---प्रायोजक---

---***---

रु. 30,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु लघुकथाएँ आमंत्रित हैं.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ [लिंक] देखें. आयोजन में अब तक प्रकाशित लघुकथाएँ यहाँ [लिंक] पढ़ें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

'दे लंका में आग' [ लम्बी तेवरी--तेवर-शतक ] / रमेशराज

साझा करें:

सिस्टम आदमखोर, जि़न्दगी दूभर है, कविता को हथियार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के। असुरों के आगे विनती में हर स्वर है, क्रान्ति-भरे फिर ...

image


सिस्टम आदमखोर, जि़न्दगी दूभर है,
कविता को हथियार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

असुरों के आगे विनती में हर स्वर है,
क्रान्ति-भरे फिर भाव जगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

कान्हा है यदि मौन, भार अब तुझ पर है,
घटता द्रौपदि-चीर बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

सुन ले फिर पाश्चात्य-सभ्यता घर-घर है,
श्रेष्ठ सनातन मूल्य बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

भरा हुआ दुःख से खुशियों का अन्तर है,
मन पर भारी बोझ, हटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

पापों की बुनियाद खोखली, पल-भर है,   
जग को अब ये बात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के। 

सच है नाव-सवार, नाव जल-भीतर है,
नैया सच की पार लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

साँस-साँस पर आज लोटता विषधर है,
दंश न मारे, बीन बजा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

हर पापी के हाथ विष-बुझा खंजर है,
‘सच’ भोला इन्सान, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

कहाँ छुपा काले धन वाला अजगर है
मुद्दा संसद बीच उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

‘महिषासुर’ भर रहा हृदय में फिर डर है,    
माँ दुर्गे को जगा, जगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

संसद में खर्राटे भरे मिनिस्टर है,
इसको तीखा मज़ा चखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

क्यों जूए-सा बोझ रखा कंधे पर है,
मत जीवन बदहाल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

घुड़की देता हुआ समय अब बन्दर है,
मत घुड़की पै माथ नवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इस सिस्टम के पास लूट का मंतर है,
मत इसकी बातों में आ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के |

राम-नाम का ढोंग हृदय के भीतर है,
इस ‘शबरी’ के बेर न खा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

दे लंका में आग जहाँ सब बदतर है,
बन कपीश इस बार दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

आग आँधियों को आयी अब लेकर है,
अपने छप्पर-छान बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

संवेदन से दूर भावना पत्थर है,
स्पंदन-हित बुद्धि लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

अब चीज़ों का भाव पहुँच से बाहर है,
क्या पीयेगा दूध-मठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

हवस अमीरों को धन की अम्बर पर है,         
अब इनको औक़ात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

ये संसद का बजट वसंती छल-भर है,
बनकर कोयल गीत न गा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इस निजाम को छेद, भेद ये पल-भर है,
मात-मात-दर-मात न खा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जीवन का आनंद लीक से हटकर है,
बन कोल्हू का बैल चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

हर उन्मादी लिये हाथ में खंजर है,
नफरत की दीवार गिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

असहायों का यहाँ रुदन में हर स्वर है,         
मुस्कानें बस्ती में ला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।    

द्रौपदि बैठी जिस जंघा के ऊपर है
क्यों न तोड़ता वो जंघा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जहाँ सरों पर छतें नहीं, बस अम्बर है,
भले झौंपड़ी बने, बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मुझमें-तुझमें बस इतना ही अन्तर है,
मैं माचिस, बारूद बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

बस थोड़ी ही दूर नूर जल्वागर है,
सोच जहाँ पर आज खड़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इस नुक्कड़-नाटक में परिवर्तन-स्वर है,
मेरे सँग में गोल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।    

जिसके भीतर खुशहाली का मंज़र है,
उस चिन्तन को पका, पका तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जल्लादों की छुरी हमारे सर पर है,
बड़े बुरे हैं हाल, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मेरी मति पर कुंठाओं का पत्थर है,
ऐसे मत आरोप लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

उड़ी पतंगों के पीछे अब लंगर है,
कहीं न हो ये काम बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जहाँ प्रेम का बदला-बदला-सा स्वर है,        
वहाँ लगी है आग, बुझा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

ये भी जीने का कोई क्या स्तर है,
कदम प्रगति की ओर बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

लेकर कच्ची चली ‘सोहनी’ गागर है,
नदिया भरे उफान, बचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

डाका अबकी बार हमारे हक़ पर है,
दिल्ली को यह बात बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

देश लूटता धनिक, सांसद, अफसर है,
अब भारी आक्रोश जता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

नदी बनी ये बता भला क्यों पोखर है,
पोखर को फिर नदी बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

अपना बल मत भूल कि तू तो नाहर है,
अंधकार दे चीर, बला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

देख तुझे अँधियार काँपता थर-थर है,
लाया है इस बार प्रभा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इन्क़लाब का तू ही तो नामाबर है,
परचम सच का उठा, उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

महँगाई का बोझ करे तन दुल्लर है,
जमाखोर को सबक सिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

वर्षों से ये ही शोषण का मंजर है,        
आग-बबूला आज हुआ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के। 

तू ही तो विष पीने वाला शंकर है,
रच दे फिर इतिहास नया तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

कह दे नेता देश बेचता तस्कर है,
परदा अब की बार उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

उसने अपना नाम रखा क्या ‘ईश्वर’ है?
कौन लूटता देश बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

क्रान्तिकारियों साथ रही जो जलकर है,
वो ही बुझी मशाल जला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

असुरों की चर्चा फिर से अधराधर है,    
भय का यह माहौल मिटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

कैसे मानूँ मेरी पीर निरुत्तर है,
जाने सबका हाल, ‘जगा’ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मेघनाद-सा गर्जन, रावण-सा स्वर है,
धूल अधम को चटा, चटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

आज कंश का मित्र बना मुरलीधर है,
इस रिश्ते से खुश है क्या तू लाँगुरिया? गाल छर असुरों के।

कर में ले तलवार दूसरे खप्पर है,
लाश खलों की आज बिछा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

तेरे ही काँधे पै सच की काँवर है,     
चल तेजी से पाँव बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।     

जहाँ दलदली भूमि कीच या गोबर है,
वहाँ नहीं चादरें बिछा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जिनके सोचों बीच लफंगा-लोफर है,
कर उन बीच न बैठ सभा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

फिर बम का आंतक देख पटरी पर है,
सोच-समझकर कर ट्रेन चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

कोई बोले ‘अल्ला’ कोई ‘हर-हर’ है,
बढ़ता हुआ फसाद घटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

बस थोड़ी दूरी पै अमृत-निर्झर है,    
वक्ष चीर दे कुछ तम का तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।       

एक यही तो रूप सत्य है-सुन्दर है,
‘भगत सिंह’ बन आज दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जहाँ आदमी बेहद दब्बू-कायर है,
वहाँ क्रान्ति की बाँच कथा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

भले दीखती तेरी काया पंजर है,
पहले ऐसा वीर न था तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

छुपा हुआ झाड़ी के पीछे अजगर है,
सच को लेगा लील, भगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के |

सूखे हुए खेत की खातिर जलधर है,
गहरे तम में अग्नि-शिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।       

है रावण-दरबार तुझे किससे डर है,
अंगद जैसा पाँव जमा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

तू है मौला-मस्त, विकट यायावर है,
इन्क़लाब की बहा हवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

तू नैतिक मूल्यों का सच्चा बुनकर है
ले-ले शब्दों में फरसा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

यह तेरा उपचार श्रेष्ठ अति हितकर है,       
लगा घाव पर सही दवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।        

ख़ामोशी को लादे गया दिसम्बर है,
नया साल खुशहाल बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

राजनीति का कीचड़ भरा सरोवर है,
इसमें सच का कमल खिला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मुख पर कालिख पोत कुकर्मी ये नर है,
यूँ मत रंग-अबीर लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

हर कउए की दृष्टि तेरी रोटी पर है,
लंगूरों के बीच घिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

दाना तो क्या छूछ न आये घर पर है,   
रखा रहा ऐसी मक्का तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।    

महँगाई के कारण जन-जन को ज्वर है,
जनता का संताप मिटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

जो हैं आदमखोर उन्हीं से टक्कर है,
गरेबान तक हाथ बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

वो जीतेगा जिसकी चोट निरंतर है,
वही पुराने हाथ दिखा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इत में घोर अभाव उधर मालोजर है,
सबको एक समान बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

वही देश का शत्रु दिखे जो लीडर है,     
मत इसका सम्मान करा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।       

खिले न कोई फूल, डाल पर पतझर है,
कैसे कहूँ वसंत, बता तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

फिर ‘गौरी’ घोड़े पर आया चढ़कर है,
तान प्रत्यंचा वाण चला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

सच कहने को मुँह मैंने खोला-भर है,
आगे मेरी बात बढ़ा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

चापलूस औ’ तुझमें भारी अन्तर है,
मत असत्य को माथ नवा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

हर कोई बन गया जहाँ पर मधुकर है,    
उन ग़ज़लों के गाँव न जा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

तर आँखों के साथ निर्धनों के घर है,
उस बेटी का ब्याह रचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

अरे उसे पहचान साधु जैसा स्वर है,
पहन गेरुआ वस्त्र ठगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

तब ही नतमस्तक होगा हर अक्षर है,
भाषा को हथियार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इस सिस्टम में पाता न्याय अनादर है,
जिसका पहरेदार बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के |

तेरे घर में चून आज मुट्ठी-भर है,    
किसको देगा इसे खिला तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।     

अँधियारा इस बार हमारा रहबर है,
ग़लत दलीलों बीच घिरा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इन्क़लाबियों की ये क्रान्ति धरोहर है,
अंगारे से राख हटा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

चीजें दीखें साफ कौन नर-किन्नर है,
कर उजियारा और घना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

इस युग में हर नंग दिखे परमेश्वर है,
नंगे को नंगा कह जा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

चटक रंग के साथ खिला गुलमोहर है,    
यूँ ही पानी-खाद लगा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।   

जीवन तेरा फूटा हुआ कनस्तर है,
चाहे जैसे रोज बजा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

क्यों जि़न्दा नारी की देह चिता पर है,
मत चलने दे ग़लत-प्रथा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

देखें हम भी तेरा अब क्या तेवर है,
अग्निमुखी चिन्तन में आ तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

सही चोट करने का ये ही अवसर है,
घन को भरकर जोश उठा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मेरी तेवरियों का विद्रोही-स्वर है,    
इनके हर तेवर को गा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

मेरी तेवरियों में पावक गोचर है,
हर तेवर को बना ऋचा तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।

सौ से ऊपर इस तेवर का नम्बर है,
ऐसी ही तेवरी बना तू लाँगुरिया, गाल छर असुरों के।
---------------------------------------------------------
+ रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
Mo.-9634551630


आदरणीय विद्वान् साथियो !
  ' तेवरी ' ग़ज़ल नहीं है क्योंकि --
  
' वृहद हिंदी शब्दकोश ' [ सम्पादक- कालिका प्रसाद ] के षष्टम संस्करण जनवरी - १९८९ के पृष्ठ -४९० और ४९३ पर तेवर [ पु . ] शब्द का अर्थ - ' क्रोधसूचक भ्रूभंग ', ' क्रोध-भरी दृष्टि ' , ' क्रोध प्रकट करने वाली तिरछी नज़र '  बताने के साथ-साथ  ' तेवर बदलने ' को - ' क्रुद्ध होना ' बताया गया है | ' तेवरी ' [स्त्री. ] शब्द ' त्यौरी ' से बना है | त्यौरी या ' तेवरी ' का अर्थ है - ' माथे पर बल पड़ना ' , ' क्रोध से भ्रकुटि का ऊपर की और खिंच जाना ' |
वस्तुतः तेवरी सत्योंमुखी चिन्तन की एक ऐसी विधा है जिसमें शोषण , अनीति , अत्याचार आदि के प्रति स्थायी भाव ' आक्रोश ' , से ' विरोधरस ' परिपक्व होता है |
कुछ अति ज्ञानी साहित्यकार  'तेवरी ' को  ' ग़ज़ल ' का ही रूप मानकर काव्य की इस नूतन विधा पर हमले बोलते आ रहे हैं और ' तेवरी ' को ' ग़ज़ल ' ही मानने या मनवाने पर आमादा हैं | ' तेवरी ' ' ग़ज़ल '  कैसे है ?, वे इस प्रश्न का उत्तर देने से कतराते हैं | वे हर समय तेवरीकारों को कुछ इस तरह गरियाते हैं - " तेवरी - कवि मन - बहलाव के मदारी प्रतीत होते हैं |" [ डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य  ] या " आप ग़ज़ल को ' तेवरी ' क्यों कहना चाहते हैं ? [ डॉ.सुधेश  ]
ऐसे सवालों को लेकर हमारा उत्तर सिर्फ इतना - सा है - " कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई और साम्राज्यवादियों से टक्कर लेने वाली रानी लक्ष्मीबाई में क्या अन्तर है , उसे पहचानो | प्रेमिका को बाँहों में भरने के जोश और कुव्यवस्था से पीड़ित आमजन के आक्रोश को एक ही खाने में फिट मत करो | "
हमारे ऐसे ही अनेक उत्तरों को दरकिनार कर ग़ज़ल के महापंडित अन्ततः ऐसे व्याख्यान उतर आये हैं - " बुरा न मानें तो एक बात कहूं - " अब तक पढ़ी तमाम तेवरियाँ . ग़ज़ल का बिगड़ा रूप हैं | " [ज्ञान प्रकाश विवेक ]


तेवरी और ग़ज़ल में मूलभूत अन्तर क्या है , आइये इसे समझने का प्रयास करें -
1. ग़ज़ल का अर्थ है - ' प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत ' , जबकि तेवरी का अर्थ है - ' कुव्यवस्था का विरोध ', इसी कारण तेवरी को समकालीन यथार्थ की सत्योंमुखी प्रस्तुति के रूप में माना - स्वीकारा गया है |
2. तेवरी का स्थायी भाव ' आक्रोश '  और इससे बनने वाले रस का नाम ' विरोध ' है | जबकि ग़ज़ल एक प्रणय - गीत होने के कारण शृंगार रस की विधा है |
3. ग़ज़ल की सम्पूर्ण व्यवस्था में एक ही बहर अर्थात् छंद का समावेश किया जाता है , जबकि तेवरी के हर तेवर [कथित शे'र ] में दो छंदों का समावेश कर सम्पूर्ण तेवरी को दो - दो छंदों में भी लिखा जाने लगा है | तेवरी की पहली , तीसरी , पाँचवीं , सातवीं ....पन्क्तियों में मान लो यदि कोई सोलह मात्राओं का छंद निर्धारित किया गया हो तो दूसरी , चौथी , छठी , आठवीं ... पन्क्तियों में 14 , 18 , 25 , 30 मात्राओं का अन्य छंद प्रयोग में लाया जा सकता है | इस प्रकार ग़ज़ल के छंद से अलग विशेषता वाला पृथक दो पन्क्तियों [कथित मिसरे ] का तेवर [कथित शे'र ] बनाया जा सकता है | कम से कम मेरी तेवरियों में इस विशेषता का आलोक आपको अवश्य मिलेगा | मेरी प्रस्तुत तेवरी या तेवरियों में एक नहीं अनेक नये छंदों का मकरंद आप सबको चकित कर सकता है | नया या नये छंद का नाम क्या है या होना चाहिए , सुधिजन बताने का कष्ट करते हैं तो मुझ पर कृपा होगी |
6. तेवरी के हर तेवर में एक नहीं दो-दो स्वरांत [कथित काफिये ] भी अब तेवरी की शोभा बढ़ाने लगे हैं , जबकि ग़ज़ल के हर शे'र में एक ही काफिया आता है | ठीक यही व्यवस्था तेवरी के समान्त [ कथित रदीफ़ ] पर भी लागू होती है |
इस व्यवस्था से उलट कहीं - कहीं ग़ज़ल के रदीफ़ - काफियों जैसी  व्यवस्था यदि तेवरी में दृष्टिगोचर होती भी है तो यह व्यवस्था ' कवित्त ' में भी मिलती है | क्या ' कवित्त ' को ग़ज़ल कहने या मानने का साहस किसी में है ??
7. तेवरी में गीतात्मकता पायी जाती है अर्थात् इसके सारे तेवर एक दूसरे के पूरक बनकर सम्पूर्ण कथ्य को पूर्णता प्रदान करते हैं , जबकि ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपनी स्वतंत्र सत्ता लिये हुए होता है |


ग़ज़ल से पृथक तेवरी की इन सारी विशेषताओं को दरकिनार कर अगर कोई ग़ज़ल का जानकार तेवरी को फिर भी ग़ज़ल मानता है तो उसे 'नाटक ' और ' एकांकी ' , 'लघुकथा ' और ' लघुकहानी ' तथा 'चुटकला ' और ' व्यंग्य ' के अन्तर को ध्यान में रखते हुए यह बताना ही चाहिए  कि ग़ज़ल की हू - ब - हू नक़ल ' हज्ल ' ग़ज़ल से अलग विधा कैसे और क्यों है ??

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच करें : ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3865,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2814,कहानी,2138,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,91,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,348,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,18,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,881,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,39,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,660,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,705,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,187,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: 'दे लंका में आग' [ लम्बी तेवरी--तेवर-शतक ] / रमेशराज
'दे लंका में आग' [ लम्बी तेवरी--तेवर-शतक ] / रमेशराज
https://lh3.googleusercontent.com/-clwkgZs4kIw/V8vr6J5LCvI/AAAAAAAAv5A/jsWRXU8NC9w/image_thumb%25255B4%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-clwkgZs4kIw/V8vr6J5LCvI/AAAAAAAAv5A/jsWRXU8NC9w/s72-c/image_thumb%25255B4%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/09/blog-post_27.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/09/blog-post_27.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ