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हिंदी और रोजगार की भाषा / हिंदी दिवस विशेष / डॉ. हरीश कुमार

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हिंदी और रोजगार की भाषा

हिंदी दिवस एक बार फिर आ गया है। हिंदी के चलन प्रचलन को लेकर सुझाव ,चिंताओं और चिन्तनों पर कार्यक्रम ,आयोजन और वही सब पारम्परिक बातें। खैर इस विषय पर ज्यादा कुछ कहने की बजाय मै आज की राष्ट्रभाषा और उसके बदलते स्वरुप के साथ उसका ग्लोबल रूप में स्वागत करना चाहूँगा। बहुत अच्छी बात है कि आज हर दिन ,हर समय हमारी भाषा के पास एक प्राइम टाइम है। समाचार पत्रों की बढती तादाद और उनके पाठको की संख्या तो बढ़ ही रही है ,वही डिजिटल क्षेत्र में हिंदी से जुड़े कई एप मोबाइल और एंड्राइड पर उपलब्ध हैं। यहाँ तक कि टीवी कार्यक्रमों में सबसे अधिक टी आर पी जुटाने वाले कार्यक्रम हिंदी भाषा में ही संचालित हो रहे है।

समय के अनुसार भाषा का जो रूप परिवर्तन हमारे सामने है उसका एक साझा और सरल रूप हमें पाठ्क्रमों में शामिल करने की जरूरत हैं। शिक्षा संस्थानों में भी हिंदी से जुडी जो बाते इस आधुनिक दौर में एक छात्र के लिए जाना जरूरी है उन्हें सही रूप में शामिल करना होगा और इस बात को ध्यान में रखना होगा कि शिक्षा संस्थानों के लिए भाषा के जो पाठ्क्रम निश्चित किये जा रहे है या पढाये जा रहे है उनकी उपयोगिता अवश्य छात्रों को स्पष्ट करवाई जाये। इस ग्लोबल समाज और डिजिटल संसार में हिंदी भाषा के कैसे पाठ्यक्रम को बनाया जाये या कैसे छांटा जाये और आधुनिक बनाया जाये इस पर जोर देने की आवश्यकता है। जब तक भाषा को रोजगार या उपयोगिता के अनुसार नहीं बदला जायेगा वो एक अतिरिक्त विषय की तरह धीरे धीरे अपनी गुणवत्ता खो देगी।

आजकल विज्ञापनों की भाषा देखिये ,आलोचना की भाषा देखिये ,बातचीत का सरल रूप देखिये ,सभी हिंदी के एक बदले हुए संसार की सबसे अच्छी उदाहरण हैं। दिल्ली जैसे शहर में हर वर्ष कितने कार्यक्रम सामजिक विषयों या साहित्यिक विषयों पर हो रहे है। उनमे भाग लेने वाले सभी विद्वान् समाचार पत्रों ,पत्रिकाओं और मंचों पर जिस हिंदी का प्रयोग कर रहे है ,वाही हिंदी का सबसे उत्कृष्ट रूप है। भाषा में दुरूहता या अर्थ की पहुँच आम श्रोताओं तक कितनी सरलता तक होती है यह विचारणीय है। आप की विद्वता यदि भाषा के कठिन प्रयोगों में लिपटी है तो संचार प्रभावित होता है और आप को नकार दिए जाने की प्रतिशतता बढ़ जाती हैं। आज हिंदी भाषा के प्रयोग को लेकर उसका जो बाजार की दृष्टि से परिवर्तन हुआ है उसे आप नकार नहीं सकते। लोकप्रियता संचार का सबसे बड़ा उद्देश्य है और संचार की सरलता का प्रयोग हर रोज बदलती हुई हिंदी के रूप में हो रहा है। हमारी राष्ट्र भाषा ने इस परिवर्तन को हर युग में अपनाया है। संस्कृत से लेकर पाली ,पाली से लेकर प्राकृत .प्राकृत से लेकर अपभ्रंश ,अपभ्रंश से लेकर खड़ी बोली और कड़ी बोली से लेकर आज कि आधुनिक हिंदी लगातार परिवर्तन को अपनाते हुए अपनी साख को लगातार बढ़ा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज हिंदी का एक बड़ा फलक फैला है। गूगल का आभार मानिये जिसने हिंदी के कंप्यूटर प्रयोग को लगातार उपभोक्ताओं के लिए सरल बनाने का काम किया है। आज हिंदी के अनेक फॉण्ट माइक्रोसॉफ्ट उपलब्ध करवा रहा है। यूनिकोड जैसे फॉण्ट और गूगल द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे भाषा इनपुट टूल्स ने समय के अनुसार हिंदी के संचार को बाधित नही होने दिया है। सिनेमा का हिंदी के प्रचार प्रसार में योगदान है ही। कितनी फिल्मों की रिलीज़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। यही नहीं हिंदी भाषी समाज जो विदेशो में लगातार बढ़ रहा है ,साहित्य ,उद्योग तथा सामजिक उत्सवों के जरिये भाषा के प्रचार प्रसार में अपनी एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

आज हिंदी का भारतीय बाजार में पूरी तरह वर्चस्व फैला है। अनुवाद ,शिक्षा ,पत्रकारिता ,बैंकिंग ,विज्ञापन ,सिनेमा ,खान पान आदि सभी क्षेत्रों में हिंदी एक आधार का काम कर रही है। हिंदी के न जाने कितने ब्लॉग ,ऑनलाइन साहित्य ,पत्र पत्रिकाए ,फेसबुक ,ट्विटर आदि हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक अभिन्न रूप बन चुके हैं। हमारी भाषा अस्तित्व रूप में हमारे साथ हर समय जुडी हुयी है। इसलिए हिंदी दिवस आने पर किसी चिंता का रोदन करने के बजाय भाषा को रोजगार से जोडकर देखा जाय और इस बात का प्रछार किया जाए कि हमारी हिंदी भाषा तो हमारे जीवन में चलते साँसों के सामान है ,हम एक क्षण उसके बिना नहीं रह सकते ,वो हमेशा हमारे इर्द गिर्द बनी रहेगी।

-डा हरीश कुमार

09463839801

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