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व्यंग्य / सुखीराम 'जनसेवक' / वीरेन्द्र 'सरल'

कितना प्यारा नाम है सुखीराम 'जनसेवक'। उपनाम 'जनसेवक' को उन्होंने अपने सीने से ऐसे चिपका रखा है जैसे बन्दरिया अपने मरे हुए बच्चे को। निष्प्राण जनसेवक शब्द के केवल अवशेष ही शेष है पर उसे विशेष बनाकर पेश करना सुखीराम जी को खूब आता है। वैसे शुभ्रधवल वस्त्रों में वे जनसेवक जैसे लगते भी हैं। वे जब से जनसेवा के मैदान पर आये हैं तब से अंगद के पांव की तरह गड़े हुए हैं और सेवा करने की जिद पर अड़े हुए है। जनता बिल्कुल नहीं चाहती कि वे और ज्यादा सेवा करे पर वे मानने वाले कहाँ है। वे तो अपने क्षेत्र के ऐसे अनूठे जनसेवक है जो एक बार किसी की सेवा करने की जिद पर उतर गये तो उसकी सेवा करके ही दम लेंगे। सेवा कराने वाले मरे या बचे इससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता।

सुखीराम जी का व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही बड़ा रहस्यमय है। ऊँट किस करवट बैठेगा ये पता लगाना एक बार आसान है पर सुखीराम जी कब पाला बदल देंगे, इसे तो भगवान भी नहीं जान सकते। उनकी बुद्धि इतनी खतरनाक कि खतरा भी उससे लोहा लेने में कतरा जाये। एक बार क्षेत्र के प्रतिष्ठित चमचे कुछ काम से सुबह-सुबह उनके बंगले पर पहुँच गये। कड़ाके की सर्दी में सुखीराम जी शॉल ओढ़ और स्वेटर पहनकर नहा रहे थे। उन्हें देखकर चमचों का दिमाग चकराया पर मामला कुछ भी समझ में नहीं आया। एक वरिष्ठ चमचे ने उनसे पूछा कि भैया जी आप ये क्या गजब ढा रहें हैं। कडाके की सर्दी में शॉल ओढ़कर और स्वेटर पहनकर नहा रहे हैं। सुखीराम जी ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, पूरा क्षेत्र मेरे इशारे पर नाचता है। इस ठंड की इतनी हिम्मत जो मुझे कँपकँपाये। सर्दी के इस मौसम की ऐसी की तैसी, अब तो इसे भी अपनी ऊँगलियों पर नचाना है। इस नये स्टाइल में नहाकर अपने आप को सर्दी से बचाना है, समझे? इतनी बुद्धिमतापूर्ण बाते सुनकर चमचों को काटो तो खून नहीं। कुछ तो बड़ी मुश्किल से अपने आप को बेहोश होने से बचा पाये। पर चमचे तो ठहरे चमचे, भैया जी की इस बुद्धिमानी की जय-जयकार करने लगे।

सुखीराम जी पहले जनसेवक बने या जनसेवक बनने के बाद सुखीराम हुए इस संबंध में विद्वानों का अलग-अलग मत है। पक्ष वाले विद्वान कुछ और कहते हैं और विपक्ष वाले कुछ और। लेकिन सुखीराम जी को बचपन से जानने वाले बुजुर्गों का कहना है कि वे पहले नाम के ही सुखीराम थे। दाम के, काम के और आराम के सुखीराम तो वे जनसेवा का व्रत लेने के बाद ही बने। उनके पूर्वजों ने जीवन-यापन के लायक सम्पत्ति अवश्य रख छोडी थी पर अपने करिश्माई हाथों से उनमें चार-चाँद लगाने का काम तो स्वयं सुखीराम जी ने ही किया। बाल्यकाल से ही उन्हें जनसेवा की लत पड़ गई थी। पहले वे पार्ट टाइम ही जन सेवा किया करते थे। इसलिए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे पढ़ने का कुविचार त्याग दिया। उन्हें ना तो कंधे पर बस्ते का भारी बोझ उठाना पसंद था और न ही बेकारी में दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए जूते घिसना। उनका कहना था कि भाई आदमी आखिर पढ़ता क्यों है। आत्मनिर्भर होने के लिए ही न? जब मुझे बिना पढ़े ही आत्मज्ञान के माध्यम से न केवल अपनी बल्कि अपनी सात पीढ़ी की आत्मनिर्भरता का सूत्र हाथ लग गया है। तो मैं इन बेकार की बातों में अपना दिमाग खपाकर समय क्यों नष्ट करूँ। यही सब कहते हुए वे कमर कसकर फुलटाइम जनसेवा के क्षेत्र में कूद पड़े। और जब से कूद पड़े हैं तब से ऐसा उछल-कूद मचा रहे हैं जैसे कोई छूटा हुआ सांड़। जनसेवा के क्षेत्र में उन्हें सबसे पहले बड़ा ब्रेक करीब पच्चीस वर्ष पहले के एक चुनाव में एक बड़े भैया जी ने दिया था। चुनाव जिताने वाले बुद्धिनाशक पेय वोटरों तक सुरक्षित पहुँचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हें मिली थी। इस कार्य को उन्होंने इतनी खूबसूरती के साथ अंजाम दिया था कि भैया जी को विजयश्री मिल गई। खुशी के मारे भैया जी ने सुखीराम को गले से लगा लिया था। बाद में सुखीराम ही भैया जी के ऐसे गले पड़ गये कि भैया जी को मोहल्ला छोड़कर गली में गुम होना पड़ा।

भ्रष्टाचार की गंगा में रोज डुबकी लगाने के बाद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ झन्नाटेदार भाषण देना सुखीराम जी का प्रिय शगल है। गरीबी हटाओ, मंहगाई घटाओ, विकास बढ़ाओ और सबको पढ़ाओ जैसे नारों का बम्फर स्टॉक उनके मुँह पर वैसे ही रहता है जैसे किसी जमाखोर के गोदाम में माल। जब भी जनता गरीबी, भुखमरी, बेकारी और महंगाई की बात करती है तो अपने स्टाक से दो-चार नारों का हवाई फायर कर देते हैं ताकि नारों की गूँज दूर-दूर तक सुनाई पड़े और जनता चुप हो जाय। किसी ने ज्यादा छेड़ने की कोशिश की तो उनके पास साम, दाम दंड, भेद जैसे घातक अस्त्र-शस्त्र तो है ही जिससे छेड़ने वाले का मुँह बंद किया जा सके। इन अस्त्र-शस्त्र से लैस होने के कारण उनकी निडरता और निर्भरता देखते ही बनती है। नियम-कायदे सब जेब के भीतर रखते हैं। नैतिकता, ईमानदारी, परोपकारिता जैसी चीजों से अपने आप को दूर रखकर उन्होंने जो तरक्की की है, पक्ष वाले उसकी मिसाल देते नहीं थकते। लोग जब भी उनके कारनामों पर ऊँगली उठाते हैं। तो वे अपना मुँह फेरकर मुस्कराते 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातों को' गुनगुनाने लगते हैं। और फिर ऐसी तबीयत से जनसेवा करते हैं कि जनता की रूह काँप उठे।

पाँच वर्षों तक बिल्कुल बेखौफ और निरंकुश रहने वाले सुखीराम जी को केवल चुनाव के समय कुछ घबराने की आवश्यकता महसूस होती है। इस समय वे अपने मुखमंडल पर विनम्रता का भरपूर मेक-अप करते हैं। आशीर्वाद देने वाले हाथ की मुद्रा को फिर से जोड़ने वाली मुद्रा में लाने के लिए गहन अभ्यास करते है। मेरा दिल ये पुकारे आजा के अंदाज में कार्यकर्ताओं को आवाज देते है। उन पर पड़ी हुई नाराजगी की धूल-कचड़ों को साफ करते है। फिर भी अंदर ही अंदर बेचैनी और घबराहट महसूस करते हैं। अपने सिवाय किसी और के लोकप्रियता की ग्राफ को बढ़ते देख उनको साँप सूँघने लगता है। वे चुनाव जीतने के लिए अपनी सारी शक्ति वैसे ही लगा देते हैं जैसे मैराथन दौड़ जीतने के लिए कोई धावक या मैच जीतने के लिए खिलाड़ी।

चुनाव के समय सुखीराम जी बेहद चौकने रहते है। गैरों को तो छोड़ो वे अपनों से भी बहुत सावधान रहते है। मन में बराबर यह भय लगा रहता है कि कहीं इतिहास अपने आप को दोहरा न दे। वे भले ही क्षेत्र के दौरे पर रहते हों पर उनकी आत्मा हमेशा कुर्सी के इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाती रही है।

एक दिन वे अपन आप बड़बड़ा रहे थे कि नहीं छोड़ूगा, किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ूगा, मरते दम तक नहीं छोड़ूगा। एक कायकर्तानुमा चमचे ने उनसे पूछा,क्या हुआ जनसेवक जी, क्या किसी ने आपके शान में गुस्ताखी करने की हिमाकत की? आप बार-बार किसे नहीं छोड़ने की बात कह रहें हैं। जनसेवक जी ने उसे घूरते हुए कहा-'अरे कुर्सी नहीं छोड़ने की बात कर रहा हूँ पगले। जब तक यह कुर्सी है तब तक किसमें हिम्मत है जो मेरी शान में गुस्ताखी कर सके।''

कार्यकर्ता ने कहा-''क्या आपकी कुर्सी पर कोई काला कौआ बैठ गया था। जिसके अपशगुन से आप इतना घबरा गये हैं। एक मंत्री जी तो कार पर काला कौआ के बैठने से इतने घबरा गये थे कि उन्होने अपन कार ही बदल दी थी। क्या आपको को भी कुछ इसी तरह का भय लग रहा है। यदि ऐसा है तो तुरन्त बाबा संकटानंद से सलाह लेकर उस अपशगुन को डिफ्यूज करा देते हैं।''

जनसेवक जी ने कहा-''नहीं, ऐसी बात नहीं है। पर पता नहीं क्यों आज मुझे मेरा सिंहासन डोलते हुए महसूस हुआ। पता करो, मेरा सिंहासन छीनने के लिए कोई कठिन तपस्या तो नहीं कर रहा है। यदि ऐसा कोई तपस्वी मिले तो तुरन्त उसकी तपस्या भंग करने का इंतजाम करो। चाहे कुछ भी करना पड़े पर मेरा सिंहासन छूटने न पाये, समझ गये? दो दिन के भीतर मुझे रिपोर्ट दो कि मेरे इन्ऊलोक में कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो रहा है। कार्यकर्ता जो आज्ञा सरकार के अंदाज में सिर झुकाकर बंगले के बाहर निकल आया।

दो-चार दिनों में वह कार्यकर्ता रिपोर्ट लेकर जनसेवक जी के बंगले पर पहुँचा। उन्होंने बताया कि इस बार क्षेत्र की जनता एक उच्चशिक्षित, सेवा भावी और ईमानदार युवा की सेवा लेने के लिए उसे मैदान पर उतारना चाहती है। उस युवक की लोकप्रियता का ग्राफ अश्वमेध यज्ञ के छोड़े हुए घोड़े के समान बढ़ता ही जा रहा है। हो सकता है आप की छठी इन्द्रीय इस बात को भांप गई हो और आपको अपना सिंहासन डोलता हुआ नजर आ रहा हो।

यह सुनते ही जनसेवक जी अपनी कुर्सी को कसकर पकड़ते हुए चीखा-''नहीं, नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। मैं मरते दम तक अपनी कुर्सी को नहीं छोड़ सकता। चाहे जैसे भी हो उस युवक की तपस्या को भंग करने का इंतजाम करो। तुरन्त कामदेव और अप्सराओं को भेजकर उसकी तपस्या में विघ्न डालो, समझे।

कार्यकर्ता ने कहा-''जनसेवक जी! यह तो तपस्या भंग करने की बड़ी प्राचीन पद्धति है जो अब असर हीन हो गई है। अब तो इसके लिए नये वर्जन का उपयोग करना पडेगा और वह है कामदेव के बदले नामदेव और दामदेव दोनों को भेजना पड़ेगा। अप्सराओं के बदले नोटों की गड्डियों से भरा हुआ ब्रीफकेस भेजना पड़ेगा। तभी उसकी तपस्या भंग होगी। हरी पत्ती और लाल बत्ती का लालच अच्छे अच्छों के ईमान को डांवाडोल कर देता है। उस नये लड़के की बिसात ही क्या है।

जनसेवक जी ने उस कार्यकर्त्ता को प्रशंसात्मक नजरों से देखते हुए कहा-''शाबास! बिल्कुल मुझ पर गये हो। आगे खूब तरक्की करोगे। मेरे बाद मेरी कुर्सी तुम्हारा ही वरण करेगी। अब विलंब मत करो । चाहे जैसा भी हो पर फटाफट उस तपस्वी की तपस्या भंग कर दो। कार्यकर्त्ता जो आज्ञा कहते हुए बंगले से बाहर आ गया।

कुछ ही दिनों बाद अखबारों में यह समाचार आया कि उस युवा जनसेवक जी की पार्टी की नीतियों से प्रभावित होकर अपने समर्थकों के साथ उनकी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है। अखबार में जनसेवक जी से गले मिलते हुए उस युवा की मुस्कुराती हुई तस्वीर भी छपी थी।

जनसेवक जी के चेहरे पर ऐसा तेज दिखाई दे रहा था मानो इन्द्र का सिंहासन छिनने से बच या हो। समर्थक भी खुशी से झूमते नजर आ रहे थे। मायूस थी तो उस क्षेत्र की जनता। जिनकी आँखों में जगी उम्मीद की एक किरण भी बुझ चुकी थी।

वीरेन्द्र 'सरल'

बोड़रा( मगरलोड़)

जिला-धमतरी( छत्तीसगढ़)

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