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लघु कथाः खुशी / गिरधारी राम

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अनुपम बेचैनी से अस्पताल में इधर-उधर टहल रहा था। बेचैनी का कारण था अनुपम की पत्नी का आपरेशन हो रहा था। जब अनुपम की पत्नी को पेट में दर्द हो रहा था, तभी वह एम्बुलेंस से अस्पताल ले कर आया था। आशा अनुपम की पत्नी थी उसको तभी से खुशी और बढ़ गयी थी जब वह पहली बार पेट से हुई थी। और होगी भी क्यों नहीं क्योंकि शादी के लगभग दस साल बाद ये खुशखबरी मिली थी।

आशा को रह-रह कर प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) हो रही थी। वह लेबर रूम में बेचैन हो रही थी, एक दम से ऐंठने लगती, नर्स एक इंजेक्शन हाथ में तथा एक स्लाईन भी लगा कर गयी। स्लाईन में भी दो-तीन इंजेक्शन लगा गयी। स्लाइन लगने के करीब तीस मिनट के बाद आशा का लेबर पेन और बढ़ गया।

नर्स और दायी ने मिलकर आशा को लेबर रूम में ले गयी। डॉ कान्ता ने काफी प्रयास किया लेकिन सब बेकार जा रहा था, क्योंकि बेबी का पोजीशन ठीक नहीं था। आखिर में डॉ कान्ता ने आपरेशन करने का निर्णय लिया। अनुपम की अनुमति लेने के उपरान्त आपरेशन प्रारम्भ हुआ।

इधर आपरेशन प्रारम्भ हुआ और उधर अनुपम की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इसीलिए अस्पताल के लेबर रूम के बाहर इधर-उधर टहल रहा था।

दरअसल अनुपम की माँ बहुत ही पुराने ख्यालों की थीं। उन लोगों की सोच यही थी, कि अगर घर पर बेबी पैदा हो तो बेहतर है, क्योंकि घर की इज्जत घर पर रहेगी। लेकिन अनुपम, वह अच्छी तरह जानता था कि अस्पताल घर से बेहतर है। फिर भी वह सोच रहा था कि अगर अस्पताल जाऊँगा तो खर्च पर खर्च होगा दवाओं, डाक्टर, तथा अस्पताल का खर्च, वह खर्च से घबरा जाता था।

अनुपम का परिवार बहुत ही पुराने ख्यालों का था। घर की महिलाओं का घर से बाहर निकलने से समाज में प्रतिष्ठा चली जायेगी। क्योंकि औरत की डोली ससुराल जाती है और ससुराल से अर्थी ही घर से बाहर निकलती है। “ये दकियानूसी विचार और ऊपर से ग़रीबी” मनुष्य को कहीं का भी नहीं छोड़ती है। अनुपम का परिवार बहुत ही ग़रीब था, केवल मजदूरी पर ही आश्रित था इसीलिए और घबराने का कारण था।

गाँव में जब आशा की स्थिति एकदम से बिगड़ने लगी, गाँव की दायी प्रयास करके हार मान चुकी थी तब जाकर अनुज की सलाह पर अनुपम ने आशा को लेकर अस्पताल आया था।

नर्स ने नन्हा सा बेबी लेकर आयी और अनुपम को दिखाकर बोलीः-आपका बेटा हुआ है। अनुपम को खुशी का ठिकाना नहीं रहा, उसका दिल खुशी से झूमने लगा। नर्स बेबी को दूसरे कमरे में ले गयी और एक सीसे के छोटे से घर में रख दिया और एक नीली रोशनी जला दिया। शायद बेबी बहुत कमजोर था।

अनुपम झटपट दौड़ा और टोकरी भर मिठाई ले आया, और सबको बाटने लगा। मन ही मन सोच रहा था कि बेटा का छठी करूँगा, बरही करूँगा, कीर्तन कराऊंगा खुशियां मनाऊंगा तभी डॉ कान्ता ने आकर अनुपम से कहा - यदि और देरी होती तो जच्चा और बच्चा दोनों को बचा सकने में असमर्थ होती, लेकिन ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि समय रहते अस्पताल चली आयी।

अनुपम का हृदय ग्लानि से भर गया, वह मन ही मन पछता रहा था कि आशा को अस्पताल पहले क्यों नहीं ले आया। लानत है गाँव की दकियानूसी पुराने ख्यालों का कि महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। तभी एक आदमी ख़बर दे गया कि आपको अस्पताल के आफिस में बुलाया जा रहा है। अनुपम जब आफिस में गया तब आफिस के लिपिक ने पंद्रह सौ रूपये थमाते हुए कहा कि यह जच्चा-बच्चा की देखभाल के लिए सरकार की तरफ से दिया जा रहा है।

अनुपम का दिल और खुशियों से भर गया वह दौड़े-दौड़े आशा की तरफ गया। आशा अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई थी, उसकी आँखों में खुशी तथा संतोष साफ दिखाई दे रही थी। आशा, अनुपम को निहार रही थी, उसकी गालों पर खुशी के आँसू बह रहे थे।

समाप्त

 

 

दिनांकः 8 अगस्त 2010, सिलीगुड़ी

 

लेखक परिचय

 

नामः गिरधारी राम

पिताः श्री मिश्री राम

जन्मः 25.07.1974, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

शिक्षाः स्नातक

पताः 3/E, D.S.कालोनी, न्युजलपाईगुड़ी, भक्तिनगर,

जलपाईगुड़ी, प.बं, पिनः734007

फोनः 9434630244, 8515077444

ईमेलः giri.locoin@gmail.com

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