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कहाँ है - मेरा शिक्षक ? - 5 सितंबर शिक्षक दिवस विशेष आलेख / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

कहां है - मेरा शिक्षक

घुप्प अंधेरों ने जकड़ रखा था सभी दिशाओं को। कहीं कोई प्रकाश नजर नहीं आता था। पूरी दुनिया में त्राहि त्राहि की स्थिति थी। कोई समझ ही नहीं पा रहा था कि , दुनिया में उनके आने का प्रयोजन क्या है ? जिस प्रयोजन के लिये वे अवतरित हुये हैं , वे कब बताये जायेंगे , और कौन है जो बतायेगा इन्हें ? ब्रह्मा जी से सवाल किया लोगों ने। अंधेरे दूर करने का उपाय पूछा। तब  ब्रह्मा जी ने जवाब देते हुये कहा था कि – तुम्हारे जीवन के अंधकार को दूर करने के लिये ही सूरज की रोशनी तुम्हें दी गयी है। इससे अधिक प्रकाशवान कुछ भी नहीं है दुनिया में। इन्हीं की रोशनी का लाभ उठाकर अपने जीवन के अंधकार को मिटाओ। यह भौतिक प्रकाश है ब्रह्मा जी। हमारे मन के भीतर का अंधेरा हमें लील रहा है , उसका उपाय बताओ। ब्रह्मा जी सोच में पड़ गये। देवता , राक्षस और मनुष्यों का निर्माण केवल खेल खेलने के उद्देश्य से किया था , खेल में मजा लेने के लिये इनके भीतर मन और दिमाग बना दिया था। इसी का उपयोग करने लगे थे ये। सारे लोगों को लेकर शिव जी के समीप गये। समाधि पर बैठे भोले बाबा ने आने का कारण जान , उपाय बताते हुये गुरू बनाने की सलाह दी। अब गुरू बनेगा कौन ? जो सर्वाधिक योग्य होगा , वह गुरू बनेगा। अखिल विश्व में शिव जी से अधिक योग्य कोई नहीं था। उन्होंने गुरू बनना स्वीकार कर लिया , परंतु सभी को शिष्य बनाने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा - शिष्य ढूंढने वे स्वयं जायेंगे , वे ही शिष्य भविष्य में गुरूतर दायित्व का निर्वहन करेंगे। देवलोक में बृहस्पति , पाताल लोक में शुक्राचार्य एवम पृथ्वी लोक में वेदव्यास जी को अपना शिष्य बनाया उन्होंने। इसी समय से शिव जी महागुरू हो गये। अयोग्य लोगों तक मंत्र न पहुंचे , इसलिये कान में फूंक मार कर मंत्र की दीक्षा दी। गुरू बनाने के लिये “कान फुंकाने” की परम्परा तभी से चली आ रही है। मंत्रों के माध्यम से शिक्षा का विस्तार करने वाले विद्वजन कालांतर में शिक्षक कहलाये।

कौन है यह शिक्षक ? अज्ञान को मिटाने – मोमबत्ती की तरह जलने वाला , विकास की मंजिल तक युग को पहुंचाने वाला , शिष्यों के हृदय धरा को ज्ञान मेघ बन कर सींचने वाला , सामाजिक विषमताओं के विष को शंकर की तरह पीने वाला , लोकहित में दधीचि बन शरीर दान करने वाला , ब्रह्मा बिष्णु महेष जैसा सामर्थवान व्यक्ति ही तो शिक्षक है जो , कभी कृष्ण गीता गाकर विजय का उल्लास दिलाता है , कभी गुरू द्रोण की तरह लक्ष्यवान बनाता है , कभी गुरू नानक की तरह तत्वबोध कराता है , कभी परमहंस बन विवेकानंद दे जाता है , कभी पाखंड का खंडन करने कबीर बन राह दिखाता है , कभी विज्ञान का नवआयाम देने कलाम बन सर उठाकर जीना सिखाता है , कभी कर्तव्यनिष्ठ ज्ञानमूर्ति राधाकृष्णन बन , विश्वगुरू का सम्मान पाता है।

शिक्षा- शिष्य – शिक्षक पूरी ऊंचाई पर जाकर तब चमकता है , जब गुरू शिष्य को ढूंढने जाता है। वास्तव में परम्परा इसलिये बनाई गई थी , चूंकि वही शिष्य भविष्य का गुरू है। आधुनिक काल में भी रामकृष्ण परमहंस – विवेकानंद इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आज शिष्य शिक्षक ढूंढता है। क्या शिष्य इतना सक्षम होता है कि वह शिक्षक का मुल्यांकन कर सके ? यहीं से शिक्षकों का पतन शुरू हुआ है। शिक्षक केवल फेक्टरी बन गये हैं जो - कलेक्टर , डाक्टर , इंजीनियर , वकील बना रहे हैं अपने शिष्यों को , पर शिक्षक नहीं बना पा रहे हैं। वैसे भी शिक्षक बनाने के लिये , शिक्षक के पास समय कहां ? वह ऐसा पारखी भी नही कि किसी शिष्य को ढूंढकर , विश्वपूजित शिक्षक बना दे। शिक्षा व्यापार हो चली है , शिक्षक दुकानदार या उनके नौकर , और शिष्यगण ग्राहक। शिक्षा सेवा नहीं , लाभ हानि का खेल हो गया है , केवल बाजारू हो चली है शिक्षा।

शिक्षक का उद्देश्य सिर्फ किताबी ज्ञान बांटकर , किसी तरह शिष्य को एक कक्षा से दूसरी में प्रमोट करना रह गया है। अब तो वह यह भी नहीं कर पा रहा है , क्योंकि जिस काम के लिये नियुक्त हुआ है , उसी के लिये समय नहीं उसके पास। सरकार के सारे गैर शैक्षणिक कार्य करने में छह महीने बीत जाते हैं , तीन महीने छुट्टियों में , बाकी तीन महीने परीक्षा , धरना - प्रदर्शन में। कब वक्त मिलेगा पढ़ने पढाने का ? स्कूल पहुंचते ही मध्याह्न भोजन की चिंता सताती है। आज क्या पढाना है इसकी चिंता किये जमाना बीत जाता है। वैसे भी कौन सा ज्ञान बांटकर विवेकानंद पैदा कर देंगे ? केवल परीक्षा परिणाम दुरूस्त रखने की चिंता रहती है। वास्तव में जितनी कवायद परीक्षा परिणाम के दुरूस्तीकरण में की जाती है , उतना पढ़ने- पढाने में की जाती तो ?

सारे शिक्षक ऐसे नहीं हैं। पर उनकी संख्या उंगलियों में गिनने लायक है जो अपना मूल कार्य , मुस्तैदी से बिना किसी भय प्रलोभन या स्वार्थ के कर रहे हैं। वास्तव में पहले सर्वाधिक विद्वजन इस पद के काबिल माने जाते रहे , परंतु आज सभी के लिये यह पद आखिरी विकल्प है। खाली है , तब तक पढ़ा रहा है स्कूल में यही भावना प्रबल है अब। अपनी फेक्टरी से शिष्यों को धनवान बना देने वाला शिक्षक , स्वयं लाभांवित होने की आशा के साथ शिक्षा देता है। कोई अपने शिष्य को इंसान बनाने की जहमत नहीं उठाना चाहता। विभिन्न श्रेणियों वाले पदों को सुशोभित करने वाला शिक्षक केवल “ निम्नश्रेणी “ रह गया है आज दिन। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है ? गुरूद्रोण , विश्वामित्र , परमहंस , राधाकृष्णन , कलाम की धरती क्या बांझ हो चली है , जो योग्य शिक्षक पैदा नहीं कर पा रही है ? इसके पीछे पहला कारण यह भी है कि योग्यता का सही इस्तेमाल न होना। दूसरी बात उन्हें भरपूर समय न देना। आर्थिक एवम नैतिक असुरक्षा भी बार बार , इन्हें दूसरी ओर भागने के लिये प्रेरित करती है।

कर्तव्यों से विमुख हो जाने के कारण शिक्षकों का सम्मान दिनों दिन कम होता जा रहा है। डा. राधाकृष्णन जो स्वयं शिक्षक रहे , महसूसते थे बड़ी शिद्दत से। इसलिये अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में याद रखने की इच्छा जतायी थी , ताकि कम से कम एक दिन मजबूरी में ही सही , शिक्षकों का भरपूर सम्मान हो। वास्तव में ऐसा हो भी रहा है , शिक्षक दिवस के दिन विधायक , सांसद या किसी अन्य जनप्रतिनिधि के हाथों , माला पहन कर सम्मानित होने वाला शिक्षक, अपने किसी काम के बहाने , दूसरे ही दिन इनके चौखटों को रगड़ते हुये देखा जा सकता है। अब तो राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने की अलग दास्तान बन चुकी है। वर्ष भर अपनी बहादुरी के प्रमाण जुटाकर , नेताओं और अधिकारियों के आशीर्वाद से पल्लवित शिक्षक ही , इस पुरस्कार का हकदार बन पाता है। पुरस्कार का निर्धारण योग्यता नहीं , बल्कि कागज के मोटे मोटे दस्तावेज होते हैं।

वास्तव में वर्तमान युग में भी बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जो , अपने कर्तव्यों का पालन पूरी तन्मयता से करना चाहते हैं , परंतु नहीं कर पा रहे हैं ? क्यों “ दीप ” बन प्रकाश बांटने की प्रवृत्ति दम तोड़ती दिखती है ? इसके लिये जिम्मेदार हमारी व्यवस्था है। इन्हें “ बनिहार “ की तरह व्यवहार मिलेगा तो , निश्चित ही गुणवत्ता प्रभावित होगी।“ दीप बन कर मर खप जाने” वाले अनेक शिक्षक आज भी हैं , जरूरत है उनको उचित सम्मान , संरक्षण और पोषण की।

हम दिया जलाये रखना चाहते हैं जरूर , पर तेल और बाती का प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे साजिश यही कि , प्रकाश कायम रहेगा तो रहनुमाओं की करनी दिखते रहेंगी। अंधेरे का कोई पर्दा कायम नहीं रहेगा , इनकी कारगुजारियों का पर्दाफाश होता रहेगा। तब साल भर सम्मानित होने वाला व्यक्ति , एक बार भी सम्मान नहीं पायेगा और साल में एक बार सम्मान के लिये तरसने वाला शिक्षक , जिंदगी भर नवाजे जायेंगे सम्मान से। और जब ये स्थितियां निर्मित होंगी – सारे विद्वजन शिक्षक की भूमिका निभायेंगे और भारत का गौरव वापस दिलायेंगे। तब उस दिन का इंतजार शिष्य करेगा , कब आएगा ढूंढते , मुझे मेरा शिक्षक .......कहां है मेरा शिक्षक ..... कहां है ?

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

छुरा , जि. गरियाबंद ( छ.ग.)

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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 05 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षक और शिक्षा की वास्तविकता का बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से वर्णन किया है। यह सत्य है कि शिक्षा अब व्यापार बन गया है परंतु जो शिक्षक आज के समय में सही मायने में शिक्षक के कर्तव्यों का हनन करना चाहता है सिस्टम उसे करने नहीं देता, आज शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों विवश हैं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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