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मुर्गे का सुरीला गाना / बाल कहानी / उपासना बेहार

राधेश्याम किसान गावं से दूर अपने खेत में घर बना कर रहते थे, उनके पास एक मुर्गा था, कई साल पहले जब मुर्गा छोटा चूजा था तब राधेश्याम बाबा उसे बाजार से खरीद कर लाये थे, तब से ही वह उनके साथ रहता आ रहा था. राधेश्याम मुर्गे को अपने बच्चे जैसा प्यार करते थे और हमेशा उसकी रखवाली करते थे. पास में ही जंगल होने के कारण मुर्गे की सुरक्षा के लिए घर के चारों ओर कटीले तार से घेरा बना दिया था ताकि कोई भी जानवर अंदर आ दज उसे खा न सके. उस जंगल में एक लोमड़ी रहता था. एक दिन उसने इस मोटे मुर्गे को देख लिया. उसका जी मुर्गे को खाने को ललचाने लगा लेकिन कटीले तारों की वजह से वो मुर्गे के पास पहुँच नहीं सकता था. उसने एक प्लान बनाया, दूसरे दिन सुबह सुबह जब मुर्गा बांग देने लगा और जोर जोर से “कुकड़ू कु” की आवाज निकालने लगा तभी लोमड़ी वहाँ पहुँचा. उसे देख कर मुर्गा डर गया, लोमड़ी ने मीठी आवाज में कहा “दोस्त डरो मत. मैं तुम्हें नहीं खाऊंगा, तुम्हारी आवाज कितनी सुरीली है, मैंने आजतक इतनी मीठी आवाज नहीं सुनी.” यह कह कर लोमड़ी चला गया. रात भर मुर्गा सोचता रहा ‘क्या मेरी आवाज वाकई में सुरीली है?’.

अब लोमड़ी रोज मुर्गे के बांग देने के समय आता और उसके आवाज की बहुत तारीफ करता. धीरे धीरे मुर्गे को भी लगने लगा कि उसकी आवाज सुरीली है और वो बहुत अच्छा गाता है. जब लोमड़ी ने देखा कि मुर्गा उसके झासें में आ गया है तब एक दिन उसने कहा “दोस्त मुर्गे क्या तुम पूरी जिन्दगी इसी जगह गुजर दोगे, अपनी मधुर आवाज को दुनिया के सामने नहीं लाओगे. यहाँ तुम्हारी कद्र करने वाला कोई नहीं है, मेरे साथ चलो मैं तुम्हें बड़ा गायक बना दूंगा, खूब पैसे मिलेगें और तुम मालामाल हो जाओगे.” मुर्गे ने कहा “मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता. राधेश्याम बाबा ने बताया है कि लोमड़ी हमारे दुश्मन होते हैं. तुम मुझे मार कर खा जाओगे”. लोमड़ी को लगा शिकार हाथ से निकल जायेगा, उसने मुर्गे से प्यार से कहा “ दोस्त मैं चाहता तो तुम्हें कब का खा गया होता लेकिन मैं चाहता हूँ कि जैसे तुमने मुझे अपनी आवाज का दीवाना बना दिया है वैसे ही पूरी दुनिया को बना दो”. मुर्गा घमंड से चूर हो गया, उसने कहा “कल सुबह राधेश्याम बाबा शहर जाने वाले हैं, उनके जाने के बाद हम चलेगें.” लोमड़ी खुश हो गया. उसे रात भर नींद नहीं आई, इतना मोटा मुर्गा कल उसे खाने को मिलेगा,ये सोच के ही उसके मुहं में पानी आने लगा. उधर मुर्गे को भी नींद नहीं आ रही थी, वो सोच रहा था कि कल वो दुनिया को अपना गाना सुनाएगा और सब उसके दीवाने हो जायेगें.

सुबह राधेश्याम बाबा शहर के लिए निकल गए, थोड़ी देर में लोमड़ी मुर्गे को लेने आ गया. मुर्गा लोमड़ी के साथ चल पड़ा. जब वो दोनों बीच जंगल में पहुँचे तो मुर्गे ने कहा “तुम तो मुझे शहर ले जाने वाले थे, वहाँ लोगों को मेरा गाना सुनाना था पर तुम बीच जंगल क्यों ले आये?.” लोमड़ी ने हँसते हुए मुर्गे से कहा “हम शहर नहीं जा रहे हैं. पता है मुर्गे तुम बहुत बेसुरा गाते हो, वो तो मैंने झूठ बोला था ताकि तुम मेरे बहकावे में आ जाओ और उस कटीले तारों से बाहर निकलो, अगर मैं उन मजबूत तारों को पार करता तो मुझे चोट लग जाती जिससे मैं मर जाता. अब मैं तुम्हें मारूंगा और मजे से तुम्हें खाऊंगा.” मुर्गे को अपनी मूर्खता पर बहुत पछतावा हुआ. उसे राधेश्याम बाबा की चेतावनी याद आई. पर मुर्गे ने हार नहीं मानी और सोचा ‘मौत तो सामने है, कम से कम एक बार बचने की कोशिश जरुर करनी चाहिए.’ उसने अपने डर को दूर कर आसपास नजर घुमाया तो देखा कि सामने ही एक बड़ा पेड़ है. उसे पता था कि लोमड़ी पेड़ में चढ़ नहीं पायेगा. मुर्गा तेजी से उड़ कर पेड़ की डंगाल पर चढ़ गया. लोमड़ी को समझ नहीं आया वो क्या करे. लोमड़ी पेड़ के नीचे बैठ गया. देर तक मुर्गे के पेड़ से नीचे उतरने का इंतजार करता रहा और थक के सो गया. मुर्गे को इसी पल का इंतजार था वो धीरे से पेड़ से उतरा और घर की ओर दौड़ लगा दी, सीधे अपने घर आ कर ही दम लिया. मुर्गे ने सोचा अब वो किसी की झूठी बातों में नहीं फंसेगा और राधेश्याम बाबा की बात को ध्यान से सुनेगा.

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बहुत अच्छी कहानी है, बधाई । आप अपनी बालोपयोगी साहित्य केवल अंतर्जाल पर प्रकाशित होने वाली छोटे बच्चों की पत्रिका " नाना की पिटारी" मे भी भेज सकती हैं पता है https://sharadkumar1.hindiblogs.in

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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