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हास्य कविता - भाभी जी नमस्ते! / गोपाल प्रसाद व्यास

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कहास

जैसे वर्षा-काल पोखरों में
मेंढक टर्रा उठते हैं ।
जैसे पौ फटते ही मुर्गे
कुक्ड़ूं-कुक्ड़ूं गा उठते हैं ।

जैसे कान -समीप देखकर
मच्छर तान झाड़ देता है ।
जैसे माइक मन्द देखकर
नेता गला फाड़ देता है ।

जैसे कपड़ा लाल देखकर
बैठा साँड़ उछल पड़ता है ।
घुटी किसीकी चाँद देखकर
जैसे हाथ मचल पड़ता है ।

उसी  तरह ही देख आपको
मुझको आज कहास लगी है ।
मेरे मन के आंगन में भी
मधुर-मधुर कुछ घास जगी है ।

क्षमा कीजिए मुझको साहब,
अभी उम्र में मैं छोटा हूँ ।
थाली में रखा बैंगन हूँ
धरती पर लुढ़का लोटा हूँ ।

यानी मैं कि प्रजातंत्री हूँ
बहुमत को आदर देता हूँ ।
सदा बहू जी के भी आगे
अपना शीश झुका लेता हूं ।

आप जानते हैं दुनिया में
मनहूसों को बड़े वोट  हैं ।
गम्भीरों की बड़ी पहुँच है
संजीदों पर बड़े नोट हैं ।

इसीलिए मैं इस बहुमत का
पग-पग पर वन्दन करता हूँ ।
हर जलसे में, हर जलूस में
इनका अभिनन्दन करता हूं ।

इस दुनिया में मनहूसी ही
सबसे परम तत्व है भाई!
सबसे गुह्य ज्ञान है लाला,
बिना मूल की 'नरम कमाई' ।

चेतन से ईश्वर घबराता,
प्रभु को भी जड ही प्यारे हैं ।
चतुरों के चूल्हे ठंडे हैं,
मनहूसों के पौ-बारे हैं ।

कोई कहीं सिकत्तर होता
कोई कहीं कलक्टर होता ।
कोई कहीं उठाता झंडा
कोई कहीं मिनिस्टर: होता ।

और हास्य रस के लेखकजी
इस समाज में साँड़ कहाते ।
चटनी - जैसे समझे जाते,
. या मजलिस के भाँड़ कहाते ।

सचमुच हंसना बुरी बात है
हँसने से लच्छन झड़ते हैं
हंसने से आँसू आते हैं
आँतों में भी बल पड़ते हैं ।

हंसी लड़ाई का घर भाई
शान्ति-काल में अति घातक है ।
देख किसी को मुस्का जाना
राम-राम! भारो पातक है ।

दाँत दिखाना फूहड़पन है
खीस काढ़ते रहते बन्दर ।
हंसने से आँखें मिचती हैं
लगने लगते लोग असुन्दर ।

हंसने से हल्कापन आता
वाणी हकली हो जाती है ।
सूरत नकली हो जाती है, '
तबियत तकली हो जाती है ।

अस्तु आप भी हंसना छोड़ें,
मनहूसों से नेह लगाएं ।
मैंने इधर कहास मिटा ल
आप तालियाँ उधर बजाएं ।

विडम्बना


गाँधी बाबा के सुराज में
सुरा बहुत है, राज नहीं है
राज बहुत खुलते हैं, लेकिन
खिलता यहां समान नहीं है


यह देखो कैसी विडम्बना!
राजनीति में नीति नहीं है ।
और राजनैतिक लोगों को
नैतिकता से प्रीति नहीं है ।

सदाचार का आन्दोलन है,
नोटों से भारी थैला है।
दर-दर पर खेला की दस्तक
घर-घर में बैठी लैला है ।

यह देखो, कैसा मजाक है,
कला बिक रही बाजारों में ।
रूप खड़ा है चौराहे पर
जंग लग रही हथियारों में ।

यह कैसा साहित्य कि जिसका,
हित से कुछ सम्बन्ध नहीं है
सभी यहाँ मुक्तक है यारो,
कोई यहाँ प्रबन्ध नहीं है ।

हर अध्यापक आलोचक है,
हर विद्यार्थी गीतकार है
सभी नकद सौदा करते हैं,
एक नहीं रखता उधार है ।

हर आवारा अब नेता है,
हर अहदी बन गया विचारक ।
जिसके हाथ लग गया माइक,
वही बन गया प्रबल प्रचारक ।

आलोचना लोच से खाली
अब मजाक में मजा न, गम है ।
सत्ता से सत निकल गया है,
सिर्फ अहम में हम-ही-हम है ।

सरकार कहते हैं ।

बुढ़ापे में जो हो जाए उसे हम प्यार कहते हैं,
जवानी की मुहब्बत को फकत व्यापार कहते हैं ।
जो सस्ती है, मिले हर ओर, उसका नाम महंगाई
न महँगाई मिटा पाए, उसे सरकार कहते हैं ।

जो पहुंचे बाद चिट्ठी' के उसे हम तार कहते हैं,
जौ मारे डाक्टर को हम उसे बीमार कहते हैं ।
जो धक्का खाक चलती है उसे हम कार मानेंगे,
न धक्के से भी जो चलती उसे सरकार कहते हैं ।

कमर में जो लटकती है, उसे सलवार कहते हैं,
जौ आपस में खटकती है, उसे तलवार कहते हैं ।
उजाले में मटकती है, उसे हम तारिका कहते,
अँधेरे में भटकती है उसे सरकार कहते हैं ।


मिले जो रोज बीवी से उसे फटकार कहते हैं
जिसे जोरू नहीं डांटे उसे धिक्कार कहते हैं ।
मगर फटकार से धिक्कार से भी जो नहीं समझे
उसे मक्कार कहते हैं उसे सरकार कहते हैं ।

सुबह उठते ही बिस्तर से ' कहाँ अखबार कहते हैं
शकल पर तीन बजते 'चाय की दरकार' कहते हैं ।
वे कहती हैं ' चलो बाजार ' हंसकर शाम के टाइम,
तो हम नजरें झुका कर ' मर गए सरकार ' कहते हैं ।

होता है!


नहीं जिससे सुनाई दे
वो ऊँचा कान होता है।
कि जिससे कान कच्चे हों,
वो पक्का गान होता है ।

जिसे खा लें मजे में सब,
वही ईमान होता है ।
जो बे-ईमान होता है
वही इन्सान होता है ।

कटे बाजार में पाकिट,
समझ लो, दान होता है ।
लगे चूना मुहब्बत से
करारा पान होता है ।

अगर वो देख-भर लें
तो बड़ा अहसान होता है ।
मगर हम मर मिटे तो भी
नहीं बलिदान होता है ।

किसी को हार पहनाकर
कहो-सम्मान होता है ।
किसी की पीटकर ताली
कहो-कल्याण होता है ।

थमा दो नोट के बंडल
नहीं नुकसान होता है ।
इसी से जिन्दगी के बल्ब
का स्विच ऑन होता है ।

सिड़ी ही सीढ़ियां चढ़कर
सदा श्रीमान होता है ।
बिदककर बुद्धमानी से
मनुज विद्वान होता है ।

जो लम्बी तानकर सोता,
वही शैतान होता है ।
भगत जिसको भगा देते,
वही भगवान होता है?

सास


हिन्दी के कवियों को जैसे
गीत-गवास लगा करती. है,
या नेता-टाइप लाला को,
नाम-छपास लगा करती है ।

मथुरा के पंडों को लगती
है खवास औरों के घर पर,
उसी तरह श्रोतागण पाकर
मुझे कहास लगा ..करती है ।

पढ़ते वक्त मुझे बचपन में
अक्सर प्यास लगा करती थी,
और गणित का घंटा आते,
शंका खास लगा करती थी ।

बड़ा हुआ तो मुझे इश्क के
दौरे पड़ने लगे भयंकर,
हर लड़की की अम्मा मुझको
अपनी सास लगा करती थी ।

कसम आपकी, सच कहता हूं,
मुझको सास बहुत प्यारी है,
जिसने मेरी पत्नी जाई,
उस माता की बलिहारी है ।

जरा सोचिए, अगर विधाता
जग में सास नहीं उपजाते,
तो हम जैसे पामर प्राणी
बिना विवाहे ही रह जाते ।

कहो कहाँ से मुन्नी आती ?
कहो, कहाँ से मुन्ना आता ?
इस भारत की जन-संख्या में
अपना योगदान रह जाता ।

आधे दर्जन बच्चे-कच्चे,,
अगर न अपना वंश बढ़ाते,
अपना क्या है, नेहरू चाचा
बिना. भतीजों के रह जाते ।

एक-एक भारतवासी के
पीछे दस-दस भूत न होते,
तो अपने गुलजारी नन्दा
भार योजनाओं का ढोते!

क्या फिर बांध बनाए जाते?
क्या फिर अन्न उगाए जाते?
कर्जे - पर - कर्ज ले-लेकर
क्या मेहमान बुलाए जाते?

यह सब हुआ सास के कारण
बीज रूप हैं वही भवानी!

सेओ इनको, नेता लोगो!
अगर सफलता तुमको पानी!

श्वसुर-प्रिया, सब सुखदाता है,
भव-भयहारिणि, जगत्राता है,
सुजलाम-सुफलाम,विख्याता हैं,
सास नहीं, भारत माता हैं ।

साली


तुम श्लील कहो, अश्लील कहो
चाहो तो खुलकर गाली दो!
तुम भले मुझे कवि मत मानो,
मत वाह-वाह की ताली दो!

पर मैं तो अपने मालिक से
हर बार यही वर मागूँगा
तुम गोरी दो या काली दो
भगवान मुझे एक साली दो!

सीधी दो, नखरोंवाली दो
साधारण, या कि निराली दो!
चाहे बबूल की टहनी दो
चाहे चम्पे की डाली दो!

पर मुझे जन्म देने वाले
यह मांग नहीं ठुकरा देना
असली दो, चाहे जाली दो,
भगवान, मुझे एक साली दो!

यह यौवन भी क्या यौवन है
जिसमें मुख पर लाली न हुई!
अलकें घूँघर वाली न हुई
आखें रस की प्याली न हुई.

वह जीवन भी क्या जीवन है
जिसमें मनुष्य जीजा न बना;
वह जीजा भी क्या जीजा है
जिसके कोई साली न हुई!

तुम खा लो भले पलेटों में
लेकिन थाली की और बात!
तुम रहो फेंकते भरे दाव
लेकिन खाली की और बात!

तुम मटके-पर-मटके पी लो
लेकिन प्याली का और मजा;
पत्नी को हर दम रखो साथ,
लेकिन साली की और बात!

पत्नी केवल अर्द्धांगिन है
साली सर्वांगिन होती है ।
पत्नी तो रोती ही रहती,
साली बिखेरती मोती है!


साला भी गहरे में जाकर,
अक्सर पतवार फेंक देता;
साली जीजाजी की नैया
खेती है, नहीं डुबोती है ।

विरहिन पत्नी को साली ही
पी का सन्देश सुनाती है ।
भौंदू पत्नी को साली ही
करना शिकार सिखलाती है ।

दम्पति में अगर तनाव
रूस-अमरीका जैसा हो जाए ।
तो साली ही नेहरू बन कर
भटकों को राह दिखाती है ।

साली है पायल की छम-छम,
साली है चम-चम तारा-सी!
साली है बुलबुल-सी चुलबुल,
साली है चंचल पारा-सी!


यदि इन उपमाओं से भी कुछ
पहचान नहीं पाए हो तो;
हर रोग दूर करने वाली
साली है अमृत-धारा-सी!

मुल्ला को जैसे दुख देती
बुर्के की चौड़ी जाली है!
पीने वालों को ज्यों अखरी
टेबिल की बोतल खाली है!

चाऊ को जैसे च्यांग नहीं
सपने में कभी सुहाता है
ऐसे ही खूसट लोगों को
यह कविता साली वाली है!

साली तो रस की प्याली है
साली क्या है रसगुल्ला है!
साली है मधुर मलाई सी
अथवा रबड़ी का कुल्ला है!

पत्नी तो सख्त छुहारा है,
हरदम सिकड़ी ही रहती है
साली है फाँक संतरे की.
जो कुछ है खुल्लमखुल्ला है!

साली चटनी पोदीने की'
बाटों की चाट जगाती है ।
साली है दिल्ली का लड्डू,
देखो तो भूख बढ़ाती है ।

साली है मथुरा .की खुरचन
रस मैं लिपटी ही आती है!
साली है आलू का पापड़
छूते ही शोर मचाती है!

कुछ पता तुम्हें है,  हिटलर को
किसलिए अग्नि ने छार किया?
या क्यों ब्रिटेन के लोगों ने
अपना प्रिय किंग उतार दिया?

ये दोनों थे साली-विहीन,
इसलिए लड़ाई हार गए ।
वह मुल्के-अदम सिधार गया,
यह सात समुन्दर पार गए ।

किसलिए विनोबा गाँव-गाँव
यूँ पैदल मारे फिरते थे?
दो-दो बज जाते थे लेकिन
नेहरू के पलक न गिरते थे।

ये दोनों थे साली-विहीन
वह बाबा बाल बढ़ा निकला ।
चाचा भी कलम घिसा करता,
अपने घर में बैठा इकला ।

मुझको ही देखो, साली बिन
जीवन ठाली-सा लगता है!
सालों का जीजाजी कहना
मुझको गाली-सा लगता है!

यदि प्रभु के परम पराक्रम से
कोई साली पा जाता मैं ।
तो भला, हास्य रस में लिखकर
पत्नी पर गीत बनाता मैं?

भाभीजी नमस्ते


'भाभीजी, नमस्ते!'
'आओ लाला, बैठो!' बोली भाभी हंसते-हंसते ।
' भाभी, भय्या कहा गए हैं ? ' 'टेढ़े-मेढ़े रस्ते!
'तभी तुम्हारे मुरझाए हैं भाभीजी, गुलदस्ते । '

'अक्सर संध्या को पुरुषों के सिर पर सींग उकसते!
रस्सी तुडा भाग ही जाते, हारी कसते-कसते!'
'लेकिन सधे कबूतर भाभी, नहीं कहीं भी फँसते ।
अपनी छतरी पर ही जमते, ज्यों अक्षर पर मस्ते!
'भाभीजी, नमस्ते!'

चला सिलसिला रस का!
'बैठो, अभी बना लाती हूँ लाला, शर्बत खस का । '
'भाभी, शर्बत नहीं चाहिए, है बातों का चसका । '
'लेकिन तुमसे मगज मारना देवर, किसके बस का?'

भाभी का यह वाक्य हमारे दिल में सिल-सा कसका ।
तभी लगाया भाभीजी ने हौले से यूँ मसका-
ओहो, शर्बत नहीं चलेगा? वाह, तुम्हारा ठसका!'
कलुआ रे, रसगुल्ले ले आ! ये ले पत्ता दस का!'
चला सिलसिला रस का ।

भाभीजी का लटका!
कलुआ लेकर नोट न जाने कौन गली में भटका?
वार-बार अब हम लेते थे दरवाजे पर खटका ।
बत-रस-लोभी चित्त हमारा रसगुल्लों में अटका ।
कुरता छू भाभीजी बोलीं, 'खूब सिलाया मटका ।'
'लेकिन हम तो देख रहे है ब्लाउज नर्गिस-कट का ।'
आरखों-आखों भाभीजी ने हमको हंसकर हटका ।
'ये नर्गिस का चक्कर लाला, होता है संकट का ।'
भाभीजी का लटका!

'भाभी बड़ी सलौनी ।


बंगाली में भालो—भालो पंजाबी  में सौनी ।
ऐसी स्वस्थ, सनेह-चीकनीर ज्यों माखन की लौनी 1
अतिशय चारु चपल अनियारी, मानो मृग की छौनी । '
पत्नी ठण्डा भात, कि साली भी बेहद मिरचोनी ।
लेकिन मेरी भाभी जैसे रस की भरी भगोनी ।
ऐसी मीठी, ऐसी मनहर,  नौनी - नौनी ।
घंटाघर पर मिलती जैसे, दही बड़े की दौनी ।'
भाभी बड़ी सलौनी ।

'देवर बड़ा रंगीला ।
कोई मजनूं होगा, लेकिन यह मजनूं का टीला ।
पैण्ट पहनता चिपका-चिपका, कोट पहनता ढीला ।
ऐसी चलता चाल कि जैसे बन्ना हो शर्मीला ।
वैसे तो यह बड़ा बहादुर, बनता है बमदीला ।
पर घर में बीवी के डर से रहता पीला-पीला।
बाहर से है सूखा-सूखा, अन्दर गीला - गीला ।
मधुबाला को भूल गया अब भाती इसे शकीला ।'
देवर बड़ा रंगीला ।

'भाभी मेरे मन की ।
बातसुनो! क्यासुनूँ, महाशय. तुम हो पूरे सनकी!
किस सन् की बाबत कहती हो?' वह बोली,'पचपन की ।
थे कमीज से नाक पोंछते, याद करो बचपन की ।
टुकुर-टुकुर क्या देख रहे हो ' 'सुन्दरता कंकन की ।
'कंकन-कुण्डल नहीं चीन्हते, कथा याद लछमन की ?'
बत-रस की गजलों मैं सहसा आई टेक भजन की ।
दरवाजे पर भय्या आए हमने पालागन की ।
भाभी मेरे मन की ।

मामाजी!

लो आज आपसे होजाए अपनी कुछ रामा-श्यामा जी
हे मामाजी!

पत्नी पर मैंने लिखा
लिखा उनके प्राणोपम भाई पर
साली पर मैंने लिखा
लिखा अपनी पवित्र भौजाई पर ।

सासू पर मैंने लिखा,
ससुरजी पर भी अक्षत डाल दिए;

अब तुम ही सिर्फ बचे हो मेरे काव्य-जगत के गामा जी!;
हे मामा जी!

माँ से बढ़कर है मामाजी
मांजी से बढ़कर मामा जी ।
जीमा कि नहीं मामाजी ने
होता इस पर हंगामा जी ।
ढीली आदत, ढीली अंटी
ढीली, आँखे, ढीला चश्मा
ढीली टाँगों में लदर-पदर, पहने ढीला पाजामा जी!
हे मामाजी ।

नभ मैं चन्दा मामा नामी
माहिल मामा थे हंगामी ।
मामा बरेरकर इस युग में
बन गए भांजों के स्वामी ।
इस राजनीति में, आजादी
के बाद जरा-सी हिम्मत कर
जो बने इन्दिरा के मामा, उनके बज रहे दमामा जी!
हे मामाजी!

मामाजी के घर आते ही
भारी हल्ला हो जाता है? ।
मम्मी का, उनके आते ही
भारी पल्ला हो जाता है ।
पापा को लगता फुलस्टाप,
बच्चे ब्रेकिट मैं आते हैं
चाचा-ताऊ, नौकर-चाकर, सब पर लग जाता कामा जी!
हे मामा जी!

मामाजी को लस्सी पसन्द,
मामाजी को मच्छर लगते ।
मामाजी जल्दी सोते हैं
मामाजी देरी से जगते ।
मामजी  मिर्च कम खाते
उनको रसगुल्ले ही भाते ।
मँगवा दो इनको गोल्ड  ये पीते नहीं पनामा जी!
हे मामाजी!

मामाजी के घर आते ही
पापा की छुट्टी होती है ।
गुड्डू, से झगड़ा होता है
गुड्डी से कुट्टी होती है ।
उनके आते ही मम्मी की
आमदनी बढ़ने लगती है
लेकिन मामा के जाते ही, चुक जाता उनका नामा जी!
हे मामाजी!

मामा पक्के आडीटर हैं
रकमों को लिख रख लेते हैं ।
बैलेंस पिताजी का फिर भी
वे नहीं बिगड़ने देते हैं ।
उनको सब मिलकर सहते है,
सब कान दबाए रहते हैं,
वे इस प्रकार हैं सम्मानित, जिस तरह दलाई लामा जी!
हे मामाजी!

कवि न कभी बूढ़ा होता है ।

हाय, न बूढा मुझे कहो तुम
शब्दकोश में प्रिये, और भी बहुत गालियां मिल जाएंगी,
जी चाहे सो कहो, मगर मत मरी उमर की डोर गहों तुम!

हाय न बूढ़ा मुझे कहो तुम

क्या कहती हो दांत झड् रहे ?
अच्छा है वेदान्त आएगा ।
दाँत बनाने वालों का भी
अरी, भला कुछ हो जाएगा ।

बालों पर आ रही सफेदी
टोको मत, इसको आने दो ।
मेरे इस सर की कालिख को
शुभे, स्वयं ही मिट जाने दो ।


जब तक पूरी तरह चांदनी
नहीं चाँद पर लहराएगी ।
तब तक तन के ताजमहल पर
गोरी नहीं ललच पाएगी ।

झुकी कमर की ओर न देखो,
विनय बढ रही है जीवन में ।
' तन में क्या रक्खा है रूपसि,
झाँक सको तो झाँको मन में ।

अरी पुराने गिरि-श्रृंगों' से'
ही बहता निर्मल सोता है ।
कवि न कभी बूढ़ा होता ' है ।

मेरे मन में सुनो सुनयने,
दिन भर इधर-उधर होती है ।

और रात के अँधियारे में
बेहद खुदर-पुदर होती है ।

रात मुझे गोरी लगती है
प्रात मुझे लगता है बूढ़ा ।
बिखरे तारे ऐसे  लगते
जैसे फैल रहा हो कूड़ा ।

स्वर्गगा चम्बल लगती है,
सातों ऋषि लगते हैं डाकू ।
ओस नहीं, आ रहे पसीने
पौ न फटी, मारा हो चाकू ।

मेरे मन का मुर्गा तुमको
हरदम बांग दिया करता है ।
तुम जिसको बूढ़ा कहतीं वह
क्या-क्या स्वांग किया करता है।

बूढ़ा बगुला ही सागर में
ले पाता गहरा गोता है ।
कवि न कभी बूढ़ा होता है ।

भटक रही हो कहाँ?
वृद्ध बरगद की छाँह घनी होती है ।
अरी, पुराने हीरे की कीमत
दुगनी - तिगुनी होती है ।
बात पुरानी है कि पुराने
चावल फार हुआ करते हैं ।
और पुराने पान बड़े ही.
लज्जतदार हुआ करते हैं ।

फर्म पुरानी से 'डीलिंग'
करना सदैव चोखा होता है ।
नई 'कम्पनी' से तो नवले,
अक्सर ही धोखा होता है ।

कौन दाव कितना गहरा है
नया खिलाड़ी कैसे जाने?
अरी, पुराने हथकण्डों को
नया बाँगरू क्या पहचाने,?

किए-कराए पर नौसिखिया
फेर दिया करता पोता है ।
कवि न कभी बूढ़ा होता है ।

वर्ष हजारों हुए राम के
अब तक शेव नहीं आई है!
कृष्णचन्द्र की किसी मूर्ति में
तुमने मूँछ कहीं पाई है?

वर्ष चौहत्तर के होकर भी
नेहरू कल तक तने हुए थे ।
साठ साल के लालबहादुर
देखा गुटका बने हुए थे ।

अपने दादा कृपलानी को
कोई बूढ़ा कह सकता है?
बूढ़े राजा जी की चोटें
कोई जोद्धा सह सकता है?

मैं तो इन सबसे छोटा हूँ
क्यों मुझको बूढ़ा बतलातीं
तुम करतीं परिहास, मगर
मेरी छाती तो बैठी जाती ।

मित्रो, घटना सही नहीं है,
यह किस्सा मैना - तोता है ।
कवि न कभी बूढ़ा होता है ।

--

(डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया से साभार)

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