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हिंदी दिवस विशेष व्यंग्य / हिंदी का वसंत मास / डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

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हिंदी का वसंत मास
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मुझसे जब कोई पूछता है कि वसंत पंचमी कब है,तो मैं कहता हूँ 14 सितंबर को। लोग हँस देते हैं। उन्हें हँसी आती है पर मुझे नहीं.उलटे गुस्सा आता है। मेरी गंभीर बात को वे हँसी में उड़ाना चाहते हैं। प्रायः मेरे दर्द की अनदेखी कर अब तो लोग मजे लेने के लिए भी मुझसे 'वसंत पंचमी ' की जानकारी चाहने लगे हैं। उन्हें नहीं पता कि हिंदी वालों का वसंत मास सितंबर ही है। इसी मास में हिंदी की कोयलें कूकती हैं। कहीं पढ़ा था कि नर कोकिल का कंठ अधिक सुरीला होता है। मोरनी को सुंदर पंखों वाली मानने  का भ्रम भी उन्हीं दिनों टूटा था कि यह भी नर ही होता है । इसके बाद नर की मधुरिमा उस समय और अधिक प्रामाणिक हो गई जब अनेक कोकिल कंठी कवयित्रियों को छोड़कर एक नर कोकिल को कूजने और पूजने के लिए पाँच-पाँच लाख मिलने लगे।वह अपनी चार लाइनों को चौवन बार दुहाराता है। मटकता है। झूमता है। कुछ द्विअर्थी संवाद बोलता है,फिर गाने लग जाता है। यानी श्रोताओं को वहीं गीत याद करा देता है।पूरा फ़िल्मी गीत का मज़ा देता है। कुछ जानकार बताते हैं कि,"आप 'विश्वास' करो चाहे न करो पर वह नर कोकिल अकेले इसी मास में आधा करोड़ कमा लेता है। "वही नर क्यों इस महीने हर नर कोकिल कुछ ज़्यादा ही कूकते हैं।

ज़गह-ज़गह हिंदी के नर-बैनर ही तो छाए-बिछाए दिखते हैं। कहीं भी देखो ज़मीन पर खड़े,पड़े या गड़े दोनों कोछों में ईंट बांधे हवा में इतराते ,इठलाते और लहराते हुए मिल जाते हैं। जहाँ न चाहो वहाँ भी ये दिख जाते हैं। हर गली के मोड़ पर । सब्जी लेने जाओ वहाँ भी। पैसे लेने जाओ वहाँ भी। विश्व विद्यालय में हिंदी विभाग के दरवाजे के बाहर तो होते ही होते हैं ।  भरपेट अनाज पाए किसान की तरह ये राष्ट्रीयकृत बैंकों के मुख्य द्वार पर भी ज़्यादा खुशी न सँभाल पाने के कारण आत्महत्या की मुद्रा में लटके हुए देखे जा सकते हैं।
हिन्दी का वसंत आते ही कवयित्रियों की मुख मंजरी पर फूल-से धरे अधराधार रक्ताभ हो उठते हैं। कवि -भ्रमर उन फूलों के पराग की गंध पा उन्मत्त हो जाते हैं। मुहल्ले छाप से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के कवि सम्मेलनों की झड़ी लग जाती है। इन दिनों कुछ चालाक किस्म के बंदों को छोड़कर जिन्हें अपने अंडे औरों से सेवाने की आदत है, बाकी में से अमूमन हर कवि -लेखक के खुद के घर भी 'गोष्ठी-घर' में तब्दील हो जाते हैं।कितना सही है या गलत पर कहा जाता है कि प्राचीन काल में गायों के बांधने के स्थल को गोष्ठी कहा जाता था। पक्का है उनके भोजनार्थ वहाँ चारा भी रखा जाता होगा। आधुनिक काल में कोई गोपालक ही उनका वह सारा चारा खा गया । जब गायों ने यह सुना तो तो वे शर्म के मारे गावों के किनारे के तालाबों पर डूबने गईं तो उनमें चुल्लू भर भी पानी न मिला वह भी चारा खाने के बाद वही महाशय पी गए  । बहुत दूर वाले बड़के तालाब पर गईं तो वहाँ परधान की मछलियाँ कुलेलें कर रही थीं। परधान के कारिंदों ने तो उसमें झाँकने तक नहीं दिया। लाठियों से मार-मार के खूनाखच्चर ऊपर से कर दी। इससे वे और भी शर्मिंदा हो गईं और खुद ही कसाइयों के घर चली गईं ।कुछ असफल मसखरे कवियों और लेखकों की किंवदंती है कि उन्हीं गायों की कमी पूरी करने के लिए कुछ गऊ छाप कवयित्रियाँ खुद आकर गोष्ठी के संयोजक मकान मालिक के खूँटे और कभी-कभी मालकिन के खूँट से भी बँध जाती हैं।


इन दिनों हिन्दी- विभागाध्यक्ष के कक्ष में तो कविता कहानी का अकच्छ वैसे ही मचा रहता है जैसे सावन के महीने में शिवालयों में । वहाँ पाँवों के नीचेऔर अगल-बगल से प्रसाद में लिपटा चीटियों का झुंड चिपक के चिकोटी काटता है और यहाँ चरण चुंबन की जल्दबाजी में ऊपर से रीडरों और प्रोफेसरों का। खास तौर पर इस मास में सभी विभागाध्यक्ष की विचारधारा के समर्पित अनुयायी लगने लगते हैं। सबमें उनकी जाति और कुल गोत्र का पता लगाकर उस जाति-प्रजाति को भारतीय इतिहास का गौरव बताने की होड़ लग जाती है।   ऐसा लगता है कि सिंधु सभ्यता सभ्यता से लेकर भारतीय इतिहास ,सभ्यता और संस्कृति तक के अध्ययन के लिए एक ही केंद्र रह गया है,वह है उनका विभाग,जिसके केंद्र में हैं विभागाध्यक्ष। सभी विभागाध्यक्ष को यह दिखाना चाहते हैं कि अबकी के पाठ्यक्रम में उनसे अधिक प्रासंगिक कविता और कहानी किसी की न रहेगी। विभागाध्यक्ष सभी को इतनी गंभीरता से सुनते हैं कि सबको उम्मीद-सी बँध जाती है। अपने पाठकोंसे क्या छिपाऊं इस वसंत मास में मैं भी अपने विभागाध्यक्ष का लँगोट नियमित छांटता हूँ तो कुछ आशा -सी मुझे भी दिखने लगी है। सुना है वे अबकी संस्थान की पुरस्कार समिति में लिए गए हैं।उनके कहने से पिछले सितंबर में बाईस कार्यक्रम मिले थे।वह भी सबके सब डिग्री कॉलेजों के ।   मैं तो हिन्दी का सुख अब समझा हूँ तो चाहता हूँ कि बारहों महीने सितंबर ही सितंबर आए। कोई दूसरा महीना हो ही न।


१४ सितंबर तो इस वसंत मास का पीक डे होता है.सब अखबारों में हिंदी की चर्चा। टीवी चैनलों पर हिंदी की चर्चा । विद्यालय-विद्यालय और महाविद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय के आँगन तक हिंदी का वसंत छा जाता है। चारों ओर हिंदी का खुशनुमा वातावरण सृजित हो जाता है। दिग्दिगंत हिंदी की सुरभि से सुवासित हो उठता है। जो कभी कहीं नहीं पूछे जाते हैं उन्हें भी कोई-न- कोई विभाग न्योत ही लेता है। वे भी टाई और कोट पैंट में भाषण देते हुए फोटो खिंचवा के किसी साप्ताहिक या पाक्षिक के तीसरे-चौथे पन्ने की अंतरी-कोलिया में ज़गह पा ही लेते हैं।
हिंदी के दो संप्रदाय हैं। एक अज्ञेय की तरह धनाड्य है,जो विद्युत के दूधिया  प्रकाश से जग को जगर-मगर करता है तो दूसरा कबीर की तरह अपनी ही बडेर पर लुकाठा रखकर या फिर प्रेमचंद की तरह जीवन का तेल जलाकर साहित्य की ज्योति जलाकर समाज को रास्ता दिखाता है। एक की महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में प्राण प्रतिष्ठा की गई है । दूसरा संप्रदाय अनबिकी प्रतिमाओं की तरह या तो फुटपाथ पर पड़े-पड़े धूल फाँकता है या फिर हर अनबिके माल की तरह कलाकार के साथ वापस हो जाता है। यह सत्य प्रतिमाएँ भी जानती हैं कि वे चाहे जितनी सुंदर क्यों न हों पर प्राण प्रतिष्ठा के बिना किसी भी मूर्ति की कोई कद्र नहीं।


उच्च कक्षाओं में हिंदी वे पढ़ते-पढ़ाते हैं जो प्रायः गाँव के होते हैं। किसी गरीब घर से आते हैं या जिनके माँ-बाप पढे-लिखे नहीं होते हैं। प्राय:लड़कियाँ इसका अपवाद होती हैं। इसके अपवाद यदा-कदा वे लड़के भी हो सकते हैं जो अमीर घरों के तो हैं पर निठल्ले हैं और माँ-बाप की नज़र में कुछ भी कर पाने लायक नहीं रह गए हैं या फिर जिनकी संगत खराब हो गई है । जिनका अन्य विषयों में एकाध अंक से प्रवीणता सूची में नाम छपने से छूट जाता है,इक्का-दुक्का  समय की कद्र करने वाले विद्यार्थी भी साल बर्बाद न हो यह सोच कर  हिंदी में  नाम लिखा लेते हैं।ये लगभग प्रतिभाशाली ही होते हैं।लेकिन किसी परीक्षक का शिकार होकर अपने भाग्य पर रो रहे होते हैं। लेकिन आगे चलकर इनमें प्रोफेसर बनने अगर इससे चूक गए तो कवि/कवयित्री या लेखक/लेखिका बनने की पूरी संभावना रहती है।   

हिंदी पढ़ने वालों को क्या मिलता है ?इसके उत्तर में जितना कुछ कहा जाए कम ही है। कुछ को अध्यापकी तो कुछ को रीडरी,प्रोफेसरी मिल जाती है। अगर अंग्रेज़ी भी आती है तो इनमें से कुछ केंद्रीय संस्थानों में अनुवादक/हिंदी अधिकारी /सहायक निदेशक बनकर देवनागरी की सेवा में लग जाते हैं। विज्ञान का हर विद्यार्थी वैज्ञानिक ,गणित का गणितज्ञ,शिक्षा शास्त्र का शिक्षा शास्त्री और दर्शन का दार्शनिक नहीं होता पर हिंदी का हर वह विद्यार्थी जो परास्नातक कर लेता है, कवि/कवयित्री या लेखक/लेखिका ज़रूर बन जाता है। कार्यालयों में कागज़ -कलम क्या अब तो कंप्यूटर भी मुफ्त मिल जाता है तो ऐसे पार्ट टाइम कवि/लेखक कविता-कहानी लिखते -पढ़ते रहते हैं। जो नहीं लिखते-पढ़ते वे अखबारों की समस्या पूर्ति करते रहते हैं। ऑफिस में में जहाँ दूसरे लोग तास खेलते हैं,ये समस्या पूर्ति करते हुए शब्दों से खेलते हैं। हिन्दी पढ़े- लिखे लोगों में कुछ पाठक हो जाते हैं। वे रसपूर्वक कविता -कहानी की बात करते हैं। दक्षिण या वामपंथी होकर अपने विचारधारा वाले साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़-पढ़ा कर लहालोट होते रहते हैं।गाल बजाते हैं. सभाओं और सम्मेलनों में माइक टेस्ट करने के बहाने तरह-तरह के गीत/कवित्त/श्लील-अश्लील चुट्कुले/चौबल्ले सुनाते हैं. मंच से भगाए जाने पर पंडाल में चौकडी भरते रहते हैं. बड़े-बड़े आयोजनों को मुफ़्त सुनने जाते हैं। साहित्यकारों के साथ फोटो खींचते हैं। सेल्फ़ी लेते हैं और घर या ओफिस पहुंचते ही फेसबुक पर जम जाते हैं और अपनी या जिसकी भी खुली पा जाएं उसकी टाइम लाइन पर अपलोड भी कर देते हैं।लोगों से कह-कहके लाइक करवाते हैं.

कुछ हिंदी पढने -लिखने वाले लोग तो अपने को साहित्यकार की श्रेणी में विद्यार्थी जीवन से ही रख लेते हैं.बहुतों को सुनकर और उस सब सुने हुए को मिलाकर कुछ न कुछ लिख भी मारते हैं। इसी आदत के चलते ये कभी-कभार कहीं छप-छपा जाते हैं । पहेली आदि पर इन्हें कभी -कभी पुरस्कार भी मिल जाता है। इस सदकर्म पर जब-तब अखबार या पत्रिका वाले सौ-डेढ़ सौ रुपए की किताबें पुरस्कार के रूप में भी भेज देते हैं तो वे उन्हें अपने कार्यालय के पते पर ही मंगाते हैं और अपने बॉस समेत सभी साथियों को दिखाकर वाहवाही लूटते हैं। फोटो खिंचाते हैं और ड्राइंग रूम में बाबू जी या अम्मा की माला चढ़ी फोटो की बगल में लटका देते हैं।


हिंदी में एक नया संप्रदाय उभरा है । वह है पी-एच.डी संप्रदाय। इसे कर लेने के बाद हर कोई आलोचक हो जाता है।आगे डॉक्टर लगा होने से इसकी पहचान आसान हो जाती है । इसी का लाभ उठाकर इन दिनों होम्योपैथी के कुछ चिकित्सक हिंदी आलोचना के क्षेत्र में खूब चमक रहे हैं। वे प्रायः खाली रहते हैं। इससे उन्हें क्लीनिक में भी आलोचना लिखने का समय मिल जाता है। कंपाउंडर परची भी काटता है और साथ-साथ आलोचनाएँ भी टाइप करता रहता है। इन्हीं सबकी कृपा से इन दिनों हिंदी का आलोचना क्षेत्र काफ़ी समृद्ध हुआ है। हिंदी में इतने आलोचकअवतरित हो चुके हैं जितने अङ्ग्रेज़ी के दुनिया भर में भी नहीं हैं। इन आलोचकों को देखकर मैं प्रायः आश्वस्त हो जाता हूँ कि हिंदी विश्व भाषा बन चुकी है।
हिंदी का एक सर्वहारा वर्ग है जो किसी संप्रदाय में नहीं आता। उसे धर्म निरपेक्ष कह सकते हैं। गलियों-गलियों ट्यूशन पढ़ाता कविता कहानी लिखता-छपाता फिरता है।

इस वर्ग के लोग रोज़गार पाए हुए दिखते तो हैं पर असल में पाए हुए होते नहीं हैं। खाली होने पर भी लाज बचाने के लिए ये व्यस्त दिखने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं। ये संतोषी प्रवृत्ति के होते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा ये अंशकालिक रोज़गार प्राप्त कहे जा सकते हैं। इनमें से कुछ अख़बारों में अवैतनिक संवाददाता हो जाते हैं। कुछ हाकर का काम कर लेते हैं। कुछ पुस्तक विक्रेताओं के यहाँ पुस्तकें उठाते- धरते हैं। कुछ बजाज के यहाँ थान उलटते-पलटते हैं। जिन्हें शहर या कस्बे में कुछ नहीं मिलता वे गाँव लौटकर खेती और मजूरी-धतूरी करने लग जाते हैं।

सितंबर महीना केवल इसी वर्ग के लिए दुख लेकर आता है। ऊपर के सभी वर्ग इन्हीं से आशाएँ लगाए बैठे रहते हैं कि ये हिंदी के लिए कुछ करेंगे।इसके लिए इन्हें बरगलाते हैं। कहते हैं कि फलाँ हिंदी का उत्थान नहीं होने दे रहे हैं,ढिकाँ नहीं होने दे रहे हैं। यह कहकर इन्हें भावुक बनाकर इनके हाथों में कुछ बैनर -पोस्टर थमा देते हैं। किसी विभाग में खुद मुख्य अतिथि ,विशिष्ट और सम्मानित अतिथि बन कर मंचासीन हो जाते हैं।उधर वे खा-पीकर लच्छेदार भाषण देते रहते हैं और इधर ये भूखे-प्यासे बैनर थामे खड़े रहते है। ये भी उनको खुश करने के लिए हिंदी के साथ हो रहे अन्याय को लेकर अपने बदन पर छप्पन छुरी चला-चला के पेट से लेकर पीठ तक लहूलुहान कर लेते हैं । हाय-हसन की तर्ज़ पर हिंदी के ताज़िए निकालते हैं । केवल इसलिए कि अगले दिन मुख्य अतिथि के साथ अखबार में इन सबकी भी रंगीन फोटो छप जाती है।इससे जो बच जाते हैं वे हैं कैमरा वाले ,चाय-पानी कराने वाले और पंडाल में अपने उधम से मुर्दनी न छाने देने वाले बच्चे. ब्लैक ऐंड व्हाइट ख़बर में ये सब भी एक पंक्ति में आदि-आदि में स्थान पा जाते हैं। इस तरह वक्ता ब्रेकिंग न्यूज़ के नायक बन जाते हैं फिर साल भर हिंदी की रोटी तोड़ते हैं । इस सत्य से अवगत होने पर बैनर -पोस्टर वाले सर्वहारा यानि उनके धारक और उद्धारक भी वहीं बैनर-पोस्टर पटक के अपने-अपने काम पर चले जाते हैं।


मैं किस श्रेणी में आता हूँ? यह मैं अपने मुँह से नहीं कहना चाहता। बस ,हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। इसीलिए मैं देश-देश मारा-मारा घूम रहा हूँ। केवल ढाई लाख महीने की पगार लेकर हिंदी के लिए घर-परिवार त्यागे चीन में पड़ा हूँ। यह त्याग कोई नहीं देख रहा है। मैं ही नहीं और भी सैकड़ों लोग मेरी ही तरह देश-देश मारे-मारे फिर रहे हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास की तरह जब कभी हिंदी सेवियों का इतिहास लिखा जाएगा उसमें हम शहीदों का नाम होगा । उसे पढ़ने के बाद लोग जान पाएंगे कि विदेश में हिंदी पढ़ाना कोई आसान काम नहीं है। युद्ध की तरह जोखिमों से भरा है। मैं सालों से यहाँ पड़ा हूँ । किसी ने कोई हाल नहीं पूछा । जब सितंबर आने को हुआ तो कुछ कद्र हुई। कुछ लोगों ने आदेश दिया कि पता लगाओ और बताओ कि चीन में कितने लोग हिंदी जानते हैं या जानना चाहते हैं? वे हिंदी में प्रबोध,प्राज्ञ या प्रवीण में से किस स्तर की योग्यता रखते हैं? उनका हिंदी प्रेम कहीं नकली तो नहीं है। मैं यही सब पता लगाने को एक से पूछ ही रहा था कि अंदर कर दिया गया । तीन महीने बाद जमानत पर छूटा हूँ। यह त्याग कोई कम है। मुझे चाहिए था कि पहले काम सौंपने वाले सज्जन से पूछता कि भारत में हिंदी की स्थिति का पता लगाओ । चीन में हिंदी भाषियों की जन गणना से क्या लाभ है? पर पूछ नहीं पाया। तीन महीने बाद उसी बेकूफी का खामियाज़ा भुगत  के लौटा हूँ.


सितंबर महीने में ही लोग जान पाते हैं कि हिंदी कहाँ-कहाँ पढ़ाई जाती है। यह भी जान पाते हैं कि कितने लोग विदेशों में हैं, जो हिंदी पढ़-पढ़ा रहे हैं। बहुत से प्रोफेसर और रीडर हिंदी पढ़ाने के लिए विदेश जाने की तैयारी में लग जाते हैं।नए सूट सिलाए जाते हैं तो दर्जियों को काम मिल जाता है और मक्खी मार रहे बजाजों की भी विक्री बढ़ जाती है। नए सूट केस खरीदे जाते हैं। पता लगाया जाता है कि किस देश में कौन हिंदी पढ़ा रहा है। उसका फोन नंबर लिया जाता है। जो अपने रिशतेदारों से स्वदेश में भी एक मिनट से ज़्यादा बात नहीं करता ,आई एस डी पर दस-दस मिनट बात करता है। कभी-कभी तो यह अपनापन उमड़ता हुआ चोंगे से या फिर मोबाइल हुआ तो स्क्रीन से भी बाहर आता हुआ दिख जाता है। उन्हें अपने-अपने विभागों में आमंत्रित करने की होड़ लग जाती है। विदेश में रहने वालों को भी लगता है कि उनकी पूछ हो रही है । इन दिनों उन्हें पक्का भरोसा हो जाता है कि अपने वतन से प्यारा वतन कोई दूसरा नहीं,जहाँ अपनों की अब भी कद्र होती है। वह आने से पहले झूम के गाता है -"सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा...."इस तरह यह मास अपने से बिछुड़े हुओं को वतन बुलाने का मास है।अपनों के दिन बहुरने का मास है। हिरनियों और विरहिनियों के लिए तो यह अपनी शीतल-शीतल फुहारों से मन की प्यास बुझाने वाला सावन मास ही है।


सितंबर महीना शब्दकोशों के दिन बहुरने का मास भी है। इस महीने लोग हिंदी का शब्दकोश भी देखते हैं।हिंदी भाषा का उत्सव मास भी यही है। जबसे केंद्र सरकार के कार्यालयों और पुस्तकालयों में पचास फीसदी रकम हिंदी की किताबों पर खर्चना ज़रूरी हो गया है,बाज़ार में हार्ड बाउंड किताबें ही छप रही हैं। इनके दाम इतने ज़्यादा होते हैं कि विद्यार्थी और गरीब पाठक इन्हें बस देख सकता है। हिंदी की पुस्तकों की खरीद की दृष्टि से प्रकाशकों का भी उत्सव मास है यही सितंबर । इस सूचना से लेखक खुश न हों क्योंकि पुस्तकों की बिक्री का विवरण जिस बही में होता है,वह सितंबर की बाढ़ में बह या अक्तूबर के सूखे में सूख जाती है। यह अफवाह पहले से है कि कवि लोगअपनी पुस्तकें नामी प्रकाशक को मुंहमांगी रकम देकर छपाते हैं । इसलिए उनके लिए जैसे सूखे सावन वैसे भरे भादों।
यह हिंदी का वित्तीय मास भी कहा जा सकता है और आँकड़ा मास भी । इसी महीने अपने देश को छोडकर दुनिया भर के आँकड़े बाहर आते हैं।तरह -तरह के आंकड़े निकलते हैं कि किस देश के किस विश्वविद्यालय में हिंदी की पढ़ाई होती है। कनाडा, रूस या जापान के किस विद्वान ने हिंदी के लिए कितना काम किया है और जर्मनी के किस विद्वान ने कितना । मारीशस ,सूरी नाम और त्रिनिडाड आदि के अवधी- भोजपुरी गाने वालों का  आँकड़ा निकालने वाले अपने बारे में नहीं बताते कि उन्होंने किस-किस फ़ोरेन लैंगवेज़ इंस्टीट्यूट में स्पोकेन इंगलिश सीखी है। इसके बावजूद उनके दिए आँकड़ों में इतना दम होता है कि पढ़ते ही या तो खुशी नहीं तो गम से आँखें छलछ्ला आएँ। कभी-कभी तो ये आंकड़े बहुत ही आशाजनक होते हैं और लगता है कि इन आँकड़ों को देखकर यू एन ओ लजा जाएगा और सभी भाषाओं को हटाकर इकलौती हिंदी को कामकाज की भाषा बना लेगा। हम भी आंकड़े देख-सुनकर खुश हो जाते हैं। इसी महीने आप एक अठन्नी में चार चवन्नी भुनाने वाले अपने विभाग -प्रमुख से हिंदी के नाम पर भी चवन्नी-अठन्नी निकलवा सकते हैं। अपने-अपने विभागों में हिंदी बोल और बुलवा सकते हैं। यह हिंदी का मेला मास भी है और मैला मास भी।हिंदी का   श्राद्ध मास भी यही है । जो अपने पूर्वजों की तरह हिन्दी को बहुत मानते हैं वे पंद्रह दिन का श्राद्ध पक्ष रख लेते हैं और जो कम मानते हैं वे दिवस मनाकर चुप्पी साध लेते हैं और फिर साल भर के लिए हाइवरनेशन में चले जाते हैं। 

सुभद्रा कुमारी चौहान आज जीवित होतीं तो सितंबर के इन उत्सवों को देखकर उन्हें भी कुछ न कुछ लिखना ही पड़ता।वे पक्का एक कविता और लिखतीं,जिसका शीर्षक होता-

'हिंदी का कब होता वसंत?'
जिस मास में कूकें संत असंत
स्वर छाएँ   जिनके   दिग्दिगंत
हो जाता हिंदी मय अग-जग 
यह सब माहों में मानी महंत

बाकी सब हैं घोंघा बसंत.  

बस यही सितंबर है वसंत।

-डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

 

प्रोफेसर(हिंदी)एवं संपादक 'इंदु संचेतना'

कुआंगतोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय

कुआंगचौ, कुआंगतोंग प्रांत,चीन

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