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शबनम शर्मा की कविताएँ

insane gray 

        आस


ज़िन्दगी की आस में तुम्हारा
पास होना कितना रोमांचित
करता मुझे।
        रंगीन हिलोरे खाता मेरा मन
        इंद्रधनुषी आसमान की तरह,
        पहचान लेते लोग मेरा ये
        बरसाती मौसम।
कितना कटु व भयानक
यथार्थ दिया तुमने,
सदैव नमक ही छिड़का
मेरे दहकते जख्मों पर।
        रिसते
        सदैव रूलाया मेरी हँसती
        आँखों को,
        सिसके हैं मेरे अरमान
        झोली पसारकर। पर तुम
        न पिघले। खड़ी है मेरी
        ज़िन्दगी आखिरी कगार पर
        यही सोचती कि आस किसी
        यथार्थ से कितनी भली।

    सामना


आज बरसों बाद उनसे
सामना हो ही गया।
पहचानने में तनिक देर न लगी
वही प्यासी आँखें, थरथराते लब
जो कभी कुछ भी बयान न कर पाये।
ले गये घसीट कर मुझे
अतीत के उस आँगन में
जहाँ पहली बार शादी के
जमघट में आँखें चार हुई थी उनसे।
वो चुपचाप लम्बे-लम्बे खत देना
व लिखना, खुद ही बतियाना और हँसना
सामने आने पर मूक हो जाना, अचानक
रूला गया मुझे।
बरस बीत गये वक्त का पहिया न रुका,
सुना जिद्द की उसने मुझ संग ब्याह
रचाने की, हार गया गोटी माँ-बाप,
रिश्तेदारों की कसमों के सामने।
वो ब्राह्मण लड़की से ब्याह नहीं कर सकता
ब्याह हो गया उसका,
पर आज भी हमारी वही आस,
वही प्यास, वही स्पर्श झुंझलाता है हमें,
कि काश खड़ा हो जाता दोनों के दरमियाँ।

        आँगन


ब्याह होते ही क्यूँ
पराया हो गया आँगन।
        ताकती नहीं वो तुलसी भी मुझे
        बुलाता नहीं दादा का हुक्का भी,
        दादी भी अपनी संदूकड़ी भैया
        के बच्चों को बाँटती,
पड़ोसी भी पूछते ‘रानी आई है’
पीहर, कब तक रहेगी?
बात-बात में भईया-भाभी भी
हँसकर पूछ लेते मेरा ‘प्रोग्राम’
        चाची हाल पूछती व बोल ही
        देती ‘जमाई’ कब आ रहे
        तुम्हें लिवाने?
पिता नहीं दिखाते वो चिड़िया
का सामने वाले पेड़ पर घोंसला
न ही गाते वह गीत।
सिर्फ माँ दिखती बटोरते छोटा-छोटा
सामान।
        क्यूँकि उसे भी इन्तज़ार है
        चिड़िया के उड़ जाने का
        फिर भी, चुन्नी के आँचल से
        आँखें पोंछती कई बार रो देती
        और कहती, ‘‘बेटी वो घर ही
        अब तेरा घर है।’’
सोचती बेटी, शायद इन सबका
निर्णय उसे भेजना है उसके घर
जहाँ अब आँगन, पिता, माँ,
भाई-बहनों को अपना बनाने
में उमर गुज़र जायेगी और
ग़र रोयेगा तो सिर्फ उस और
इस घर का आँगन जब वो
इन्हें छोड़कर जायेगी।


    स्पर्श


कितने सुहाने ये स्पर्श,
छूते जब नन्हें के हाथ
गले लगाते हम उसे,
इक अनूठा सा अहसास
        लगाते दोस्त को गले,
        लगता सब समस्याओं
        का हल दे गया कोई,
दिनों बाद गली में
टकराव, उस पुराने इन्सान से,
जिसने देना है मेरा कुछ पैसा
हाथ मिलाना उसका,
और कह देना सब कुछ
        घर से निकलते ही
        पति का वो अनछुआ
        अनकहा छूने का अन्दाज़
        कुछ शरारती, कुछ मज़ाकिया,
कोई भी गलती होने पर
पिता का वो सख्त हाथ
कंपकंपा देता रूह
अनजाने में ही
        पर, हर जगह, हर पल,
        हर साँस में, माँ के प्यार
        का स्पर्श, सदैव देता
        दुआएँ, रखता सुरक्षित,
        सब बलाओं से, महसूस
        होता मुझे, मेरे रोम-रोम में।


    डोर


नहीं दिखाई देती,
वो डोर,
जो चढ़ाती हमारी ज़िन्दगी
कभी ऊपर, कभी खींचती
धरातल पर।
सिर्फ महसूस होती
ये चढ़ती पतंग
और ढीली डोर,
थक गई मैं आसमान
में लेती अनगिनत हिलोरे,
हर किसी की नज़र,
मेरी चढ़ती पतंग पर,
कोई न देख पाता,
मेरे उतार-चढ़ाव का सिलसिला।
कट गई इक दिन वो
ऊँची पतंग
आ गई मैं ज़मीन पर
लपेटी नहीं थी मेरे पतंग की डोर,
उलझ गई, और उलझ गई।
बैठी थी उसे सुलझाने
कि, जितना सुलझाती
वो और उलझती ही जाती,
एक गिरह खोलती तो
दूसरी पड़ जाती।
गुस्से में मैंने और उलझा दी
समेट कर तोड़ दी पतंग भी
और फेंक दिया उसे बारिश
के पानी में।

वो वतन का लाल
हर बरस छुट्टी आता,
कुछ न कुछ घर में करा ही जाता
देखता जाते हुए दुल्हन को
कनखियों से,
उठाता नन्हें को, रो देता
उसका मन, लगा गले
देकर दिलासा, उतार देता गोद से,
जाता माँ के कमरे में
भीगे दुपट्टे से आँखें पोंछती,
तिलक लगाती, दही खिलाती,
पाँव छूता, तो घुट कर रो देती
बाबा न रोने का इशारा करते।
लेकर मन पर कोसों बोझ
चल देता, वो भारत माँ
की रक्षा करने।
पर हाय, आज ये क्या
कहर बरपा है इस मिट्टी पर
आया है घर वो लिपटा
तिरंगे में,
रो रहा आँगन, रो रही धरती,
सिसक रहा समस्त परिवार,
पर इक झंडा भारत माँ का
फहरा रहा चहुँ ओर
देख रहा आज भी वो आँगन
जहाँ बड़ा होकर गया था वह
भारत माँ की रक्षा करने
रो रहा उसका भी दिल
लिपटे कफ़न के अन्दर
देख इन सबका रुदन,
पर दे रहा संदेश
‘‘जय माँ, जय भारत माँ
तेरा लाल आज दुनिया से
जा रहा, तेरे दिल से नहीं
जय माँ।’’


        वह


जाते हुए निहारा था आँगन,
जहाँ पैदा होकर खेला था वह,
निगाह डाली थी कोने-कोने पर
जहाँ कभी छिपा था वह
        लौटकर स्कूल से छिपाता था
        बंटे, तो कभी गिल्ली-डंडा,
        भाग जाता था भरी दोपहर में
        चकमा देकर नींद का सबको,
देखता था आँगन के उस कोने का,
पेड़ उसे हर काम करते हुए
चुराता था वो हर पल इस
छोटी सी ज़िन्दगी में से,
        बड़ा हुआ, चल दिया वो
        भारत माँ की सेवा हेतू
        वर्दी पहनकर, बंदूक थामकर,
        देखता रहा गर्व से उसे ये
        गाँव, ये आँगन, ये घर
लाया दुल्हन, नाच उठा सारा घर
नाचे थे बाबा, दादी, मामा सब
हुआ था नन्हा, बजे थे ढ़ोलक
यहाँ, आज चला है माँ की रक्षा हेतू।


    सन्नाटा


इक अजीब सा सन्नाटा है
मेरी इस ज़िन्दगी में,
कोई आवाज़ आती भी नहीं,
कोई धुन जाती भी नहीं,
इक कदम उठते ही, लम्बी
काली गलियाँ
जिसमें कोई लौ टिमटिमाती
भी नहीं
कोई आस जाती भी नहीं
हर लम्हा, बेबुनियाद उम्मीदें लिये
बाँहें पसारे खड़ा है कब से
जिसमें कोई राह जाती भी नहीं
जिसकी कोई मंजिल आती भी नहीं
फिर भी चुपचाप जिए जा रही मैं,
सुना है हर काली रात की
जगमगाती सुबह होती है,
उम्मीद की अटकी फाँस गले में,
अन्दर जाती भी नहीं
और बाहर आती भी नहीं।


    इन्तज़ार


घर से दूर,
बच्चों से दूर,
इन वादियों को छोड़
जाना पड़ा उसे, चंद सिक्के कमाने
अपने बीवी-बच्चों का पेट
पालने हेतू।
सुबह से शाम कब हो जाती
पता ही न चलता,
पर शाम ले आती
घर की तमाम यादें
चिपक जाती सब
बातें कमरे की छत पर,
झड़ने लगती किसी धूल सी,
बच्चों की याद,
बीवी की बातें
माँ-बाप का प्यार।
उधर बच्चे भी शाम होते ही
राह ताकते,
एक दूसरे से पूछते
‘‘पापा कब आएँगे?’’
हद तो तब हो जाती
जब नन्हा कह उठता
‘‘पापा बहुत दूर के आॅफिस
गये हैं, उन्हें गाड़ी में लेकर आओ,
मैं उन संग खेलूंगा,
कुश्ती लडूंगा’’, ऐसे-ऐसे
शब्द गले में निगल कर,
सब सुन लेते, बहला देते उसे
पर मन नहीं मानता,
याद तो याद है, वक्त का
परिन्दा फड़फड़ाते ही आती है।
पर क्या करें
सब अपने वश में कहाँ,
रोटी कमाना आसान नहीं
सात समुन्द्र पार भी
चंद सिक्कों के लिये
हमें ये भिजवा सकती
फिर भले ही इन्तज़ार
कितना ही फड़फड़ाये?

 

    नदी


काँच सी नाजुक,
पतली, लम्बी, छरहरी देह लिये,
सिमटती, लहराती, खिलखिलाती
चल दी अपने गंतव्य की ओर,
लाखों सपने सजाये थे उसने
मिलती-मिलाती चलेगी सबको,
पग-पग पर होगा उसका स्वागत,
पूजी जायेगी, आशीर्वाद देगी
व बढ़ती जायेगी अपने
गंतव्य की ओर,
पग बढ़ते गये, बढ़ते गये,
लोगों ने अपने मन की व्यथायें
सुनाई, मालायें पहनाई, तो कहीं
मिली स्वर्ग की ओर जाते
यात्रियों से,
माहौल जगमगा उठा, जब
जलते दीयों की कतारों ने
पनाह ली उसके आँचल में,
शाँत-चुपचाप आगे बढ़ी,
कोई न था उसे देखने वाला,
उसकी रक्षा करने वाला,
देखा अपने अरमानों का खून,
बदबू भरे नाले उसमें आ गिरे,
शहर भर की गन्दगी ने उसे
मनचाहा मैला किया,
उसके वो नन्हे-मुन्ने बच्चे
जो मीलों से संग आ रहे
चीख-चीख कर दम तोड़ रहे
उदास अति उदास अब,
धीमी रफ्तार में चली नदी,
उसके अश्रु उसमें ही विलीन हुए
दहाड़ता समुद्र बाँहें फैलाये
खड़ा था कि वो चुपचाप सरक
गई उसके आगोश में व
विलीन हो गई सदा के लिये
वैसे ही जैसे ‘‘कभी ऊपर
जाकर कोई वापस नहीं आता।’’

    भूख


रोटी गरीब की कितनी बड़ी,
कितनी भारी और कितनी महंगी
रात-दिन जान तोड़ता महुआ,
दो जून रोटी के लिये
फिर भी पानी उबालती सक्को,
बहलाती बच्चों का दिल
आखिर देख ही लेता झबुआ,
पानी उबल रहा है भात नहीं,
चुपचाप निहारता छोटे भाई-बहनों
क्योंकि सच्चाई वो सहन न करेंगे
हड़कंप मचा देंगे घर में,
खोल अंटी से लाया चार बिस्कुट
का चूरा, जो रखे थे कभी
सभी से छिपाकर।
रख दिया बहन-भाई की हथेली पर,
जो समझ सौगात टूट पड़े थे उस पर
सोच रही, देख रही सक्को झबुआ को,
उससे भी बड़ा होते, संभालते उस
भारी, बड़ी, महंगी रोटी को।


    औरत


औरत में औरत का होना
कितना जरूरी,
औरत-औरत नहीं,
ब्रह्माण्ड है।
रचती संसार,
सींचती आधार
बनाती नींव हर कुल की,
इस पतली सी देह से,
लड़ती सदैव खुद से,
हर जगह मना लेती
अपने मन को,
बस चलती सदैव नदी की तरह
खुद-ब-खुद बना लेती
अपने रास्ते संकरी
पगडंडियों से भी,
पर पहुँचाती शीतलता सदैव
आसपास के किनारों को,
आबाद करती ज़मीं व आसमान
सींच कर अपनी खुशियाँ,
क्योंकि सुनती बचपन से
‘‘औरत दो कुलों की शान है।’’

- शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर,
हि.प्र. – 173021       

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