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September 2016
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हिंदी साहित्य में व्यंग्य को लेकर बहुत ज्यादा प्रयोग देखने को नहीं  मिलते है और  जो  अभी तक हुए है उनका भी सही से मूल्याकन नहीं हो पाया है . लेकिन  फिर भी व्यंग्यकारों  ने से एक अनोखा प्रयोग किया - व्यंग्य की जुगलबंदी .

इससे पहले इस प्रकार की जुगलबंदी ईश्वर शर्मा और लतीफ़ घोघी के द्वारा की जा चुकी थी. यह जुगलबन्दी व्यंग्य के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग था। लतीफ घोंघी और ईश्वर शर्मा ने व्यंग्य के नियमित स्तम्भ के रूप में एक ही विषय पर व्यंग्य लिखे। उनको अमृत सन्देश, रायपुर और अमर उजाला बरेली-आगरा अख़बारों ने प्रकाशित किया। बाद में 1987 में सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली ने इस जुगलबन्दी को छापा।

इसबार व्यंग्य की जुगलबंदी के तहत चार लेखको अनूप शुक्ल,  निर्मल गुप्ता, रवि रतलामी और एम्.एम्. चन्द्रा ने  एक  साथ  जुगलबंदी की.इस जुगलबंदी  को एक साथ आप के सामने प्रस्तुत कर रहे ताकि इस प्रयोग  के बारे में एक सही मूल्याकन हो सके)

पहली जुगलबंदी - अनूप शुक्ल : मोबाइल

आज की दुनिया मोबाइलमय है। समाज सेवा के नाम पर सरकारें बनाने के काम से लेकर अपराध का धंधा करने वाले माफ़िया लोग मोबाइल पर इस कदर आश्रित हैं कि इसके बिना उनके धंधे चौपट हो जायें।

बिना मोबाइल का आदमी खोजना आज के समय कायदे की बात करने वाले किसी जनप्रतिनिधि को खोजने सरीखा काम है। जितनी तेजी से मोबाइल की जनसंख्या बढी है उतनी तेजी से इन्सान के बीच के दूरी के अलावा और कुछ नहीं बढा होगा। आज के समय में आदमी बिना कपड़े के भले दिख जाये लेकिन बिना मोबाइल के नहीं दीखता। गर्ज यह कि बिना आदमी के दुनिया का काम भले चल जाये लेकिन बिना मोबाइल के आदमी का चलना मुश्किल है।

मोबाइल ने लोगों के बीच की दूरियां कम की हैं। झकरकटी बस अड्डे के पास जाम में फ़ंसा आदमी लंदन में ऊंघती सहेली से बतिया सकता है।भन्नानापुरवा के किचन में दाल छौंकती महिला अपने फ़ेसबुक मित्र को कुकर की सीटी से निकली भाप की फ़ोटो भेज सकती है। गरज यह कि दुनिया में घूमता-फ़िरता आदमी बड़े आराम से दुनिया को मुट्ठी में लिये घूम सकता है।

जितनी दूरियां कम की हैं, बढाई भी उससे कम नहीं हैं इस औजार ने। आमने-सामने बैठे लोग अगर अपने-अपने मोबाइल में डूबे नहीं दिखते तो अंदेशा होता है कि कहीं वे किसी और ग्रह के प्राणी तो नहीं। एक ही कमरे में बैठे लोगों के बीच अगर संवाद कायम नहीं है तो इसका मतलब यही समझा जा सकता है कि उस कमरे में मोबाइल नेटवर्क गड़बड़ है।

मोबाइल ने बिना शर्मिन्दगी के झूठ बोलना सुगम बनाया है। नाई की दुकान पर दाढी बनवाता आदमी अपने को दफ़्तर में बता सकता है। बगल के कमरे में बैठा आदमी अपने को सैकड़ो मील दूर होने की बात कहकर मुलाकात से बच सकता है। घंटी बजने पर फ़ोन उठाकर बात करने की बजाय तीन दिन बाद कह सकता है – ’अभी तेरा मिस्डकाल देखा। फ़ोन साइलेंट पर था। देख नहीं पाया।’

समय के साथ आदमी की औकात का पैमाना हो गया है मोबाइल। फ़ोर्ड कार वाले आदमी को मारुति कार वाले पर रोब मारने के लिये उसको बहाने से सड़क पर लाना पड़ता था। मोबाइल ने रोब मारने का काम आसान कर दिया है। आदमी अपनी जेब से एप्पल का नया आई फ़ोन निकालकर मेज पर धरकर वही रुतबा काबिल कर सकता है जो रुतबा गुंडे लोग बातचीत के पहले अपना कट्टा निकालकर मेज पर धरकर गालिब करते थे।

मोबाइल और इंसान समय के साथ इतना एकात्म हो गये हैं कि एक के बिना दूसरे की कल्पना मुश्किल हो गयी है। किसी आदमी को खोजना हो तो उसका फ़ोन खोजना चाहिये। इंसान अपने फ़ोन के एकाध मीटर इधर-उधर ही पाया जाता है।

मोबाइल के आने से दुनिया में बहुत बदलाव आये हैं। कभी अपने जलवे से मोबाइल की दुनिया का डॉन कहलावे वाले नोकिया के हाल आज मार्गदर्शक मंडल सरीखे बस आदर देने लायक रह गये हैं। किलो के भाव मिलने वाले मोबाइलों से लेकर एक किले तक की कीमत वाले मोबाइल हैं आज बाजार में। 

तकनीक की साजिश से खरीदते ही पुराना हो जाता है मोबाइल। सामने की जेब से आलमारी के कोने तक पहुंचने की यात्रा जितनी तेजी से पूरी करता है उतनी तेजी से बस नेता लोग अपना बयान भी नहीं बदल पाते।

मोबाइल का एक फ़ायदा यह भी है कि इसके चलते देश की तमाम समस्याओं से देश के युवाओं का ध्यान हटा रहता है। वे मोबाइल में मुंडी घुसाये अपना समय बिताते रहते हैं। मोबाइल न हो तो वे अपनी मुंडी घुसाने के लिये किसी और उचित कारण के अभाव में बेकाबू हो सकते हैं।

मोबाइल कभी बातचीत के काम आते हैं। आजकल मोबाइल का उपयोग इतने कामों में होने लगा है कि बातचीत का समय ही नहीं मिलता। फ़ोटो, चैटिंग, के अलावा लोग मारपीट के लिये अद्धे-गुम्मे की जगह अपने पुराने मोबाइलों पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। टाइगर वुड्स की प्रेमिका ने वुड्स की बेवफ़ाई की खबर पाने पर अपने मोबाइल का हथियार के रूप में प्रयोग करके इसकी शुरुआत की थी। ऐसा फ़ेंक कर मारा था मोबाइल कि टाइगर वुड्स का दांत टूट गया था। भारत-पाक सीमा पर भी देश के पुराने मोबाइल इकट्ठे करके फ़ेंककर मारे जा सकते हैं। अपना कूड़ा भी उधर चला जायेगा और जलवा भी कि हिदुस्तान इतना काबिल मुल्क है कि मारपीट तक में मोबाइल प्रयोग करता है।

किसी भी देशभक्त कथावाचक की दिली तमन्ना की तरह बस यही बताना बचा है मेरे लिये कि दुनिया में यह तकनीक भले ही कुछ सालों पहले आई हो लेकिन अपने भारतवर्ष में महाभारतकाल के लोगों को मोबाइल तकनीक की जानकारी थी। महाभारत की मारकाट के बाद पांडव जब स्वर्ग की तरफ़ गये थे तो साथ में अपना कुत्ता भी ले गये थे। वास्तव में वह कुत्ता पांडवों का वोडाफ़ोन मोबाइल था। पांच भाइयों की साझे की पत्नी की तरह उनके पास साझे का मोबाइल था। जब देवदूत युधिष्ठर को अकेले स्वर्ग ले जाने की कोशिश करने लगे तो उन्होंने बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने से मना कर दिया। अड़ गये। बोले-“ ऐसा स्वर्ग हमारे किस काम का जहां मेरा मोबाइल मेरे पास न हो।“ अंत में देवदूत युधिष्ठर को उनके मोबाइल समेत स्वर्ग ले गया।

महाभारत काल में सहज उपलब्ध मोबाइल तकनीक को हजारों साल चुपचाप छिपाये धरे रहे और इंतजार करते रहे कि जैसे ही कोई विदेशी इसको चुराकर मोबाइल बनायेगा हम फ़टाक से महाभारत कथा सुनाकर बता देंगे कि जो तुम आज बना रहे हो वो तो हम हज्जारों साल पहले बरत चुके हैं।

महाभारत काल में सबसे पहले प्रयोग किये मोबाइल का हजारों साल बाद फ़िर से चलन में आना देखकर यही कहने का मन करता है-“ जैसे मोबाइल के दिन बहुरे, वैसे सबसे बहुरैं।“

 

दूसरी जुगलबंदी-  निर्मल गुप्ता : स्मार्ट मोबाईल फोन और स्मार्टनेस

वह कतई स्मार्ट नहीं हो सकता जिसके पास अपनी गर्दन को कमोबेश पैंतीस डिग्री पर मोड़ ,कंधे को उचका और उसके बीच अपने मोबाइल फोन को फंसा ट्रेफिक के सिपाही से आँखें चुराकर भरी सड़क पर टूव्हीलर को दौड़ाने का कौशल नहीं आताlवे लोग जो तमाम प्रयासों के बावजूद इस चातुर्य को पाने में असफल हैं वही इस मुद्दे पर सबसे अधिक नाक भौं सिकोड़ते हैंlइनके मन में इस तरह के कौशलसम्पन्न लोगों के प्रति सौतियाडाह टाइप की चिंता रहती हैlनाकामयाब लोग ही अकसर बाय डिफॉल्ट चिंतक बनते हैं l
अमरीका से खबर आई है कि स्मार्टफोन से दिन भर चिपके रहने की आदत न केवल आँखों के लिए वरन गर्दन और रीढ़ की सेहत के लिए भारी पड़ सकती हैlसिकुड़ी हुई नाकों को जब उन्हें इसका पता लगा तो उनकी त्वरित प्रतिक्रिया आई कि उन्हें तो यह बात पहले से ही पता थी lस्मार्ट लोगों ने कहा : हू केयर्सlनो रिस्क नो गेम l जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल l
स्मार्टफोन अब महज संवाद का उपकरण नहीं रह गया हैlइनके आकार प्रकार कीमत और गुणवत्ता के जरिये ही इसे धारण करने वाले का सोशल स्टेट्स और स्मार्टनैस तय होती हैlसिर्फ इतना ही नहीं इसके सम्यक इस्तेमाल का सलीका ही धारक के व्यक्तित्व को आभामय बनाता है lइससे ही मित्र मंडली का निर्माण होता है l प्यार ,दुलार ,स्वीकार दुत्कार और चीत्कार अभिव्यक्त होता है lमित्रों को ब्लॉक करने का सुगम उपाय मिलता है lसिर्फ इतना ही नहीं आभासी दुनिया में सेलिब्रिटी स्टेट्स मिलता है lउन्हें देश दुनिया की पल पल की खबर रहती है और उनके हर पग की पदचाप सोशल साईट पर दर्ज होती जाती है lउनके कुत्ते के जुकाम होने की सूचना से लेकर नुक्कड़ के पान वाले की बिटिया की गुड़िया के ब्याह की खबर सचित्र वायरल हो जाती है lजब वह जाकिर हुसैन के तबला वादन से लेकर बाबूलाल हलवाई की बालूशाही की रेसिपी तक पर विचार व्यक्त करते हैं तो तीन सौ लाइक्स और सवा सौ कमेन्ट उनके सर्वगुण सम्पन्न होने की तुरंत पुष्टि कर देते हैं l
एक रिपोर्ट के मुताबिक मुल्क के स्मार्टफोन यूजर्स रोज तीन घंटे अठारह मिनट इसी तीन - तेरह में उलझे रहते हैं lउनके लगभग डेढ़ सौ बार फोन या मैसेज न आने पर भी घंटी का आभास होता है lवे बार –बार अपने फोन को निहारते हैं और उसांस लेकर खुद से कहते हैं –कोई न आया है कोई न आया होगा ,मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा lइस जद्दोजहद में ये लोग इतनी अधिक हवा गहरी सांस के जरिये अपने भीतर भर रहे हैं कि आशंका है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन दुनिया में निर्वात कायम हो जायेगा l
न्यूयार्क के एक रिसर्च सेंटर द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार स्मार्टफोन स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे पैदा कर रहा है lइस सूचना से स्ट्रीट स्मार्ट लोग अमरीका से बेहद खफा हैं lउनका कहना है कि यह मुआ अमरीका दूसरों की स्मार्टनेस इतना चिढ़ता क्यूँ है lजब देखो किसी न किसी को धमकाता या बरगलाता रहता है l किसी पर वह आँख तरेरता है तो किसी के सर को निशाना बना के अपने ड्रोन से मिसाइल दागता है l
वैसे भी आज के वक्त में तनी हुई रीढ़ और उठी हुई गर्वोन्मत्त गर्दन की जरूरत ही किसे है ?

 

तीसरी जुगलबंदी-  रवि रतलामी :आपका मोबाइल ही आपका परिचय है!

आयम डॉ. गुलाटी - एम.एम.एम.पी. - डॉ. गुलाटी ने अपने उसी गुरूर वाले अंदाज में अपना परिचय दिया.

एम.एम.एम.पी. मतलब?

एम.एम.एम.पी मतलब - मेरा मोबाइल ही मेरा परिचय है.

अच्छा, तो आपका मोबाइल कौन सा है?

इससे पहले कि डॉ. गुलाटी बड़े स्टाइल से, उसी गुरूर से अपना मोबाइल निकाल कर जनता को दिखाएँ, ताकि जनता ठहाके लगा सके, जरा आप अपना मोबाइल चेक कर लें. क्योंकि अब आप भी जुदा नहीं हैं. डॉ गुलाटी की तरह ही, आपका मोबाइल ही आपका परिचय है.

एक जमाना था जब आदमी का परिचय भिन्न-भिन्न तरीकों से लिया-दिया जाता था. ऊपर-ऊपर से आदमी का परिचय प्राप्त करने के लिए कोई प्रकटतः, प्रत्यक्ष साधन उपलब्ध नहीं था. कोई धोतीबाज आदमी भी ब्यूरोक्रैट निकल सकता था तो कोट-टाई डांटा हुआ आदमी ठेठ खेती-किसानी वाला भी हो सकता था. तब नाईकी और एडिडास के जूते और टिसॉट, पेबल की घड़ियाँ  भी तो नहीं थे जिनसे आदमी के व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जा सके. जब तक घुट-घुट कर आपसी परिचय का आदान प्रदान नहीं हो जाता था, ये कहना मुश्किल होता था कि यार, ये बंदा आखिर करता क्या है!

पर आज?

आज आपके और सामने वाले के हाथों में एक अदद मोबाइल है ना इंस्टैंट परिचय पाने के लिए!

घुट-घुट कर एक दूसरे का परिचय देने लेने की जरूरत ही नहीं!

उदाहरण के लिए, यदि आपके हाथों में अभी भी एक अदद फ़ीचर फ़ोन है, तो आप इस सदी के सबसे बड़े तकनीकी तौर पर दलित, वंचित आदमी हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि आज जो भी ईमानदार बचा है, तो वो इस लिए कि उसे मौका नहीं मिला होता है. तो आपको भी स्मार्टफ़ोन का मौका नहीं मिला है, और आप भी मौका पड़ते ही एक अदद स्मार्टफ़ोन की ओर छलांग लगाने को तैयार बैठे हैं. अथवा यह भी हो सकता है कि आप स्मार्टफ़ोन से ऊबे-अघाए व्यक्ति हैं जो सबकुछ छोड़छाड़ कर, अपना फ़ेसबुक-ट्विटर प्रोफ़ाइल हटा-मिटाकर सन्यास लेकर वापस फ़ीचरफ़ोन की दुनिया में वापस आ गए हैं - जिसकी कि संभावना नगण्य ही है. ये भी हो सकता है कि आपकी कंपनी में स्मार्टफ़ोन बैन हो और आपको मजबूरी में सादे फ़ीचरफ़ोन लेकर चलने जैसी गांधीगिरी करनी पड़ रही हो!

यदि आपके हाथों में श्यामी, वनप्लस जैसे स्मार्टफ़ोन है, तो यकीन मानिए, आप इस सदी के सबसे अधिक होशियार, मितव्ययी आदमी हैं, जो पैसे की कीमत समझते हैं, टेक्नोलॉज़ी की परख रखते हैं. इसके साथ ही, आप उन डम्ब अमरीकियों को चिढ़ा रहे होते हैं, जो उतने ही डम्ब एप्पल फ़ोन को, जिसमें फ़ीचर के नाम से ज्यादा कुछ नहीं होता है, और टेक्नोलॉज़ी में कोई पाँच साल पीछे चल रहा है, दुगनी-तिगुनी कीमत देकर खरीदते हैं. आजकल वैसे भी, अमरीका में डम्ब और ट्रम्प का राइम बढ़िया चल रहा है, और उनके एप्पल से बाहर निकलने की संभावना कम ही है. इसलिए, भारत में एप्पल? ना बाबा ना! जो थोड़ा मोड़ा एप्पल किसी भारतीय के हाथ में दिखता है तो वो या तो धोखा खाया भारतीय होता है या फिर अमरीकी-नुमा भारतीय. वैसे, मैं अपनी बात कहूं तो एक बार मैं भी धोखा खा गया था, और धोखा खाने के मामले में एक बात अच्छी ये है कि आमतौर पर आदमी बार-बार धोखा नहीं खाता.

यदि किसी के हाथ में (अब भी) विंडोज़/लूमिया मोबाइल है तो उसके व्यक्तित्व के बारे में पक्के तौर पर यह कहा जा सकता है कि वो इंटीग्रिटी के मामले में पक्का है. वो बड़ा ही पक्का विश्वासी आदमी होगा. वो आँख-कान मूंदकर जिस किसी पर विश्वास कर लेता होगा, उस पर मरते दम तक विश्वास करता होगा. विंडोज़ फ़ोन मार्केट से बाहर हो गया है, चीजें उसमें चलती नहीं मगर फिर भी उसे जी जान से सीने से चिपकाए व्यक्ति के विश्वास, उसकी विंडोज़ के प्रति प्रतिबद्धता की प्रशंसा तो करनी ही होगी. मगर, हमें इनसे अच्छी खासी हमदर्दी भी दिखानी चाहिए.

अब आते हैं लाइफ़ मोबाइल की ओर. आप कहेंगे कि सेमसुंग, एचटीसी, हुआवेई, जेडटीई, ब्लैकबेरी, नोकिया, एलजी, नैक्सस, मोटो, पैनासोनिक, सोनी, माइक्रोमैक्स, इंटैक्स, डाटाविंड आदि-आदि का क्या? ओप्पो! अरे, ये भी तो, अनगिनत में से एक मोबाइल ब्रांड है. आज आप कोई भी शब्द ले लें. उससे मिलता जुलता किसी न किसी कंपनी का कोई न कोई वर्जन का मोबाइल फ़ोन मिल ही जाएगा. 33 करोड़ हिंदू देवी देवता की तरह मोबाइल ब्रांड और वर्जन भी इतने ही हैं. न एक कम न एक जियादा. यूँ, ये सब आम जनता के मोबाइल हैं. मैंने आम आदमी जानबूझकर नहीं कहा, नहीं तो समस्या हो सकती थी. तो ये बाकी के सब मोबाइल आम जनता के आम मोबाइल हैं. अपवादों को छोड़ दें तो कोई खास, विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं. हमें क्या और चलताऊ ऐटीट्यूड युक्त.  अधिकांशतः में ये बात लागू है - आपके फ़ोन में लाखों ऐप्प इंस्टाल हो सकते हैं और हजारों फ़ीचर हैं, मगर आप में से  अधिकांश के लिए काम के केवल व्हाट्स्एप्प और फ़ेसबुक हैं! आम जनता के आम ऐप्प. बहुत हुआ तो ट्विटर बस. यकीन नहीं होता? अरे भाई, यकीन कर लो. और ये भी यकीन कर लो कि महज तीन टैप से सेटिंग में जाकर आप अपने फ़ोन का इंटरफ़ेस यानी भाषा हिंदी में बदल सकते हैं, और कीबोर्ड भी हिंदी में कर सकते हैं. अब बताएं? क्या आपके फोन की भाषा हिंदी है? क्या आपके फ़ोन का कीबोर्ड असल हिंदी है कि गूगल ट्रांसलिट्रेशन वाली Ram से रामा लिखने वाली? हिंदी बेचारी आपके फ़ोन में उपेक्षित पड़ी है, और आप धकाधक हिंदी पखवाड़े में उपेक्षित हिंदी के बारे में रोमन में लेख पे लेख, स्टेटस पे स्टेटस मारे जा रहे हैं! इन आम मोबाइलों के स्क्रीन पर महज एक झलक मारने की देरी है. मोबाइल मालिक के आम व्यक्तित्व का पता आम हो जाता है!

हाँ, तो बात हो रही थी लाइफ़ - एलवाईएफ़ मोबाइलों की. हाल-फिलहाल डेटा का तमाम आग पानी इन्हीं मोबाइलों में तो आ रहा है. बेखौफ आप यह बात यकीन से कह सकते हैं कि जिस किसी के पास भी वर्तमान में लाइफ़ मोबाइल है वो दुनिया के न सही, भारत के सबसे भाग्यशाली लोगों में से एक हैं. जिन्होंने पहले से इसे खरीदा हुआ है, जाहिर है वे भाग्यशाली होने के साथ-साथ बहुत बड़े वाले दूरदर्शी भी रहे हैं. अब यह अलग बात है कि यह अहोभाग्य केवल दिसंबर 2016 तक के लिए ही है.

चलिए, बहुत सी बातें हो गईं. अब तो आप कृपया बता दें कि आपका परिचय क्या है? ओह, नहीं, बस, आप ये बता दें कि आपका मोबाइल कौन सा है?

 

चौथी जुगलबंदी-एम एम चन्द्रा-  हर मुद्दे को संसद बना दिया

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भारतीय संसद का भी कोई जवाब नहीं है. यह इतनी चरित्रवान जगह है जिसको ऐरा-गैरा-नत्थू खैरा कहीं भी,कभी भी, अपनी छोटी-छोटी बातों से सम्मानित कर देता है- “यार तुम तो हर मुद्दे को संसद बना देते हो”. संसद एक पवित्र गाली है या गाली ही संसद जैसी बन गयी है. संसद एक ऐसी संस्था है जो देश के सबसे गैर-गंभीर मुद्दों पर बहस करती और नए-नए मुद्दे पैदा करती है जिसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई वास्ता नहीं होता. समस्या का हल संसद नहीं चंदा देने वाली शक्तियों के लाभ हानि के आधार पर निर्भर होता है.

आज मोबाइल का होना न होना भारत की सबसे बड़ी समस्या बन गया. 2जी, 3जी, 4जी के आने के बाद भी देश की समस्त जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है . सामाजिक सेवा करने वाली एक मोबाइल कम्पनी के आका ने, मोबाइल से अपने पाले हुए सांसद को मर्यादित भाषा में एकदम साफ -साफ शब्दों समझाया- “यदि कल आपने संसद में मोबाइल का मुद्दा नहीं उठाया तो आपको परिवार कल्याण हेतु चंदा देने की प्राचीन प्रथा को बंद कर दिया जायेगा. नेताजी ने अपने आका की बात एक कान से सुनी और अपने चेले चपाटो के कान में देशभक्ति की एक दो घूंट दाल दी- “कल बाजारी देशभक्ति दिखाने के लिए संसद का ऐतिहासिक दिन है. मैं एक मुद्दा उठाऊंगा, आप लोग दूसरा मुद्दा उठाये, इस तरह दो विपरीत मुद्दों का संघर्ष और लाभ की एकता बनी रहेगी. समर्थन करना और समर्थन जुटाना एक दम असली लगना चाहिए. मुद्दे पर इतना आक्रामक होना ताकि सभी घूम-फिरकर अपने ही मुद्दे तक सोचे. ध्यान रहे, संसद की बहस को एक खेल भावना की तरह से खेलना है . चतुर नेता वही जो अपने पाले में ही खेल खेले. दूसरों के पाले में खेलेंगे तो पिटाई अलग . अच्छा फोन रखता हूँ, कल की तैयारी करो- कब, किसको, कितना बोलना है.

सांसद-1! अध्यक्ष महोदय आज आपके सामने एक ऐसा मुद्दा रख रहा हूँ जो पूरे भारत के लोगों की जरूरत ही नहीं बल्कि उनकी आन-बाण-शान बन गयी है. देश की पहचान बन गयी है, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए ज़ाल बन गयी है यानि मोबाइल! मोबाइल! मोबाइल! अध्यक्ष महोदय नेटवर्क की कमी के चलते करोड़ों काल प्रतिदिन ड्राप हो रहे हैं. जिसकी वजह से भारत की जिन्दगी ठहर सी गयी. इन पर लगाम लगनी चाहिए.

अध्यक्ष-! माननीय सांसद महोदय! आप अपनी भाषा पर लगाम लगाये. ये कोई न्यायालय नहीं जहां किसी को सजा दी जाये. यहाँ सिर्फ सवाल पूछे जाते हैं या उनके जवाब दिए जाते हैं.

सांसद-2 अध्यक्ष महोदय! नेता जी नेटवर्क का मुद्दा उठाकर पूरे देश को भटका रहे हैं. असल में नेता जी मोबाइल कंपनियों को बचाना चाहते हैं. समस्या नेटवर्क की नहीं बल्कि मोबाइल तकनीकी की है जिसे जानबूझकर छिपाया जा रहा है. देश को अच्छे मोबाइल की जरूरत है ताकि पूरा देश हर समय अपडेट रहे. यदि अच्छे मोबाइल होंगे तो देश की बड़ी से बड़ी समस्या चुटकी में हल हो जाएगी, जैसे-गरीबी, बेरोजगारी, डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और आतंकवाद भी. मैं यह जरूर मानता हूं कि इस समस्या को राष्ट्रीय समस्या घोषित किया जाना चाहिए किन्तु हमारे महान नेता जी तथ्यगत रूप में देश की अवाम से झूठ बोल रहे हैं. ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रतिनिधि सभा की आँखों में भी धुल झोंकने का काम कर रहे हैं. पहली बात तो ये कि भारत की भोली-भाली जनता को बिना बात इस गंभीर मुद्दे पर घसीट रहे हैं. जहां देश में 84 करोड़ लोग 20 रुपए रोज कमाते हों उन लोगों को इस राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे पर घसीटना क्या इनको शोभा देता है ?. मोबाइल से इन्टरनेट चलाने वाले लोगों की संख्या अभी भी पूरे देश में लगभग 16 करोड़ है. आधी आबादी आज भी एक वक्त भोजन करती है.एक लाख किसान प्रत्येक वर्ष आत्महत्या करते है.एक लाख महिलायें गरीबी के चलते बच्चा जन्म देते समय ही मर जाती है.और तो और गर्मी सर्दी से भी हजारों लोग हर साल मर जाते है.इन लोगों का मोबाइल वाली राष्ट्रीय महत्त्व की समस्या से क्या लेना देना. मेरा तो बस इतना कहना है कि इतने गरीब लोगों को इस मुद्दे अलग रखा जाये.

संसद -1 ! ये बात ठीक है, हम अपने सभी विमर्शों से इन भोली भाली जनता को अलग कर देते है. और देश की 20% आबादी वाली असली जनता के बारे में बात करते है. 80% आबादी के लिए तो सिर्फ जुमले ही काफी है वो भी चुनाव के लिए. महोदय डिजिटल इंडिया इस वर्ग की सबसे बड़ी जरूरत है. हम नहीं चाहते कि मध्यम वर्ग बिना मोबाइल के बिन जल मछली की तरह तड़पता रहे. आज देश के तमाम बुद्धिजीवियों के लिए भी मोबाइल का मुद्दा सबसे बड़ा है. गरीबी, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों पर तो देशद्रोही बात करते हैं. हम मोबाइल पर बात करते हैं, मोबाइल से बात करते हैं. देश की तमाम समस्या अब सिर्फ मोबाइल से हल हो जाएगी, मोबाइल बेरोजगार को नौकरी दिलाएगा, टिकट बुक कराएगा, भूखे को खाना खिलायेगा, कहीं भी कभी भी पैसा जमा कराएगा. किसानों की फसलों को शेयर मार्किट में बेचेगा. देशभक्ति की धुन बजाएगा. सीमा पार के दुश्मनों को भगाएगा, वीर पुरुषों को जगायेगा और नई क्रांति लायेगा यह मोबाइल क्रांति का दौर है . किसी शायर ने ठीक ही कहा "देश की ऊंचाई को मीनार से मत आंकिये असली हिंदुस्तान तो मोबाइल पे आबाद है."

अध्यक्ष महोदय- ठीक है! ठीक है! मोबाइल और नेटवर्क दोनों जरूरी है. इनकी समीक्षा हेतु एक समिति गठित की जाएगी. कोई और महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो तो बतायें उस पर बात की जाये.

सांसद-3 अध्यक्ष महोदय! मोबाइल भारतीय लोकतंत्र का पांचवां स्तम्भ है. इसलिए मोबाइल कंपनियों को बचाने के लिए जो ठोस कदम उठाये गये है वो बहुत धीमी रफ्तार से हो रहे. इस राष्ट्रीय हित के मुद्दे पर भी बात होनी चाहिए.

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अदालत की कार्यवाई शुरू होने वाली थी. मयंक पाल की आँखें भर आईं. रह रहकर उन्हें वो दृश्य याद आ रहा था- जब उनके कलेजे का टुकड़ा, उनकी बिटिया नीना अधजली हालत में अस्पताल लाई गयी थी. नीना को उसके वहशी पति किशोर ने मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था. उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रेम विवाह करके, जब वो किशोर के साथ चली गयी, तब भी वे उतना आहत नहीं हुए थे, जितना उसकी दुर्दशा को देखकर. नीना ने तड़प तड़पकर उनके सामने ही दम तोड़ दिया और वह कुछ न कर सके. सुना था कि किशोर के घरवाले नोटों से भरी थैली लेकर घूम रहे थे, न्यायाधीश को शीशे में उतारने की गरज से. पाल ने एक ठंडी सांस ली. कभी वे भी एक संपन्न परिवार के वारिस हुआ करते थे. अब जब समय ने तेवर बदल लिए हैं, सब कुछ बदल गया है उनके लिए!

ना जाने भाग्य का फैसला क्या हो! जीवन के इस मोड़ पर वह बिलकुल अकेले पड़ गए हैं. पत्नी बरसों पहले परलोक सिधार चुकी थी. अपना कहने को एक बेटा जरूर है; पर वो तो बीबी के पल्लू से ही बंधा रहता है. फिर मयंक पाल की इस लड़ाई में उन्हें हौसला देने वाला भला कौन था? वे सोच में डूबे थे कि घोषणा हुई, “माननीया जज साहिबा पधार रही हैं.” मयंक ने आँखें खोलकर देखा तो आत्मा काँप गयी. जज की कुर्सी पर विराजमान उस महिला के झुलसे हुए चेहरे को देख, अतीत के काले पन्ने मानस पटल पर फड़फड़ाने लगे. “सुष्मिता डियर, इतनी देर से मैं तुमसे बात करने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम हो कि मुझे एवॉइड किये जा रही हो.”

“सॉरी मयंक. मेरे नोट्स खो गए ; अपसेट हूँ, इसी से तुम्हारी बात पर ध्यान नहीं दे पा रही.”

“बस इत्ती सी बात! तुम मेरे नोट्स ले लो”, मयंक ने हँसते हुए कहा. “देखो, हिस्ट्री के नोट्स खोये हैं,.. और हिस्ट्री हमारा कौमन सब्जेक्ट नहीं हैं”, सुष्मिता झल्ला उठी थी. इस पर उसका दोस्त थोड़ा खीज गया, “कम ऑन सुष्मिता, वो तो मैं कहीं से मैनेज कर दूंगा …..तुम बस….”

“ओके, जल्दी बोलो जो बोलना चाहते हो……मैं ज्यादा बात करने के मूड में नहीं हूँ”

“बोलने की जरूरत नहीं….सब कुछ इसमें लिखा है….पढ़ना जरूर” कहते हुए मयंक ने, गुड़ीमुड़ी सा एक वैलेंटाइन कार्ड उसे थमाया और वहां से गायब हो गया. कार्ड को पढ़ते ही सुष्मिता गंभीर हो गयी. अगली बार जब मयंक उससे मिला तो वह उसे देखते ही बोली, “तुम्हारा मैसेज पढ़ा….आई एम सॉरी मयंक. तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो पर..”

“पर…?!!”

“…मेरी सगाई हो चुकी है….काश तुमने मुझे पहले प्रपोज़ किया होता! तब शायद….”

“कब हुई सगाई? यू नैवर टोल्ड मी एबाउट दैट”

“यू नो माई पेरेंट्स! शादी होने तक, उन्होंने इस बारे में चर्चा करने से मना किया है.”

“लुक सुशी, सगाई ही तो हुई है- कोई शादी तो नहीं….यू कैन स्टिल चेंज योर माइंड”

“हाउ कुड यू से दैट मयंक?!!…आफ्टर ऑल, आई एम हैविंग सम सोशल वैल्यूज़”

“सुशी, तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकतीं! तुम्हें खोकर जीने का कोई मकसद नहीं रहेगा मेरे लिए”

मैं मजबूर हूँ, सुष्मिता ने कहा और आगे बढ़ चली. अपनी प्रणय याचना की ऐसी अवमानना मयंक से सहन नहीं हुई. धीरे धीरे सुष्मिता का रवैया उसके लिए और भी कठोर होता चला गया. बात हद से बढ़ गयी, जब एक दिन मयंक ने, सबके सामने उसका हाथ पकड़कर अपने आग्रह को दोहराना चाहा. एक झन्नाटेदार तमाचा, रसीद कर दिया था उस ऐंठू लड़की ने, तब उसके गाल पर! पुरानी दोस्ती का ऐसा सिला!! आहत अहम् लिए पाल, बिलबिलाता रहा बदले की चाह में. वो एक ऐसा रईसजादा था कि जिस चीज़ पर उंगली रख देता, वह उसे मिल ही जाती. जिन्दगी में पहली बार उसे नीचा देखना पड़ा- वह भी एक साधारण सी छोकरी सुष्मिता मंडल के लिए!

वो गुस्से से बुदबुदाया, “ये बदतमीज़ी तुझ पर बहुत भारी पड़ेगी सुशी; गर तू मेरी नहीं हुयी, तो किसी और की भी बनने नहीं दूंगा तुझे!” और फिर आ गयी वो मनहूस शाम जब …”मयंक पाल गवाही के लिए विटनैस बॉक्स में आयें” अपना नाम पुकारे जाने पर, मयंक हठात ही वर्तमान में लौट आये. भारी क़दमों से चलकर वे उस कटघरे तक पहुंचे, जहाँ गीता पर हाथ रखकर उनको कसम खानी थी. जज सुष्मिता मंडल की सुलगती हुई नज़रें भीतर तक गड़ रही थीं उन्हें. बीते हुए कल की कड़ी, सहसा आज से जुड़ गयी. निःसंदेह ये वही सुशी है जिसे!……जिसे उस मनहूस शाम को उन्होंने तेज़ाब फेंककर जला दिया था; वह भी उसके विवाह के ठीक एक दिन पहले!!

फिर तो अदालत में क्या हो रहा था, उसका होश नहीं था मयंक को. वे न्याय की उम्मीद खो बैठे थे. वह तो तभी सचेत हुए जब, सुनवाई के अंत में जज साहिबा ने अपना फैसला दिया, “विरोधी पक्ष ने कई हथकंडे अपनाए. साक्ष्य मिटाने से लेकर, अदालत को खरीदने तक की कोशिश की. पर सच्चाई के साथ खड़ी होकर, ये अदालत, दिवंगत नीना दत्त के पति किशोर दत्त को, मुजरिम करार देते हुए, आजीवन कारावास की सजा सुनाती है.” इस बार पाल, खुद को रोक न सके सुशी को देखने से. फिर वही दृष्टि! वह दृष्टि जो कह रही थी- “दूसरों को जलाने वाले, जलने का दर्द अब जाकर जाना है तूने!” उस समय तो मयंक सजा से बच गया था, अपने पिता के रसूख और पैसों के बलबूते पर; लेकिन अब लग रहा था कि जो तेज़ाब उसने सुशी पर फेंका था, सम्प्रति वही उसकी आत्मा को झुलसा रहा था, अंतस के कोने कोने में रिसकर!

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विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

सम्पर्क- फ़ोन नं. – (०४८४) २४२६०२४

मोबाइल- ०९४४७८७०९२०

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में कविता प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- बोधि- प्रकाशन की ‘उत्पल’ पत्रिका के नवम्बर(२०१३) अंक में कविता प्रकाशित

१६- -जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

१८-तेजपुर की वार्षिक पत्रिका ‘उषा ज्योति’(२०१४) में हास्य रचना प्रकाशित

१९- ‘गृहशोभा’ के दिसम्बर ‘प्रथम’ अंक (२०१४)में कहानी प्रकाशित

२०- ‘वनिता’, ‘वुमेन ऑन द टॉप’ तथा ‘सुजाता’ पत्रिकाओं के जनवरी (२०१५) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२१- ‘जागरण सखी’ के फरवरी (२०१५) अंक में कहानी प्रकाशित

२२- ‘अटूट बंधन’ मासिक पत्रिका ( लखनऊ) के मई (२०१५), नवम्बर(२०१५) एवं दिसम्बर (२०१५) अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

२३- ‘वनिता’ के अक्टूबर(२०१५) तथा फरवरी (२०१६) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२४ – राष्ट्रीय दैनिक पत्र ‘सच का हौसला’ के ‘२०/९/१६’ अंक में कहानी प्रकाशित

त्राचार का पता- टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

फैक्ट्री का सालाना जलसा होना था. तीन ही सप्ताह बच रहे थे. कायापलट जरूरी हो गया; बाउंड्री और फर्श की मरम्मत और कहीं कहीं रंग- रोगन भी. आखिर मंत्री महोदय को आना था. दरोदीवार को मुनासिब निखार चाहिए. अधिकाँश कार्यक्रम, वहीं प्रेक्षागृह में होने थे. उधर का सूरतेहाल भी दुरुस्त करना था. ए. सी. और माइक के पेंच कसे जाने थे. युद्धस्तर पर काम चलने लगा; ओवरसियर राघव को सांस तक लेने की फुर्सत नहीं. ऐसे में, नुक्कड़- नाटक वालों का कहर... लाउडस्पीकर पर कानफोडू, नाटकीय सम्वाद!! प्रवेश- द्वार पर आये दिन, उनका जमावड़ा रहता. अर्दली बोल रहा था- यह मजदूरों को भड़काने की साज़िश है. नुक्कड़- नाटिका के ज्यादातर विषय, समाजवाद के इर्द गिर्द घूमते.

एक दिन तो हद हो गयी. कोई जनाना आवाज़ चीख चीखकर कह रही थी, “बोलो कितना और खटेंगे– रोटी के झमेले में?? होम करेंगे सपने कब तक - बेगारी के चूल्हे में?! लाल क्रांति का समय आ गया... फिर एक बार!” वह डायलाग सुनकर, राघव को वाकई, किसी षड्यंत्र की बू आने लगी थी. उसने मन में सोच लिया, ‘ अब जो हो, इन बन्दों को धमकाकर, यहाँ से खदेड़ना होगा- किसी भी युक्ति से. चाहे अराजकता का आरोप लगाकर, या प्रवेश- क्षेत्र में, घुसपैठ का इलज़ाम देकर. जरूरत पड़ने पर पुलिस की मदद...’ उसके विचारों को लगाम लगी जब वह आवाज़, गाने में ढल गई.

जाने ऐसा क्यों लगा कि वह उस आलाप, स्वरों के उस उतार- चढ़ाव से परिचित था. मिस्री सा रस घोलती, चिरपरिचित मीठी कसक! राघव बेसबर होकर बाहर को भागा. उसका असिस्टेंट भौंचक सा, उसे भागते हुए देखता रहा. वह भी नासमझ सा, पीछे पीछे दौड़ पड़ा. गायिका को देख, आंखें चौड़ी हो गईं, दिल धक से रह गया...निमिष भर को शून्यता छा गयी. प्रौढ़ावस्था में भी, मौली के तेवर वही थे. बस बालों में थोड़ी चांदी उतर आई थी और चेहरे पर कहीं कहीं, उम्र की लकीरें. भावप्रणव आँखें स्वयम बोल रही थीं; आकर्षक हाव- भाव, दर्शकों को सम्मोहन में बांधे थे. वह उसे देख, हकबका गयी और अपना तामझाम समेटकर चलने लगी. संगी- साथी अचरच में थे; वे भी यंत्रवत, उसके संग चल पड़े. राघव उलटे पैरों भीतर लौट आया.

राघव के असिस्टेंट संजय ने पूछा, “क्या बात है रघु साहब? कुछ गड़बड़ है क्या??!”

“कुछ नहीं...तुम जाओ; और हाँ पुताई का काम, आज तुम ही देख लेना...मशीनों की ओवरहॉलिंग भी...मेरा सर थोड़ा दुःख रहा है”

“जी ठीक है...आप आराम करें. चाय भिजवाऊं?”

“नहीं...आई ऍम फाइन. थोड़ी देर तन्हाई में रहना चाहता हूँ”. उसे केबिन में अकेला छोड़, संजय काम में व्यस्त हो गया. उधर रघु के मन में, हलचल मची थी. बीती हुई कहानियां, फिल्म की रील की तरह रिवाइंड हो रही थीं. वह सुनहरा समय- राघव और मौली, अपने शौक को परवान चढ़ाने, ‘सम्वाद’ थियेटर ग्रुप से जुड़े. दोनों वीकेंड पर मिलते रहते. वे पृथ्वी के विपरीत ध्रुवों की भाँति, नितांत भिन्न परिवेशों से आये थे. फिर भी अभिनय का सूत्र, उन्हें बांधे रखता. कितने ही ‘प्लेज़’ साथ किये थे उन्होंने. रघु को समय लगा; थियेटर की बारीकियाँ जानने- समझने में- अभिनय- कौशल, डायलाग- डिलीवरी, पटकथा- लेखन और भी बहुत कुछ.

किन्तु मौली को यह सब ज्ञान घुट्टी में मिला था. उसके पिता लोककलाकार जो थे. घर में कलाकारों की आवाजाही रहती. इसी से बहुत कुछ सीख गयी थी. यहाँ तक कि तकनीकी बातें भी जानती थी. जैसे साउंड व लाइट इफेक्ट्स, मेकअप, बैक स्टेज का संचालन; यही नहीं - दृश्य तथा पर्दों का निर्माण भी. सम्वादों पर उसकी अच्छी पकड़ थी. बौद्धिक अभिवृत्ति ऐसी कि डायलाग सुधार कर, उसे असरदार बना देती. सामाजिक समानता को मुखर करने वाले ‘शोज़’ उसे ज्यादा पसंद थे. इसी एक बिंदु पर उन दोनों के विचार टकराते. राघव मुंह सिकोड़ कर कहता, “कैसी नौटंकी है...’सो कॉल्ड’ मजबूरी और बेचारगी का काढ़ा! टसुओं का ओवरडोज़...दिस एंड देट...टोटल पकाऊ, टोटल रबिश!! दिस इस नॉट द वे टु सॉल्व प्रोब्लेम्स”

“टेल मी द वे मिस्टर राघव” मौली उत्तेजना में प्रतिवाद कर बैठती, “आप क्या सोचते हैं कि आपके जैसे लक्ज़री में रहने वाले, समस्या को हल कर सकेंगे... नहीं रघु बाबू...फॉरगेट इट !!” और बोलते बोलते उसके कान लाल हो जाते. जबड़ों की नसें तन जातीं. निम्नमध्यम वर्ग की त्रासदी, दंश मारने लगती...आँखों के डोरे सुर्ख हो उठते और चेहरे का ‘ज्योग्राफिया’ बदल जाता. ऐसे में राघव को, हथियार डालने ही पड़ते. छोटी छोटी तकरारें कब प्यार बन गयीं, पता ना चला. मौली के दिल में भी कसक होती पर वह जबरन उसे दबा लेती. उसने राघव से कहीं ज्यादा, ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव देखे थे. वह जानती थी कि धरती और आकाश का मिलन, आभासी क्षितिज पर ही होता है.

वास्तविक जीवन फंतासियों से कहीं दूर था. उसके पिता एक छोटी सी परचून की दूकान रखे थे; जबकि राघव जाने माने वकील का बेटा था. ऐसा जुगाड़ू वकील- जिसने नेताओं से लेकर, माफिया तक से हाथ मिला रखा था. स्याह को सफेद कर दिखाना, जिसका धंधा था. पैसा ही जिसका ईमान और जीने का मकसद था. इधर मौली-- वह स्वयम डांस- क्लास चलाकर, अभावों के हवनकुंड में, आहुति दे रही थी. राघव अक्सर कहता, “ये भी कोई लाइफ है मौली?! करियर में आगे बढ़ना है तो कुछ बड़ा मुकाम हासिल करो...रेडियो, टी. वी. में ऑडिशन दे डालो. कहो तो मैं बायोडाटा तैयार करूं?? आफ्टर आल यू आर सो एक्सपीरियंस्ड...कितने कैरेक्टर प्ले किये हैं तुमने और एक से बढ़कर एक परफॉरमेंस... सिंगिंग और डांस की भी मास्टर हो तुम...”

“बस बस रघु बाबू!” उत्तेजना में मौली उसे ‘बाबू’ की पदवी दे डालती; स्वर में व्यंग्य उतर आता और शब्दवाण, राघव को निशाने पर लेते, “बाबू साहेब, हम सीधे- सादे गरीब आदमी... इज्जत की रोटी खाने वाले. दंदफंद करके एप्रोच निकाल पाना, अपन के बस में नहीं! उस पर कास्टिंग काउच...सुना है ना??!” शुभचिंतक बनने का जतन, राघव को अदृश्य कटघरे में खड़ा कर देता. ऐसे में वहां रहना असम्भव हो जाता. वह तमककर उधर से चल देता और मौली चाहकर भी उसे मना ना पाती!! यूँ ही खट्टी मीठी झड़पों में दिन बीतते रहे और एक दिन राघव को पता चला कि परिवार चलाने के लिए मौली ने रंगशाला को अलविदा कह दिया है और कोई ‘फूहड़ टाइप’ का ऑर्केस्ट्रा ग्रुप जॉइन कर लिया है. ग्रुप क्या- नौटंकी कम्पनी ही समझो. मेले- ठेले में या दारूबाज लोगों की नॉन- स्टैण्डर्ड पार्टियों में शिरकत करते थे कलाकार.

राघव के दिलोदिमाग में, धमाका सा हुआ! वह दनदनाता हुआ उनके दफ्तर पंहुचा और बिना संदर्भ- प्रसंग, मौली पर बरस पड़ा, “ बहुत ख्याल था इज्जत का. अब कहाँ है इज्जत?! दो कौड़ी की गेदरिंग्स में भाड़पना करना अच्छा लगेगा...ना कोई स्टेटस, ना डिग्निटी!!” उसकी बात से स्तंभित ना होकर, मौली ने चट नहले पे दहला जड़ दिया, “ राघव बाबू! आपके घर दो दो छोटे भाई नहीं हैं...बिन ब्याही बहन नहीं है. ऐसी बातें तभी अच्छी लगती हैं जब पेट भरा हो और गाँठ में पैसा हो. नहीं तो इन लफ्फाजियों का कोई मोल नहीं!” रघु के पूरे वजूद में, बर्फीली लहर सी दौड़ गयी थी. उसे कोई जवाब ना सूझा. पिटे हुए सिपाही की तरह, कदम पीछे खींचने पड़े. कई बार राघव ने, पैसे से मदद करनी चाही किन्तु मौली का स्वाभिमान हर बार आड़े आ गया.

राघव को लगा कि भारी भरकम जेबखर्च और तगड़ा बैंक अकाउंट –किसी काम के नहीं! एक अरसा हो गया और वे दोनों नहीं मिले. नाक का सवाल जो ठहरा! दोनों ही ऊंची नाक वाले थे. रघु ने मन को समझाया- ‘अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊंगा तभी मौली के सामने जाऊंगा... बड़े घर का नाकारा बेटा ना कह सकेगी मुझे!” प्रिया के वियोग में युगों से दिन बीतते रहे. और एक दिन...पिता ने आदेश दिया, “मेरे विधायक दोस्त हैं ना- अरे वही रामआसरे जी...रौनकनगर में पब्लिक मीटिंग कर रहे हैं. उधर चलना है...वहां नारे लगाये जायेंगे. मौजूदा सरकार की धज्जियाँ उड़ाई जायेंगी और जनता को बांधे रखने के लिए भाषणबाजी के बीच में...यू नो थोड़े बहुत मनोरंजन के कार्यक्रम भी होंगे..एंटरटेनमेंट मने शुद्ध मनोरंजन ”

यह कहते हुए वे रहस्यमय ढंग से मुस्कराए. ना जाने क्यों उस मुस्कान से, रघु सिहर गया! पिता अपने मित्र की खुराफात भरी गतिविधि से उसे जोड़ना चाहते थे. उम्मीद होगी कि राजनीति की बिसात पर बेटे को ‘पावरफुल पोजीशन’ दिला सकेंगे याकि राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर कहीं अच्छी नौकरी...” इसके आगे वह सोच ना सका. मौली का गढ़ा हुआ संवाद याद हो आया, “ आम जनता भेड़ है. सूत्रधार तो ऊपरवाले हैं जो उसका और उसकी भावनाओं का दोहन भर करते हैं’

“साहब, मैनेजमेंट का संदेसा आया है...प्रोग्राम में प्रसिद्द लोककर्मी मौलश्री को बुलाना है. उनकी कोई प्रस्तुति भी दर्शकों के सामने रखनी है और फिर उनका सम्मान....”

“मौलश्री???” संजय की बात सुन राघव नासमझ की तरह बुदबुदाया. “अरे वही! नुक्कड़ नाटिका वाली”

“ओह!!” रघु मानों नींद से जागा. तो आखिर, मैनेजमेंट का दिमाग चल गया था. फैक्ट्री के बाहर डायलॉगबाजी रोकने का उपाय था- उनकी लीडर को शीशे में उतार लेना! विचारों से बाहर आते हुए उसने पूछा, “तब फिर?”

“हमें आज ही, बल्कि अभी ही मौलीजी के पास चलना होगा...समय बहुत कम है”

“लेकिन मैं क्यों??” वह कुछ हिचकिचाया, कुछ चौंका. किन्तु दूसरे ही पल, उसे अपनी प्रतिक्रिया बेवकूफाना लगी. कार्यक्रम का कर्ताधर्ता तो वही था. उसका जाना अनिवार्य सा था. “ठीक है...” उसने थकी हुई आवाज़ में संजय से कहा, “चलते हैं” फैक्ट्री का एक राउंड लगाकर वे बाहर निकले. संजय ने स्कूटर स्टार्ट किया तो राघव यंत्रवत बैक सीट पर बैठ गया. पूछते पुछाते वे गन्तव्य की तरफ बढ़ चले. पुनः विचार मथने लगे. मौली की विवशता वह तभी समझ पाया था जब पिताजी जेल चले गये और उनका बना बनाया साम्राज्य ध्वस्त हो गया. जब आर्थिक तंगी ने उसके परिवार को जकड़ा; मौली के अभावग्रस्त जीवन का दर्द महसूस कर सका. एक हाई प्रोफाइल केस में, गलत साक्ष्य जुटाने को लेकर, पिता गिरफ्तार क्या हुए; वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा!

कैसी कैसी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी थी उसको...यादें उसे कचोटतीं- किस बेदर्दी से मौली को शर्मिंदा किया था उसने. अपना पक्ष ना रख पाई मौली और उसके निर्दय प्रेमी ने किनारा कर लिया!! रौनकनगर वाली मीटिंग में, ठुल्ले नेताओं की बकबक संग, गीत संगीत का तड़का भी लगा. आइटम सांग पर कमर लचकाती, कोई बाला नजर आयी. बेशर्म लटके झटकों और छोटे कपड़ों में, नागिन सी बलखा रही युवती पर जमकर नोट बरसाए गये. सीटियाँ बजाई गयीं, अभद्र ताने कसे गये. अजब तमाशा था. राघव भी होठ भींच कर मुस्कराया. किन्तु यह क्या! नोट बटोरते हुए युवती का घूँघट खुला और राघव के मुंह से चीख निकलते निकलते रह गयी. मौली और इस भेस में!!

बैक स्टेज पर जाकर देखा तो पाया, मौली लुटाये गये चंद चिल्लरों के लिए, आयोजकों से झगड़ा कर रही थी. राघव वितृष्णा से भर उठा था. उसकी जलती हुई दृष्टि, मौली की आँखों से जा टकराई. “बाबू!!!” मौली के स्वर में अपराध- बोध फूट पड़ा. रघु ने कुछ भी कहना सुनना मुनासिब ना समझा और पैर पटकता हुआ, वहां से निकल चला. यह तो बहुत बाद में जाना कि मौली के भाई का एक्सीडेंट हुआ था और वह कुछ अग्रिम रकम जमा कर, अस्पताल के खर्चों का बन्दोबस्त कर रही थी. उस बेचारी को भाई की जान बचानी थी; भद्दे नाच और निर्लज्ज ठुमकों के पीछे, कितनी बड़ी बेबसी रही होगी!

राघव जब तक यह जान सका, बहुत देर हो चुकी थी. जीवन नये मोड़ लेने लगा. स्मृतियों की पगडंडी, कहीं पीछे छूट गयी... प्रेयसी के पदचिन्ह खो गये- राहों की धूल में!! मौली शहर को छोड़, किसी अजानी जगह पर जा बसी थी. ना उसका कोई पता और ना ही परिवार का. विचारक्रम बाधित हुआ- जब धचका खाकर स्कूटर, मौली के द्वार रुका. “अरी बंसरी, देख तो जरा कौन आया है...कौन हो सकता है इस समय?” दूसरा वाक्य लगभग फुसफुसाकर बोला गया था. रघु और संजय अचम्भित से खड़े थे. सहसा एक हंसी सन्नाटे में खनक गयी, “क्या अम्मा...छोटे से छोटे काम में भी बंसरी की गुहार!”

“अब जाती है या...” जवाब थप्पड़ की तरह पड़ा. राघव को अब तनिक भी संदेह ना रहा कि वह ‘तथाकथित अम्मा’ मौली ही थी! उसे देख एक सर्द आह मौली के मुख से निकली. उसकी बेटी बंसरी भी वहां थी; लिहाजा धर्मसंकट और बढ़ गया. किसी भाँति बंसरी को ठेलकर बाजार भेजा, ‘मेहमानों’ के लिए मिठाई लाने वास्ते. संजय ने खुदबखुद हालात को ताड़ लिया और उन दोनों को छोड़, बाहर निकल आया. कहासुनी तो होनी ही थी उनके बीच. लेकिन गिले- शिकवों का फायदा भी हुआ. मन एक -दूजे के लिए मैला ना रहा. मानों पोखर का गन्दला पानी, निथार कर साफ़ कर दिया हो.

कारखाने की तरफ से सम्मान- प्रस्ताव रखते हुए, रघु के नयनों में भी श्रद्धा छलक पड़ी थी; और मौली के लिए तो यही सबसे बड़ा सम्मान था! राघव लौटते समय, बेहद हल्का महसूस कर रहा था. सुदर्शना बंसरी को उसने, अपने बेटे के लिए मांग लिया और मौली ने खुशी से हामी भर दी. बदले हालातों में, बदले किरदारों के बीच; वह फिर साथ साथ थे. दो शरीरों का मिलन ना हो सका तो क्या! आत्मा का जुड़ाव कुछ कम नहीं. किस्मतें भी टकरा गयीं थीं- फिर एक बार!

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विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

सम्पर्क- फ़ोन नं. – (०४८४) २४२६०२४

मोबाइल- ०९४४७८७०९२०

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में कविता प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- बोधि- प्रकाशन की ‘उत्पल’ पत्रिका के नवम्बर(२०१३) अंक में कविता प्रकाशित

१६- -जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

१८-तेजपुर की वार्षिक पत्रिका ‘उषा ज्योति’(२०१४) में हास्य रचना प्रकाशित

१९- ‘गृहशोभा’ के दिसम्बर ‘प्रथम’ अंक (२०१४)में कहानी प्रकाशित

२०- ‘वनिता’, ‘वुमेन ऑन द टॉप’ तथा ‘सुजाता’ पत्रिकाओं के जनवरी (२०१५) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२१- ‘जागरण सखी’ के फरवरी (२०१५) अंक में कहानी प्रकाशित

२२- ‘अटूट बंधन’ मासिक पत्रिका ( लखनऊ) के मई (२०१५), नवम्बर(२०१५) एवं दिसम्बर (२०१५) अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

२३- ‘वनिता’ के अक्टूबर(२०१५) तथा फरवरी (२०१६) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२४ – राष्ट्रीय दैनिक पत्र ‘सच का हौसला’ के ‘२०/९/१६’ अंक में कहानी प्रकाशित

त्राचार का पता- टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

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वह तथाकथित जिम सीलन से भरा था. जमीन पर बिछा, टाट के बोरे जैसा कारपेट, हवाओं में रेडियो मिर्ची के सुरों की धमक और यहाँ वहां उड़ने वाले पसीने के भभके. कसरत- वर्जिश वाला यह औरतों का स्लॉट था. थुलथुल देह वाली स्त्रियाँ, ट्रेडमिलों और एक्सरसाइजिंग साइकलों पर जुटीं- दौड़तीं, हांफतीं, साँसें भरतीं. स्पीडोमीटर के ग्राफ, उनकी ‘पुअर परफॉरमेंस’ की चुगली करते हुए! सुनन्दा ने बौखलाहट में, कमरे का मुआइना किया. ‘टारगेट’ पूरा करने को, जूझती महिलायें...परस्पर मशीन और बदन के नट- बोल्टों की जुगलबन्दी ... असाध्य करतब...चित्र- विचित्र मुद्राओं में अटकती, लटकती, मटकती बालाएं! ट्विस्टर पर कमर फिरकनी सी नचातीं, नटी की तरह बैलेंसिंग बीम पर, पैर जमातीं या फिर रोइंग- मशीन पर, जोर- आजमाइश करतीं.

सुनन्दा ने बोतल का पानी, एक ही सांस में गटक लिया. माथे पर उभर आयी पसीने की बूंदों को नैपकिन से पोंछा. बिना कुछ किये ही, उनका ये हाल था. सहसा फ्लोर एक्सरसाइज कर रही युवती का ध्यान, उनकी तरफ खिंचा. वह फौरन उठ खड़ी हुई और सुनन्दा से पूछा, “आप न्यू- मेम्बर हैं?” उन्होंने बिन बोले ही, अपना परिचय- पत्र, उसकी तरफ बढ़ा दिया. वह औचक ही मुस्कराई, “सो यू आर मिसेज सुनंदा शर्मा ...टुडे इटसेल्फ यू कैन स्टार्ट. शुरू शुरू में १५ मिनट का वार्मअप और ३० मिनट का वर्कआउट काफी रहेगा. उसके बाद धीरे धीरे, ड्यूरेशन बढ़ाना होगा”

“ओह...अच्छा” प्रौढ़ा मिसेज शर्मा की, स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया थी. युवती ने उन्हें कुछ शुरुआती व्यायाम करवाए; फिर वेट लिफ्टिंग और पैडलिंग भी. उनकी सांस बेतरह फूलने लगी. “अरे आंटी”, किसी ने कहा, “आपको ज्यादा ही मेहनत करवा दी” उन्होंने पास खड़ी लड़की को गौर से देखा. उसने अपनी कई सारी लटों को, लाल रंग से रंग रखा था. वह कमर में छल्ले डाल, उन्हें फिरकी की तरह घुमा रही थी. कसी हुई जालीदार टी. शर्ट और मटमैले शॉर्ट्स, पसीने में तर, बदन से चिपके हुए. लड़की के रंग ढंग देख, कुछ हिकारत जैसी महसूस हुई. तो भी लोकाचार के नाते, एक संक्षिप्त मुस्कान, उसकी तरफ उछालनी ही पड़ी.

“बेटा क्या नाम है तुम्हारा?” मुस्कान के साथ ही शब्द भी फूट पड़े.

“तरंग आंटीजी”

“ओह” सुनंदा जी पुनः मुस्करायीं और अपने काम में लग गयीं. कन्या निहायत बातूनी थी. वह इतने में ही पीछा नहीं छोड़ने वाली थी, “ आप कहाँ से आती हैं”

“गुलाबगंज से”

“आई सी...मैं तो अक्सर, उधर जाती हूँ... नटराज रंगशाला है ना- वहीं पर”

“हूँ” सुनंदा ने बेमन से कहा. “वहां मेरे प्ले होते रहते हैं” सुनंदा जी के लिए, वार्तालाप कठिन होता जा रहा था- श्वास अनियंत्रित और स्वेद में नहाई देह. संयोग से तरंग की सहेली वहां आ धमकी और तब जाकर उसकी बकबक बंद हुई.

“हाय मोनिला” तरंग ने उछलकर और चहककर उस ‘सो कॉल्ड’ मोनिला को गले से लगा लिया. आगन्तुक लड़की को देख, सुनंदाजी बुरी तरह चौंक पडीं. वही मुखड़ा...वही चेहरे की गढ़न, आँख, नाक होंठ- सब वही! अतीत में खो गयी, सुपरिचित आत्मीय छवि पुनः जीवंत हो उठी!! मोनिला हंस रही थी. मन के सोये तार, उस हंसी से झनझना पड़े. इस सबसे बेखबर, वह कहे जा रही थी, “यू नो...आज आशू के साथ, मेरी डेट है’

“वाऊ यू लकी गर्ल! ही इज़ सो डैशिंग. तमाम लड़कियों का दिल, जेब में लिए घूमता है. एक बार आया था थियेटर में... रेनोवेशन के सिलसिले में. यू नो- थिएटर को रेनोवेट करने का कॉन्ट्रैक्ट, उसके फादर को मिला है!”

“ओह...फिर?”

“फिर क्या?! अपनी सोफ़िया मैम तो बिलकुल लट्टू हो गयीं उस पर!”

“इज़ दैट सो?”

“येस ऑफ़ कोर्स! कहने लगीं कि हमारे नये एक्ट में हीरो का रोल प्ले कर लो. पर बंदे ने टका सा जवाब दे दिया- यू सी. ही हैड बीन रूड टु हर! मना करने के हजार तरीके होते हैं. वह चाहता तो कोई बहाना भी बना सकता था... सच इन्सोलेंस, सच एरोगेन्स!!”

“व्हाट इज दिस?? यू आर क्रिटिसाइजिंग माय बिलवेड ऑन माय फेस?!” मोनिला के मुख पर चढ़ते- उतरते रंग, सुनंदा को फिर उसी पुरानी छवि की याद दिला गये- वैसे ही तेवर! होंठों का खुलना और बंद होना ...टेढ़ी भंवें और आँखों से टपकता आक्रोश, “ये मां बाप भी! हम लडकियों की फीलिंग्स कभी नहीं समझ पायेंगे...जनरेशन गैप ही तो है, और क्या!”

“क्यों क्या हुआ?” सुनंदा ने तब अचरज से पूछा था. “देख जब हाई- एजुकेशन की बात आती है तो पल्ला झाड़ लेते हैं. कहते हैं- ‘लड़की जात हो. कोचिंग- ट्यूशन जाओगी तो एक जने को संग चलना पड़ेगा. हर बखत पहरेदारी कौन करे?!’ इनके हिसाब से तो, घर के बगल वाले कॉलेज में एडमिशन ले लो. लिखाई- पढ़ाई सिफर हो तो हो- इनके ठेंगे से!”

“ये बात कहाँ आ गयी री?! तू तो बी. कॉम. के बाद, जॉब भी करने लगी...फिर??”
“देखो डिअर, बात तो यहीं से शुरू होती है. लड़कियों को पढ़ने न दो. फीस के लिए, गाँठ मत ढीली करो; भले दहेज में, पगड़ी नीलाम हो जाए!... ऊंची तालीम लेकर क्या करेंगी- जब रसोईं में ही मरना- खपना है! इस ‘ट्रांजीशन पीरियड’ में, जब लडकियाँ हर फील्ड में, लड़कों को चुनौती दे रही हैं; ये लोग पुराणपंथी बने बैठे हैं.” सुनंदा एक झटके में, अतीत से वर्तमान में आ गयी. संक्रमण का वह युग- जब जीवन- मूल्य, नये सिरे से परिभाषित हो रहे थे. ‘रीमिक्स’ वाली सभ्यता, सांस्कृतिक मान्यताओं को नकार रही थी...मोनिषा रवि से विवाह करना चाहती थी. जिस कोचिंग में वह पढ़ाती थी, रवि वहां के संचालक थे.

मोनिषा के मां- बाप ‘विलेन’ बनकर खड़े हो गये. साफ़ कह दिया, “तुम उस दो कौड़ी के मास्टर से ब्याह नहीं करोगी. अफसर बाप की बेटी हो, गली के भिखारी की नहीं! अपने बाऊजी की इज्जत का कुछ तो ख़याल करो...बिरादरी में थू थू होगी; क्या तुम्हें अच्छा लगेगा?!” यहीं पर मोनिषा अड़ गयी. अपने समान मानसिक और शैक्षणिक स्तर वाला रवि उसे भाता था. रवि उसको बहुत मानता था, सम्मान देता था. घरवालों का सुझाया लड़का, क्या वाकई उसे प्रेम करेगा? पिता को अफसर जंवाई ही चाहिए था. किन्तु जो व्यक्ति, दहेज़ के लिए, अपने पद, अपनी काबिलियत की बोली लगाता हो; उसको खुश रख सकेगा??

गहरा प्रेम तो समान बौद्धिकता, समान अंतर्दृष्टि वाले इंसान से ही हो सकता था. उसके अपने घर में, मां और अन्य स्त्रियाँ, कम पढ़ी लिखी होने की प्रताड़ना झेलती थीं. ठसकदार पति का रुआब, उनके वजूद को नगण्य कर देता. घरवालों की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए, उसे किसी उच्च पदस्थ अधिकारी के साथ फेरे लेने थे- पितृसत्ता की रची रचाई साजिश के तहत, चहारदीवारी का गुलाम बनना था. गर उसे भी काबिल बनने दिया होता; पढ़ाई के बजाय, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई सीखने का हठ न किया होता तो तस्वीर कुछ और ही होती! बदलाव के उस दौर में, मोनिषा अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ रही थी और बदलाव के ही दूसरे दौर में, हूबहू मोनिषा जैसी दिखने वाली मोनिला अपनी छद्म स्वतंत्रता के लिए. इतनी उच्छ्र्न्खलता...इतना खुलापन ...निजी मसलों की सरेआम नुमाइश!

आखिर सुनंदा की ख़ास सहेली, मोनिषा जैसी सूरत वाली मोनिला थी कौन? घंटे की कानफोडू आवाज़ के साथ ही, स्लॉट ख़त्म हुआ और सुनंदा शर्मा का विचारक्रम टूटा. उन्होंने मन ही मन कुछ निश्चय किया. अगले दिन वे, उन दो लड़कियों के पास जाकर ही, ‘पुश- अप्स’ करने करने लगीं. “हाय आंटी” तरंग ने उन्हें विश किया तो वह भी प्यार से “हलो बेटा” बोलीं. “आंटीजी, आप देसी घी खाती हैं क्या?” तरंग की बात सुनकर इस बार, मोनिला ने भी उन्हें ध्यान से देखा. ‘वार्मअप’ की मशक्कत से, उसके गुलाबी गाल, लाल हो रहे थे. सुनंदा जानकर मुस्करायीं. दिल को दिल से राह मिली, “हलो आंटी, मैं मोनिला हूँ”

“बेटा, आप बहुत क्यूट हो...जरूर आपकी ममा भी बहुत सुंदर होंगी; ऍम आई राईट?” मोनिला हिचकिचाकर बोली, “लोग कहते हैं कि मैं अपनी मॉम की कार्बन कॉपी हूँ- मोनिषा वर्मा की बेटी मोनिला वर्मा!” उत्तेजना में वह अपनी मां का नाम बता गयी थी. अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी थी. मोनिला की मां मोनिषा ही, उनकी प्रिय सखी थी. सुनंदा जी ने घर जाकर, अपने सम्पर्क सूत्रों को टटोला. पुरानी डायरी से, पुराने पतों को नोट किया. दूसरे दिन कान, उन कन्याओं की बातचीत पर ही लगे थे.

“क्या हाल हैं आशू के?”

“जल्द ही हम दोनों फ्रेंडबुक पर, अपनी रिलेशनशिप एनाउन्स करने वाले हैं”

“वाऊ इट्स ग्रेट...सो यू विल बी लिविंग टुगेदर!” सुनंदा जी के कान खड़े हो गये और दिल जोरों से धड़कने लगा. उस दिन उनका मन, किसी वर्जिश में नहीं लगा. उस दिन ही क्यों- दिनोंदिन, बेचैनी उन्हें घेरे रही. खुद को ठेलकर, वे जैसे- तैसे जिम जाती रहीं; पर सप्ताह भर तक मोनिला के दर्शन नहीं हुए. हफ्ते भर बाद वह अचानक प्रकट हुई तो तरंग ने उससे पूछा, “क्यों जी, आशू के साथ कुछ ज्यादा बिजी थीं?” कहते हुए अपनी एक आँख भी दबाई. इस बार, मोनिला की प्रतिक्रिया, सर्वथा भिन्न थी. वह आशू का नाम सुनकर उछली नहीं बल्कि लजाकर बोली, “ही इज माय फियॉन्सी नाऊ...ममा ने कहा है- शादी के पहले ज्यादा मिलना जुलना ठीक नहीं”

“पर ये चमत्कार हुआ कैसे?!” तरंग बेहद चकित थी. “ना जाने कैसे मॉम को मेरे और आशू के बारे में पता चल गया. उन्होंने आशू की फॅमिली हिस्ट्री छान मारी...आशू के घर में एस्टेब्लिश्ड बिसनेस है. वे उन लोगों से बेहद इम्प्रेस्ड हुईं. तुम तो जानती हो –मां एक जानी मानी पॉलिटिशियन हैं. दैट इज व्हाई, उन लोगों को भी हमारा रिश्ता पसंद आया.”

‘विवाह को लेकर मोनिषा ने, बेटी की पसंद को जाना और परखा...उसकी भावनाओं की कद्र की; इसमें आश्चर्य कैसा?! वह स्वयम खुले दिमाग की है...प्रेम और निजी सम्बन्धों में, स्वतंत्रता की हिमायती रही है’ सुनंदा ने अपनेआप से कहा. मोनिला ने एक सांस में, पूरी कहानी उगल दी; फिर भी, तरंग की तीसरी इन्द्रिय कुलबुला रही थी, “लेकिन उन्हें, तुम दोनों प्रेमियों के प्रेम का पता कैसे चला?!” सहेली के प्रश्न पर मोनिला चुप थी. इस पहेली में, वह भी उलझ गयी थी.... जिज्ञासा का समाधान, उसको भी चाहिए था. उस समय, यदि सुनन्दाजी की रहस्यमय मुस्कान को देखा होता तो प्रश्न अनुत्तरित न रहता. लड़कियों को अपने सवाल का जवाब, मिल ही गया होता!

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परिचय

विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

सम्पर्क- फ़ोन नं. – (०४८४) २४२६०२४

मोबाइल- ०९४४७८७०९२०

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में कविता प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- बोधि- प्रकाशन की ‘उत्पल’ पत्रिका के नवम्बर(२०१३) अंक में कविता प्रकाशित

१६- -जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

१८-तेजपुर की वार्षिक पत्रिका ‘उषा ज्योति’(२०१४) में हास्य रचना प्रकाशित

१९- ‘गृहशोभा’ के दिसम्बर ‘प्रथम’ अंक (२०१४)में कहानी प्रकाशित

२०- ‘वनिता’, ‘वुमेन ऑन द टॉप’ तथा ‘सुजाता’ पत्रिकाओं के जनवरी (२०१५) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२१- ‘जागरण सखी’ के फरवरी (२०१५) अंक में कहानी प्रकाशित

२२- ‘अटूट बंधन’ मासिक पत्रिका ( लखनऊ) के मई (२०१५), नवम्बर(२०१५) एवं दिसम्बर (२०१५) अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

२३- ‘वनिता’ के अक्टूबर(२०१५) तथा फरवरी (२०१६) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२४ – राष्ट्रीय दैनिक पत्र ‘सच का हौसला’ के ‘२०/९/१६’ अंक में कहानी प्रकाशित

त्राचार का पता- टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

 

घूंधराले वालों वाली सूजी एक प्यारी सी बच्ची थी. वह कक्षा 4 में पढ़ती थी. एक दिन सूजी अपने दोस्त अकबर के घर गई तो देखा कि उसके हाथ में सफेद रुई जैसे बिल्ली के 2 छोटे बच्चे हैं. बच्चे बहुत ही सुंदर और नाजुक थे, इतने छोटे बिल्ली के बच्चों को उसने पहली बार देखा था. “ कितने प्यारे बच्चे हैं, काश मेरे पास भी ये होते” सूजी दुखी हो कर बोली. अकबर ने कहा “इनमें से एक बच्चा तुम रख सकती हो, ये तुम्हारे जन्मदिन का गिफ्ट है”. कुछ दिनों बाद ही सूजी का जन्मदिन आने वाला था. “सच में, मैं अभी घर जा कर मां को इसे दिखाती हूँ”. सूजी खुशी से चहक उठी और बिल्ली के बच्चे को लेकर घर की ओर दौड़ लगा दी. “मम्मी देखो अकबर ने मुझे जन्मदिन में क्या गिफ्ट दिया है”. मम्मी ने उसके हाथ में सफेद छोटा सा बिल्ली का बच्चा देखा. सूजी ने खुश होते हुए कहा “मम्मी हम इसका नाम पोपो रखेगें”. मम्मी ने तुरंत पोपो के लिए एक बक्से में कपड़े और रुई लगा कर घर बना दिया और उसे सूजी के कमरे में रख दिया. सूजी पोपो के साथ खेलने में लग गई. शाम में सूजी ने अपने दोस्तों को पोपो से मिलवाया.

सूजी के जन्मदिन को एक दिन बाकी था, मम्मी ने उससे कहा कि वह अपने सभी दोस्तों को कल उसके जन्मदिन की पार्टी के लिए घर आने का न्यौता दे आये. जब वह अकबर के घर गयी तो अकबर ने कहा “सूजी हमें पोपो का जन्मदिन भी मनाना चाहिए”. सूजी सोच में पड़ गई.

वह घर आई और मम्मी से कहा “मम्मी मेरे जन्मदिन के दिन पोपो का भी जन्मदिन मनायेगें. मम्मी उसकी बात सुन कर हँस पड़ी और कहा “जानवररों का भी कोई जन्मदिन होता हैं”. “मम्मी अगर हमारा जन्मदिन हो सकता है तो जानवरों का क्यों नही? वैसे भी पोपो जानवर नही है वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त हैं.’ सूजी दुखी हो गई. तब मम्मी ने कहा “ठीक है हम तुम्हारे जन्मदिन के साथ साथ उसका भी जन्मदिन मनायेगें”.सूजी ने खुश होकर कहा “थैंकयू मम्मी”.

सूजी ने अपने जन्मदिन के दिन पोपो के बालों में कंघी की,गले में लाल रंग का रिबन बांध कर उसे तैयार किया. धीरे धीरे सूजी के सभी दोस्त आ गये. अब केक काटने का समय आ गया था. टेबल में एक बड़ा और एक छोटा केक का डब्बा रखा था. सब सोच रहे थे कि ‘आज तो केवल सूजी का जन्मदिन है पर यहाँ तो दो केक रखे हैं,दूसरा कौन है जिसका आज जन्मदिन है?’

जब केक काटने का समय आया, तब सभी बच्चों ने कहा “अंकल आज तो केवल सूजी का जन्मदिन है फिर ये छेाटा वाला केक किसके लिए है?” सूजी के पापा ने कहा “बच्चों अभी थोड़ी देर में पता चल जायेगा तब तक सूजी बड़े वाले केक को काटेगी”. सूजी ने केक को काटा और सबने तालीयां बजायी। फिर छोटा केक खोला गया जिसमें लिखा था ‘जन्मदिन की बधाई पोपो’. तब सब बच्चों के सामने छोटे केक का राज खुला.आज सूजी के साथ साथ पोपो का भी जन्मदिन मनाया जा रहा है. सभी बच्चे बहुत खुश हुए और बच्चों ने पोपो को भी जन्मदिन की बधाई दी और दो-दो केक खाने के मजे लिए. पोपो भी मियाऊ मियाऊ करता बच्चों के आसपास घूमता रहा.

ई मेल- upasana2006@gmail.com

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सूर्यकुमार पांडेय की हास्य कविता -"एकतरफ़ा प्यार"

 

इक चाँदनी-सी लड़की, स्मार्ट दिख रही है 

वह दूर देश से ख़त 'इन्बॉक्स' लिख रही है।

 

उससे नहीं मिला मैं, मुझसे नहीं मिली वह 

मैं जानता नहीं हूँ, किस बाग़ की लिली वह।

 

ख़ुशबू  हरेक अक्षर में  गीत भर रही है

पर एक ख़त वो कइयों को टैग कर रही है । 

 

जिस-जिस को ख़त मिला, वह उन सबको अपनी लगती 

आकांक्षा मिलन की हर हृदय में सुलगती।

 

है शशिमुखी, सभी का तम दूर कर रही है 

वह चाँदनी सभी के आँगन में भर रही है ।

 

यह मानता हूँ, चेहरा लाखों में एक उसका 

यूँ भाव से है सच्ची, पर चित्र 'फेक'उसका ।

 

कुछ ग़लत लिख गया तो अब एंड कर ही देगी 

यह भी पता है, मुझको  'अनफ़्रेन्ड' कर ही देगी।

 

इक चाँदनी-सी चाहत से, हाय! डर रहा हूँ

वह 'फेक' है या 'रीयल', मैं प्यार कर रहा हूँ।

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हाइकू -24
गौरैया
सुशील शर्मा

चोंच में दाना
उठा उड़ी गोरैया
चुगाती चूजे।

कब आओगी
गौरैया मेरे द्वार
दाना चुगने।

पेड़ पर है
तिनकों का घोंसला
गौरैया नहीं।

नन्ही गौरैया
फुदक फुदक कर
दाना चुगती।

मुन्ने के सिर
फुदक रहा चूजा
प्रेम बंधन।

अंजुरी भर
प्रेममयी गोरैया
स्नेहिल स्पर्श।
----

हाइकू -16

विविध

सुशील कुमार शर्मा

1. नीली सी आँखे

कौन कहेगा इन्हें

कत्लोगारत।

2. तुझ से इश्क

नहीं था शौक मेरा

मज़बूरी थी।

3. यादों के बक्से

सहेजे चंद पल

मुलाकातों के।

4. तुमसे कभी

मुलाकात न हुई

ख्वाब था टूटा।

5. तुम दूर थे

लेकिन जुदा न थे

अब फासले।

6. खूबसूरत

तेरा चेहरा न था

तेरी सादगी।

7. सोता शहर

अंदाज है गजब

गूंगे बहरे।

8.उरी घटना

ख़ौलता मेरा खून

जबाब मौन।

9.नापाकी नक्शा

मिटा दो जमीन से

जुमले छोड़ो।

 

11.सैनिक लाशें

मांग रहीं इंसाफ

बोलो तो साब।

हाइकू -17

कवि और कविता

सुशील कुमार शर्मा

1. कवि सपेरा

भावों की पिटारी

शब्दों के सांप।

2. कवि ह्रदय

जैसे जल कमल

शुद्ध निर्लेप।

3. कवि का कर्म

नव जीवन संचार

उच्च विचार।

4. कवि का मन

प्रेम से परिपूर्ण

शाश्वत दृष्टी।

5. पहुंचे कवि

जहाँ न जाये रवि

अतुलनीय।

6. कवि का काम

सत्य परिभाषित

मन झंकृत।

7.महान कवि

अहंकार से परे

शिशु सदृश्य।

8 .कवि की कृति

सौंदर्य अनुभूति

आनंद सुधा। 

9. कवि के शब्द

अन्धकार में दीप

शीतल जल।

 

10. कविता कला

भावना से रंजित

सत्य समृद्ध।

11.कवि निर्जीव

दुःख दर्द से दूर

खोखलापन। 

12.खुद को चीर

शब्द भाव गंभीर

  बुनी कविता। 

13.शोषित वर्ग

कविता का आधार

बिफरे शब्द।

 

14. कविता मौन

कोलाहल से परे

  एक बीज है।

15. झंकृत शब्द

ह्रदय उदगार

झूमी कविता।

हाइकू -18 

दुःख और कर्म

सुशील कुमार शर्मा

1.मन के कष्ट

जीवन की कसौटी

सभी के पास।

 

2. दुखी ह्रदय

मन की संवेदना

गिरते अश्रु।

3. कर्म का फल

हमेशा रहे साथ

न हो निष्फल।

4. धरा पर कर्म

धनुष छूटा तीर

चूके न शर।

5. कर्म फल है

शब्द बने पत्तियां

तना शरीर।

6. कर्म आकृति

तप मेरा ह्रदय

क्रिया शरीर।

7.सूर्य में तेज

कर्म से प्रकाशित

मनुज देह।

8 .कर्म का लक्ष्य

गुणोत्तर आनंद

बंधन मुक्त।

9. निष्काम कर्म

अनासक्त मनुष्य

साधना पथ।

10. कर्म कुसुम

ईश्वर को अर्पित

अहं से मुक्त।

11.सुन्दर कर्म

स्वर्ग में अभिसार

प्रभु के संग।

हाइकू-19

उरी कांड

उरी घटना

ख़ौलता मेरा खून

जबाब मौन

नापाकी नक्शा

मिटा दो जमीन से

जुमले छोड़ो।

सैनिक लाशें

मांग रहीं इंसाफ

बोलो तो साब।

फिर से चला

पाक का षडयंत्र

शेर शहीद

कहाँ खो गया

छप्पन इंच सीना

चीखा शहीद।

पाक की हस्ती

पैर से कुचल दो

नरेंद्र मोदी।

सुन बे पाक

हरकतें नापाक

मर जायेगा।

1947 से

नस्तर सा चुभता

ये पाकिस्तान।

हिन्द अखंड

ह्रदय धधकता

ज्वाला प्रचंड।

सवा अरब

भारतीयों की आन

पैर के नीचे।

वीरों के सिर

सिंहासन निष्ठुर

कौन दे न्याय।

चार कुत्तों में

खोये सत्रह शेर

बदला लेना।

हाइकू-20

चाँद

सुशील शर्मा


चाँद सी गोल

गरीब की रोटियाँ

थाली में तारे।


चाँद किनारे

सुनहरे सपने

बुनने तो दो।


चाँद चकोरी

कह कर बतियाँ

बहलाओ ना।


चाँद छत पे

पर तुम न मिले

कल का वादा।


छुपता चाँद

घूँघट में चेहरा

दीदार तेरा।


ईद का चाँद

चिलमन से झाँका

प्यारा चेहरा।


मन का चाँद

अनंत आसमान

उड़ता पंक्षी।


शुभ्र धवल

उज्जवल प्रांजल

शशि नवल।


चाँद सी बिंदी

सुहागन के माथे

पिया का संग।


चाँद निकला

पर तुम न आये

उदास रात।


चाँद का दाग

मुख पर ढिटोना

कित्ता सलोना।


नीरज निशा

पिया गए विदेश

बैरी निंदिया।


चाँद सी तुम

बिखेरती चांदनी

महकी रात।


तुम्हे क्या कहूँ

चौदहवीं का चाँद

या आफताब।


चंदा रे चंदा

संदेशा उन्हें देना

पिया बावरी।


ओ चंदा मामा

मुनिया के खिलौने

साथ में लाना।


हाइकू -21

सुशील शर्मा

क्रोध

मन का क्रोध

अच्छी स्मृतियाँ लोप

स्वयं का दुःख।


क्रोध का बैरी

विनय निरुत्तर

पिघले क्रोध।


क्रोध की काट

कोई अस्त्र न शस्त्र

मौन का मन्त्र।


क्रोध उपजे

बुद्धि विवेक भ्रांत

मस्तिष्क बंद।


कम विवेक

मानव बना दैत्य

क्रोध है पाप


क्रोध है अग्नि

अच्छाई का हवन

भस्म जीवन।


क्षमा


ह्रदय धर्म

क्षमा करना सबको

परम तप


क्षमा की आभा

पुरुषों का भूषण

स्त्रियों की शोभा।


क्षमा ही धर्म

मान को दे समृद्धि

क्षमा सत्य है।


विश्व सम्मान

क्षमाशील मानव

उत्तम गति।


क्षमा में शांति

दंड में उल्लास

क्षमा पवित्र।


मुस्कराहट


मुस्कुरा कर

मत देख जालिम

तेरे हैं हम।


मुस्कराहट

बहती ताज़ी हवा

सरसराई।


धर्म

शरीर धर्म

दीन दुखी की सेवा

सबका सुख।


मानव धर्म

अहं रहित सेवा

जीवन मूल।


धर्म का मूल

करुणा और दया

कर्म प्रेरणा।


धर्म की व्याख्या

मानवीय गौरव

सदाचरण।


धर्म का तत्व

ह्रदय ग्राह्य ज्ञान

बुद्धि से परे।


धर्म का आकार

सामाजिक समता

यश सम्मान।


धर्म से प्रेम

राष्ट्रीयता के भाव

स्व का अर्पण।


धर्म की बात

न हो प्रवचन

सत आचार।


चिंता


मन की चिंता

शरीर की दुश्मन

चिता सामान


चिंता ही चिता

चिता दहे निर्जीव

चिंता सजीव।

हाइकू -22

जीवन

सुशील शर्मा


जीवन पथ

कठिन संघर्ष रत

नित नूतन।


जीवन गीत

बहता निर्मल जल

शस्य कमल।


जीवन धन

पुरुषोचित कर्म

आत्म सम्मान।


जीवन पथ

नित नव संघर्ष

प्रगति रथ।


जीवन लक्ष्य

अभिनव भविष्य

वासना मुक्त।


जीवन यात्रा

प्रवाह चरामेति

सिंधु की ओर।


जीवन पुष्प

जगत उपवन

रजनीगंधा।


जीवन मृत्यु

शरीर अवसान

नवीन यात्रा।


जीवन संध्या

उजास और तम

लक्ष्मण रेखा।


जीवन गति

अभिलाषा के पंख

सार्थक लक्ष्य।


जीवन सत्य

परमात्मा का ध्यान

अंतरतम।


दिव्य जीवन

पारमार्थिक भाव

बुद्धि साधना।

हाइकू -23

गाँव

सुशील शर्मा


गोरी का गांव

लहराता दुपट्टा

भरी गगरी।


आम की छाँव

नमक संग रोटी

खेत में हल।


गांव की गैया

दुलारती बछड़ा

दुहती मैया।


दद्दा का मुन्ना

कांधे लटका बस्ता

बहती नाक।


गांव का स्कूल

घंटी बजाते बच्चे

गुरु की छड़ी।


गांव की नदी

लहराती चुनरी

सरसराई।


साँझ की बेला

धूल उड़ाते ढोर

जलते दीये।


सुन्दर खेत

हरयाती फसल

चुगते पंछी।


पेड़ पर चढ़ी

मोहन की मुनिया

झूलती झूला।


मन को भाये

गांव का मधुवन

सुख सदन
----

हाइकू -20

सुशील शर्मा

क्रोध

मन का क्रोध

अच्छी स्मृतियाँ लोप

स्वयं का दुःख।

क्रोध का बैरी

विनय निरुत्तर

पिघले क्रोध।

क्रोध की काट

कोई अस्त्र न शस्त्र

मौन का मन्त्र।

क्रोध उपजे

बुद्धि विवेक भ्रांत

मस्तिष्क बंद।

कम विवेक

मानव बना दैत्य

क्रोध है पाप

क्रोध है अग्नि

अच्छाई का हवन

भस्म जीवन।

क्षमा

ह्रदय धर्म

क्षमा करना सबको

परम तप

क्षमा की आभा

पुरुषों का भूषण

स्त्रियों की शोभा।

क्षमा ही धर्म

मान को दे समृद्धि

क्षमा सत्य है।

 

विश्व सम्मान

क्षमाशील मानव

उत्तम गति।

क्षमा में शांति

दंड में उल्लास

क्षमा पवित्र।

मुस्कराहट

मुस्कुरा कर

मत देख जालिम

तेरे हैं हम।

मुस्कराहट

बहती ताज़ी हवा

सरसराई।

धर्म

शरीर धर्म

दीन दुखी की सेवा

सबका सुख।

मानव धर्म

अहं रहित सेवा

जीवन मूल।

धर्म का मूल

करुणा और दया

कर्म प्रेरणा।

धर्म की व्याख्या

मानवीय गौरव

सदाचरण।

धर्म का तत्व

ह्रदय ग्राह्य ज्ञान

बुद्धि से परे।

धर्म का आकार

सामाजिक समता

यश सम्मान।

धर्म से प्रेम

राष्ट्रीयता के भाव

स्व का अर्पण।

धर्म की बात

न हो प्रवचन

सत आचार।

चिंता

मन की चिंता

शरीर की दुश्मन

चिता सामान

चिंता ही चिता

चिता दहे निर्जीव

चिंता सजीव।

हाइकू-19
उरी कांड

उरी घटना
ख़ौलता मेरा खून
जबाब मौन

नापाकी नक्शा
मिटा दो जमीन से
जुमले छोड़ो।

सैनिक लाशें
मांग रहीं इंसाफ
बोलो तो साब।

फिर से चला
पाक का षडयंत्र
शेर शहीद

कहाँ खो गया
छप्पन इंच सीना
चीखा शहीद।

पाक की हस्ती
पैर से कुचल दो
नरेंद्र मोदी।

सुन बे पाक
हरकतें नापाक
मर जायेगा।

1947 से
नस्तर सा चुभता
ये पाकिस्तान।

हिन्द अखंड
ह्रदय धधकता
ज्वाला प्रचंड।

सवा अरब
भारतीयों की आन
पैर के नीचे।

वीरों के सिर
सिंहासन निष्ठुर
कौन दे न्याय।

चार कुत्तों में
खोये सत्रह शेर
बदला लेना।

हाइकू -18 

दुःख और कर्म

सुशील कुमार शर्मा

1.मन के कष्ट

जीवन की कसौटी

सभी के पास।

 

2. दुखी ह्रदय

मन की संवेदना

गिरते अश्रु।

3. कर्म का फल

हमेशा रहे साथ

न हो निष्फल।

4. धरा पर कर्म

धनुष छूटा तीर

चूके न शर।

5. कर्म फल है

शब्द बने पत्तियां

तना शरीर।

6. कर्म आकृति

तप मेरा ह्रदय

क्रिया शरीर।

7.सूर्य में तेज

कर्म से प्रकाशित

मनुज देह।

8 .कर्म का लक्ष्य

गुणोत्तर आनंद

बंधन मुक्त।

9. निष्काम कर्म

अनासक्त मनुष्य

साधना पथ।

10. कर्म कुसुम

ईश्वर को अर्पित

अहं से मुक्त।

11.सुन्दर कर्म

स्वर्ग में अभिसार

प्रभु के संग।


हाइकू -17

कवि और कविता

सुशील कुमार शर्मा

1. कवि सपेरा

भावों की पिटारी

शब्दों के सांप।

2. कवि ह्रदय

जैसे जल कमल

शुद्ध निर्लेप।

3. कवि का कर्म

नव जीवन संचार

उच्च विचार।

4. कवि का मन

प्रेम से परिपूर्ण

शाश्वत दृष्टी।

5. पहुंचे कवि

जहाँ न जाये रवि

अतुलनीय।

6. कवि का काम

सत्य परिभाषित

मन झंकृत।

7.महान कवि

अहंकार से परे

शिशु सदृश्य।

8 .कवि की कृति

सौंदर्य अनुभूति

आनंद सुधा। 

9. कवि के शब्द

अन्धकार में दीप

शीतल जल।

 

10. कविता कला

भावना से रंजित

सत्य समृद्ध।

11.कवि निर्जीव

दुःख दर्द से दूर

खोखलापन। 

12.खुद को चीर

शब्द भाव गंभीर

  बुनी कविता। 

13.शोषित वर्ग

कविता का आधार

बिफरे शब्द।

 

14. कविता मौन

कोलाहल से परे

  एक बीज है।

15. झंकृत शब्द

ह्रदय उदगार

झूमी कविता।


हाइकू -16

विविध

सुशील कुमार शर्मा

1. नीली सी आँखे

कौन कहेगा इन्हें

कत्लोगारत।

2. तुझ से इश्क

नहीं था शौक मेरा

मज़बूरी थी।

3. यादों के बक्से

सहेजे चंद पल

मुलाकातों के।

4. तुमसे कभी

मुलाकात न हुई

ख्वाब था टूटा।

5. तुम दूर थे

लेकिन जुदा न थे

अब फासले।

6. खूबसूरत

तेरा चेहरा न था

तेरी सादगी।

7. सोता शहर

अंदाज है गजब

गूंगे बहरे।

8.उरी घटना

ख़ौलता मेरा खून

जबाब मौन।

9.नापाकी नक्शा

मिटा दो जमीन से

जुमले छोड़ो।

 

11.सैनिक लाशें

मांग रहीं इंसाफ

बोलो तो साब।
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हाइकू -14

सुशील कुमार शर्मा

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ईर्षा

---------------

काली नागिन

विष फुफकारती

मन की ईर्ष्या।

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मन में ईर्षा

स्वाभाविक पृवत्ति

अवहेलनीय।

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हीनता बोध

पनपती है ईर्ष्या

दे संकीर्णता।

-----------------

उन्नति

--------------------

स्वयं सुधार

उन्नति का आधार

सबका सुख।

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भावों की शुद्धि

जीवन में उन्नति

पवित्र मन।

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अकर्मण्यता

उन्नति में बाधक

मन निराश।

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स्त्री की उन्नति

भारत की प्रगति

बढ़ता देश।

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करुणा

-------------------

मानव सृष्टि

करुणा पर टिकी

अनुगृहीत।

---------------------

अंतःकरण में

सात्विकता की ज्योति

जगे करुणा।

------------------

करुणा बीज

प्रेम का आलंबन

कृतज्ञ जन।

---------------

ॠण

--------------

ॠणी मानव

बदतर जीवन

नीची नजरें।

-------------------

ॠण का जाल

जीवन का जंजाल

भीख मांगना।

-------------

------------------

समग्र विश्व

ॐ में व्याप्त प्रकाश

इत्येकाक्षरं।

-------------------

ओम की ध्वनि

प्रचंड अंतर्नाद

परम सिद्धि।

------------

नारी

--------------

नारी की बुद्धि

सीधी सच्ची सिद्धि

गुनती कम।

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स्त्री का ह्रदय

बेइंतहा स्नेह या

अनंत घृणा।

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सोना और स्त्री

सौ गुनी मादकता

कोई न बचा।

हाइकू -13

वियोग  

सुशील शर्मा

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खामोश बूंदें

खूबसूरत उदासी

तुम्हारी यादें।

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गम हमारे

तुम्हे लगते प्यारे

टूटे किनारे।

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मेरे कातिल

सीने में तेरा चाकू

होंठों पे तुम।

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नजर उठी

वो नजर में चढ़े

नजर लगी।

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ये महफ़िल

तेरी ऐसी तो न थी

नागवार सी।

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जेहनसीब

जो होते तुम करीब

बदनसीब।

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शामे ए हिज़्र

तेरा रूठ के जाना

पत्थर दिल।

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आजमाइशें

तोड़ देती हैं दिल

समझा करो।

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इश्क़ मेरा

कतरे से दरिया

तुझ से बना।

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लहर आई

मिटा रेत से नाम

दिल से नहीं।

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नए हैं जख्म

तेरी वेबफाई के

मुझे मंजूर।

हाइकू -12

विविध

सुशील शर्मा

कुछ गुजारी

कुछ गुजरने दी

बीती जिंदगी।

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कुछ वक्त दे

जिंदगी मिली मुझे

फुर्सत नहीं।

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वक्त तू सता

तेरे मन की बता

हारूँगा नहीं।

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हम अकेले

सफर पर निकले

बना कारवां।

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राह मुश्किल

संभल कर चलिए

आगे मंजिल।

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हाथ की रेखा

ज्योतिष की दुकान

फरेबी भाग्य।

हाइकू 10

ईश्वर

सुशील शर्मा

1. ईश आभाष

व्यापक है सर्वत्र

ह्रदय वास।

2. ईमानदारी

सर्वोत्तम भावना

ईश्वर रूप।

3. ईश्वर वृत्त

प्रकाशित सर्वत्र

प्रसन्न चित्त।

4. समस्त विश्व

परिपूर्ण ईशत्व

प्रकाश तत्व।

5. बुद्धि से परे

आत्मा का अनुभव

अपरिभाषित।

6. कुरान सार

अल्लाह की प्रार्थना

आखरी सच।

7. ईश है सत्य

जड़चेतन व्याप्त

एकोविश्वस्य।

8. विष्णु पालक

ब्रम्हा रूप सर्जक

शिव न्यायिक।

9. अटल सत्य

नास्तिक भी उसका

आराधक भी।

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हाइकु -4

सुशील कुमार शर्मा

श्राद्ध पक्ष

1. हे पितृपक्ष

भोगवादी समाज

पितर कौन।

2. श्राद्ध का पाख

याद करो पूर्वज

श्रद्धा है मूल।

3. ब्राहम्ण भोज

स्वाद मय भोजन

पंडित तुष्ट।

4. सन्तुष्ट पितृ

श्राद्ध श्रद्धा पूर्वक

मिले सौभाग्य।

5. मरों का दान

पहुंचा उन तक

श्रद्धा पहुंची।

6. श्राद्ध किसका

अंदर रक्त जिसका

ऋण उसका।

7. दें जलांजलि

कृतज्ञ भावनाएँ

पायें आशीष।

8. जरुरी नहीं

सबको भोजन दें

पौधा रोप दें।

9. बगैर स्वार्थ

नहीं दक्षिणा दान

गिरते हम।

10. तर्पण मूल

चरित्रों से प्रेरणा

आत्म कृतज्ञ।

11. श्राद्ध उचित

श्रद्धा भाव से दान

शास्त्र सम्मत।

हाइकू -6

चुप से

सुशील शर्मा

1.चुप से क्यों हो

मन को सारी बातें

कहने तो दो।

2.सुनो तो आओ

बैठें एक किनारे

कांधे पे सिर।

3.आंसू क्यों गिरे

दर्द का समंदर

पीना है तुझे।

4. खामोशियाँ ही

अच्छी है बोलने से

रूठते लोग।

5. तेरा हँसना

लगा चाँद उतरा

मुस्कुरा कर।

6.मन तुम्हारा

व्यथित बहुत है

चाँद सरीखा।

7.क्यों चुप सी हो

मन के दरवाजे से

बाहर झांको।

8. प्यार में आओ

मिल कर हमसे

गम भुलाओ।

9.ये जीवन है

अश्रु की जलधारा

अटूट रिश्ते।

10.भेज रहा हूँ

सुन्दर से हाइकू

बोलो है कैसे

हाइकू-7
तुम
सुशील शर्मा
प्यारी सूरत
चांदनी सा चेहरा
किस के लिए।
एक चाहत
चाँद लेकर आना
सरगोशियां।
तुम न मिले
तुम्हारी तमन्ना थी
यादें ही सही।
प्रेम की पाती
किताबों के पन्ने
सूखते गुलाब।
उदास आँखे
कुछ कहती मुझे
बंद पलकें।
तुम न आओ
लौट जाओगे कल
यादें साथ हैं।
सुशील शर्मा

हाइकू -9

शिक्षा

सुशील कुमार शर्मा

1.आर टी ई क्या

शिक्षा का अधिकार

गरीब बच्चे।

2.मध्यान्ह भोज

रोइ बनाता गुरु

दाल में कीड़े।

3.5 सितंबर

शिक्षक का सम्मान

सिर्फ दिखावा।

4.शिक्षा का दर्द

महंगी होती शिक्षा

सूना भविष्य।

5.बिकती शिक्षा

घूमते सौदागर

सीटों की बोली।

6.कोचिंग अड्डे

लुटते माता पिता

बुने सपने।

7.रीते संस्कार

मौन है सरोकार

कौन है दोषी।

8.नैतिक शिक्षा

पाठ्यक्रम का आभाव

बुरा प्रभाव।

9.शिक्षक कहाँ

दारू का अड्डा जहाँ

नीचे गरिमा।

10.सोता शासन

शिक्षा पर सेमिनार

सब बेकार।

11.दो मुहीं शिक्षा

एक है आसमान

एक पाताल।

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हाइकू -11

गणेश वंदना

सुशील कुमार शर्मा

1. वक्रतुण्डाय

धीमहि तन्नो दन्ति

प्रचोदयात।

2. विश्वरूपेण

हे गणपति देव

तुम्हे प्रणाम।

3. हे धूम्रवर्ण

जीवन के आधार

  तेरी जय हो।

4. हे भालचंद्र

विघ्न के विनाशक

मोदक भोग।

5. हे गौरी सुत

रिद्धि सिद्धि के भर्ता

नमस्करोमि।

6.कृष्णपिंगाक्ष

सुरः प्रियायः नमः

लम्बोदराय।

7. हे महाकाय

सर्व विघ्न शामक

  रक्षा कवच।

8. एक दन्ताय

सर्व शांति कारक

शुभं करोति।

9. गणाधिपति

आत्मा के मूर्तिमान

स्वरुप तुम।

10. गजमस्तक

बुद्धि बल के स्वामी

विस्तीर्ण कर्ण।

11.  हे विनायक

ज्ञान विवेक शील

साक्षात ब्रम्ह।

12. विघ्नराजेन्द्रं

मस्तक है विशाल

कुशाग्र बुद्धि। 

 

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हाइकु-3
सुशील कुमार शर्मा

1. रोटी की सत्ता
जलती है जिंदगी
साब का कुत्ता।

2. स्याह जवानी
सहमा सा विश्वास
बढ़ती बेटी।

3. विलोपित स्त्री
मनुष्य की जनक
क्या अधिकार ?

4. स्त्री के बंधन
पति का बलात्कार
भाई की मार।

5. दलित बेटी
नवरात्र पूजन
कन्या भोजन।

6. पुत्र का जन्म
जगमग है घर
छांई खुशियां।

7. बेटी का जन्म
घर भर कराहे
छाया मातम।

8. नैतिक खूंटे
बंधी हुई नारियाँ
खोलो बंधन।

9. शब्द कोशों में
जब्त परिभाषाएं
सुनो सिसकी।

10. सशंकित माँ
सामाजिक मर्यादाएँ
कैद लड़की

11. पुत्र दुत्कारे
पति का बहिष्कार
समाज मौन

12. बेटी की विदा
अजनबी का घर
सब स्वीकार। 

एक कूड़ा बिनने वाला लड़का कोई चौदह-पंद्रह साल का होगा मैले-कुचले, फटे कपड़े पहन रखा था। शाम के समय कूड़ेदान के आस-पास कूड़ा बिन रहा था। उसके पास एक बोरी में कूड़ा इक्कठा हुए था ( उपयोगी कूड़े जैसे प्लास्टिक, लोहा, पेपर, या टूटी-फूटी चीजें जिसको रिसायकिल किया जा सके) और कुछ अभी ढूँढ रहा था तभी उसको आठ-दस की संख्या में कुत्ते उसको घेर लिए और जोर-जोर से भौंकने लगे, लगता था कि उस लड़के को अभी कुत्ते काट ही लेंगे चोर समझ कर।

वह लड़का रुक गया और घबराकर जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित..........सुमित........सुमित......! तुम कहाँ हो.............?

अभी भी कुत्ते उसे घेरे हुए थे और उस लड़के को या उसके समान को नोचने वाले ही थे, फिर एक बार वह लड़का और जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित.........सुमित............सुमित.............!

लड़के की आवाज सुनकर एक सफेद रंग का कुत्ता उन कुत्तों के पीछे से दुम हिलाता हुआ उस लड़के के पास पहुँच गया, वह लड़का कुत्ते को पुचकारने लगा और निर्भीक हो गया, तभी बाकी के कुत्ते वहाँ से दूर खिसक गये।

वह लड़का उस सुमित (कुत्ता) से बात कर रहा था और सुमित से बोलाः देखा सुमित ये सब मुझे काटने के लिए आये थे तुम आ गये तो ये कुत्ते सब जा रहे है।

वह कुड़ा वाला उस कुत्ते को रोज कुछ न कुछ खिलाता था आज उसका फर्ज निभाया था वफादारी निभाई उसको काटने से बचाकर।

सुमित ने तो वफादारी निभाई पर ये मनुष्य कब सबक लेगा? वह लड़का मन ही मन सोच रहा था।

समाप्त

 

न्यूजलपाईगुड़ी

गिरधारी राम, फोनः9434630244, 8518077444

पताः 3/E, D.S. कालोनी, न्यूजलपाईगुड़ी, भक्तिनगर,जलपाईगुड़ी,प.बं. पिनः734007

ईमेलः giri.locoin@gmail.com

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1

बछड़ा बोला गाय से-

दूध नहीं पीना मुझको

काम चलेगा चाय से।

2

बिल्ली बोली शेर से-

सही समय पर आओ स्कूल

क्यों आते हो देर से?

3

बंदर बोला भेड़ से-

अगर कहा मामा मुझको

कूद पड़ूँगा पेड़ से।

4

हाथी बोला ऊँट से-

प्यास बुझाऊँ मैं कैसे

पानी की दो घूँट से?

5

लौकी बोली भिंडी से-

जाती हो तो जाओ

घर फिर लौट न आना मंडी से।

6

आलू बोला गोभी से-

ज़रा बता दो, कपड़े तुम

धुलवाती हो किस धोबी से!

7

मिर्ची बोली सेम से-

झगड़े छोड़ें अब हम-तुम

रहें साथ में प्रेम से।

8

बैंगन बोला प्याज़ से-

इतना महँगा अगर बिके 

खुट्टी  अपनी आज से।

क़ैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

+91 9004781786 09:05am, 17 June 2016

कहानी

सफ़ेद दाग़

इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी. काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली. उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये सोचकर कि, “अगली बस से चलूँगी.” लेकिन इससे पहले कि वो भीड़ को चीरकर उतर पाती, बस चल दी थी.

अब उसे खड़े-खड़े ही सफ़र करना था. वैसे तो उसे बस में खड़े रहने में कोई दिक़्क़त नहीं होती थी, क्योंकि अब तो उसे इसकी आदत हो चुकी थी. लेकिन आज उसकी तबियत कुछ ख़राब थी, इसलिए उससे खड़े नहीं रहा जा रहा था. वो बैठना चाहती थी, लेकिन बस पूरी भरी हुई थी. बस में एक के बाद एक, और इसी तरह से ढेर सारे लोग चढ़ते जा रहे थे, कण्डकर टिकट काटता जा रहा था, और भीड़ को देखकर इला की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

फिर वही हुआ, जो वो नहीं चाहती थी. उसे ऐसा लगा कि, “अब मुझे उल्टी हो जाएगी. भरी बस में लोग मुझे उल्टी करते हुए देखेंगे, तो क्या सोचेंगे?” ये सवाल उसके मन को अच्छा नहीं लग रहा था. इसलिए वो नहीं चाहती थी कि कोई उसकी तरफ़ देखे या उसके ऊपर ध्यान दे.

लेकिन इला का इस तरह बेचैनी से इधर-उधर देखना, लोगों की नज़रों से छुपा हुआ नहीं था. थोड़ी ही देर में उसे पता चल गया कि, “सब लोग मुझे बड़ी अजीब नज़र से देख रहे हैं.” अब इला किसी भी तरह बैठ जाना चाहती थी, क्योंकि अब उससे बिलकुल भी खड़े रहा नहीं जा रहा था. वो सोच-सोच कर परेशान हो रही थी कि, “लोग पहले ही मुझे अजीब नज़रों से घूर रहे हैं, अब अगर उल्टी करते भी हुए देख लेंगे, तो पता नहीं क्या सोचेंगे!”

लेकिन बस में बैठे हुए लोग तो पहले से ही उसे देख रहे थे और सोच रहे थे कि, “ये लड़की इतनी बेचैन क्यूँ है?” क्योंकि लोगों को तो उसकी ख़राब हालत का कुछ पता नहीं था. लोगों की नज़र तो बस उसके सफ़ेद दाग़ से भरे हुए चेहरे पे टिकी थी. उसका चेहरा सफ़ेद दाग़ से इतनी बुरी तरह भरा हुआ है कि लोगों को उससे घिन आ रही थी, लेकिन फिर भी लोग उसे आँखें फाड़-फाड़ कर घूरे जा रहे थे, क्योंकि वो एक लड़की है, और उसके पास देखने जैसा बहुत कुछ है. भले ही, उसके चेहरे पे सफ़ेद दाग़ है तो क्या हुआ!

ये सफ़ेद दाग़ भी, वैसे तो किसी-किसी को कहीं एक-आध जगह हो जाता है, लेकिन इला का तो पूरा जिस्म ही इतनी बुरी तरह सफ़ेद दाग़ के चितकबरे धब्बों से ढँका हुआ है कि उसे ख़ुद भी अपने आप से घिन आती है. क्योंकि सफ़ेद दाग़ उसके होंठों पे है, उसकी नाक पे है, उसके कान के आस-पास है, उसके माथे पे है, उसकी गरदन पे है, उसके हाथ पे है और उसकी शलवार के नीचे दिख रहे पैर के पंजों पे भी है.

उसको देखकर ऐसा लगता है कि ये सफ़ेद दाग़ इसी तरह उसके जिस्म के उन हिस्सों पर भी होगा, जो अभी उसकी शलवार-क़मीज़ के अन्दर ढँके हुए हैं, यानी उसकी पीठ पर, उसके पेट पर, उसके सीने पर, उसकी जाँघों पर... और वहाँ भी...

लोगों की नज़र ख़ुद से अन्दाज़ा लगा रही थी कि, “इस लड़की के पूरे जिस्म पर सफ़ेद दाग़ ने अपना कब्ज़ा जमा रखा है.” लोग ये भी सोच रहे थे कि, “जब ये लड़की नहाने के लिए अपने सारे कपड़े उतार देती होगी, तो इसके जिस्म के सारे सफ़ेद दाग़ कितने बुरे लगते होंगे, है ना?” लोग ये भी अटकलें लगा रहे थे कि, “अभी तो इस लड़की की उम्र भी कुछ बीस से ज़्याद: नहीं लग रही है. बेचारी की ज़िन्दगी सफ़ेद दाग़ की वजह से बेक़ार हो गई. अब कौन करेगा इससे शादी-वग़ैरह...?”

लोगों की सारी अटकलें सही थीं. इला के पूरे जिस्म पे सफ़ेद दाग़ हैं. उसके होंठों के चारों ओर बने सफ़ेद दाग़ की वजह से उसका चेहरा, किसी चितकबरी बकरी की तरह लगता है. और जब वो नहाती है, तो आँख बन्द करके नहाती है, क्योंकि ये चितकबरापन, यही सफ़ेद और गहरे भूरे धब्बों का मिला-जुला जिस्म, उसकी आँखों में किसी काँटे की तरह चुभता रहता है. और यही वजह है कि अभी तक उसकी शादी भी नहीं हुई है. वरना ग़रीब लड़कियों की शादी बीस बरस तक न हो, ऐसा तो होता नहीं.

लेकिन इस वक़्त इला को अपने सफ़ेद दाग़ या अपनी शादी की उतनी चिन्ता नहीं थी, जितनी इस बात की थी, कि वो कहीं किसी आदमी के ऊपर उल्टी न कर दे. इसलिए जब उससे बिलकुल ही नहीं रहा गया, तो उसने बस के पिछले गेट के पास, पहली सीट पर बैठे हुए आदमी से, बड़ी लाचारगी भरी आवाज़ में कहा, “मेरी तबियत ठीक नहीं है. क्या आप मुझे थोड़ी देर बैठने देंगे?”

उस सीट पर बैठे हुए आदमी ने उसे एक नज़र देखा और झट से खड़ा हो गया. ऐसा नहीं था कि उस आदमी को इला पर दया आ गई थी, बल्कि हक़ीक़त ये थी कि इला को देखते ही वो आदमी बिदक सा गया था कि, “कहीं इस लड़की से मेरा हाथ-वाथ न छू जाए, और कहीं इस लड़की के ढेर सारे सफ़ेद दाग़ मुझे भी न लग जाएँ.”

वो आदमी सीट छोड़कर उठ गया, फिर इला उस आदमी को “आपकी बड़ी मेहरबानी” के अन्दाज़ में देखते हुए सीट पर बैठ गई. फिर बैठते ही वो अगली सीट के हत्थे पर, अपना सिर टिकाकर, आगे की तरफ़ झुक गई. लोगों की नज़र अब उसकी गरदन के पीछे और क़मीज़ से बाहर दिख रही पीठ पर थी, जिसके ऊपर भी सफ़ेद दाग़ के कुछ धब्बे नज़र आ रहे थे.

अमूमन, होता तो ये है कि लड़की के जिस्म पे सफ़ेद दाग़ बुरे लगते हैं, लेकिन इला के जिस्म पे सफ़ेद दाग़ इतने ज़्याद: हैं कि उसके सफ़ेद दाग़ों से ज़्याद: उसका अपना गहरे भूरे रंग का जिस्म बुरा लगता है. ऐसा लगता है जैसे उसके सफ़ेद जिस्म पे ढेर सारे गहरे-भूरे दाग़ हो गए हैं. इला ज़्याद: ख़ूबसूरत नहीं है. उसका जिस्म गेहूँ के रंग को पार करते हुए, गहरे भूरे खजूर के रंग का है, जिसपे इतने सारे सफ़ेद दाग़, उसके जिस्म को बहुत ही बदसूरत बना चुके हैं.

सीट पर बैठी और आगे की ओर सिर झुकाये हुए इला से अब नहीं रहा गया और उसने बस में ही उल्टी कर दी. अब क्या था, लोगों की नज़र में उसके लिए जो घिन थी, अचानक उसने एक भयानक रूप ले लिया. सब लोग उसे कोसने लगे, “अरे बस में ही उल्टी कर दी. तबियत सही नहीं है, तो घर से निकली ही क्यों?” वग़ैरह, वग़ैरह की नसीहतें सुनाई देने लगीं.

समद अपनी ज़िन्दगी लगभग जी चुका है. उसने अपनी ज़िन्दगी में लगभग सब कुछ देख लिया है. नौकरी, पैसा, शादी, बच्चा, रिश्तेदार, दोस्त, यार.... लेकिन ये सबकुछ वो बहुत पीछे छोड़ चुका है. उसको किसी भी चीज़ से तसल्ली नहीं मिली है.

नौकरी की, तो थोड़े ही दिनों में नौकरी से ऊब गया. पैसा तो बहुत कमाया, लेकिन उसे पैसे से कभी मोह नहीं रहा. शादी हुई, तो बीवी ऐसी मिली, जो हमेशा बीवी बनके रहना चाहती थी, और सबको दिखाना चाहती थी कि, “मेरा पति बहुत पैसा कमाता है, और मुझे बहुत प्यार करता है.” बीवी की ज़िद पे, और न चाहते हुए भी, समद को एक बच्चा पैदा करना पड़ा.

बच्चा हुआ, तो बीवी का पूरा ध्यान बच्चे पे चला गया. अब उसकी बीवी, लोगों से ये कहती फिरने लगी कि, “हम लोग अपने बच्चे को सबसे बढ़िया स्कूल में पढ़ायेंगे. मेरे पति ने अभी से सारा इन्तज़ाम कर दिया है. पैसे की कोई दिक़्क़त नहीं है.” बच्चा बड़ा हुआ, तो रिस्तेदारों ने ‘एक और’ की रट लगा ली.

अब यहाँ आके समद के सब्र का बाँध टूट गया और उसकी सबसे अनबन हो गई. उसने साफ़-साफ़ कह दिया, “तुम लोगों ने चक्कर में, मैं अपने आप को खोता जा रहा हूँ. मैं जीना चाहता हूँ. सभी रिश्तेदारियों और इस दिखावे से भरी हुई ज़िन्दगी से बहुत दूर, कुछ दिन अकेले रहना चाहता हूँ.”

लेकिन एक शादी-शुदा आदमी ऐसा कर सके, इसके लिए हमारा समाज अभी इतना आज़ाद-ख़याल नहीं हुआ है. समद की बातों से लोगों ने ये अन्दाज़ा लगाया कि, “समद का, शादी के बाद, अपनी बीवी से जी भर चुका है, और अब उसका किसी ‘दूसरी औरत’ से चक्कर चल रहा है.” फिर रिश्तेदारों ने भी अपना हक़ जताया और समद की बीवी को उकसाया कि, “पति को इस तरह आज़ाद-ख़्याल रहने दोगी, तो किसी दिन हाथ से जाएगा.” फिर बीवी तो आख़िर बीवी होती है. उसने भी अपना हक़ जताया और बात सीधे तलाक़ पर ही ख़तम हुई. बीवी-बच्चा, रिश्तेदार, सब के सब समद के ख़िलाफ़ हो गए. और अन्त में समद अकेला रह गया. अब उसकी ज़िन्दगी में जीने का कोई ख़ास मक़सद नहीं बचा है. और अब वो अपनी बेमक़सद ज़िन्दगी को ढोते हुए इधर-उधर भटकता रहता है.

आज जब समद ने बस में अपने बगल में बैठी हुई लड़की को उल्टी करते हुए देखा, और लोगों को उसे बुरी तरह झिड़कते हुए देखा, तो उसे बहुत बुरा लगा. उसने अपनी पानी की बोतल, उसे पकड़ाते हुए कहा, “पानी पी लीजिए, थोड़ा आराम मिलेगा.” इला ने इस आदमी को हैरानी से देखा, जो पूरी बस में अकेला ऐसा आदमी था, जिसे उसके सफ़ेद दाग़ या उसकी बदसूरती से कोई हिचक नहीं हो रही थी. यहाँ तक कि उसने उल्टी भी उसके बगल में ही बैठ कर की थी.

समद के चेहरे पर, एक ख़ामोश मुस्कुराहट देखकर, इला ने पानी की बोतल उसके हाथ से ले ली, और बोतल अपने मुँह से थोड़ा सा ऊपर रखकर एक घूँट पानी पीना चाहा. लेकिन तभी ड्राइवर ने ब्रेक मारी और इला का हाथ हिल गया, जिससे बोतल का थोड़ा सा पानी उसके चेहरे और उसके कपड़ों पर गिर गया. समद ने उसे मुँह पोंछने के लिए अपना रुमाल देते हुए कहा, “कोई बात नहीं, मुँह लगा के पी लीजिए.”

लोग आगे-पीछे से सब कुछ देख रहे थे, और अब, जबकि इला को एक हमदर्द मिल गया था, लोगों को ये भी थोड़ा बुरा लगा. इतने में कण्डक्टर भी टिकट काटते हुए पास आ गया था. उसने इला को बस में उल्टी किये हुए देखा, तो बिगड़ गया, “अरे, ये क्या कर दिया? अब इसे साफ़ कौन करेगा?”

तभी समद ने इला के हाथ से पानी की बोतल वापस ली और बचे हुए पानी से इला की उल्टी बहा दी. कण्डक्टर ने झेंपते हुए कहा, “साहब, जब मैडम की तबियत सही नहीं है, तो बाहर लेकर क्यूँ घूम रहे हो? घर लेके जाओ इनको, या किसी डॉक्टर को दिखाओ.”

ये सुनकर इला और समद ने एक-दूसरे को हैरानी से देखा. कण्डकर ने अनजाने में ही, उनके बीच एक रिश्ता क़ायम कर दिया था. समद को भी ऐसा लगा, जैसे उसे थोड़ी देर के लिए एक मक़सद मिल गया है.

लेकिन इला ये सोच रही थी कि, “क्या इस आदमी को अभी तक मेरे चेहरे के सफ़ेद दाग़ नहीं दिखे हैं? या फिर, क्या ये आदमी जानबूझ के अन्धा बन रहा है?”

फिर समद ने इला को बस से उतर चलने का इशारा किया, जिसे इला ने अपनी ख़राब हालत को देखते हुए, बिना कुछ कहे, सिर झुका के मान लिया. इला और करती भी क्या? पूरी बस में उसे एक ही आदमी मिला था, जिसने उसे भी एक इन्सान समझा था और उसकी ख़राब हालत को बिना कुछ कहे समझ गया था.

अब दोनों बस से उतरकर सड़क पर खड़े थे. इला को समझ में नहीं आ रहा था कि वो समद से क्या कहे. उसकी झिझक को देखते हुए समद ने ही कहा, “चलिये, पहले किसी डॉक्टर के पास चलते हैं.”

इला ने उसकी बात को बड़े ग़ौर से सुना, “चलिये, पहले किसी डॉक्टर के पास चलते हैं” का क्या मतलब था? इला अपने ही सवालों में उलझती जा रही थी. लेकिन समद उसके पास बिना किसी परेशानी के इस तरह खड़ा था, जैसे वो उसके अपने ही परिवार का एक हिस्सा हो. इतना अपनापन तो उसने अपनी ज़िन्दगी में आज से पहले कभी नहीं देखा था.

बचपन से लेकर आज तक उसे सिर्फ़ हिक़ारत की नज़र से ही देखा गया था, और लोगों ने उससे दूर ही रहना चाहा था. लेकिन एक ये आदमी है, जो एक अजनबी होते हुए भी, उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए, डॉक्टर के पास ले जाना चाहता है.

आख़िर में जब उसे कुछ और समझ में नहीं आया कि वो क्या करे? तब उसने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया.

अब डॉक्टर के पास जाते हुए रास्ते में दोनों ने अपनी-अपनी ज़िन्दगी एक-दूसरे के सामने पोटली की तरह खोलकर रख दी. जिसके बाद दोनों को ही पता चला कि समाज ने दोनों के ही साथ बहुत बुरा सुलूक किया है.

डॉक्टर के क्लीनिक से दवाई लेकर जब दोनों बाहर निकले, तब दोनों को समझ में नहीं आया कि अब आगे क्या बात करें? क्या दोनों ये कहें कि, “अच्छा अब चलते हैं. आपसे मिलकर अच्छा लगा.” या कुछ और? लेकिन कुछ और, क्या?

दोनों सड़क पे खड़े बस एक-दूसरे को देखते रहे, और “पहले कौन बोले?” ये सोचते रहे. फिर जब समद को लगा कि, “शायद ये लड़की झिझक रही है और कुछ नहीं बोलेगी.” तब उसने ही कहा, “अपना ख़याल रखियेगा.” और इतना कहकर समद मुस्कुराते हुए वहाँ से चल दिया.

लेकिन इला वहीं खड़ी रही. थोड़ी दूर चलने के बाद जब समद ने वापस पलट कर देखा, तो इला वहीं खड़ी थी, और पहले से ज़्याद: उदास लग रही थी. उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे अगर उसे किसी ने तुरन्त नहीं रोका, तो वो अभी रो देगी.

समद ने दूर से ही उसे न रोने का इशारा किया और उसके क़दम अपने आप इला की तरफ़ वापस मुड़ गये. समद को अपनी ओर वापस आते हुए देखकर इला से नहीं रहा गया और उसकी आँखों से भरभरा के आँसू बह निकले.

समद ने उसके आँसूओं को पोछते हुए कहा, “पागल हो क्या?”

उसके इस सवाल का जवाब इला के पास नहीं था, लेकिन उसने समद का हाथ कस के पकड़ लिया और अपने आँसूओं की तेज़ धार के साथ और बिना शब्दों के ये कहना चाहा कि, “फिर कभी मुझे इस तरह सड़क पर अकेले छोड़कर मत जाना.”

समद ने अपनी प्यार भरी आँखों से उसकी बात सुनी, फिर उसके कन्धे पर अपनेपन से भरा हुआ हाथ रखते हुए, उसकी ही तरह, बिना शब्दों में कहा, “चलो, अब घर चलते हैं.”

समद पढ़ा-लिखा था. वो जानता था कि सफ़ेद-दाग़ मिटाना मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं. उसने इला को अपनी जान-पहचान के अच्छे डॉक्टरों को दिखाया और भरोसा दिलाया कि, “तुम्हारे ये सारे सफ़ेद दाग़ एक दिन मिट जायेंगे और तुम इतनी ख़ूबसूरत हो जाओगी कि लोग तुम्हारी ख़ूबसूरती को पाने के लिये आह भरेंगे.”

इला को समद की इस बात पे बिलकुल भी यक़ीन नहीं था. लेकिन उसे समद की ये प्यार भरी हमदर्दी बहुत अच्छी लगी.

समद को अपनी ज़िन्दगी में अब एक मक़सद मिल गया था. और वो जी-तोड़ मेहनत करके इला के सफ़ेद-दाग़ मिटाने और उसे ख़ूबसूरत बनाने में जुट गया था. इतने सालों की नौकरी में उसने पैसा बहुत कमाया था. उसने अपना सारा पैसा और सारा समय इला को ख़ूबसूरत बनाने में लगा दिया.

उसने इला को शहर की भीड़ से दूर, एक हरियाली से भरी हुई जगह पे रखा, जहाँ आस-पास कोई दूसरा मकान नहीं था. ताकि वो लोगों की नज़र से बची रहे और उसे अपने बदसूरत होने का ज़रा भी अहसास न हो. इला ने भी ख़ुद को अब पूरी तरह से समद के हवाले छोड़ दिया था.

समद इला के जिस्म से सफ़ेद दाग़ को मिटाने के लिये तरह-तरह के नुस्ख़े इस्तेमाल करता था. वो उसे तुलसी के पत्‍ते और नींबू का रस पिलाता था. विटामिन बी, फ़ोलिक एसिड और विटामिन सी की गोलियाँ खिलाता था.

वो उसके सफ़ेद दाग़ के धब्बों पर नदियों के किनारे पाई जाने वाली लाल मिट्टी में अदरक का रस मिलाकर लगाता था. उसके सफ़ेद दाग़ के धब्बों पर हल्दी और सरसों के तेल को मिलाकर बनाया हुआ लेप लगाता था.

वो अँग्रेज़ी दवाओं के साथ-साथ होमियोपैथी का भी सहारा लेता था. ताँबे के लोटे में रात भर पानी भरके रखता था, और सुबह-सुबह इला को खाली पेट पिलाता था. वो इला को अनार की पत्‍तियाँ पीस कर पिलाता था. नारियल के तेल से इला के पूरे जिस्म की दिन में तीन बार मालिश करता था. वो उसे नीम के पत्‍तों का रस पिलाता था, जिसे पीने में इला की हालत ख़राब हो जाती थी, लेकिन समद के प्यार और दुलार के आगे वो मना भी नहीं कर पाती थी.

समद इतना कुछ कर रहा था लेकिन इला के जिस्म से सफ़ेद-दाग़ मिटने का नाम ही नहीं ले रहे थे. बस उनका रंग थोड़ा हल्का ज़रूर हुआ था. फिर इस चाहत में कि, “जिस दिन मेरे ये सफ़ेद-दाग़ मिट जायेंगे, उस दिन मैं कैसी दिखूँगी?” ये सोचकर इला ने एक दिन अपने सारे कपड़े उतारकर, ख़ुद को आईने में देखा तो उसे बड़ी हैरानी हुई.

उसके जिस्म के सफ़ेद-दाग़ कम होने के बजाए उल्टा बढ़ रहे थे. उसको कुछ समझ में नहीं आया. उसने तुरन्त अपने खुले जिस्म को ढँका और हड़बड़ाती हुई उन सारी दवाईयों को टटोल डाला, जो वो अब तक ले रही थी. उसने अपनी सारी रिपोर्ट्स भी देख डालीं, लेकिन उसको कोई वजह हाथ नहीं लगी. अभी तक वो समद के ही भरोसे थी कि वो सब कुछ सँभाल लेगा. वो सोच में पड़ गई कि मेरे दाग़ तो कम हो नहीं रहे हैं, उल्टा बढ़ रहे हैं. इसका क्या मतलब है?”

उसने सोचा कि आज रात मैं समद से कहूँगी कि, “हम किसी और डॉक्टर को दिखाते हैं.” तभी उसे अपनी रिपोर्ट्स के बीच एक ख़त मिला, जिसे पढ़कर इला के होश उड़ गये. उस ख़त में उसी डॉक्टर ने, जो इला का इलाज कर रहा था, समद को लिखा था कि, “जैसा आप चाहते हैं, इला के सफ़ेद दाग़ जल्दी ही उसके पूरे जिस्म पे फैल जायेंगे.”

“जैसा आप चाहते हैं” पढ़कर इला को इतना बड़ा धक्का लगा, जैसे कमरे की दीवारें, और छत, सब अचानक से इला के ऊपर आ गिरेंगी, और वो उनके नीचे दबके मर जायेगी. वो भागती हुई फिर से आईने के सामने गई और उसने एक बार फिर से अपने सारे कपड़े उतार कर, आईने में अपना जिस्म ग़ौर से देखा. ख़त में लिखी बात बिलकुल सही थी. उसके सफ़ेद-दाग़ अब उसके जिस्म के उन हिस्सों पे भी फैल चुके थे, जहाँ पहले नहीं थे.

उसने तुरन्त इन्टरनेट पर जाकर सफ़ेद दाग़ के बारे में पढ़ा. और इन्टरनेट पर मौजूद जानकारियों को पढ़कर उसके दिमाग़ को और बड़ा सदमा पहुँचा. अब उसे पता चला कि समद उसका हर वो इलाज कर रहा था, जिससे सफ़ेद दाग़ मिटते हैं. लेकिन उनके साथ ही साथ वो इला को हर वो चीज़ खिला रहा था, जो सफ़ेद दाग़ के रोगियों को नहीं खिलाना चाहिये. जैसे कि वो उसे मछली खाने के तुरन्त बाद दूध पिलाता है. खट्टी चीज़ें ज़्याद: खिलाता है. उसके खाने में नमक ज़्याद: डालता है. मिठाई, रबड़ी, दूध और दही एक साथ खिलाता है. उड़द की दाल, माँस और मछली ज़्याद: खिलाता है. खाने में तेल, मिर्च और गुड़ भी खिलाता है.

इला सोचने लगी, “लेकिन ये सब चीज़ें तो सफ़ेद दाग़ के रोगियों को मना हैं.” इला को कुछ समझ में नहीं आया कि अब वो क्या करे? वो काँपते और रोते हुए बड़बड़ाने लगी कि, “समद मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता है? उसने तो मेरे दाग़ मिटाने का वादा किया था? लेकिन वो तो डॉक्टर के साथ मिलके मेरे दाग़ और बढ़ा रहा है! लेकिन वो ऐसा क्यों कर रहा है?”

तभी उसके दिमाग़ में एक बात आई कि, “समद अपनी पहली बीवी को छोड़ चुका है. कहीं ऐसा तो नहीं कि अब वो मुझे भी छोड़ने की तैयारी कर रहा हो?” लेकिन उसे ये नहीं समझ में आ रहा था कि, “समद मुझे क्यों छोड़ना चाहेगा? जबकि वो तो मेरे साथ बहुत ख़ुश रहता है, मेरी इतनी देखभाल करता है, मेरा इतना ख़्याल रखता है, मुझे ख़ुश रखता है. क्या उसका प्यार सिर्फ़ एक नाटक है?”

इला ने अपने आप को बहुत समझाया, लेकिन कोई भी बात उसकी समझ में नहीं आई. तब उसने समद को बिना बताए, उसकी पहली बीवी, ज़ुलेखा का पता लगाया, और उससे ख़ुद जाकर मिली. वहाँ उसे ज़ुलेखा ने बताया कि, “समद एक पारिवारिक ज़िन्दगी के लिये नहीं बना है. उसे आज़ादी चाहिये, हर चीज़ से. रिश्तों-नातों को वो नहीं मानता. उसे रोज़ एक नई-नई लड़की चाहिए. इसीलिए तो उसने मुझे छोड़ दिया. पता नहीं, तुम्हारे साथ अभी तक कैसे और क्यों रह रहा है!”

ज़ुलेखा की बातों ने इला के दिल में आग पैदा कर दीं. ज़ुलेखा के मुताबिक़, “समद सिर्फ़ कुछ दिनों तक ही एक लड़की के पास रह सकता है, फिर उसे छोड़ वो दूसरी के पास चला जाता है.”

इला ज़ुलेखा से मिलके वापस आ गई. समद को, “इला के मन में कुछ हलचल मची हुई है”, इसका अन्दाज़ा तो हुआ, लेकिन उसके पूछने पर वो “कुछ नहीं” कहके टाल गई. समद अभी भी पूरी लगन से इला को सही वक़्त पर दवाएँ खिलाता था, उसके जिस्म पर लगाने वाली दवाएँ, वो ख़ुद अपने हाथ से लगाता था. यहाँ तक कि उसके जिस्म की मालिश भी वो ख़ुद ही किया करता था. वो चाहता तो कोई नर्स रख सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

इला ने महसूस किया कि समद उसके बढ़ते हुए दाग़ों की वजह से बिलकुल भी परेशान दिखाई नहीं देता है. बल्कि वो उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराते हुए कहता है, “बहुत जल्द ही ये सब दाग़ मिट जाएँगे.” लेकिन इला को उसके दाग़ मिटते हुए कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहे थे.

अब इला को इस बात का पक्का यक़ीन हो गया कि, “समद मेरे दाग़ मिटाना नहीं, बल्कि बढ़ाना चाहता है, ताकि एक दिन इन्हीं बढ़े हुए दाग़ों का बहाना बनाकर वो मुझे छोड़ सके, और फिर मेरी ही तरह किसी और मासूम लड़की को अपनी हवस का शिकार बना सके.”

“समद ने मेरे साथ ये किया?” ये सोच-सोचकर उसकी आँखों से आँसू बहने लगते थे. जबकि समद को लगता था कि, “इला मेरी देखभाल से इतनी ख़ुश है कि उसे रोना आ जाता है.”

अब इला अपने जिस्म का कुछ नहीं कर सकती थी. सफ़ेद दाग़ उसके पूरे जिस्म पर फैल चुका था. उसकी सफ़ेद चमड़ी इतनी चमकती थी कि अब उसे अपने-आप से ही नफ़रत होने लगी. और एक दिन उसने गुस्से में आकर घर का आईना भी तोड़ दिया ताकि उसे अपनी सफ़ेद चमड़ी दिखाई न दे. समद के पूछने पर उसने कहा, “अच्छा हुआ टूट गया. मुझे लगता है, अब इस घर में आईने की ज़रूरत नहीं है.” समद को लगा कि, “इस वक़्त इला गुस्से में है”, इसलिए उसने फिर कुछ और नहीं पूछा.

फिर एक दिन किचन में काम करते हुए इला ने समद को डॉक्टर से फ़ोन पे बात करते हुए सुना. समद डॉक्टर के साथ बड़ा ख़ुश होके बात कर रहा था. वो कह रहा था, “शुक्रिया डॉक्टर साहब! आपने मेरा काम आसान कर दिया. अब दाग़ इला के पूरे जिस्म पे फैल चुका है.”

इतना सुनते ही इला को ऐसा लगा, जैसे उसके कानों में किसी ने जलता हुआ कोयला डाल दिया हो. उसने तुरन्त, किचन में लटके हुए, सब्ज़ी काटने वाले चाकू से, अपनी नस काट लेनी चाही, लेकिन चाकू उसकी सफ़ेद चमड़ी पर कुछ इस तरह चमक रहा था कि उसे लगा, “अगर मैंने चाकू फेर दिया तो मेरे जिस्म से लाल नहीं, बल्कि सफ़ेद ख़ून निकलेगा.”

उसकी आँखों में समद के लिये इतना गुस्सा भर चुका था कि उसे अपने आस-पास हर चीज़ जलती हुई दिखाई दे रही थी. उसे महसूस हो रहा था कि उसकी आँखों के सामने मौजूद हर चीज़ को सफ़ेद दाग़ हो गया है. किचन के बर्तनों, दीवारों, फ़र्श और घर की छत, सबको सफ़ेद दाग़ हो गया है.

इला ने कस के अपनी आँखें भींच लीं, क्योंकि उससे अब कुछ भी देखा नहीं जा रहा था. किचन से निकलकर, अपने कमरे में जाते हुए उसने सुना, समद हँसते हुए डॉक्टर से कह रहा था, “बस, एक हफ़्ता और...”

इला समझ चुकी थी कि, “बस एक हफ़्ते के बाद समद मुझे अपनी ज़िन्दगी से बाहर निकाल देगा.” लेकिन उसके पहले वो कुछ कर देना चाहती थी. कुछ ऐसा, जो समद को सबक सिखा सके कि, “किसी मासूम और भोली लड़की के जज़्बातों के साथ ऐसा मज़ाक नहीं करना चाहिए.”

रात को बिस्तर पर समद के साथ लेटे हुए इला बार-बार छत को देख रही थी. समद ने उसका माथा चूमा और कहा, “बस इला, एक हफ़्ता और...” इला ने अपना गुस्सा छिपाते हुए कहा, “लेकिन मुझे अफ़सोस है कि तुम वो दिन नहीं देख पाओगे.”

“क्यों?” समद ने हँसते हुए, और इला के चेहरे को फिर से चूमने की कोशिश करते हुए पूछा. लेकिन तभी इला ने, एक झटके के साथ, और अपनी पूरी ताक़त के साथ, चादर के नीचे छिपाया हुआ चाकू, समद के गले में उस जगह घुसा दिया, जहाँ से आवाज़ निकलती है.

समद को कुछ समझ नहीं आया कि, “ये क्या हुआ?” वो चाकू और अपनी गरदन पकड़े हुए, सीधा छत को देखते हुए एक तरफ़ लुढ़क गया.

तब इला ने बिस्तर से उतरकर, लगभग चिल्लाते हुए कहा, “अगर तुम्हें मुझे छोड़ना ही था, तो मेरा जिस्म क्यों ख़राब क्यों किया? मुझसे कह देते, मैं चुपचाप तुम्हारी ज़िन्दगी से दूर चली जाती. तुमने औरतों को समझ क्या रखा है? मैं तुम्हारी बीवी ज़ुलेखा से मिल चुकी हूँ. उसने मुझे तुम्हारे बारे में सब बता दिया है. तुम एक हफ़्ते बाद मुझे छोड़कर फिर किसी मासूम लड़की को अपने जाल में फँसाने वाले थे ना?”

समद के गले से ख़ून का फ़व्वारा बह रहा था. उसकी साँस धीरे-धीरे कम होती जा रही थी, लेकिन उसने इला की पूरी बात सुनी. वो इला की तरफ़ अपने ख़ून से सने हाथ बढ़ाकर, रुकते-रुकते बस इतना ही कह पाया कि, “एक हफ़्ते बाद... अपने आप को... आईने में देखना...” और इतना कहकर उसने इला को एक बार और देखा, फिर अपनी आँख बन्द कर ली. कुछ इस तरह, जैसे वो जाते-जाते इला को अपनी आँखों में भरके ले जाना चाहता हो.

इला ने समद को अपनी आँखों के सामने तड़पकर मरते हुए देखा. समद के गले से बहता हुआ ख़ून पूरे बिस्तर पे और पूरे कमरे में फैल चुका था. फिर इला ने समद की लाश को रात में ही घर के पिछवाड़े ज़मीन में गाड़ दी. चूँकि आस-पास कोई रहता नहीं था, इसलिए किसी को कोई शक होने की गुंजाइश भी नहीं थी. फिर वो कमरे में से ख़ून के धब्बे रगड़-रगड़ के मिटाने लगी. उसके मन को अब एक तसल्ली थी कि, “मैंने समद को सबक सिखा दिया है.” समद की लाश को ठिकाने लगाने के बाद और समद के क़त्ल के सारे सबूत मिटा देने के बाद इला ने चैन की साँस ली.

कुछ दिन बीतने के बाद, उसे घर में राशन लाकर रखना था, क्योंकि अब तक घर के बाहर के सारे काम समद ही किया करता था. बाज़ार में पहुँचकर, इला को अब एक आज़ादी महसूस हुई. लेकिन जब वो बाज़ार से गुज़र रही थी, तो उसे बड़ी हैरानी हुई. कुछ लड़के और आदमी लोग उसे अपनी आँखें बड़ी-बड़ी करके घूर रहे थे.

इला को शक हुआ, “कहीं इन लोगों को समद के क़त्ल के बारे में पता तो नहीं है?” लेकिन तभी उसने पीछे से किसी को सीटी मारते हुए सुना. और कोई कह रहा था, “क्या ख़ूबसूरत लड़की है यार! लगता है सीधे लण्डन से आई है.”

इतना सुनते ही इला के क़दम अपने-आप तेज़ हो गये. वो जल्दी-जल्दी घर वापस आई और सारा सामान एक तरफ़ फेंकते हुए, सबसे पहले उस आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई, जो समद उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, पहला आईना टूटने के बाद लाया था.

इला ने आज बहुत दिनों बाद आईना देखा था. और आज उसे भी अपना चेहरा कुछ बदला-बदला सा महसूस हुआ. फिर उसने एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए, लेकिन उसने जहाँ भी देखा, उसे अपना जिस्म पहले जैसा नहीं लगा.

उसके सफ़ेद दाग़, अब सफ़ेद की बजाए ख़ून से भरे हुए दिखाई दे रहे थे. वो सिर से पैर तक ख़ूबसूरत लग रही थी. तब अचानक उसे समद की बात याद आई, जो उसने मरते हुए कहा था कि, “एक हफ़्ते बाद... ख़ुद को... आईने में देखना...”

अब उसे लगा, “क्या समद उस दिन कुछ और कहना चाहता था?” वो जल्दी से उसी तरह, बिना कपड़ों में भागती हुई, उस कमरे में गई, जहाँ उसकी सारी दवाईयाँ रखी हुई थीं. उसने सब दवाईयों, मलहम, और तेल की शीशियों को इधर-उधर हटाते हुए अपनी रिपोर्ट्स ढूँढ़ने की कोशिश की. और फिर उसे अपनी रिपोर्ट्स के साथ, एक और ख़त मिला, जो उसी डॉक्टर ने लिखा था, जो उसके सफ़ेद दाग़ का इलाज कर रहा था. इला ने ख़त को तुरन्त खोलकर पढ़ना शुरू किया.

ख़त में लिखा था कि, “समद, अब जबकि इला का सफ़ेद दाग़ उसके पूरे जिस्म पे फैल चुका है, अब हम अपना असली ट्रीटमेन्ट शुरू कर सकते हैं. ये दुनिया का पहला ऐसा केस होगा, जिसमें सफ़ेद दाग़ को पहले बढ़ाकर, पूरे जिस्म पर फैलाकर, फिर सफ़ेद दाग़ के ही रंग को इस्तेमाल करके, किसी लड़की को इतना ख़ूबसूरत बनाया जाएगा कि देखने वाले देखते रह जाएँगे. वैसे मैं चाहता हूँ कि तुम इला को भी ये बात बता दो, तो अच्छा रहे. बेचारी अपने बढ़ते हुए दाग़ों को देखकर परेशान होती होगी.”

इतना पढ़कर इला को ऐसा लगा, जैसे वो एक बहुत बड़े पहाड़ के नीचे अकेली खड़ी हो और अचानक से, उसके देखते ही देखते वो पूरा पहाड़ उसके ऊपर आ गिरा हो.

***

गुरुत्व (व्यंग्य-कविता)-प्रदीप कुमार साह (psah2698@gmail.com)

जब निष्कपट निज कर्म करो तब बनो स्वभिमानी.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

दो शब्द कहूँ-कुछ भी न कहूँ, खुद हो उत्तम ज्ञानी.

यत्न करो-अपना गुरुत्व पुनः प्राप्त करो, आँख में भर लो पानी.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

ईश्वर ने तुम्हें दी कीर्ति, आशीष मिला कि तू बन ज्ञानी.

कबीर दोहे ने 'सदैव देव के आगे रहना' वह मान भी दिलाया ही.

अंकित किया गुरु-महत्व ग्रन्थों ने, अब छोड़ो नादानी.

पर उलझ गए इस रूप में क्यों, खुद ही को समझ पड़े अति दानी?

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

बच्चे माता से नवजीवन पाते औ पिता से सदैव सुरक्षा.

बहु विधि बहुत सुख बरसे, पर सब तज आते पाने कुछ शिक्षा.

भाई-बंधु का असीमित सहारा, पर क्यों मांगे वह भिक्षा?

कुछ शर्म करो, निष्कपट निज कर्म करो,दो उसको उसकी दीक्षा.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

देव साधक का संशय हरते औ महिमामंडित गुरु का करते,

प्रथम गुरु हैं माता-पिता ही, पर स्वयं ही वह क्यों समझाते-

कि जीवन में कुछ करना है तो, सदैव शिक्षक का सम्मान करो.

शीश झुका कर श्रद्धा से, प्यारे बच्चों नित्य उन्हें प्रणाम करो.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

वह बाल-राधा-गोविन्द है, पर दर तेरे आता है, फैलता है झोली,

कहता-'ज्ञान की कुछ भिक्षा पाकर, सत्य-पथ पर चलना सीखूँ,

ज्ञान दीप की ज्योति जलाकर, जीवन के संघर्षो से लड़ना सीखूँ. 

मानवता निज जीवन में भर न्याय हेतु नयी-नवेली मंजिल बना दूँ.'

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

लेकिन तुमने दिये इस जगत को बहुत से प्रपंचों का घात-प्रतिघात.

करते रहे खिलवाड़, कर्तव्यचुत हो उंघते रहे तुम कुर्सी पर बैठकर.

अनजाने ही में तुम रुखसत हुए गुरु पद से शिक्षक मात्र के स्तर तक.

वह तुम्हें देखता रहा और तुम न कुछ ढूंढते रहे नींद में बेसुध होकर.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

नींद खुली तो उस हलधर, भूधर, भावी प्रतिपालक को समझा,

ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और किसी अबोध को तो माना कीड़ा.

यदि बात हो श्रुति-ग्रन्थ की, जब प्रभु रचे रुचिर सृष्टि की रचना,

तब प्रकृति हँसी देख निज नादानी, सुन उपहास उपजे तब ज्ञाना.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

पर उलझ गए इस रूप में क्यों, स्वयं ही क्यों विज्ञानी समझ?

यदि होती है शुरुआत और अंत भी ज्ञान का तुझसे ही अब.

इस धीर-गंभीर प्रकृति की एक अधीर अति कोमल पुष्प का,

ले संभाल न उपहार स्वरूप एक अति-तुच्छ व्यंग्य-बाण तब.

मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.

 

 

 

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