकोड़ी। फिर उससे पूछा, 'कहॉ रहता है, तू ?........किसकी साइकिल थी ?..........कैसी साइकिल थी, नई या पुरानी ?'

- हुजूर, म्हारी साइकिल थी.......अबई एक महिना पेले ही खरीदी थी..........एकदम नई थी.......फस-क्लास। मै पास वाले फलां गॉव में रहता हॅू।

- साइकिल गुमी थी ? या चोरी हुई थी ?

- साब, चोरी हो गई थी, फलां दरोगाजी के घर के सामने से।

- तू फलां दरोगा के घर क्यों गया था ?

- हुजूर, मैं वहॉ 'फ्री' में माली का काम करता हॅू।

- कितने में खरीदी थी, साइकिल ?

- साब, आठ हजार में खरीदी थी।

- क्या......? इतने पैसे तेरे पास आये कहॉ से थे ?

- हुजूर, म्हारा मोड़ा (लड़का) के ब्याह में उसके सुसराल वालो ने दई थी।

- क्या......? तूने दहेज में साइकिल ली थी........जानता है, तू ? मैं तुझे और तेरे लड़के........दोनों को दहेज लेने के जुर्म में अन्दर कर सकता हॅू।

- माय बाप, हमने ब्याह में साइकिल नहीं मांगी थी। वो तो मोड़ी (लड़की) के बाप ने अपनी मरजी से हई थी। जा सोचकर की हमरी मोड़ी साइकिल पर बैठकर घूमने जा सके.....।

- अभी तो तू बोल रहा था कि साइकिल तूने खरीदी थी और अब बोल रहा है, उन्होनें दी थी ? सच बता नहीं तो तुझे अन्दर कर दूंगा।

- दरोगाजी, मैं सच्ची कह रहा हॅू.......साइकिल के पईसे मोड़ी वालो ने म्हारे को दे दिये थे। जा कहके कि म्हारा मोड़ा अपनी पसंद की साइकिल खरीद ले.......।

- साइकिल की रसीद किसकें नाम से कटी थी ? और वो रसीद लेकर आया है, तू ?

- साब, रसीद म्हारे मोड़ा के नाम थी........वो तो हमने मोड़ी वालो को दे दई.......कीमत बतलाने के काजै।

- अच्छा यह बता कि तूने साइकिल का बीमा करवाया था या नहीं ?

- हुजूर, बीमा तो हमरे खानदान में आजतक किसी ने भी.....कछु भी चीजों को नाही करवाया।

- जब तूने साइकिल का बीमा ही नहीं करवाया तो फिर तू क्यों उसकी रिपोर्ट लिखवाने आया है ? तुझे साइकिल के पैसे तो मिलने से रहे।

- दरोगा साब, मैं रपट जा काजे लिखवाना चाहता हॅू कि कभी म्हारी साइकिल आपकी पकड़ाई में आ गई तो आप ही बिना रपट के म्हारे नाही देगें।

- हूं,.......बात तो तू पते की कर रहा है.........पर रिपोर्ट 'फ्री' में नहीं लिखी जाती है......इसके लिए 'दाना-पानी' और एक बड़ा कड़क हरा गांधीजी का फोटो छपा कागज देना होता है, समझें।

- हुजूर, मैं जानता था, इसलिए दाने के रूप में चने और एक दस्ता कागज लाया हॅू, क्योंकि आपके पास कागज भी नहीं रहता है।

- अबे, तू तो बहुत ज्यादा सयाना बन रहा है......जब तेरे लड़के के नाम साइकिल थी, तो फिर तू क्यों मेरे पास आया है, मेरा दिमाग चाटने.....? अपने लड़के को भेज। चल भाग यहॉ से बड़ा आया 'आम-आदमी' बनकर मेरे पास साइकिल की रिपोर्ट लिखवाने।

--

 image

संपर्क:

अशोक जैन 'पोरवाल' ई-8/298 आश्रय अपार्टमेंट त्रिलोचन-सिंह नगर
(त्रिलंगा/शाहपुरा) भोपाल-462039 (मो.) 09098379074 (दूरभाष) (नि.) (0755) 4076446

साहित्यिक परिचय इस लिंक पर देखें - http://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_59.html

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget