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शालिनी मुखरैया की दो लघुकथाएँ

दो लघु कथाएं

01़ अंतर

"बधाई हो बहनजी - बिटिया का रिश्ता तय हो गया" सरोज ने पड़ोस की शर्माइन को बधाई दी ।

शर्माइन बहुत खुश थीं - आखिर उनके मन से बहुत भारी बोझ जो उतर गया था। वह बड़े हर्ष से सरोज को बिटिया की ससुराल वालों के बारे में बता रहीं थीं।

"बड़े ही खुले विचारों वाली ससुराल मिली है हमारी गुड़िया को" शर्माइन की ऑखों में संतोष की चमक थी।" वरना मैं तो परेशान थी कि न जाने कैसे लोग होंगे।" "किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है - हमारी गुड़िया के तो भाग्य ही खुल गये ।"

"जैसा चाहो वैसे रहो - चाहे साड़ी पहनो या सलवार सूट किसी भी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं है । यहाँ तक कि जींस टॉप भी पहन सकती है ।"

"सच में बहुत अच्छा ससुराल मिला है" शर्माइन अपनी रौ में बोलती जा रहीं थीं ।

सरोज हैरान हो कर कभी शर्माइन का चेहरा देख रही थी तो कभी दरवाज़े के पीछे घूँघट की ओट में झांकती हुई बहू का चेहरा देख रही थी जिसकी आँखों में छिपा दर्द वह महसूस कर पा रही थी

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02। कंजूसी

"न जाने कितनी बार समझाया है जरा दीये में घी कम डाला कर। जब देखो मंदिर का दीया पूरा भरता है आखिर कितनी मंहगाई का जमाना है । पता नहीं है इसे कि आखिर कितनी मेहनत से पैसा कमाया जाता है" गुप्ता जी अपने पुत्र पर गुस्सा हो रहे थे ।

"अरे भगवान का दीया ही तो जलाना है - उसके लिये इतना मंहगा घी बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है"

"खाना लगा दूँ क्या" गुप्ता जी की पत्नी ने पूछा

"ले आओ - बहुत जोरों की भूख लगी है" । गुप्ताजी की पत्नी भोजन की थाली ले कर आयीं तो गुप्ता जी थाली में कम घी की रोटी देख कर बिफर गये।

"क्या सूखी रोटी ले कर आयी हो - मुझे बीमार समझ रखा है क्या"

"जाओ अच्छे से घी में तर रोटी ले कर आओ" गुप्ता जी पत्नी पर दहाड़े।

गुप्ता जी का पुत्र इस अंतर को समझने की कोशिश कर रहा था कि जिस भगवान की कृपा से आज

वह लोग घी से चुपड़ी रोटी खा रहे हैं तो उसकी पूजा के लिये इतनी कंजूसी क्यों ………………

शालिनी मुखरैया विशेष सहायक

मेडिकल रोड - अलीगढ़

03।09।2016

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