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व्यंग्य सतसई : मिश्रीमल जैन 'तरंगित'

स्वतंत्र भारत की युगव्यापी प्रवृत्तियाँ, व्यक्ति, वस्तु तथा विविध विषयक व्यंग्यात्म व्यंजना

व्यंग्य सतसई

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१ जगदीश्वर वरदान दो

जगदीश्वर वरदान दो, भारत के सब लोग
सब विधि से संपन्न हों, सुविधा सकल सुयोग ।

मिटे अशिक्षा, दीनता, बेकारी हो नष्ट
प्रगतिशील सब जन बनें, दूर हटे सब कष्ट ।

जगती का वैभव मिले, गगन लोक का ज्ञान
आत्म-ज्ञान अमृत मिले, मंगलमय विज्ञान ।

वर्तमान की देह में, हो अतीत का प्राण
पूरब पश्चिम समन्वित, नव-जीवन निर्माण ।

चपल चेतना व्यक्ति की, आत्म-बोध हो जाय
व्यक्ति जहाँ उन्नत बना, राष्ट्र स्वयं बन जाय ।

२ व्यक्तित्व का अभिमान

नूतन भारतवर्ष में, सचमुच एक अभाव
हिंदू, हिंदी, हिंद में, नहीं कहीं सद्‌भाव ।

पीड़ित है त्रिताप से, अब तो भारतवर्ष
मरपच महँगाई मिटे, औ अभाव, संघर्ष ।

धर्म धुरंधर धज्जियाँ, धंधा धक्कापेल
धमर कुटाई, धाँधली, धक, भूमिल, धरपेल ।

भाषण संभाषण प्रथम, उद्‌धाटन तब जान
चाटन आश्वासन प्रबल, यह पंचामृत पान ।

जन-जन, परिजन, भद्र जन, गुरुजन, हरिजन जान
हर जन में जागृत हुआ, निज मिथ्याभिमान ।

३ राजधर्म कोई नहीं

खाना, पीना, ओढ़ना, और बिछाना धर्म
व्यापक परिधि बन' गई, बहुविध जीवन मर्म ।

विशद प्रभावपूर्ण पर, धर्म कलह का मूल
श्रेयस्कर, सुखकर नहीं, गुण बन जाता भूल ।

संभवत: अतएव ही, भारतीय गणतंत्र
धर्म व्यक्तिगत वस्तु है, सब प्रकार स्वतंत्र ।

राष्ट्रीयता आज तो, सर्वोपरि है धर्म
सह - अस्तित्व, सहिष्णुता, युगव्यापी प्रिय कर्म ।

धर्म बना है आज तो, मानवमुखी विचार
राजधर्म. कोई नहीं, सब समान अधिकार ।

 

४ ऋण का गुरुतर भार

अब तो भारत में बढ़ा, ऋण का गुरुतर भार,
द्रव्य विदेशी के लिए, प्रस्तुत हाथ पसार ।

कोटि - कोटि जन के लिए,, आयोजन अभियान,
साधन, संबल, शिल्प हित, करता विकट प्रयान ।

पाँच बरस की योजना, अनंतवर्षी प्राण,
जनता के सहयोग बिन, बनी हुई निष्प्राण ।

अतिशय धन-साक्षेप है, विशद पूतना 'पाँव,
सकल देश में व्याप्त है, प्रांत जिला क्या गाँव ।

ऋण लेना तो है सहज, देना दुस्तर दाम,
आपाधापी में लगे, नहीं काम अभिराम ।

५ जीवट वाले लोग

.भारत भाग्याकाश में, व्यापक आज अभाव '
नहीं वांछित अन्न-धन, नहीं प्रेम, सद्‌भाव ।
आबादी अनुदिन बड़े, किंतु न बहुविध काम,
.नहीं सुलभ है सर्व जन, काम, दाम, अभिराम ।

भारतवर्ष धनाढध है, निर्धन प्रकृति लोग
उत्पादन उत्कर्ष है, नहीं सिर्फ संयोग ।

अलस-विलस, सुखकर सही, इन्हें न हितकर मान
श्रेयस्कर तब ही बने, श्रम सिंचित अभियान ।

आज हमें तो चाहिए, साधन - श्रम संयोग
करें कमी पर आक्रमण, जीवट वाले लोग ।

६ समता की महता बढ़ी

भूख - विलास दरार कम, ऊँच - नीच कम भेद?

समतल धरती बन रही जर्जर जाति विभेद

सामंती शासक गए, तन - मन - धन कर लोप

भू-स्वामी, ठाकुर हटे, सह न सके कटु कोप

युग - युग से ताड़ित रहे, ये जो हरिजन लोग
भद्र मनुज से पा रहे, उचित भोग - संयोग ।

धन, धरती, धंधे सभी, नहीं निरंकुश आज
हितकर कर शोषण करे, सुखकर कर साम्राज्य ।

प्रचलित एक प्रकार से, साम्यवाद सब ठौर

समता की महता बड़ी, निर्विवाद चहुँ ओर ।।

'७ एक भाव ही अत्र

समता की ममता बड़ी; बहुविध प्रचुर प्रयोग
गुरुता - लघुता मिट रही., सुख - सुविधा - संयोग 1

'देखो! कैसी मिट रही, प्रतिजन खींचातान
शासक - शासित - श्रमिक सब, चलें एक अभियान ।

डंडाशाही दैत्य जो, प्रथम पुलिस आयोग
जनता के सेवक बने, चमक, चकित सब लोग ।

ईश तुल्य शासक प्रथम, दुर्लभ साक्षात्कार
स्वामी ही सेवक बने, ले जन-सेवा भार 1

समता का यह रूप तो, प्रतिबिंबित सर्वत्र
सब चीजें अब तो बिकें, एक भाव ही अत्र ।

मीठे-चरके सभी ही, एक भाव लो आप
शक्कर से गुड़ बढ़ गया, वह बेटी वह बाप ।

जैसे महंगे वस्त्र हैं, दर्जी फिर बढ़ जाय
धोबी धप्पा धौल से, धमरकूट मच जाय ।

चाय डबलरोटी सहित, ' अथवा खा नमकीन

जुठलाने से भूख तो, बढती सदा नवीन ।

मोटे पहने बूट इक, जूती जोड़े तीन

है समान व्यय दृष्टि से, किसी प्रकार न हीन ।

खालो चाहे हवा ही, अथवा गोते खाय

मुँह बाओ, मक्खी उड़ा, झमक - झूम झलकाय ।

८ उच्चवंश का दंभ

अब तो प्राय: मिट .रहा, उच्चवंश का दंभ

संविधान ने जो किया, नवयुग का आरंभ ।

जाति-रंग, कुल-वर्ण के, हर बनावटी भेद

सबको सम सुविधा मिली, मिटा हृदय का खेद ।

जर्जर जाति विभेद है, शने: शने: सब ओर

भगा भत है छूत का, करके दस दिशि शोर ।

विद्युत धारा, सर्प, विष, घूर - ढेर, छू - रोग
अग्नि त्यों प्राणांतक विष, हैं अछूत अब लोग।

तन्मय, तत्पर लोग सब, होटल - बोटल बीच,

अर्द्ध धउली प्लेटें चलें, दोनों हाथ उलीच।

बीच भीड़ भौंचक भड़क, भंगिन से टकराय

रेलपेल है रेल में, अंग - अंग भिड़ जाय ।

जल के नल, चक्की चलें, संग मिलें अविभाज्य

प्याऊ में पानी पिएँ, हुआ आज सब त्याज्य । ४७

विदेश, जाति, विधर्म से, हो करके संघर्ष
आत्म - ज्ञान जागृत हुआ, तभी हुआ उत्कर्ष ।

अल्पसंख्यकों को मिला, अब विशेष अधिकार
मिला राज्य रक्षण उन्हें, आश्रय मिला अपार ।

जो पहले अभिशाप था, बना आज वरदान
जन्मजात जो दलित थे, देखा स्वर्ण विहान ।

९ भग्न आन प्राचीन

इस युग. में तो हैं विदित, व्यापक अर्थाभाव
अर्जन साधन अल्प है, महँगाई कुप्रभाव ।

गिने - चुने पैसे मिलें, प्रचुर प्रयोजन काम
ऋण का दामन थाम कर, लेते प्रभु का नाम ।

सिमिट शेरवानी गई, बनो त्वरित गति कोट,
कोन पुन: बुशशर्ट बना, छिपा लाज की ओट' ।

पेंट निकर जो बन गया, कच्छी बन तन जाय,
घटते - घटते वह कहीं, बन न लंगोटा जाय ।

भोजन टी - पार्टी बने, वैवाहिक व्ययहीन,
हाथ समेटें सब तरफ, भग्न आन प्राचीन ।

१० बढ़ी आज अभिव्यक्ति

अब तो कितना बन गया, देखो जीवन व्यस्त,
छोटी होने लग गईं, चीजें आज समस्त ।

उपन्यास छोटा बना, वह लघुकथा अरूप,
नाटक एकांकी बने, झलकी फिर तद्रूप ।

फुलवारी तो सिमिट कर, बन पाई है इत्र,
रामायण जेबी बनी, ग्रंथ न, कुंजी मित्र ।

वायुयान क्यों रेल भी, अंतरिक्ष अभियान,
टेलीप्रिंटर, विजन भी, वैज्ञानिक कल गान ।

साधन सीमित, चाह बहु, मर्यादित है शक्ति,
अन्तर्राष्ट्रीय धारणा, बड़ी आज अभिव्यक्ति ।

११ बेकारी दुर्गन्ध

ब्रिटिश काल में जो बनी, भारत भू म्रियमाण
स्वतंत्र हो कर बन गई; तत्पर औ क्रियमाण ।

लगी यांत्रिक वस्तु की, जैसे कोई टाल
वायुयान, जलयान त्यों, बहु प्रकार का माल ।

प्रचुर वस्तुएँ बन रहीं, मिट अभाव अभियोग
मंडी कार्यालय बनी, नित नव, बहुल प्रयोग ।

धीरे - धीरे मिटेंगे, अपने सभी अभाव
यहाँ पनप पाए परम, आपस में सद्‌भाव ।

सूर्योदय पर ज्यों मिटे, व्यापक छाई धुंध
त्यों ही यह मिट जायगी, बेकारी दुर्गंध ।

१२ परिवर्तित परमार्थ

सत्य, लगन, सहकारिता, और नहीं सहयोग
पूरी तन्मयता नहीं, नहीं काम में योग ।

भाषा, जाति, कुलीनता, प्रांत - धर्म के भेद
विकट आज संकीर्णता, बेधक, धातक, खेद!

है अभाव सहयोग का, ना आदान - प्रदान
व्यापक फिर कैसे मिटे, फैली खींचा - तान ।

प्रतिजन बनना चाहिए, आत्म - विस्मरणशील
लगन प्रेरणा की कमी, राष्ट्र-प्रेम की ढील ।

जो सहयोगी भावना, वह व्यक्तिगत स्वार्थ
उच्च शिक्षा से हो भले, परिवर्तित परमार्थ ।

१३ समन्वयकारी शक्तियाँ

भारत संस्कृति में निहित, सहिष्णुता सद्‌भाव
वर्ण, जाति, समाज सब, विचार प्रवृत्ति भाव ।

समन्वय शक्ति देश की, एक महान विभूति
तत्व विरोधी यों मिलें, रख अखंड अनुभूति ।

धर्म, ज्ञान, विज्ञान भी, भक्ति, वाद - विचार
व्यक्ति, समाज, स्व-पर सभी, साहित्य एकाकार ।

तदनुकूल राष्ट्रीयता, करती सब रंग - रेल
अनेकता में एकता, अनमिल होकर मेल ।

समन्वयकारी शक्तियाँ, भारत मूलाधार

गीता गौतम व तुलसी, राष्ट्रीयता चार ।

१४ मुखरित लोकतंत्र

कृषि - प्रधान यह देश है, फिर भी अन्नाभाव
अन्नपूर्ण साकार जो, आज खिन्न है भाव ।

कुटुंब के बँटवार से, सीमित सिमटे खेत
खाद, बीज, कल, बैल बिन, नहीं उपज अभिप्रेत ।

रवाद, बीज, साझा कृषी, उन्नत हो हल - बैल

क्रय - विक्रय भंडार से, कटे कृषक का मैल ।

प्रति प्रांत में है प्रचुर, फैले विकसित खंड
जिनमें पंचायत करे, शिक्षा - न्याय प्रचंड ।

आलोकित मग-धाम हैं, चालित बिजली यंत्र

जन - जन जागृत हो उठा, मुखरित लोकतंत्र ।

१५ चारों व्यक्ति महान

नूतन भारत उदय में, चारों व्यक्ति महान
बापू, राजन, जवाहर, लाल राष्ट्र - हित प्रान ।
दी बापू स्वतंत्रता, संविधान राजेन्द्र
गति, मति, जागृति जवाहर, लाल बहादुर केन्द्र ।

सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, खादी ग्रामोद्योग
सत्याग्रह, राष्ट्रीयता, बापू प्रचुर प्रयोग ।

राजेन्द्र की सरलता संतों का व्यवहार
कृषि जीवन, विदेहता हिंदी - प्रेम अपार ।

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के, वीर जवाहरलाल
शांति-दूत, सुसमन्वयी, अमर लाल' चिरकाल ।

१६ नाना ग्रामोद्योग

वंशानुक्रम परंपरा, आज गई है भूल
दृष्टि व्यावसायिक शिथिल, नहीं समय अनुकूल ।

इस युग में तो रह गया, सिर्फ शूद्र का धर्म
चाकर नाचा कर बना, जन - जीवन का कर्म ।

विपुल कलों का अब हुआ, धुवाँधार प्रचार
जल - थल - नभ के यंत्र भी, बनने लगे अपार ।

बीस प्रतिशत लोग तो, उद्योगों के आधीन
कल - क्षेत्र बहुविध खुले, अब तो नित्य नवीन ।

कृषि प्रधान यह देश है, खेती प्रिय उद्योग
वर्षा का आगम विषम, है केवल संयोग ।

प्रगति राष्ट्र की है कठिन, नहीं मात्र संयोग
अनुकूल यहाँ पर रहें, नाना ग्रामोद्योग ।

यंत्र कठिन निर्माण हैं, नहीं वांछित अर्थ

केवल लघु उद्योग ही, जन - बल आज समर्थ ।

धंधों में करते कृषक, अवसर का उपयोग
निकट विकट सुविधा मिले, श्रम संपत्ति उपभोग ।

कपड़ा, चमड़ा, धातु क्यों, लकड़ी, बर्तन, खाद्य
गृह वस्तु बहुविध मिले, यही आज प्रतिपाद्य ।

केवल इसमें चाहिए सीमित साधन, शक्ति,
भाराक्रांत भारत हिते, तदनुकूल अभिव्यक्ति ।

१७ हुई प्रगति महान

राजओं के राज्य में व्यापक हाहाकार
सुनते रानी मंद ध्वनि नहीं प्रजा चीत्कार ।

अब जनता का राज्य है, प्रतिनिधियों का जोर

पत्र - प्रेस - व्याख्यान से, प्रतिध्वनित चहुँ ओर ।

पदासीन होकर प्रबल, सत्ताधिकार विशाल,
वाणी घोषित भूलते, ज्यों कन्या ससुराल ।

आपाधापी चल रही, चले आत्म - कल्याण,
विधान के जंजाल में, होता जन - कल्याण ।

प्रांतीयता, जातीयता, साम्प्रदायिक रंग,
संकीर्णता बहु प्रबल है, ज्यों जल बीच तरंग ।

नैतिक स्तर तो बन रहा, रेगिस्तान का कृप,
स्वार्थ व्यक्तिगत यों खिले, ज्यों गरमी की भूप 1

उत्पादन होता अधिक, फिर भी व्याप्त अभाव,
जनता का दुर्भाग्य है, कटु कलिकाल प्रभाव ।

खुले सिनेमा, होटलें, मृदु जलपान निकेत,
संपन्नता जन - मन बड़ी, उद्‌घाटन अभिप्रेत ।

मिट शताब्दियों का गया, दासता अभिशाप,
गाँव - नगर में बढ़ रहा, प्रगति का परिताप ।

हुक्के से सिगरेट तक, छलक छाछ जलपान,
कठपुतली से बोलपट, हुई प्रगति महान ।

१८ अधिकता में अभाव है

वैभव बड़े विज्ञान के, अब तो दूरी दूर,
लौकिक सुख सचमुच बढ़ा, हुआ आत्मसुख चूर ।

बाहर की क्रांति बड़ी, भीतर बड़ी अशांति,
अधिक धनी धनवान तो, निर्धन की उदभ्रांति।

जब तक खाई ना पटे, दोनों का बहु बीच,
कैसे कम संघर्ष हो, ऊँच - नीच का कीच ।

मनोयोग, समवेदना, बंधु - भाव, सहयोग,
ये चारों ऐसे हटे, भड़क बीच ज्यों लोग ।

उत्पादन इस ओर है, बेकारी उस ओर,
अधिकता में अभाव है, असमंजस यह घोर ।

१९ शेष पुरातन व्याधि

राष्ट्र - ध्वज, सिक्के नए, चित्र, पत्र, उपाधि,
तनिक भाषा भी बदली, शेष पुरातन व्याधि ।

राजतंत्र तो आज भी, जटिल, कुटिल, व्ययशील,
उच्चस्तरीय, वैधानिक, तुल्य ' सिनेमा रील ।

उत्तरदायी राज है, पदाधिकारी रेल
टिक पाता केवल वही, जो कर पाता मेल ।

विलियम टिक से प्रथम, पिंडारी का राज्य
प्रगतिशील युग में अभी, वैधानिक साम्राज्य ।

निकल भला कैसे सकें, यह है अन्तर्व्यूह
अभिमन्यु से फँस गए, यह है चक्रव्यूह ।

२० यह प्राणांतक युद्ध का

रोटी - बोटी के लिए, लड़ते कुत्ते चार
किंतु मनुज लड़ते सदा, जो ना मिले विचारै ।

उपजे पल में कलह तो, वर्षों तक नहीं जाय ।
सदभावना के बिना, प्राणांतक बन जाय ।

चीनी हमला मूल है, विकट राज्य विस्तार
एक पंथ दो काज हुऐ, साम्यवाद प्रचार ।

अवसरवादी पाक है, मजहब एक प्रतीक
काश्मीर को हड़पने, ताशकंद तकनीक ।

प्रलयंकर अणु अस्त्र' है, जगती का विध्वंश
अल्प समय में कर सकें, दूर बैठ कर -वंश ।

अग्निबाण यद्यपि बनें, नहीं बनें जलबाण
संकटमय इस समय में, कठिन आज परित्राण ।

पंचशील जल बम समझ, है कवच सहअस्तित्व
तटस्थता रेडार है, धर्म - कर्म दायित्व ।

सबल निर्बल राष्ट्र को, नहीं कर सकते नष्ट
क्यूबा - कोरिया युद्ध ने, किया है आज स्पष्ट ।

राष्ट्र संघ की पोल में, सभी राष्ट्र चिप जायँ
दलबंदी को थाम कर, निर्बल दल छिप जायँ ।

जगती की ज्योति प्रखर, मेघदूत है शांति
प्राणांतक यह युद्ध का, राष्ट्र - संघ हर शांति ।

( २१) उतरदायित्व अभाव

कर्मण्यता के साथ ही, उत्तरदायित्व अभाव
इसकी परिधि प्रशस्त है, राष्ट्र व्यक्ति समभाव ।

घर से चल कर देख लें, पिता पुत्र प्रतिकार
बहू - विरोध - विराम - प्रिय, बंधु चहे बँटवार ।

पुत्री पीहर भूलती, जा सुमधुर ससुराल,
पुत्र पत्नी के लिए बस, लडू - भिड़ कर जंजाल ।

श्रमिक काम चाहें नहीं, बहु विराम का मोह,
कर्मचारी अध्यक्ष से, कर बैठें विद्रोह ।

पदाधिकारी वास्तविक, न्याय नहीं कर पाय,
दंडनायक कार्यवश, पेशी ही पलटाय ।

नेता अभिनेता परम, हो कर पद आसीन,
विस्मृत होते वचन सब, वैभव विशद नवीन ।

आज व्याप्त सर्वत्र है, केवल आत्मकल्याण,
इसीलिए कुंठित हुआ, समृद्ध देश निर्माण ।

हिंदू रमणी की तरह, करें राष्ट्र में लोप,
अन्तर्निहित व्यक्तित्व को, कर दें हम आरोय ।

जन - धन संबल प्रबल बहु, राष्ट्र निर्माण अनंत,
अपनी - अपनी शक्ति से, कर दें ज्वलित दिगंत ।

भारी भारतवर्ष है, फिर समस्या प्रधान '
जन - जन के सहयोग बिन, कैसे हो कल्यान?

(२२) सिर बीसों का काट ले

सिर बीसों का काट ले, ना मारा ना ख्‌न,
आज विलीनीकरण में, यही व्याप्त मजमून ।

जैसे केंचुल साँप की, मोह तिनूका तोड़,
मोर पंख झाड़े तुरत, बन कर के रणछोड़ ।

एकीकरण सुसंगठित, हुआ विलय के संग,
नृपति त्याग अनन्य है, राष्ट्र मिला बिन जंग ।

इनके जाते ही हुए, भू. स्वामी भी भग्न,
सामंतशाही मिट गई, पेंशन में ही लग्न ।

श्रद्धेय श्री पटेल से, संभव नव - निर्माण,
खंडित से मंडित हुआ, पूर्व पटेल प्रयाण ।

( २३) काश्मीर है हिंद का

काश्मीर है हिंद का, अंग एक अविभाज्य,
चाहे पाकिस्तान तो, फैलाना साम्राज्य ।

बन श्री, सुषमा प्रकृति की, फल - फूलों का ढेर;
नदियों की अठखेलियाँ, करें जगत जन सैर ।

सांस्कृतिक इतिहास पुनि, राजनयिक संबंध
भारत से अविकल रहे, बिना किसी प्रतिबंध ।

तीन बार जो हो चुके, वहाँ स्वतंत्र चुनाव
भारतीय गणतंत्र प्रति, अभिन्न, अमिट लगाव ।

अगणित राशि हिंद ने, दी प्रगति हित दान
सब प्रकार सुविधा मिली, फिर क्यों खींचातान?

: (२४) पाँच वर्ष की योजना

दोहन दक्ष अंगरेज जन, भारत भू म्रियमाण,
जर्जर कण बना दिया, अभीष्ट नव - निर्माण ।

यद्यपि मिला स्वराज्य तो, मिला नहीं सुराज्य,
. पांच बरस की योजनी वांछित हित साम्राज्य ।

कृषि - विकास त्यों सिंचाई, बिजली, गति - संचार,
'खनिज, उद्योग, परिवहन, प्रथम योजना सार ।

कोसी, नागल - भाखड़ा, भद्रा, हीराकुंड,
'' दामोदर, चंबल नदी, बाँध? जवाई झुंड ।'

सिंचाई, विद्युत, पनपी, बाढ़ नियंत्रण पूर्ण!
इन बाँधों से बहुमुखी,. प्रगति हुई परिपूर्ण ।

खाद,. इंजन, चितरंजन, अलीपुरी ' टकसाल
हिन्दुस्तान जलयान का, बेड़ा बना विशाल ।

पाँच बरस त्रि योजना, बहु समुदाय विकास

सहकार, ग्राम - जीवन, चकबंदी, भून्यास ।

सात - भट्टी, विद्युत्, खनिज, बुनियादी उद्योग;
दुर्गापुर; राउरकेला, भिलाई भट्टी योग ।

तृतीय योजना में बहु, कृषि सिंचाई योग
समुदाय सहकारिता, खनिज ' दौर ' उद्योग ।.

जल - सिंचन, कृषि सुरक्षा', शिक्षा आरंभ भार
स्वास्थ्य - सेवा - केन्द्र - संघ, हुआ अमित विस्तार ।

अपने संबल से अधिक, मिला विदेशी योग
मुर्गी बोल बिलायती, यह पाश्चात्य प्रयोग
संचालित सरकार से, जनता का कम योग
इसीलिए कृत्कार्य कम, यह राष्ट्रीय आयोग ।

भारी भरकम, व्यय बहुल, विदेशी मुद्राभार
ऋण उऋण होना कठिन, अनुदिन पड़ती मार ।

पांच बरस की योजना, अनंत वर्षी प्राण
जन - जन जागृति के बिना, नहीं वांछित निर्माण ।

सर्वोदय, भूदान भी, योग करे बहु दान
यदि प्रति जन सहयोग दे, होए राष्ट्र महान ।

(२५) प्रवासियों की बाढ़

भारत में तो बन गया, उत्पादन अनिवार्य
उपज न, आबादी बढ़ी, बने विफल सब कार्य ।

कडुवा वैसे करेला, प्रखर चढ गया नीम
भारतवासी प्रवासी, आते यहां असीम ।

प्रतिदिन पाकिस्तान से, औ लंका से लोग
ट्रांसवाल, नेटाल से, ब्रह्मा वंचित योग ।

परिवार - क्रम - नियोजन, आयोजन के कार्य
बहुविध उद्योगीकरण, संकट अपरिहार्य ।

जनसंख्या से अधिक है, प्रवासियों की बाढ़
नियंत्रण होता नहीं, समस्या बने प्रगाढ़ ।

( २६) आकाशी अभियान

शक्ति पूर्ण मानव प्रबल, ले धरती का ज्ञान
रह रह करना चाहता आकाशी अभियान ।

प्रकृति चुनौती दे रहा, बनता विजयी आज
जगती तल का मुकुटमणि, विस्तृत करता राज ।

धरा गर्भ को भेद कर, जल तल को कर पार
दुर्गम बन, पर्वत चढ़ अब जाता उस पार ।

भूमंडल पर अब बढ़ा, आबादी का भार
दुर्लभ रहना हो गया, सके न धरा सँभार।

शक्ति, ज्ञान, सामर्थ्य से, भर कर हुआ मदांध
भूतल क्यों आकाश भी, रखना चाहे बाँध ।

मानवता के लिए तो कितने क्षेत्र अपूर्ण
भूतल के बहु प्रश्न भी, करते हैं परिपूर्ण ।

रोगी निर्धन, अपढ़ जन, कितने संबल हीन
कितनों ने देखी नहीं, अब तक ज्योति नवीन ।

पावर फुल पहले मनुज, अब है पावर फूल'
भूतल छोड़ गगन चढ़ा, गई मनुजता भूल ।

कितना अच्छा हो शिथिल, यह आकाशी दौड़
मानवमुखी दृष्टि बने, परिवर्तित हो होड़ ।

उर्ध्वमुखी मानव यदि, अन्तर्मुख हो जाय
इस अपव्यय का अंत हो, धरा स्वर्ग बन जाय ।

(२७) धन की प्रचंड शक्ति

अब तो धन है बन गया, मापदंड अभिव्यक्ति
महिमा व्यक्ति की घटी, धन की प्रचंड शक्ति ।

येन केन प्रकार से, धन - संचय की होड़
भरसक जन - जन कर रहे, बगटुट, दमपुट दौड़ ।

झूठ, कपट, चकमा चले, व्यक्ति आज स्वच्छंद
केवल पैसा चाहिए, छल - बल - कल हर फंद ।

कहीं न कोई पूछता, किस विध हैं धनवान
कर काला - बाजार से, अथवा खींचातान ।

चप्पल चटखाते चले, अब चमकीली कार
एकाकी कैसे हुआ, यह चकमक व्यापार ।

सब भौंचक भयभ्रांत' से, धन से है संत्रस्त
धनके आगे हैं झुके, इन्द्रधनुष से त्रस्त ।

इस धन से होता सहज, लतों का उर्वर ज्ञान
सुरा - सुंदरी सहज सुख, वैभव विशद वितान ।

केवल अपव्यय के लिए, इस धन का बस अंत
निर्धन पतझड़ में रहें, वसुधा बसे बसंत ।

जीवन - रस लेते महा, धन का कर बहु भोग
हर बार त्योहार समझ, खान - पान उद्योग ।

अधकचरा जीवन बिता, अंधाधुंध बिहार
सुख निद्रा सोएँ नहीं, चिंतित, व्यथित विचार ।

(२८) है गणतंत्र चुनाव

सीताराम, शिव - शक्तिवत्, है गणतंत्र चुनाव
दोनों अभिन्न अंग हैं, व्यापक विकट प्रभाव ।

दलबंदी दुविध दलदल, होता चिल पो शोर
आपस में यों कोसते, चील - झपट्टा जोर ।

बहुमत से हो जाएँ चुने, बने पार्षद लोग
प्रतिनिधित्व करते सभी, कम करते उपयोग ।

पदाधिकार, सत्ता - मगन, मतदाता बिसरायँ
आपाधापी में लगे, अपना क्षेत्र भुलायँ ।

पाँच बरस की छूट है, वे दौड़े दमटूट
बुरा भला चाहे करें, जनता छातीकूट ।

(२९) शासन चालन आज

ऊँचे स्तर पर अब चले, शासन चालन आज
भारी भरकम व्यय बहुल, अंगरेजी अनुराज ।

सचिवों की चिर श्रृंखला, अब भी चले अटूट
उप अतिरिक्त, संगो सचिव, है वैसी ही छूट ।

पदाधिकारी ज्यों बढ़े, निम्न स्तर घट जाय
कार वाले तो सुरक्षित, बेकार धक्के खाय ।

ब्रिटिश काल विधान में, अभीष्ट कायाकल्प
परिवर्तन अनिवार्य है, तथ्यपूर्ण न जल्प ।

शिक्षा, शासन, ग्राम में, इच्छित पूर्वी मोल
देशी मुर्गी को लगें, कटु बिलायती बोल ।

(३०) गये आज हम भूल

विस्मृत गुण अँगरेज के, अवगुण चित में धार ,
स्वदेश - जाति प्रेम नहीं, स्वजन - भाषा - प्यार ।

नहीं समय का मूल्य है, काम, स्वच्छता, प्रीति
नियंत्रित जीवन कहाँ, नहीं राज्य भय - भीति ।

उनकी संस्कृति के सुगुण, गए आज हम भूल
किंतु सभ्यता धार ली, पेंट - कोट, गल - मूल ।

भारी भरकम जकड़ कटि, गरमी में भी पैंट
होटल, बोटल, चाय क्यों, बंगला - जंगला टेंट ।

यांत्रिक जीवन' बन गया, भूले श्रम का मोल
निजा संस्कृति भूल कर, बोलें गिटपिट बोल ।

(३१) नैतिकता का मोल

ना कुछ चीजों के लिए, जाए जियरा डोल
सचमुच कितना धट गया, नैतिकता का मोल ।

थंभे का सह. उड़ा, टोंटी अन्तर्ध्यान
सरस सुमन उपवन उड़े, यह करतूत महान ।

मेज रखी पुस्तक गई, सजीव दुर्लभ चित्र
पैसे पॉकिट से उड़े, छाता, बूते, इत्र ।

चोरी रुपये पाँच की, है छोटा अपराध
क्या हुआ, किसने लिया, अपना मतलब साध ।

ज्यों - ज्यों महँगाई बड़े, नैतिकता घट जाय
हाथ सफाई यह विकट, करें लोग निरुयाय ।

(३२) सर्वत्र वाद-विवाद

इस युग में छाया प्रबल, सब थल वाद - विवाद
उखेड़ बखिया बुद्धि का, चिंतन, मनन, विवाद ।

कठिन कार्य, बातें सरल, प्रति पल सकल प्रमाद
तथ्यपूर्ण बातें नहीं, सिर्फ अनर्गलवाद ।

कविता में कितने चले, हाला - प्यालावाद
कौंचे, फ्राइड, युंग का, मौलिक या अनुवाद ।

अब तो केवल हो रही, समाजवादी घूम
अहंवाद किंतु प्रबल, रच न चक्का घूम ।

धूप - छांव माया, चले, मौलिकता है लोप
कर्त्ता कम, कुतरक अधिक, तुरत करें आरोप ।

(३३) छाया भ्रष्टाचार

वातावरण ग्रसित हुआ, रूपांतरित विचार
वर्षा ऋतु में धुंध ज्यों, छाया भ्रष्टाचार ।

हल्के कागज पर रक्खो, चाँदी पेपर ह्वेट
अन्यथा मँडरायगा, होगा मटियामेल ।

इस जनता के राज में, जनता चक्काजाम
पिछवाड़े से ही मिले, परमिट, पद अभिराम ।

विचलित शासन केन्द्र का, करने लगा विचार
प्राणांतक, धातक, प्रबल कला भ्रष्टाचार ।

अन्न, कर, धन, जन दाता, है मत दाता लोग
इनका जो शोषण करें, ध्वंश, चला अभियोग ।

3४ मनमौजी सानन्द

भारत में गरमी बड़ी, होती शीघ्र थकान
नींद और आलस्य तो, दो वरदान महान ।

सुखद अंग संकट विकट, नहीं डालते लोग
कछुआनुमा. समेटते, नहीं करते उद्योग ।

भाग्य भरोसे बैठ कर, करें प्रचुर आराम
जीवन की अनमोल निधि, चिर विराम, विश्राम ।

जाजम जम चौपड़ चले, और चले शतरंज
या घंटों बातें करें, राजी हो या रंज ।

महामना हैं लोग तो, बस आरामपंसद
रहना चाहें निरंकुश, मनमौजी सानंद ।

(३५) त्यागवीर पहिचान

ब्राह्मण को मृत गाय दें, बंजर भू भूदान
गलित विदेशी अन्न दें, सचमुच दान महान ।

खट्टे आम निकल गए, दिए पड़ौसी भेज
मीठा तो स्वीकार है, कडुए से परहेज ।

उठा फूल हल्का लिया, भारी भरकम छोड़
शरमदान आदर्श है, माननीय रणछोड़ ।

गीला गोबर त्य दें, सूखा पत्थर जान
जीमन पत्तल छोड़ दें, त्यागवीर पहिचान ।

शरमदान नारी करे,? दानी अश्रूदान
' शरमवीर हो शर्म दो, कुल - भूषण कुलकान ।

( ३६) बाहिर से छविधाम

केवल अब तो चाहिए, ऊपर से अभिराम
भीतर से कंकाल है, बाहिर से छविधाम ।

गात्र की रमणीयता, उतर गई परिधान
चटक मटक, चकमक चले, सटक भटक अभियान ।

जोबन धक्के आवारा, नशा आँख, दिल प्यास
टटका टेरीलीन तो, बहुरंगे आभास ।

सुंदरता साधन प्रचुर, मंजुल, मधुर, कमाल
आलस में अँगडाइयाँ, लेते रसिक रसाल ।

आकाशी श्रृंगार में, पत्थर मारे पेट
अल्प असन, नित नव वसन, अपना हाथ समेट ।

(३७) कपटाचरण सुजान

मृदु भाषण, पर अपहरण, कपटाचरण सुजान
ठाटदार ठग आधुनिक, चारु चमत्कृत जान ।

बातों के सम्राट ये, घातों का गुरु ज्ञान
बिना बुलाए बोलते, श्री - हत कर सम्मान ।

तूँबी का तूफान कर, कलह कुलपति आप
करें शांति में क्रांति ये, सुख परिणत संताप ।

वाक् युद्ध करते प्रथम, फिर टक्कर, विस्फोट
जब तक काम बने नहीं, करते रहते चोट ।

इनकी इज्जत में भला, करे कौन संदेह
सदाशय, महाशय विकट, अपर वस्तु से नेह ।

(३८) पहने टेरीलीन

बिजली, पानी, हवा, तम, करतब, भ्रष्टाचार
ऊपर से नीचे चले, सदगुति, प्रगति, विचार ।

मोटे मसनद, परम पटु, अधिकारी आसीन
अलंकृत ऑफिस सुखद, सज्जित सदा नवीन ।

नीचे वाले पिस रहे, करतब का गुरु भार
अल्प आय, जीवन जटिल, सके न भार सँभार ।

कार्यकाल ज्यों ज्यों बढ़े, घटता त्यों त्यों काम
अधिक समय करते सदा, रुचिर विराम, विश्राम ।

शासन, अनुशासन नहीं, सार - भार से हीन
प्रखर, मुखर, शोभित परम, पहने टेरीलीन ।

३९ विकट चलन यह लंच

वैसे ही तो हो रही, अन्नाहार की खंच
तिस पर लागू हो गया, विकट चलन यह लंच ।

सरकारी स्वीकृति मिली, अटपट, प्रबल प्रचार
डेढ़ बजे निकले सभी, पैदल पथ पर कार ।

मुँह जुठलाते चाय पी, प्लेट पूर्ण नमकीन
गन्ना रस, मट्ठा तरल, या कुरुकी सेक्रीन

वेतन चौथाई भला, चपल चकित उठ जाय
उपहार में व्यय अधिक, और शौक बढ़ जाय ।

इतिश्री अवकाश की, करने का प्रिय मंच
प्रखर, मुखर, व्यय - व्यसन, अलस – विलस प्रिय लंच ।

४० अब फ्री स्टाइल काम ।

पहले मर्यादा रही, अब की स्टाइल काम
केवल कुश्ती ही नहीं, नाम, धाम,. विश्राम ।

ये फ्री स्टाइल सड़क पर, चलते चकनाचूर
दुर्घटना यदि हो कहीं, अस्पताल ना दूर ।

चीजें फ्री स्टाइल मिलें, क्या रोकड़ का काम
किश्तों में या उधार लो, दो मनमाने दाम ।

जो रंगीन चश्मा चढ़े, फ्री स्टाइल दृश्य
बुर्के में सब दीखते, किंतु स्वयं अदृश्य ।

सब की स्टाइल सफर अब, पत्र - छात्र औ मित्र
प्रेम, प्रचार, प्रयोग सब, क्लब, गोष्ठी, चलचित्र ।

४१ बहु साधन सौन्दर्य के

बहु साधन सौंदर्य के, लगी आज है होड़
टाल लगी है विविध विधि, होती सरपट दौड़ ।

क्रीम, पाउडर, लालिमा, वेणी, किलिप, अपार
नख रंजन, नेत्र अंजन, मंजन, प्रचुर प्रकार ।

नारी भूखी रह सके, पर न श्रृंगार - हीन
निर्धन चाहे हो भले, सज्जित सदा नवीन ।

शरीर की रमणीयता, उतर गई परिधान
अलंकरण बहुविध बने, विस्तृत तना वितान ।

जीवन की शोभा सुखद, नारी निखरे रूप
अलंकरण अनिवार्य है, रेगिस्तान ज्यों कूप ।

(४२) जगत मरम मुट्ठी गरम

जगत मरम मुट्ठी गरम, चाँदी चाबी जान ।
जटिल, कुटिल ताले खुले, कार्यान्वित अनुमान ।

बनते जैसे चने से, चौबीसों पकवान
रिश्वत से वैसे तनें, वैभव विशद वितान ।

बने खटाला सार्थक, दलदल बने पदार्थ
नरम गरम हलुआ परम, सब कुछ बने यथार्थ ।

कमलापति ठेका मिला, गुंजामल दूकान
दामोदर मद पान गृह, थोड़ा सा जलपान ।

बीड़ी बंडल ट्रक उड़े, मिले हाथ कर छूट
सुवर्ण सँग सुविधा मिले, रोक टोक बिन लूट ।

(४३) महँगाई मारे सभी

महँगाई मारे सभी, बने बतासा लोग,
कम खा, गम खा, कसम खा, यही पड़ा संयोग ।

प्रति सरकारी घोषणा, महँगाई बढ़ जाय
दमन चक्र दुगुना बड़े, सभी लोग निरुपाय ।

सब मर पच कर जी रहे, बचे तो जीवन एक
शेष नहीं कुछ भी बचे, प्रभु ही रक्खे टेक ।

अमित, बहुरंगी, बहुमुखी, वस्तु विविध प्रकार
विपुल माँग, जीवन जटिल, सहते कठिन प्रहार ।

साधन सीमित, शक्ति भी, कब दे पाती साथ ,
इसीलिए मुँह बल गिरे, नमित - दमित - नत्माथ ।

४४) शक्कर अमित अभाव

पूछे यदि कोई हमें, शक्कर का क्या भाव
यह निधड़क कहना पड़े, शक्कर अमित अभाव ।

यदपि उत्पादन प्रथम, चीनी कमी नवीन
भीतर महंगाई, कमी, बाहर पाक व चीन ।

ऋण बोझ से सिहर कर, पाने को परित्राण
चीनी, चमड़ा, चाय तो, निर्यात अनुप्राण ।

(४५) होली तो होली भई!

होली तो होली भई, दीवाली है दूर
सिमिट एक दिन में गया, होली का दस्तूर ।

वासंती बयार मदिर, होता था प्रारंभ
चैत्र मास के अंत तक, होली भरती दंभ ।

सिमिट, सकुच सब एक दिन, होली के नव रंग '
नाच गान, अठखेलियाँ, फाग - राग, हुरदंग ।

ठंडा जैसे पड़ गया, सब उमंग - उत्साह
पूर्ण काम जो हो गए, यथा मिटी हो चाह ।

पटाक्षेप सत्सीख से, होली के बहु रंग
रंग राग संग भग रहे, गधा चंग औ भंग ।

(४६) कामचोर के काम

कुटिल, कुमति, कुचाल प्रिय, कामचोर के काम
ये तो काम करें नहीं, करें तो काम तमाम ।

अभी अभी आए गए, हुए चपल चट लोप
आएँगे जाएँ कहाँ, टँगे कोट औ टोप ।

आए पर झट हो गए, ये तो अन्तर्ध्यान
प्रकट हुए बहु काल में, अधर सुरंजित पान ।

टेलीफोन झन्ना उठा, इतने में तत्काल
बस फौरन गायब हुए, काम हुआ बेहाल ।

अंगद पद से स्थित प्रज्ञ, नित नूतन अभिराम
लापता होते, फिर छू, कामचोर के काम ।

कामचोर छ: रूप है, होंगे और अनेक
इसी प्रशस्ति से भला, करते है अभिषेक ।

सभी क्षेत्र में ये मिलें, नहीं अधिक दरकार
सुखमय सुविधा दे रही, इनको तो सरकार ।

(४७) पाकिस्तान की नीति तो

पाकिस्तान की नीति तो, कितनी मोतीचूर
ताशकंद की संधि से, जाना चाहे दूर

सीमा पर कर उल्लंघन, गुटबंदी पर जोर
हाथ मिलाए सामने, पीछे बल्ली कोर ।

भारत प्रिय अनाक्रमण, अतिक्रमण है पाक
यह छत्तीस की भावना, करती सब कुछ खाक ।

विष दे, विश्वास न दे, देते हो कर काम
बाय बाप क्यों मुकरते, लज्जित करते नाम ।

भारत भूमि से बने, जीवन - ज्योति - प्राण
मजहब, गुट, मतलब लिए, कैसा नव - निर्माण!

व्यक्ति प्रधान

(४८) लोकप्रिय शासक भला

व्य देव! यह आपका, गौरवयुत् पद धन्य
लोकप्रिय शासक भला, नहीं आप सा अन्य ।

धवल, विभूषित, चमत्कृत, मुखमंडल देदीप्य
सुनिवास, मोटर-मंडित, इष्ट सभी सामीप्य ।

तर्क, मर्म, प्रवाहयुत्, युग. स्रष्टा वाचाल
हंतक - वादी प्रतिक्रिया, भृकुटी भाल विशाल।

यह स्वराज्य है कल्पतरु, लोकप्रियता ढाल
विस्तृत व्यापक क्षेत्र है, कटे जटिल जंजाल ।

विकट योजना सृजन में, जो हो संभव लाभ
पूर्व सूचना दें प्रथम, शीलभद्र, अमिताभ ।

विधवाश्रम, विश्रांतिगृह, वाचनालय पूर्ण
होटल, चक्की, पान घर, उद्‌घाटित संपूर्ण ।

शासन - सत्ता का सदा, सर्वांगीण उपयोग
स्वयं - सेवक आप तो, करते प्रचुर प्रयोग ।

मुद्रण, भाषण, मृदु मेले, समारोह के ठाट
शिलान्यास संपन्न हो, प्रकट, विकट, विराट ।

दुर्लभ दर्शन आपका, गुरुतर कारज भार
बँगला, जँगला, व्यस्तता, नौकर, चाकर, कार ।

सच्चिदानंद आप है, विगत कष्ट, संपन्न
सत्ता, शक्ति, संचित निधि, शासन भार विपन्न ।

(४९) सस्मित सेठ उमंग

तुंदिल, तंद्रिल, शिथिल से, अलसाए प्रत्यंग
सज्जित गद्दे मखमली, सस्मित सेठ उमंग ।

इष्ट हानि, अनिष्ट श्रवण, नहीं आप अभीष्ट
येन - केन - प्रकारेण, लक्ष्मी का ही इष्ट ।

साधन संपत्ति सभी का, करते प्रचुर प्रयोग
व्यस्त मस्त समस्त दिन, नित नूतन उद्योग ।

सेवा मंडल, कमंडल, भूमंडल भरपूर
सकल कष्ट समुदाय के, करते बहुविध चूर ।

शाह खर्च, नित नव बसन, उत्सव, अंधाधुंध
अधकचरा जीवन बिता, तोड़ सभी प्रतिबंध ।

अलंकृत आमोद - गृह, सुविधा से संपूर्ण
चलें नहीं बेकार ये, दोहन दक्ष भी पूर्ण ।

महामहिम गतिशील है, प्रगतिशील जो काल
सब प्रकार सुविधाजनक, शोभित सदा रसाल ।

साहस, अध्यवसाय, रुचि, आत्म-विस्मरणशील
तन - मन - धन अर्पण करें, नहीं काम में ढील ।

सट्टा, चूआ, फाटका, न लकी नंबर भार
पल निहाल, कंगाल पल, अद्‌भुत यह व्यापार ।

नित सशंक, रहते सजग, बच कर करें प्रहार
घात का प्रतिघात नहीं, पूरा बंटाढार ।

( ५०) बाबू बड़े अनूप

लहराती अलकावली, फैशन मंडित रूप
तने - कसे - सटे पट, बाबू बड़े अनूप ।

तलुवे सहलाते सदा, घर में मलते हाथ
दुनियादारी गिर. सँभल, ऐसे। भोलेनाथ ।

पदाधिकारी टहल - पटु, घर श्रीमती अनन्य,
ठाकुर सेवक धर्म में, राष्ट्र भृत्यवर धन्य ।
शक्ति कमाने में गई, साहस चकनाचूर,
गात ढिलमिल, गति सिटपिट, भड़कीले भरपूर ।

अनुप्राण अवकाश का, वर्ग पहेली खेल,
ऋण का मृदु आस्वाद लें, कौतुक में दुख झेल ।

उम्मेदवारी कर मधुर, चूम बूट पेटेन्ट,
झेले झिड़की फुलछड़ी, पाते तब पेमेन्ट ।

अर्द्धमास के बीच ही, होते छूछानंद,
ललचाए लोचन लखें, करते करतब फंद ।

असन, वसन दिन रात के, दुर्व्यसन दब जायँ
शान, मान, सम्मान में, महँगाई पिस जायँ ।

चाय सबिस्तर पान कर, खानपान, जलपान

अधिक आय रस - पान कर, मस्त रहें मतिमान ।

टिप्पणी व्याख्या विशद, ऐसी सबल अचूक
दनदनाती गोली सी, करती है दो टूक ।

(५१) भारत कृषक स्वभाव

भोला मुख, भूषा सरल, सहनशील, मृदु भाव
निपट निरंतर कर्मरत, भारत कृषक स्वभाव ।

सीख नागरिक गुण लिए, तालमेल का काम
घी में कोकोविट मिला, कंकड़ अन्न तमाम ।

अपव्यय मृत्यु - लग्न का, भूमि विपुल बँटवार
ऋण, निर्धनता, अशिक्षा, युगव्यापी व्यापार ।

रत रहता है वह सदा, इतना आत्मविभोर
चक्काजाम मनोदशा, ना संचय पर जोर ।

निराकरण मध्यस्थ का, क्रय - विक्रय संस्थान

ग्राहक - उत्पादक मिलें, वस्तु बड़े तब मान ।

महँगाई से कृषक का, हुआ पुन: उद्धार
अनाज, ईंधन, दूध, पशु, कीमत बड़ी अपार ।

रोग, अकाल, विवाह में, ले उधार बहुदाम
संचयशील वृत्ति नहीं, इसीलिए' बेकाम ।

लघु धरती, सुखाद नहीं, निबल बैल, हल - बीज
पकड़ परंपरा को चले, नहीं शिक्षा तजबीज ।

देता कर, मत, अन्न वह, ले नवयुग अवलंब
सरकारी संबल प्रबल, प्रगतिशील अविलंब ।

व्यापक हलचल काल की, रहे नहीं वह दूर
सड़कें, मोटर', पंप पुनि, ट्रेक्टर हल भरपूर ।

(५२) श्रमिक जीवनाधार

प्रति इह लौकिक वस्तु में, प्रतिबिंबित साकार
संचालक युग - यंत्र के,- श्रमिक जीवनाधार ।

जगत के प्रति क्षेत्र में, श्रम का ही साम्राज्य
कुशल, अकुशल, मस्तिष्क के, सब क्षेत्रों में राज्य ।

सूती, ऊनी, रेशमी, सीमेंट, काच, स्पात
विद्युत, मोटर, हवाई, शिल्प यश अवदात ।

संरक्षण सुविधा मिली, बीमा, बोनस, फंड
हानि - हरण - विधान में, हुआ मर्यादित दंड ।

श्रमजीवी परिजन सकल, बालक - बनिता - लोग
तदपि नहीं वे पा सके, जीवन के सुख भोग ।

बहु सुविधाएँ जो मिलीं, वित - वेतन - आराम
लगी लगन, अधिकार की, भूल वास्तविक काम ।

हाथ हथोड़ा थाम कर, टीमटाम विश्राम
काम कम, बातें प्रचुर, कर लेते चित दाम ।

व्यापक महँगाई बड़ी, वेतन तिगुना आज
काम तिहाई हो रहा, मूल छोड़ ना ब्याज ।

सुसंगठित हैं संघ में, प्रबल आपकी शक्ति
बहु प्रदर्शन - प्रचार में, बढी आज अभिव्यक्ति ।

एक स्वर में बोलते, यही सफलता मूल
स्थायीत्व श्रम को मिला, बना समय अनुकूल ।

(५३) भिक्षा-वृत्ति कलंक

भारत भव्य सुभाल में, भिक्षा - वृत्ति कलंक
दंडनीय, दयनीय अति, पर धंधा निश्शंक ।

जीर्ण - शीर्ण - गलित पट, टूटे - फूटे पात्र
जर्जर - रुग्ण, दुखी हृदय, है अधनंगा गात्र ।

दानप्रियता, धर्ममय, दया, पुण्य, सौजन्य
करुण अलख घर - घट जगा, माँगे भीख जघन्य ।

मीरा, तुलसी, सूर क्यों, कबिरा ओ रैदास
जगा धार्मिक भावना, करते सतत प्रयास ।

भिक्षावृति कलामयी, कल - बल औ छल - छंद
शनि, शिव, शक्ति विचित्र विधि, ले घूमे स्वच्छंद ।

चक्कर दे कर माँगते, बिंदी बुद्‌धू बनाय
बिन माँगे आशीष दें, कंठ सुरीले गाय ।

निष्प्रयोजन लोग हैं, नहीं करें कुछ काम
भक्ष्याभक्ष्य विवेक तज, संचय मे अभिराम ।

भरी शीत माँगे वसन, भीषण गरमी भीख
वर्षा माँगे आसरा, दया - दान की सीख ।

गाली - निंदा, भर्त्सना, पा कर के दुत्कार
नहीं छोड़ते भीख ये, समझ इसे व्यापार ।

माँगो भिक्षा काम की, कर सुसंगठित तंत्र
: करो प्रचार, प्रदर्शन, राष्ट्र आज स्वतंत्र ।

(५४) बने साधु अब भार

अमर हिंद इतिहास में, बने साधु अब भार
दान का प्रतिदान नहीं, संख्या अमित अपार ।

शिक्षा, औषध - क्षेत्र में, ये ना लें आनन्द
मंदिर - मठों की सुरक्षा, करने वाले चंद ।

जप - माला छापा - तिलक, करें कीर्तन शोर
ताल, मजीरा, ढोलकी, रहते आत्मविभोर ।

चिमट कर, भभूत अंग, जटाजूट त्रिपुंड
थामे कर में कमंडल, घूमे भूमंडल झुंड ।

मावस, श्राद्ध, एकादशी, सब में लेते भाग
रामनवमी, जन्माष्टमी, प्रकट श्राद्ध ज्यों काग ।

बिना बुलाए ये भगत, धराधाम छा जायँ
करते मंगल कामना, घर घर अलख जगाये ।

रामांकित ओढ़े दुपट, मोटी पोथी जाप
पूजन का उपक्रम जमा, करें विकट आलाप ।

साधु से स्वादु अधिक, खानपान प्रवीण?
ढिलमिल करतब कर्म में, धर्म दृष्टि से क्षीण ।
नहीं साधु ऐसे सभी, यहां प्राप्त आदर्श
ज्ञान, धर्म, भक्ति - प्रवर, है यह भारतवर्ष ।
परम पूज्य धर्मात्मा, मेधावी कुछ संत
अपने धर्मोपदेश से, करें प्रचार अनंत ।

(५५) विविध वेश वकील

व्यापार - व्यवसाय - पटु, विविध वेश वकील
पद - प्रतिष्ठा - प्राप्ति में, तनिक न करते ढील ।

अलंकृत ऑफिस परम, सज्जित ग्रंथ समूह
सोफासेट, गच, मसनद, अनंत अंतर्व्यूह ।

चिक डाले नव द्वार पर, नामांकित हो ठाट
मिठभाषी मुंशी सहित, मायाजाल विराट ।

वाकपटु, व्यवहार - विद, मोल पराई पीड
दिबस बनाते रात को, एकत्र होती भीड़ ।

ऊँचा स्तर, व्यय बहुल, चिंतित, चतुर, इ सुजान,
व्यवसाय, छल - छिद्र में, आकाशी अभियान ।

लीडर से ये है निडर, बीमा जन से धीर
दोहराते दादुर ध्वनि, विकट, प्रकट, गंभीर ।

विकट वक्ता, सहज मति, परिश्रमी, प्रसिद्ध
हल्का हृदय, प्रचुर पठित, छल - बल - कल से सिद्ध ।

अभियोग नहीं हारते, होती सदा अपील
तर्क, वितर्क, कुतर्क मैं।, नहीं दिखाते ढील ।

रट लगा निज बात की, सदा लगाते जोर
विपुल ग्रंथ प्रमाण दे, न्यायालय कर शोर ।

ये अभियंता डॉक्टर, करें राष्ट्र - निर्माण
किंतु आप शोषण करें, यदपि आत्मकल्याण ।

( ५६) हैं नफीस डॉक्टर यद्यपि

हैं नफीस डॉक्टर यद्यपि, करें न काम नफीस
तत्काल चले जाएँगे, जब पाएँगे फोस ।

दवा विदेशी का समझ, इनको लो एजेंट
देते रहते अधिकांश, औषधियाँ पेटेंट ।

स्टेथेंटिस्कोप से भला, कर नाटक श्रीमान
रोगी को ही पूछ कर, प्राय: करें निदान ।

रोगों को अन्तर्निहित, कर देते हैं आप:
रोग मूल जाए नहीं, वही बने अभिशाप ।

नगर - डगर क्या गांव में, व्यापक इनकी धूम
चमकता व्यवसाय है, चलता चक्काघूम ।

पकड़ थाम छू रोग की, करते हैं प्रतिरोध
राष्ट्र रक्षण मिला इन्हें, होती रहती शोध ।

जन साधारण में उठा,, देशी - औषध - द्रोह
सात समंदर पार? की, औषधियों का मोह ।

इंजेक्शन, औषध बिके, खुली दुकान अपार
डॉक्टरों का दौर तो, इक चकमक व्यापार ।

नियोजन परिवार निमित, सक्रिय सतत सचेष्ट
यक्ष्मा, ज्वर, महामारी, नष्ट आज यथेष्ट ।

राष्ट्र स्वास्थ्य रक्षा करें, आधुनिक परिपूर्ण
देहातों में मांग हैं, नगर खचाखच पूर्ण ।

( ५७) व्याख्याता वक्ता 'बडे

ख्याख्याता वक्ता बड़े, देते नित व्याख्यान
रोचकता 'लाने निमित्त, जोड़ें नब आख्यान ।

थोड़े परिश्रम से भला, रच लेते जो नोट
इस; से युगों तक, करते रहते चोट ।

अध्ययनशील, परिश्रमी, वक्ता प्रतिभापूर्ण
अनुशासन, आत्मीयता, रंग, घुलमिल संपूर्ण ।

सब प्रकार सुविधा मिले, तदपि करें कम काम
विरलों में मौलिक सृजन,, शेष करें आराम ।

संस्कार - 'परिष्कार कर, कर सकते स्वाध्याय
यदि चाहें नव खोल दें, अध्ययन अध्याय ।

(५८) अभियंता तो आज के

अभियंता तो आज के, करते युग - निर्माण
उत्पीड़ित मानवता का, करते हैं परित्राण ।

यंत्र - युग - स्रष्टा प्रबल, करते नव अभिव्यक्ति
बहु अभाव अभियोग पर, लगा सकल अनुरक्ति ।

भले नव आविष्कार के, खुले हुए है पंथ
अति उपयोगी काम ना, केवल पढ़ते ग्रंथ ।

अधिकांश अभियंतागण, करते कागज काम
यांत्रिक संचालन विरत, रहते दूर तमाम ।

इसीलिए नहीं हो रही, प्रगति आज अनुकूल
परंपरा बदले बिना, बने बात प्रतिकूल ।

(५९) नेता विशद विकास

इस युग के दो ही सखा, परम प्रतापी जान

नेता - अभिनेता युगल, लोकप्रिय बहुमान ।

यहां निठल्ले नरों को, प्राप्त अमित अवकाश
समस्त वातावरण में, नेता विशद विकास ।

ना जाने कितने सहे, कठोर कायाकष्ट
समझ जेल को खेल ये, समय गवाँ उत्कृष्ट ।

जनता तो है बूझती, आप बटोरें कीर्ति
आन्दोलन आगे रहें, विप्लव छिपी स्फूर्ति ।

प्रांत - प्रांत दौरा करें, कहें प्रसिद्धि कार्य
संभाषण भाषण परम, उद्‌धाटन अनिवार्य ।

तर्क - मर्म - भाव - प्रवण, प्रतिक्रिया से पूर्ण
महिलामंडल, कलाकुंज, आप बिना अपूर्ण ।

रिश्वत भ्रष्टाचार त्यों, है काला - बाजार
जनता दोषी जानिए, स्वार्थ सिद्ध अधिकार ।

पारदर्शक प्रकट है, एक विरोधाभास
साम्यवादी, सेठ - सखा, सत्ताविमुख, तत्दास ।

अब तो इतने हो गए, आप आत्मविभोर
प्रभुत्व घटा के सामने, नाचें ज्यों धन मोर ।

अभिलाषा अब तो यही, मिले तपो - वरदान
अवसर की अनुकूलता, परम आत्मकल्याण ।

(६०) अभिनेता युग - प्राण हैं.

अभिनेता युग - प्राण हैं, सरस सिनेमा शान
भाग्यवश सब कुछ मिले, पैसा - पद. सम्मान ।

अभिनेता पद - प्राप्ति में, झेलें अगणित कष्ट
उम्मेदवारी कर प्रचुर, करते जीवन नष्ट ।

भाग्यवान तो अल्प है, जिनका होता मोल
अंटाचित हो अन्यथा, करते बिस्तर गोल ।

होलीवुड के बाद ही, भारत का है मान
पनपे अगणित चित्रपट, कुछ की शान महान ।

राष्ट्र की अनमोल निधि, विविध रूप साकार
अभिनेता को यश मिले, सक्षम धन व्यापार ।

( ६१) कामचोर मतिमान

धुआँ उड़ाएं श्रमिक जन, पीते बाबू चाय
काम - विराम के अनंत, अटल, अचूक उपाय ।

कर्म भावना यों मिटी, ज्यों खर के सिर सींग
सत्ता - प्रभुता रट लगी, ठलुआ क्लब ज्यों डींग ।

अधिक समय में काम कम, कामचोर मतिमान
रुपया लेते हैं सही, थोड़ा सा प्रतिदान ।

ऐसा कोई थल नहीं जहाँ न मिलते आप
कोई निश्चित रूप ना,. देते नित संताप ।

. भारी भरकम भीम से, दृढ़ जैसे चट्टान
हिले - डुले ना जगह से, महिमामय मतिमान ।

कलियुग के वर वीर हैं, कामचोर श्रीमान
पंच नहीं अनंत वर्ष, योजना के प्रान ।

सदा प्रसन्न, मुखर, मृदु, अधर सुरंजित पान
चपल चिकुर, बहु मुख मुकर, प्रतिबिंबित मुसकान ।

विमल, धवल, बहु अलंकृत, बूट - सूट सम्मान
अलस-विलस प्रत्यंग में, चकित, चपल, मुखगान ।

इनकी सच्ची साधना, इनका दृढ़ व्रत काम
जोबन जो बन आय लें, रस - विराम - विश्राम ।

श्रमहर, रुचिकर, परम प्रिय, सुखमय सुन्दर गात
मुद-मंगल-प्रिय, मदिर, मधु, अरुण स्नात जलजात ।

( ६२) अभिनेत्री अभिनय कुशल

मुग्धकारिणी अप्सरा, सुन्दर प्रणय - सुजान
अभिनेत्री अभिनय कुशल, नाट्य, नृत्य, कलगान ।

घट-घट-वासिनी, सुमुखी, कौतूहल की पूर्ति
रजत-पट की शोभा श्री, करती अभिनव पूर्ति।

सर्वत्र ही साम्राज्य है, अब तो रुचिकर राज
मंडित थैले, काच में, कक्ष, समक्ष, जहाज ।

आकाशवाणी, भोंपू, गुंजित करते गान
गुनगुनाते अगणित जन, किशोर भी अनजान ।

गाड़ीवान, कोचवान, बुद्धिमान, धनवान
पहलवान, पठान सभी, गाते तेरे गान ।

किशलय कोमल गात मृदु, कुंतल केश कलाप

भौंहे, चितवन चकित, चित, मादक मृदुलालाप ।

कल कपोल हैं सुरंजित, उल्का-सम दृष्टिपात
विश्वामित्र से योगभ्रष्ट, ओस-बिंदु जलजात ।

निकले कोकिल कंठ से, लारे लप्पा गीत
उडनखटोले में उड़े, प्रीत रीत के मीत ।

तेरा संबल प्राप्त कर, अगणित धनाढ्य लोग
लाखों रुपये व्यय करें, मणि-कांचन संयोग ।

उपयोगी फिल्मों में तो, अभिनेत्री ही प्राण
अनुरंजन के साथ ही, सफल सुचित्र निर्माण ।

(६३) धर्म धुरंधर लोग

परंपरा शेषांश है, धर्म घुरंधर लोग
बलिष्ठ अंग, शक्ति अपार, परिपक्व मनोयोग ।

मृतप्राय पद्धति चले, ये चिपटाए अंग
ध्रुव निश्चय प्राणांत तक, गलित, दलित प्रत्यंग ।

कपड़ छान पानी पिएँ, लहू पिए अनछान '
लाभ लोभ बहु स्वार्थ में, ये लें भगवान ।

कुकर्म की पुनरावृत्ति, करते रहते आप
मात्र गंगा-स्नान से, बनें आप निष्पाप ।

गोमाता पर थूकते, उन पर करते कोप
सजग नहीं गोवध निमित, केवल कर आरोप ।

बालक गण ये डाँटते, लडें घरोंदे' काज
मंदिर, मूर्ति, मकान हित, मर मिटे महाराज ।

पीपल सीखें, स्नान शिव, जपें गोमुखी माल
थके-हारे राही को, जल पाना जंजाल ।

पाई पाने के लिए, लड़े, मरें श्रीमान
पर श्रीफल चवन्नी सहित, फेंके नदी सुजान ।

बैल हाँफते देख कर, उतरें, पैदल धायँ
प्रजनन पीड़ा पत्नी की, तरस नहीं वे खायँ ।

संध्या बंध्या तुल्य है, गीता मात्र रटत
कथनी - करनी सम नहीं, अद्‌भुत हैं ये संत।

(६४) अध्यापक आधार

शिक्षा द्वारा ही संभव, विचार, निर्णय शक्ति
ज्ञान-विज्ञान, सदाचार, व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति ।

अध्ययन- अध्यापन युगल, अध्यापक आधार
विश्लेषण सुविधाजनक, साधन विविध प्रकार ।

निरस्त्रीकरण हो गया, छिने गए हथियार
बेंत, धौलधप्पा, मुर्गा, कर न सकें, प्रहार ।

इस युग का संबल प्रबल, पैसा मूलाधार
टयूशन, पाठ्य पुस्तकें, करती बेड़ा पार ।

व्यस्त कार्यक्रम आपका, अरुणोदय सूर्यास्त
अध्यापन, वाचन, लेखन, होते खेल परास्त ।

(६५) नाई केश-कला-कुशल

नाई केश - कला - कुशल, कलाकार कमनीय
बुद्धि उस्तरे सी प्रखर, चकमक सी रमनीय ।

धोबी, दर्जी निर्जीव से, नाई काम सजीव
रम्य कपोल, चारु चिबुक, तुल्य सुराही ग्रीव ।

सहला बहला कर करें, पीपल पत्ते गाल
बीहड़ बन को काट कर, मुखरित गाल रसाल ।

सेपटी रेजर सफाचट, किया कुठाराघात
इससे करते नित नियम, भक्त सदा उठ प्रात ।

गद्देदार धर कुर्सियाँ, अलंकृत दूकान
पंखा, रेडियो, पत्र से, बात सहित मुसकान ।

(६६) भूले आत्मविभोर

कटु वचन, मीठा भोजन, दुर्दिन, सत्सहवास
रोग, ऋण, अपव्यय, व्यसन, भूलें ना परिहास ।

कामी, लज्जा, स्वार्थी, कृतघ्न कृपा की कोर
योगी समाधि, गृहस्थ धर, भूलें आत्मविभोर ।

ऐनक खो चश्माधारी, जाएँ बन सनेत्रांध
हो रट्‌टू घोंघाबसंत, पदाधिकार मदांध ।
लंबी यात्रा में कठिन, नहीं स्थिति अनुकूल
छाता छोटी चीज है, बड़ी-छड़ी की भूल ।

अपरिमित सान्त्वनामयी, है यह प्यारी भूल
व्यर्थ बोझ मस्तक हटे, हिय हल्का हो फूल ।

(६७) ढुल पड बईमान

देख पराई चूपड़ी, ढुल पड़ बेईमान
दो पहर की कहासुनी, जीवन भर कल्यान?

विशुद्ध वस्तु मिले कहाँ, आज असंभव बात
मिश्रण प्रवीण लोग अब, करते बहुविध घात ।

दूध-शाक में मिला जल, मिला ऊन में सूत?
चोट-खोट सोना-रजत, कतरन मिश्रित जूत ।

बेईमानी के बहुत, अलग आज हथियार
राज कमीशन, श्रम अधिक, ले व्यापारी मार ।

बेईमान सस्ती है, महँगी चीजें और
शाक तुल्य सस्ती सुलभ, मिले आज सब ठौर, ।

( ६८) निखरे नारी रूप

आदि शक्ति से अनाशक्ति, कर ना सकता व्यक्ति
नियामिका यह दृष्टि की, मृदु-प्रांजल अभिव्यक्ति ।

भवन मंत्रणा मित्र सम, दासी थल-विश्राम
उर्वसी सी आह्लादिका, भोजन मा अभिराम ।

सहनशील है धरा सी, धृति-मति-क्षमा सुजान
श्रमहर, रुचिकर, प्रिय सुखद, महामहिम मतिमान ।

त्री, पत्नी, मा, बहिन, धारे चारों रूप
कर्तव्य-रत सब रूप में, तदाचरण तड़प ।

पूरक हो तुम पुरुष की, प्राण-प्रेरणा शक्ति

अनुशासन, आनंदमय, लालन-पालन, भक्ति ।

सता, शक्ति, ऐश्वर्य में, पुरुष प्रकट ज्यों भूप
दुख दरिद, अभाव में, निखरे नारी रूप ।

नारी ही को गिरा कर, पुरुष भरे बढ़ दंभ
करती सु-नारी सुरक्षा, दृढ़ व्रत जैसे खम' ।

सीता राधे नाम है, राम-श्याम से पूर्व
देवी सम नारो प्रथम, अमिनव सदा अपूर्व ।

( ६९) लोक प्रिया का नेह

बांकी चितवन भंगिमा, मोहक, मादक देह
नदल सिंगार, बर वसन, लोक प्रिया का नेह ।

दादागुरु तहजीब की, प्रणय - प्राण .निष्णात
नाच गान महिमा मान, दृष्टिपात उद्भ्रांत ।

परम चतुर लीलामयी, मोहक, मादक खेल
प्रीत - रीत - संगीत तव, मीत - जीत रँगरेल ।

केवल धन से प्रेम है, किंतु न व्यक्ति विशेष
मक्खी स फेंके तुरत, संपत्ति जब निश्शेष ।

खर्चीखूट, विनष्ट - प्रभ, संक्रामक, आक्रांत
प्रेमी खाली हाथ तो, लौटाती भयभ्रांत ।

(७०) कलह कुपित मति कर्कशा

उल्कामुख, अनल ज्वाल लावा - लपटें खूब
कर्कशा ज्वालामुखी, नहीं मखमली दूब ।

विटप तने मोटी बनी लंबी मसनद ठोस
झीने-झिलमिल, वर वसन, इठलाती मदहोश ।

वाक् - युद्ध सन्नद्ध तुम, पूर्ण प्रवाह प्रचंड
गर्जन - तर्जन - विसर्जन, जोशीली, चामुंड ।

नागिन सी फुफकार कर, सांड तुल्य हुंकार
भोली भूरी भैंस सी, धनुष घोष टंकार ।

बकरी सी चरती बिचर, बहु खाती भयभ्रांत
धक्का दे संतान को, निर्मम, निपट, नितांत ।

अपनी राग अलापती, डफली अपना राग.
अतिरंजन करती महा, श्रोता जाता भाग ।

चामुंडा सी चमत्कृत, रणचंडी विकराल
कलह - कुपित मति कर्कशा, ज्यों बंदूक दुनाल ।

(७१) ठाठदार ठग आधुनिक

ठाटदार ठग आधुनिक, अधर सुरंजित पान
कड़कदार परिधान में, मुख मंडित मुसकान ।

शाह खर्च बहु नरम दिल, उच्चाशय, अनुदार
लेते हैं सब वस्तुएं, रोकड़ नहीं, उधार ।

द्रुतगति से पलटें भवन, नित नौकरी नवीन
घनिष्ठता होने लगे, तुरत एक, दो, तीन ।

हवा खिलाएँ, दें पटक, छूमंतर हो जायँ
छाया से पीछे लगें, तब भी धोखा खायँ ।

चिर प्रसन्न, मुखर, मधुर, रहन - सहन शालीन
प्रकट चंद्रिका से धवल, भीतर से कालीन ।

(७२) लाला की दुकान

यों खोंचा चलता फिरे, लाला की दूकान
ललचाए लोचन लखें, चड़क - भड़क, मृदु तान ।

चख कर ले लो छाँट कर, मीठा या नमकीन
परम, गरम, चीजें नरम, सज्जित नित्य नवीन ।

अपने ही हाथों लिखो, खाता तैयार
काहे का संकोच है, खानपान में यार ।

केवल खाओ ही नहीं, मित्र खिलाओ चार
तत्पर लालाजी सदा, चीजें अमित अपार ।

लाल - लली - नारी सभी, जाति न वर्ण विचार
खाना खाते एक सँग, साम्यवाद संचार ।

वस्तु प्रधान

(७३) तरल तरंगित चाय

नींद, भूख, आलस्य हर, बहुमूत्रक, सुखदाय
सतरंगी, स्वागत - सुलभ, तरल - तरंगित चाय ।

सूर्य करण सी सुखद प्रिय, उठते ही मिल जाय
अलसाई आँखें खुले, हृदय कमल खिल जाय ।

चपल चकित-चित जन - नयन, धरत न पाएँ धीर
शीतल करता कौन है, पान करें ज्यों नीर ।

मेरी भव बाधा हरों, हे अनुराधा चाय
सुखकर, रुचिकर, परम प्रिय, सद्‌गति, प्रगति, प्रदाय ।

प्रिये मन - मंदिर उतर, धमनी धूम मचाय
अपनी सत्ता समेट कर, स्फूर्तिमय बन जाय ।

होटल की शोभा सुखद, मुखरित जेन्टलमेन
श्रमजीवी विल. युगल, डेढ़ अरब की देन ।

दूधमयी गंगा गई, पानी मिले न शुद्ध
भारत के जन - जन करें, निर्धनता से युद्ध ।

ऐसे संकट काल में, चाय चपल अभिराम,
मुद्र-मंगल-प्रिय, सुलभ सब, अधिक काम, कम दाम ।

मधुर अधर लियटन लली, नाक धुआँ लहराय
दूध - धार हिय में लिए, गले चले ही जाय ।

राष्ट्रप्रेय हैं चाय तू, आंग्ल राज्य की याद
धनियों का भोजन पचा, निर्धन भूख प्रवाद

(७४) बसे पान में प्रान

ताबूलं मुख भूषण, दूषण दुखकर आज
बकरी से चरे विचरें, उभरे. गाल समाज ।

दाँत रंगे, कपड़े रँगे, सड़क रँगे रँगसाज ।
रँग वातायन की छड़ें, रंगीनी सरताज ।

चाहे जितने काम हों, धरे ताक में आप
किंतु पान तो खाएँगे, अष्टयाम यह जाप ।

तन पर लत्ता हो नहीं, अलबत खाएं पान
धान भले ही ना मिले, बसें 'गन में प्रान ।

तम्बाकू - कोकीन सँग, प्रचुर मसाले डाल
स्वाद पूर्ण, मंजुल, मृदुल, खाते पान रसाल ।

खस की डिब्बी डालकर, सुरंग सुवासित पान '
कोमल कर के परस से, करते सौख्य प्रदान ।

पाचक, रुचिकर, मुखप्रभा, सीमित सफल प्रयोग
बहु भक्षण घातक बने, उत्पादक बहु रोग ।

बढ़ा पान परचून से, विपुल दुकानें आज
धंधा धन - साक्षेप है, दुगुन मूल से ब्याज ।

अलंकृत कर रेडियो, झंकृत सजा दूकान
शीतल पान सुरुचि युक्त, बिकें सहित मुसकान ।

व्यसन बना है पान अब, सीमातीत प्रचार
नगर - ग्राम, गली - गली, अंधाधुंध मनुहार ।

(७५) धक् धूमिल सिगरेट

अरुण अधर पटरी चढ़ी, नाक धुआँ लहराय
छक छक छाती में उठा, इंजन सी उड जाय ।

अगरबत्ती तू आधुनिक, फेशनमय अधलेट
कस खींचे छल्ले बनें, धक् धूमिल सिगरेट ।

तंबाखू हिय में छिपा, ऊपर कागज अंग
अपना मुख ज्वलित करे, जले भक्त मुख तंग. ।

अलसाए क्षण में बने, तू रुचिकर मृदुपान
स्फूर्ति जगे, तन-मन लगे, करती तू श्रमदान ।

सु - करदात्री, शिल्पमुखी, स्वागत - सूचक, शान,
श्रम - संपति, सम्मान दे, अनुरंजक अनुपान ।

मीठा विष मृगान कर, निरत निरंतर लोग
धूम्रपान धक्का लगे, केंसर प्रचुर प्रयोग ।

अपव्यय पूरित अंग तू, यांत्रिक युग की शान
क्षणिक सुख - संबल प्रथम, पाँव तोड़ फिर बान ।

लत होकर इल्लत बने, जिल्लत बन कल्पाय
मुँह लग कर छूटे नहीं, प्राण संग ही जाय ।

पर दृढ़ व्रत है लोग जो, छोड़ें तृणवत् पान
अधरामृत को मृत करें, सचमुच वही महान ।

छत्तीस वत् पत्नी बने, कर दे बहिष्कार
हठधर्मी कहने लगें, धूम्रपान धिक्कार ।

(७६) यह एडी पर डालडा

परम शत्रु है शुद्ध घी, उलटा सीधा एक
यह एडी पर डालडा, लिए खजूर की टेक ।

दम भरता धी का सदा, मिला बनस्पति तेल
डिब्बों में भर कर करे, ताजेपन का खेल ।

सड़क, सिनेमा, पत्र में, विज्ञापन साम्राज्य
नगर, डगर, गाँव, घर - घर, फैला तेरा राज्य ।

छत्तीसों हैं तेल यों, प्रचलित भारत बीच
तू तो सबसे अधिक प्रिय, विज्ञापन वेलि सींच ।

उत्पादन होता अधिक, मिलता घी रँग - रूप
शक्ति, सुगंध, स्वस्थ नहीं, यों बिलकुल अनुरूप ।

भारत धनाड्‌य देश है, निर्धन प्रकृति लोग
भोजन भट हैं, स्वाद प्रिय, पाक - प्रवीण - प्रयोग ।

चाहे लोग मरे - जिएं, रुचिकर भोजन भोग
बार से त्योहार अधिक, खान - पान उद्योग ।

विशुद्ध घी दुर्लभ हुआ, मिला बनस्पति संग
दूध रमे, दधि में जमे, जन, जन - नायक दंग ।

विकट परिस्थिति में भला, तव अटल साम्राज्य

तूं तो जने वल्लभ हुआ, बना शुद्ध घी त्याज्य ।

रंगीन बनाने तुझे, हुए संगीन उद्योग
तू स्वरंगा ही रहा, घुलमिल घी संयोग ।

(७७) सुभग साइकल यान

सरपट सड़क सटी चले, भले भरी हो भीड़
कम कीमत, सब जन सुलभ, यथा पक्षी को नीड़ ।

सहवासिनी सुबल चले, प्राणप्रिया सी संग
सभी ठौर गतिशील यह, ज्यों जल बीच तरंग ।

ऊंट मरुस्थल बीच ज्यों, उदधि बीच जलयान

पेट भूख, गल गान ज्यों, सुभग साइकल यान ।

भारवाहक श्रीमती, हत्थों पर सामान
डंडे पर बच्चे बिठा, गृहपति खींचातान ।

चलता - फिरता संस्करण, परिवार का पूर्ण
दुर्घटना यदि हो कहीं, संघटित संपूर्ण ।

ग्वाले लाते दूध नित, घसियारे नित घास ।
माली लाते फूल - फल, विद्यार्थी अभ्यास ।

सुखद सदा सस्ती भली, गाँव'- नगर की जोड़
कच्चे-पक्के एक सी, यही लगाती दौड़ ।

गृहिणी सी सुंदर सुखद, निपट निरंतर साथ
भाराक्रांत भूरि तदपि, झुकी चले नत्माथ ।

विविध योग, उपयोग नित, बहुधंधी यह यान
उड़ती तितली सो फिरे, नारी चढ़ी विमान ।

आरोही ऊंचा रहे, खुद धरती पर धाय ।
पदाघात-पेट्रोल से, सदा चले ही जाय ।

(७८) होटल आत्मविभोर

संगमरमर सुभग पट, पंखों का बहु शोर'
मधुर चम्मच, प्लेट रव, होटल आत्म - विभोर ।

प्रचुर पकवानों सहित, जहाँ पडे नमकीन
ऐसे होटल में गए, निर्धन भी शालीन ।

जहाँ भूख भगती नहीं, जगती है अनुकूल
रोकथाम जिह्वा लगे, साधन पा प्रतिकूल ।

चतुर चटोरे चट करें, विविध भोग के ठाट
होटल मुखी दृष्टि बने, घर से होय उचाट ।

अपव्यय के आदी बनें, तितर - बितर घर - बार
नियंत्रण नहीं कर सकें, जीवन बनता भार ।

(७९) चित्रपट व्यापार

सरस, सजीव, सुरंग प्रिय, चित्रपट व्यापार
नाच - गान, संवाद संग, प्रतिबिंबित संसार ।

खाएं धक्के, धुकधुकी, पंक्ति में पिस जाय
हाथ-पैर चोटें लगें, जेब साफ हो जाय ।

घिसे-पिटे संवाद ले, पीड़ा, प्रेम-प्रयोग
नृत्य-गान के ' मेल से, बहुरंगा संयोग ।

तार्किक, मार्मिक अल्प हैं, मननशील कम जान
प्रणय जुगाली हैं प्रचुर, नीरस खींचातान ।

करदाता सरकार के, हाथ करें मजबूत
लाखों को उद्योग दे, यह भारत का पूत ।

(८०) यह उपनेत्र महान

घाटी को समतल बना, पकड़े दोनों कान
नाक बीच आसीन हो। यह उपनेत्र महान ।

लगाते अपने भक्त पर, ये विकट प्रतिबंध
एनक यदि खो जाय तो, वे बन जाते अंध ।

नयन ज्योति, आनन प्रभा, व्यक्ति का मृदु रूप
नारी की शोभा रुचिर, रंग-विरंग अनूप ।

धूप-प्रभंजन-ताप से, निवृत्ति पाने तात
लोचन लुकछिप लक्ष्य को, भेद करें आघात ।

हल्के गहरे रंग के, धारण कर उपनेत्र
एक बाजार बंद भी, व्यापक करते क्षेत्र ।

(८१) सरस रेडियो मीत

समाचार, साहित्य त्यों, सवाक् - पट संगीत
व्यापार, विचार, ज्ञापन, पत्र रेडियो मीत ।

जगती के सब थल सुलभ, बिना तार संबंध
सभी देश इसमें मिलें, तोड़ विकट प्रतिबंध ।

तोता-मैना आधुनिक घर की बस्तीपूर्ण
बालकेलि सा मधुर मृदु, फैशनमय संपूर्ण ।

चालित बिजली, बेटरी, गाँव - नगर की शान
विविध कार्यक्रम पूर्ण तू, मोहक, घर का प्रान ।

-कवि - सम्मेलन, मुशायरा, नेताजी के बोल
मंदिर के घंटे सुनो, पिटे ताजिए ढोल ।

(८२) धर सिलाई मशीन

अलंकरण अनुदिन बढा, मिटी भावना हीन
फेशनमय कपड़े सिले, निकर बनी कोपीन ।

खिड़की पर पर्दे लगे, अलमारी पर ओट
छोटे बच्चों के सिले, फ्राक पजामे, कोट ।

थोड़े कपड़ों में प्रथम, दृश्यमान जो दीन
अब तो ढेरों हो गए, घर सिलाई - मशीन ।

व्यय सचमुच ही बढ़ गया, घटा न किसी प्रकार
फेशन रानी ने भला, दिए जो पंख पसार ।

झालर, कॉलर, सल पड़े, आड़े - तिरछे रूप
विविध वस्त्र भूषित हुए, राज्यारोही भूप ।

(८३) विकृत रानी रूप

गगन सुहानी अप्सरा, विद्युत् रानी रूप
मावस करती पूर्णिमा, सुखद शरद ज्यों धूप ।

ऋतु बिषमता हरन मैं, अद्‌भुत प्रचुर प्रयोग
ताप शात, पंखा चले, हीटर शीत सुयोग ।

मुखर रेडियो की ध्वनि, सवाक् पट की तान
संचालित बहु यंत्र कर, प्रगतिशील गतिमान ।

गाँव - नगर की श्री बनी, आलोकित मग - धाम
सुखमय, प्रांजल, प्रगतिप्रिय, प्रचुरकाम, कम दाम ।

वैभव सूचक राष्ट्र की, बन गई मेरुदंड
जीवन यों करती मधुर, हरती प्राण प्रचंड ।

(८४) बीमा व्यापक आज

जीवन की सीमा समझ, बीमा व्यापक आज
व्यक्ति परिधि में रहा, अब है केन्द्रित राज ।

शिक्षा तितली पंख संग, बीमा भी उड़ जाय
उड़ कर के ऐसा लगे, सिर पर ही चढ़ जाय ।

केवल कह कर देखिए, आएँगे एजेन्ट
छोड़ेंगे तब तक नहीं, करें नहीं पेमेन्ट ।

जीवन आपद झेल कर, सुखमय सपने खींच
ढालें ऐसे आपको, प्राण - वेलि को सींच ।

कोटि - कोटि संपति मिले, राष्ट्र आय बढ़ जाय
सरकारौ संबल प्रबल, सदा फूलता जाय ।

मितव्ययिता की सीख दे, कर अपव्यय का अंत
पतझड़ जीवन में भला, करने चला बसंत ।

प्रिय परिजन आधार बन, बीमा का व्यापार
जीवन की शोभा सुखद, हर जीवन दुख - भार ।

शिक्षा, सदन, विवाह में, शुभ कामों में योग
अल्प बचत का पाठ दे, मधुर मृत्यु - संयोग ।

युग, जनता, सरकार के, बीच मधुर व्यापार
कण-कण जोड़े मन बने, यह बीमा व्यापार ।

उपयोगी जन-धन सकल, आग-प्रभंजन-शूल
संकट-झंझट झेलता प्राण-फूल का मूल ।

(८५) यह है निर्झर लेखनी

यह है निर्झर लेखनी, गोपनीय गुरु गात
नोक नुकीली ले उठा, मानो सहज दवात ।

सटक मृदु स्याही भरी, सुरंग, सुरंजित मीत
सरपट काराज पर चले, बिना हुए भयभीत ।

सस्ती, सुंदर, सुलभ सब, सदा अलंकृत अंग
टँगे कोट मईं चपल गति, खुल - खिल तरल - तरंग ।

महँगे आते पार कर, चलें भद्र - जन बीच,
जो ना पाएँ पार कर, लें आजीवन खींच ।

युग - प्रवीण, साक्षर सखी, शोभा, सुरुचि समान
फेशनमय है अंग तू, रखें सदा मतिमान ।

' ( ८६) ये खादी भंडार

खादी दादी तुल्य है, परंपरा अनुकूल,
तन - मन की शोभा रुचिर, राष्ट्र भक्ति का मूल ।

शासन का संबल मिला, तदपि न हुआ प्रचार,
प्रलोभन के बल चले, घुंआधार संचार ।

राष्ट्रपिता ने थे किए, हर संभव उपचार ,
जन जन में व्यापी नहीं, हो न सकी स्वीकार ।

वशीभूत हैं स्वार्थ के, नहीं स्वदेश का प्रेम
इसीलिए खादी बनी, फेशनमय प्रिय मेम ।

मणि - कांचन संगम हुआ, फेशनमय परिधान
विक्रेता महिला बनी, लालच तना वितान ।

विपुल डिजाइन में खिला, खादी का रँगरूप
जगमग जोत बड़ी जगी, अभिनव वेश अनूप ।

विविध कुटीर - उद्योग भी, चल रहे बेपार
कितनों को इससे मिला, धंधा - श्रम - आधार ।

कृषि प्रधान यह देश है, यहाँ विपुल अवकाश
मधुमय यह प्रकाश है, अर्जन प्रिय अभ्यास ।

आजादी अभिनव कृति, अनुपम आश्रय देत
बहुजन की यह जीविका, देश - प्रेम अभिप्रेत ।

एकीकरण यदि कर सके, राष्ट्र - प्रेम संचार
तो सचमुच ही धन्य हैं, ये खादी भंडार ।

विविध व्यंजना

विविध

हाँकी स्टिक सी बंक भ्रू चितवन रसिक रसाल
अरुण टमाटर निखर मृदु, चाल प्रकट भूचाल ।

चल पतंग बिन पूँछ ही, भद्र पुरुष बिन मूँछ
नारी की दो चोटियाँ, चड्‌क, भड़क की छूँछ ।

जवाहर जाँकेट चली, कट दिलीप हैं बाल
मूँछें तो तलवार कट, रखते नटवर लाल।

कर्जन कट मूँछें प्रथम, वही हुई अब लोप,
सफाचट फेशन सरपट, मुखमंडल आरोप ।

ट्राम चलें, रेल चलें, चलें यंत्र बेपार
छोटे धंधे यों चलें, ज्यों मेले में कार ।

प्रथम फारसी, फिर उर्दू तब अँगरेजी भार
अँगरेजी बोली भुला, लो अंगरेजी धार ।

लोगों को होती जरा, स्वाभाविक ही ऊब
लगें भली चीजें बुरी, जब मिल जाती खब ।

सट्टा - लॉटरी - फाटका, लकी नंबर तद्रूप
निखरे जुए हैं सकल, बौंड इनामी भूप ।

सैनिक की शोभा परम, ज्यों आधुनिक अस्त्र
फैशन - प्रिय, जन - गौरव, घुल कर निखरे वस्त्र ।

झाड़ू मारी बहू ने, नाक काट दी सास
भड़क उठी अग्नि प्रबल, संवादों का त्रास ।

नाई केश - कला कुशल, किटकिट बजे मृदंग
सिर में उँगली यों बजे, फागुन में डफ, चंग ।

फोटो याद की सुरक्षा, जागत जीवित देन
सदा संग, सज्जित सदन, अनुरंजक दिन रैन ।

दीप्ति परम' दीवार की, कभी टेबल का रूप
घंटाघर में यह लगे, कभी घड़ी बन धूप ।

ऋतु - विषमता - हरण में, थर्मस है अनुकूल
वस्तु ज्यों की त्यों रखे, परिस्थिति प्रतिकूल ।

नाड़ी थामे ताप का, करते थे अनुमान
आज अनाड़ी का बना, ताप - मापक प्रान ।

मूड अथवा मनोदशा, विकट व्यापक रोग
इसी ओट में चोट कर, पाँव तोड़ते लोग ।

ऊब जायँ या बोर हों, दोनों हैं इक रूप ।

यह तो मन की खीझ ए, निपट अरुचि के रूप ।

मक्खन सा कोमल घना, मधुर - मुखर फानूस
पत्थर मोम बना सके, विकट भट चापलूस ।

इक इशारे से थमे, दिन हो अथवा रैन
ताँगा - साइकल - मोटरें, पुलिसमेन के सैन ।

कर में कोमल मखमली, पॉकिट में लो डाल
अँग अँग की स्वच्छता, रखता है रूमाल ।

सहानुभूति शक्ति है, अनुशासन अधिकार
अर्थ से वाणी प्रबल, करती बल - संचार ।

अलंकारी सोने से, सोने का सम्मान
कड़ाचूर जब काम से, चकनाचूर थकान ।

होटल - बोटल में मिलें, साथ देख लें चित्र
अवसर पर सुख मोड़ लें, तथाकथित ये मित्र ।

मारे गरमी के बने, हम' तो मोतीचूर
सड़क - टाट - कपड़े तपे पैदल पथ घर दूर ।

ऊँचे लोगों में मिले, आज असाध्य व्याधि
इष्ट औ२ अभीष्ट है, सर्वस्व गवाँ उपाधि ।

महाराज कर कमंडल, थैली बाबू हाथ
मेडम कर में बेग ले चले कबूतर साथ ।

नल - बल - जल ऊँचा चढ़े, छल - बल बढ़ता दाम
कल - बल बढ़ता राष्ट्र है,. दल - बल मिलता नाम ।

सब्जी से भी सस्ती है, बेईमानी आज
नैतिकता का मूल्य नहीं, वांछित केवल काज ।

आज लोग है कष्टमर' दें मनमाने दाम
मानो भाव अभाव है, चढ़े मूल्य अविराम ।

टन - टन - टन घंटी बजी, अरे आ गया कौन
अंतरतम झंकृत उठा, आया टेलीफोन ।

तूंबी में तूफान उठा, बिना बात का शोर
आवारा की करतूत है, चलें चपल ज्यों दौर ।

हित हानि, वित हानि हो, मानहानि, प्रवाद
सबका पटाक्षेप है, सौरी- का ' संवाद ।

अर्थ व्यय अभीष्ट नहीं, शक्ति नहीं बरबाद
कृतज्ञ हो कह दीजिए, महाशय धन्यवाद ।

टायँ - टायँ फिस बात तो, हुई नहीं पड़ताल
शासन के आसन हिले, हंगामा हड़ताल ।

चीन तनिक नाचीज हो, करें लोग स्वीकार
कुछ देकर तो देखिए, पुरस्कार का प्यार ।

चूहे तो बिल में घुसे, समझ कर परित्राण
भाई! सूखे आपके, बिल- देखते प्राण ।

नकटे, निर्लज्ज, निपट ये, गालों के गुरू बाल
ज्यों काटे त्यों - त्यों बढ़ें, जटिल, कुटिल जंजाल ।

मुद्रण में है सरस्वती, रमा मुद्रामय रूप
अग्नि आज माचिस बसी, मानव - मुखी स्वरूप ।

रेगिस्तान के ऊँट से, प्रगतिशील है जीप
शांति - युद्ध में काम की, अंधकार - प्रदीप ।

सर्टिफिकट को समझ लो, एक प्रमाण पत्र
मूक रहे, मुखरित बने, यत्र - तत्र - सर्वत्र ।

गुट - बंदी, गढ़ मजहबी, हरदम खींचातान
ऐसा कौनसा देश है, सिवाय पाकिस्तान ।

अधिक छात्र स्कूल हैं, बहु यात्री है रेल
शिल्पालय में श्रमिक हैं, जीवन धक्कापेल ।

पहले का हलुआ सहल, महँगी अब तो चाय
महंगाई मारे खर, लोग बने निरुपाय ।

दिन में डाकू लूटते, रात चोर पटु पाप
जेब, उचक्के, गिरहकट, पंचमुखी अभिशाप ।

कठिन काम है उपार्जन, उचकाना आसान
लाभ लोभ से ललक कर, चोरी का अभियान ।

स्थिति - स्थापक बंद में, पट्टा पा अनुकूल
खिले सुवर्णमयी बड़ी, थामे कलई कुल ।

बाह्य वातावरण का, पड़ता नहीं प्रभाव
शर्मवीर यह सूरमा, थर्मस है समभाव ।

चाचा नेहरू वाक्य था, आराम है हराम
हर आम आराम करे, प्रतिकूल परिणाम ।

प्रयत्न लाघव से हुई, कितनी भाषा भ्रष्ट
आम्दी, काचू, बतासा, अब बोलें जन स्पष्ट ।

सभी जगह तो मच गया, भरती का बहु शोर
शाला, शिल्प, कार्यालय, सेना आत्मविभोर ।

दूर बैठ ऊँचा सुने, कतराते हैं काम
चपरासी तंद्रामय ये, करते हैं आराम ।

गलबंधन टाई प्रबल, ईसाईयत भाव
फेशनमय यह बन गई, अनजाने ही चाव ।

तंग है तो जंग है, नहीं तथापि क्रांति
सहनशील, विकेवपूर्ण, चाहे जनता शांति ।

जोबन में जो बन आए, करो कमाई, काम
जा कर फिरना आयगा, यह जीवन अभिराम ।

शीतल गन्ना पान कर, सोडा वाटर भूल
हिंदी हिय का हार है, अंगरेजी गल शूल ।

पाँच पुत्र का एक पिता, कर सकता प्रतिपाल
पाँचों मिल कर पिता की, कर न सके सँभाल ।

मकान का तो ले मना, रसिक किरायेदार
मालिक तो दुख झेलते, पेट काट लाचार ।

हिय दर्पण मुख देखिए, कैसे लगते आप
प्रतिबिंबित होते जहाँ, पुण्य - पाप - परिताप ।

सोना तो है रात का, मिलती चांदी चोट
सुलभ वस्तु दुर्लभ बनी, लगे चौगुने नोट ।

अजी पुत्र है डॉक्टर, देता होगा दाम
जी कभी देता ही है, पोस्टकार्ड अभिराम ।

शाह खर्च तो आप है, भग्नमनोरथ, चूर
बोतल घोड़े पर चढ़े, धर चिंता से दूर ।

अपव्यय बुरी बात है, करती चक्काजाम
उधार से ऋण नित बड़े, मरने पर विश्राम ।

ना जाने कब मिटेगी, काश्मीर घुसपैठ
पाकिस्तान तो चाहता, पकड़ - थाम कर बैठ ।

तंग सजीले वस्त्र तन, चलती सोना तान
गतिशील क्या प्रगतिशील' नारी आज महान!

नचा हवा में उँगलिया, रासबरी ला चार
वह घंटों आया नहीं, उठे आप लाचार ।

पगड़ी - साफा बाँधते, टोपी भी अब लोप
नंगे सिर फेशन बना, नहीं कोप - आरोप ।

प्रयोजन की वस्तुएँ, बनी आज अनिवार्य
बिजली, बँगला, रेडियो, स्कूटर अपरिहार्य ।

सिनेमा पर पर्दा लगा, नारी पर्दा लोप
पाप पर पर्दा पड़ा, हुआ पुण्य - प्रकोप ।

दैनिक व्यय तो बढ़ गया, सचमुच आशातीत
विकट, प्रकट, संकट सहें, जीवन भार प्रतीत ।

लड़के - वाले बन गए, नए जागीरदार
दोहन - दक्ष दहेज लें, प्रीत - रीत व्यापार ।

एक बार जो मिल सके, कृपापूर्ण कटाक्ष
खुले रखते हम सर्वदा, हृदय - नेत्र - गवाक्ष ।

आज हमें तो चाहिए, हरे तिमिर आलोक
भूत - प्रेत - भय भग सकें अज्ञान - अविद्या - शोक ।

जोबन, धन, संतोष - धम, जीवन - धन के साथ
दूर रहे सब व्यर्थ धन, जीवित बने अनाथ ।

जीवन की ज्योति प्रखर, चाह - वाह - उत्साह
लगन, जिज्ञासा, सदाशा, प्रेम, प्रयोग, प्रवाह ।

अमेरिका खाद्यान्न तो, मानो है निष्प्राण
भूखा करता क्या नहीं, पाने को परित्राण ।

व्यापारी लोभी बड़े, किसान कब दातार?
संचय कर महँगा बेचें, बेपार व्यापार ।

मध्यम - वर्ग गरीब है, एक कमाय दस खायँ
जो - जी कर मर जायँ वे, मर - मर कर जी जायँ ।

टीले पर बारूद के, इस जगती का वास
एटम बम विस्फोट का, सदा व्याप्त है त्रास ।

भारत सचमुच अहिंसक, स्वतंत्रता के बाद
मछली - मांस - मुर्गादि का, करता बहु आस्वाद ।

जोते जिसका खेत है, करता उसका काम
नहीं करें, चरे - विचरें, कर्त्ता नहीं विश्राम ।

भारत को संपत्ति बड़ी, कितनी आज असीम
होटल, विश्रांति, सिनेमा, पाउडर, शेम्पू, क्रीम ।

कैसे गहरे बन गए, आत्मविस्मरणशील
शतरंज, ताश, खेल में, नील गगन ज्यों चील ।

उनके तो प्रिय चल बसे, वे खाएं मुर्दा माल
जीते जी पानी न दें, तर्पण कर तर माल ।

पूजा तो एक स्वांग है, करे पुजारी लोग
तन्मय तत्पर लें उठा, बेचे पा संयोग ।

अनुशासन अंकुश नहीं, आतंकी अधिकार
पिता पुत्र सा स्नेह ना, केवल प्रचुर प्रहार ।

बकरे, बतख, बहु बटेर, हरिन, जंतु आबाद
निरपराध मारे मनुज, कर सकता ईजाद ।

तुम्हें मारने का भला, कहाँ मिला अधिकार,
ओरों से तुम जीव हो, फिर क्यों अत्याचार ।

पनघट, पथ, बिहरथल, ताल वाटिका योग
शाश्वत आवागमन है, मनुज मात्र संयोग ।

मरणशील है मनुज तो, राजा, जोगी, रंक
ऐसी स्मृति छोड़िए, याद करें निरशंक ।

मानव जीवन है परम, एक विरोधाभास
शीत - ताप, यौवन जरा, जीवन - मृत्यु बास ।

दुर्लभ दूध बड़ा हुआ, घर - घर चाय प्रचार
घी, मक्खन, कैसे मिले, जब विचलित आधार ।

फेशन, खर्चे, अनुकरण, अलंकरण, बहु काम
देखादेखी कर रहे, ऋण, उधार ना दाम ।

प्रतिभा, पटुता, कर्म के, क्षेत्र कल्पनातीत
वांछित क्षमता साधना, अध्यवसाय व प्रीत ।

कुर्सी पाने के लिए, चलते कितने दौर,
येन - केन - प्रकारेण, छीनें-झपटें कौर ।

दिल का ताला तोड़ दे, हुदय का पट खोल
बस अनन्य आत्मीयता, यही प्रेम का मोल ।

पुत्री, पत्नी, मा, बहिन, ये नारी के रूप
रुचिकर, प्रिय, जीवन मधुर, प्रेम-त्याग अनुरूप ।

क्षणभंगुर जीवन मनुज, कैसा जाता बीत
हँसता, गाता, खेलता, करे न प्रभु से प्रीत ।

सूर्योदय के साथ ही, चलते बहुविध काम
अनवरत क्रम से चलें, नहीं विराम-विश्राम ।

अप्रिय सत्य बचाइए, कहिए मार्मिक बैन
इंगित ही कर दीजिए, अथवा तिरछे नैन ।

कब से बैठे देखते, तकें आपकी बाट
असमंजस आए नहीं, मन को हुई उचाट ।

डाका पड़ सकता बैंक में, चोरी घर आतंक

जेब कतर डालें तुरत, कहीं नहीं निश्शंक ।

हवा सलिल संयोग से, लोहा लगता जंग
दलगत घर्षण से जगे, जंग जगत-सुख-भंग ।

माया को अपहरण भय, काया का भय रोग
जीवन को भय मौत का, भयभ्रांत सब लोग ।

हृदय, घर, परिवार में, समरस सब परिवार
प्रणय-प्राण पत्नी वही, सबका पा ले प्यार ।

खेत - रेत अभिप्रेत है, मिले खाद समवेत
जल-सिंचन से हो उदय, श्रम बिन सब रणखेत ।

बने हैं पंडित जन्म से, निरक्षर भट्टाचार्य
काला अक्षर भैंस सम, जाति से आचार्य ।

नाम नयन - सुख, नयन ना, सुदर्शन हैं कुरूप
धनपत के धर धन नहीं, यथा नाम ना रूप ।

छाती छेदें फूल की, छाती पर लटकायँ
कस बंद में सुगंध के, छाती, नाक लगाये ।

गत पाक महायुद्ध में, बम - बारी पर जोर '
अमृतसर और जोधपुर, तदपि न खंडित कोर ।

बीस अरब रण मालका, मुक्त पाक कर ध्वस्त
आँख अमेरिका को खुली, खा कर एक शिकस्त ।

दामन थाम अमेरिका, नहीं छोड़ता पाक
साँठ छ गाँठ कर चीन से, करना चाहे खाक ।

वातावरण अशांति का, मँहगाई, कुंठा, भास
असंतोष, अभाव अमित, यत्र-तत्र आभास ।

सभी वर्ग में चल रहा, एक प्रकार संघर्ष,
शासक, शासित, सेठ, श्रम, यत्नशील उत्कर्ष ।

पडे ठंड, लगती हमें, बने गात भयमीत,
उलझें, टूटें, जुडें जन, प्रकट - विकट ज्यों प्रीत ।

हे प्रभो! यह सतसई, हो काम्य रमनीय,
संस्कार-परिष्कार की, संबल बन कमनीय ।

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(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

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