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कविता और मैं / महेंद्र भटनागर

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व्यक्ति और समाज के लिए कविता की उपादेयता निर्विवाद है। कविता के प्रमुख तत्त्वों (अनुभूति / भाव, विचार, कल्पना, कला-शिल्प) में भाव-तत्त्व मानस को जितना उद्वेलित करता है; उतना अन्य कोई तत्त्व नहीं। कविता इसीलिए अभीष्ट है; क्योंकि भाव-प्रधान होने के कारण वह हमारी चेतना को बड़ी तीव्रता से झकझोरने की क्षमता रखती है। कविता पढ़कर-सुनकर हम जितना प्रभावित होते हैं; उतना साहित्य की अन्य विधाओं के माध्यम से नहीं। कविता व्यक्ति को बल प्रदान करती है; उसे सक्रिय बनाती है; उसके सौन्दर्य-बोध को जाग्रत करती है। जब-तक मनुष्य का अस्तित्व है; कविता का भी अस्तित्व बना रहेगा। कविता का सहारा सदा से लिया जाता रहा है। मानवता का प्रसार करने के लिए, व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य प्रेम-भाव बनाए रखने के लिए, देश-प्रेम का उत्साह जगाने के लिए, वेदना के क्षणों में आत्मा को बल पहुँचाने लिए, सात्त्विक हर्ष को अभिव्यक्त करने के लिए आदि अनेक प्रयोजनों की पूर्ति कविता से होती है। काव्य-रचना का प्रमुख उद्देश्य मनोरंजन नहीं (वस्तुतः मनोरंजन की भी अपनी उपयोगिता है); हृदय के सूक्ष्मतम भावों और श्रेष्ठ विचारों को रसात्मक-कलात्मक परिधान पहनाना है; आकार देना है।

साहित्य-रचना में रुचि रखने वाले सर्वप्रथम कविता के प्रति आकृष्ट होते हैं। मानों कि उनकी अन्तः चेतना में साहित्य और कविता पर्यायवाची हैं। इसका कारण हमारे संस्कार हैं। कविता से हमारा नाता प्रथम रहा है। मुद्रणालय के अभाव में संसार का अधिकांश साहित्य कविता में ही रचा गया। कविता मनुष्य के कंठ में सुगमता से रच-बस जाती है। आदिकाल से कविता को लोकप्रिय बनाने में संगीत की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही है। जन्म से मृत्यु तक हमारे समस्त लोकाचार संगीत-बद्ध कविता से सम्पृक्त रहे हैं। इससे कविता की रोचकता में निरन्तर वृद्धि हुई। कविता के प्रति हमारे विशेष लगाव का रहस्य यही है।

प्राचीनतम साहित्य में कवि की महिमा का गायन भी कोई कम नहीं हुआ। यथा µ ‘कवि रस तथा भाव का विमर्शक होता है।’, ‘काव्य’ लोकोत्तर वर्णना में निपुण कवि का कर्म होता है।’, ‘कवि क्रान्तदर्शी होता है - कवयः क्रान्तदर्शिनः’।, ‘कवि अन्तर्निहित-तत्त्व का ज्ञानी होता है।’,‘तत्त्व-दर्शन से युक्त होने के कारण कवि कवि कहा जाता है।’, ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू।’ आदि। ऐसे साहित्य-सृष्टा बहुत कम होंगे; जिन्होंने अपने साहित्यिक जीवन के प्रारम्भ में काव्य-रचना न की हो। भले ही कवि-कर्म में सफल न होने के कारण; वे आगे चल कर अन्य साहित्य-विधाओं की ओर उन्मुख हो गये। व्यक्ति स्वभाव से कवि होता है अर्थात् संवेदनशील होता है। भले ही, जीवन-भर वह एक भी काव्य-पंक्ति की रचना न करे। चूँकि उसमें रचना-सामर्थ्य नहीं होती; इसलिए उसे भावक कहा गया। कवि संवेदना को - विचारणा को - शब्दार्थ एवं कला के विभिन्न उपादानों द्वारा प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करता है। अभिव्यक्ति-कौशल उसे प्रभावी एवं सार्थक कवि बनाता है।

प्रत्येक भाषा का अपना कविता-शिल्प होता है। कवि को इसमें पारंगत होना पड़ता है। कविता-शिल्प के अभाव में रचना गद्य-विधा का रूप ले लेती है। चूँकि उसमंे भी अनुभूति, संवेदना, भाव, विचार, कल्पना, फंतासी, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार-वक्रता, शब्द-परिशोधन आदि की उपस्थिति रहती है; इस कारण वे गद्यात्मक ‘कविताएँ’ भी आधुनिकता-बोध सम्पन्न बौद्धिक पाठकों को अरुचिपूर्ण नहीं लगती। अनूदित कविताओं का रूप-स्वरूप बहुत-कुछ इसी प्रकार का होता है। काव्यानुवाद में मूल भाषा का सौन्दर्य रूपान्तरित नहीं हो सकता। इसी कारण, काव्यानुवादों से सामाजिकों का उतना आवर्जन नहीं हो पाता; जितना आनन्द मूल भाषा के जानने वालों को आता है। अनूदित कविता पुनर्रचना बन कर ही मूल कविता के समान या उससे अधिक प्रभावी हो सकती है।

कविता का प्रभाव गद्य की तुलना में अधिक होता है। गद्य हमें वैचारिक उत्तेजना दे सकता है; किन्तु हमारे हृदय और मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव अंकित नहीं कर पाता। कविता का प्रभाव प्रेरक होता है। वह हमें सक्रिय बनाता है। ‘गद्य’ से आशय - उपदेश या भाषण से ही नहीं; वरन् गद्य में रचित विविध विधाओं के साहित्य से भी है - कथा-साहित्य, नाटक आदि से।

कविता वह ग्राह्य नहीं; जिसमें सम्प्रेषणीयता का अभाव पाया जाता है। जो शब्द-क्लिष्ट ही नहीं; अर्थ-क्लिष्ट भी होती है। दूसरे, वह कविता भी सम्मानित नहीं हो सकती जिसमें अश्रील, नग्न, घिनौने, गाली-गलौज भरे वर्णन निहित रहते हैं।

कविता के पाठक-श्रोता दो प्रकार के होते हैं - जन-साधारण और काव्य-मर्मज्ञ। काव्य-मर्मज्ञों को काव्य-शास्त्रीय ज्ञान होता है; जबकि जन-साधारण मात्रा भावक होता है। कविता उसकी समझ में आनी चाहिए; तभी वह उससे आनन्दित हो सकेगा। अन्यथा भी, प्रांजलता श्रेष्ठ कविता के लिए अनिवार्य शर्त है। क्लिष्ट-दुरूह काव्य से मस्तिष्क का व्यायाम तो हो सकता है; हृदय का आवर्जन नहीं। कविता ऐसी न हो कि ख़ुद समझें या ख़ुदा समझे। सम्प्रेषणीयता किसी भी रचनात्मक कृति के लिए अनिवार्य है। सम्प्रेषणीयता वहाँ बाधित होती है; जहाँ कवि अप्रचलित शब्दों का प्रयोग करता है, अपनी विद्वत्ता दर्शाने के लिए प्रसंग-गर्भत्व का आवश्यकता से अधिक सहारा लेता है, पाठक को चौंकाने के लिए अटपटी अभिव्यंजना का प्रयोग करता है, जनबूझकर काव्य-शास्त्रीय बौद्धिक चमत्कारों के भार से अपनी रचना को लाद देता है। कल्पना, अलंकार, बिम्ब, प्रतीक, लक्षणा-व्यंजना आदि गुण जब कविता में सहज ही अवतरित होते हैं तो वे प्रभावोत्पादक सिद्ध होते हैं। अन्यथा आरोपित; बाहर से थोपे हुए। ऐसा कविता-कर्म कभी-कभी तो हासास्पद बन जाता है। अस्तु।

कविता की श्रेष्ठता का मापदंड उसका कथ्य, उसकी अन्तर्वस्तु, उसमें अभिव्यक्त भाव-विचार माना जाना चाहिए। व्यक्ति और समाज के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना रचनाकार का धर्म है। इसका अर्थ यह नहीं कि कलात्मक मूल्यों के महत्त्व को कम किया जा रहा है या उनकी अवहेलना की जा रही है। प्रश्न प्राथमिकता का है। वरीयता तो कथ्य को ही देनी होगी। चाहे वह किसी भी रस की कविता हो। सफल व सार्थक कविता वही है जिसमें उत्कृष्ट भाव, श्रेष्ठ विचार, उदात्त कल्पनाएँ और अभिव्यंजना कौशल हो।

‘कविता क्या है’ - इस विषय पर लगातार विमर्श जारी है; किन्तु किसी सर्वमान्य निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सका है; न पहुँचा जा सकेगा। कविता को पारिभाषित करने का मैं अपने को अधिकारी नहीं समझता। यों तो प्रत्येक, ‘कविता क्या है’ का उत्तर देने लगेगा! हमारा काम रचना करना है; जिसे काव्य-शास्त्रा के विद्वान जो भी विधा-नाम दें। कविता के मर्म के संदर्भ में मैं महाकवि तुलसीदास जी की निम्नांकित काव्य-पंक्तियाँ प्रायः उद्धृत करता रहा हूँ:

हृदय सिंधु मति सीप समाना।

स्वाती सारद कहहिं सुजाना।।

जे बरखै बर बारि बिचारू।

होहिं कवित मुक्ता मनि चारू।।

* * *

कीरति भणति भूति भलि सोई ।

सुरसरि सम सब कहँ हित होई ।।

निःसंदेह, कविता आत्माभिव्यक्ति का माध्यम / साधन प्रथम है। सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की दिशा में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। कविता कितनी भी व्यक्ति-केंद्रित क्यों न हो; उसका सीधा संबंध जन-समुदाय से है। समाज-सापेक्ष होने के कारण ही हम कविता के संबंध में प्रेषणीयता की बात करते हैं। आज कविता का किसी रहस्य-अनुभूति (रहस्यवाद) से कोई सरोकार नहीं है। वस्तुतः वैज्ञानिक युग में ‘रहस्य’ के लिए कोई स्थान नहीं।

भावों की अभिव्यक्ति गीत में अधिक प्रबल रूप में होती है - यह तथ्य सर्वमान्य है। लघु-विस्तारी होने के कारण गीतों में भावाभिव्यक्ति को अधिक तीव्रता व सघनता मिलना स्वाभाविक है। गीत-रचना मंथर गति से आगे नहीं बढ़ती। कविता में मात्र भावाभिव्यक्ति ही नहीं; विचारों की अभिव्यक्ति भी होती है। विचार-कविता के नाम से एक विशिष्ट कविता को रेखांकित भी किया गया है। लेकिन गीत को विचार-गीत के नाम से कम-से-कम अभी-तक तो अभिहित नहीं किया गया है। कल्पना-तत्त्व एवं भाव-तत्त्व गीत और कविता दोनों में द्रष्टव्य हैं। कविता में वर्णनात्मकता के लिए पर्याप्त अवकाश रहता है; किन्तु गीत में सूक्ष्म संकेत रहते हैं। उत्कृष्ट गीत ध्वनि-प्रधान होते हैं। लक्षणा का भी वहाँ अस्तित्व है। किन्तु मात्रा अभिधामूलक गीतों की सृष्टि से मानव-हृदय उद्वेलित नहीं हो पाता। अपवाद हो सकते हैं। कविता में भी ध्वनि और लक्षणा को वरीयता दी जाती है; किन्तु उसमें सहज-स्वाभाविक कथन-भंगिमा भी विद्यमान रहती है। वीर रस की ओजस्वी कविताओं में यह तथ्य विशेष रूप से द्रष्टव्य है:

बुंदेलों-हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी!

हास्य-रस की कविताएँ तो सीधी-सपाट होती ही हैं। उनमें शब्द-चमत्कार अधिक पाया जाता है। व्यंग्यार्थ होता है; किन्तु गूढ़ नहीं। व्यंग्यार्थ समझने में जन-साधारण को कोई कठिनाई नहीं होती। निष्कर्षतः कहा जा सकता है, गीत हो या कविता भावों की प्रबल-प्रभावी अभिव्यक्ति रचनाकार के व्यक्तित्व और उसके काव्य-संस्कारों पर निर्भर है। भावों का वाणी में अवतरण विशिष्ट अभिव्यक्ति-सौन्दर्य की माँग करता है। काव्य-कला के विभिन्न उपकरणों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति निखरती है; उसकी धार में तीव्रता आती है।

एक सफल-सार्थक गीत में अनेक गुण होते है; यथा - आकार लघु। विस्तार सीमित। भावों की तीव्रता और एकाग्रता बनाये रखने के लिए। एडगर एलेन पो के अनुसार, ‘प्रेरणा स्वभाव से ही क्षणिक होती है और केवल लघु कृतियों में ही निबद्ध होती है।’

गीत में संगीतात्मकता अनिवार्य है। विभिन्न वाद्यों के योग से गीत मानव-हृदय की अतल गहराइयों का स्पर्श करने में सक्षम हो उठता है। संतों ने संगीत का सहारा लिया। चाहे अनेक वाद्य-यंत्रों के साथ भक्ति-पदों का गायन हो; चाहे चिमटे या इकतारे पर साखियों-दोहों का उच्चार।

आत्म-अभिव्यक्ति गीत का प्रमुख गुण है। गीत व्यक्तिपरक होते हैं। बाह्य-तत्व उसमें गौण रहता है। यह आत्म-अभिव्यक्ति कोई निराली, अद्भुत, अटपटी नहीं होती। अतः गीतकार की आत्माभिव्यंजना जन-जन की आत्माभिव्यंजना बन जाती है। इसी कारण सामाजिकों का आवर्जन होता है। उन्हें आनन्दानुभूति होती है।

गीत में नुकीलापन होता है µ केन्द्रीयता होती है। उसमें भावों, अनुभूतियों, विचारों की तीव्रता होने का रहस्य यही है।

गीत में भावों की अभिव्यक्ति अकृत्रिम, आडम्बर-रहित रहती है। गीतकार अलंकारों-प्रतीकों-बिम्बों के फेर में नहीं पड़ता। उसमें भावावेश स्वयं फूट बहता है। गीत इसी कारण अधिक हृदय-स्पर्शी होता है। इसका आशय यह नहीं कि बौद्धिक तत्त्व से उसे कोई सरोकार नहीं। गीत एक व्यवस्थित कलात्मक रचना है - प्रलाप नहीं। उसमें छंद का विधान रहता है। भाषा-सौन्दर्य पाया जाता है।

शिल्प की दृष्टि से गीत कविता की अपेक्षा अधिक कलात्मक सतर्कता की माँग करता है। गीत में विषयानुकूल छंद-चयन का ही नहीं; शब्द-चयन का भी अत्यधिक ध्यान रखना पड़ता है। संक्षिप्त होने के कारण गीत की एक-एक पंक्ति सधी नपी-तुली होती है। उसमें कसावट होती है। शैथिल्य तो कविता में भी होना नहीं चाहिए; किन्तु अभिव्यक्ति-प्रवाह में बहुत-कुछ ऐसा भी समाविष्ट हो जाता है जो मूल भाव या विचार को वहन नहीं करता - भले ही कविता उसे निबाह ले जाती हो।

साहित्य का परम लक्ष्य समष्टिगत हित ही है। गीत भी इस शर्त को पूरी करते हैं। विलक्षणता या वैयक्तिकता यदि असामान्य होगी तो अवश्य वह सामाजिकों को आकर्षित नहीं कर सकेगी। व्यक्ति समाज की इकाई है; समाज का अंग है। उसकी व्यक्तिगत अनुभूतियाँ-अभिव्यक्तियाँ विलक्षण हो सकती हैं। पर अजूबी नहीं। विलक्षणता गीतकार/कवि को वैशिष्ट्य प्रदान करती है। वक्र-कथन और निजता से उसकी-सृष्टि निखरती है। उसमें नयापन आता है। वैयक्तिकता यदि उलझी हुई अथवा अस्वस्थ होगी तो उससे सामाजिकों का तादात्म्य सम्भव नहीं हो सकेगा। ऐसे रचनाकारों का अस्तित्व क्षणिक होता है। उन्हें समाज अंगीकार नहीं करता।

निःसंदेह, गीत की लोकप्रियता का कारण उसकी गेयता है। संक्षिप्ति भी। गीत मानव-कंठ में सहज ही रच-बस जाते हैं। यही स्थिति सुभाषितों की है, दोहा-सोरठा, चतुष्पदियों आदि की है। जिनमें जीवन का गहन अनुभव निहित रहता है। छंद व तुकाश्रित रचनाएँ अपने अभिव्यक्ति-सौन्दर्य के कारण मानव को प्रभावित करती हैं। माना कि छंद-तुक पर निर्मित रचना कृत्रिम होती है; वह रचनाकार के विशिष्ट भाषा-संस्कार पर निर्भर रहती है। इस प्रक्रिया में भावावेश बाधित ज़रूर होता है। लेकिन अनुभवी-अभ्यस्त रचनाकार कृत्रिमता को हावी नहीं होने देते। उनका यही कौशल अथवा चमत्कार उन्हें सिद्ध-शिल्पी प्रमाणित करता है। यह वैशिष्टय सूक्ष्म शब्द-साधना और निरन्तर अभ्यास से आता है। क्योंकि अभिव्यक्ति का आधार तो भाषा ही है। यह भाषा यदि जन-भाषा होगी तो उसका प्रभाव-क्षेत्रा अधिक व्यापक होगा।

गीत को यदि समग्र रूप में परिभाषित किया जाए:

‘‘सूक्ष्म पावन अनुभूतियों-भावनाओं-संवेदनाओं, विराट कल्पनाओं और उदात्त विचारों की सुन्दर सहज स्वतःस्फूर्त संगीतमय अभिव्यक्ति गीत है।’’

जीवन के सच और रचना के सच में अन्तर होता ही है। रचना कोई फोटोग्राफ़ी नहीं है। वहाँ चयन है। जीवन स्थूल, रहस्यपूर्ण, जटिल, विराट और घिनौना-क्षुद्र होता है। रचना सूक्ष्म, स्पष्ट-मुखर, प्रांजल, तलस्पर्शी, विशाल और सुन्दर होती है। रचना जीवन से कोई कम काम्य नहीं। वह मानव हृदय और मस्तिष्क की पहचान है। जीवन की सार्थकता उसमें निहित है। वस्तुतः वह सभ्यता-संस्कृति का दर्पण है।

भोग के क्षण रचना में अवतरित नहीं होते; वे कालान्तर में पुर्नआहूत होते हैं कल्पना और सम्भावना के सहारे। उनमें जीवन से अधिक संगति होती है। जीवन आकस्मिक और अदभुत-आश्चर्य का पुंज है। रचना सहज और विश्वसनीय कलात्मक कृति। अपनी विशृंखलता में भी सुगढ़-सुगठित। जड़-निस्पन्दता में भी जीवन्त।

स्वान्तःसुखाय कविता का संबंध भक्त-कवियों से रहा है; किन्तु घर-परिवार और समाज से विरक्त होते हुए भी भक्त-कवियों का अस्तित्व व्यक्ति या समाज-निरपेक्ष नहीं रहा। उनका गायन (लेखन) कोई अरण्य-गायन नहीं माना जा सकता। व्यक्ति को सदाचरण की ओर प्रेरित करने वाला भक्ति व नीतिपरक काव्य मात्र स्वान्तःसुखाय क्यों? आत्मा की शुद्धि और पारलौकिक जीवन से सम्बद्ध चिन्तन व्यक्ति और समाज के लिए अर्थ रखता है। ज़ाहिर है, कविता का संबंध समाज से अटूट रहा है; रहेगा। वस्तुतः, ‘स्वान्तःसुखाय’ एक दर्शन है; जो अन्ततः बहुजनहिताय का कारण बनता है। अपने शाब्दिक अर्थ में स्वान्तःसुखाय स्वार्थ का पर्याय है। मात्र ‘स्व’ के उत्थान एवं मोक्ष-कामना के लिए जीना।

काव्य-भाषा के अनेक रूप होते हैं। जन-सामान्य के लिए लिखी जानेवाली कविता की भाषा भी जन-भाषा होगी। सूक्ष्म भावों, गूढ़ विचारों और विराट् कल्पनाओं को अभिव्यक्त करनेवाली भाषा जन-भाषा नहीं हो सकती। यहाँ रचनाकार शब्द-शक्तियों एवं बिम्बों-प्रतीकों का भी प्रश्रय लेता है। तत्सम शब्दों का प्रयोग क्लिष्टता नहीं है। जन-साधारण को अधिक भाषा ज्ञान नहीं होता; किन्तु शिक्षित समाज से तो कवि यह अपेक्षा रखता है कि वह परिष्कृत भाषा-सौन्दर्य को समझेगा। हाँ, अप्रचलित शब्दों का प्रयोग अवश्य सम्प्रेषण में बाधक होता है। विषयानुसार भी भाषा का रूप-परिवर्तन होता है। हास्य-रस की कविताओं की जो भाषा होती है; वह दार्शनिक अथवा प्रेम कविताओं की नहीं। ओजस्वी कविताओं में सरल शब्दावली और अभिधा की प्रधानता रहती है। वस्तुतः भाषा क्लिष्ट व दुरूह नहीं होती; दुरूहता अक़्सर अभिव्यक्ति में होती है। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो आपके लिए क्लिष्ट हो सकते हैं; पर अन्यों के लिए नहीं। आज ऐसी जटिल कविताएँ लिखी जा रही हैं; जिनमें शब्द तो एक भी कठिन या अप्रचलित नहीं होता; किन्तु उनका कथन इतना अटपटा और अद्भुत होता है कि पाठक समझ ही नही पाता कि क्या कहा गया है! गद्यात्मकता भी उसमें अत्यधिक पायी जाती है। ऐसी कविताएँ कविता का आभास मात्रा देती हैं। कविता की लेकप्रियता कम हो जाने का एक कारण यह भी है। ऐसी रचनाओं का अस्तित्व एक दिन स्वतः समाप्त हो जाएगा। कविता रची जाती है; अतः उसके संदर्भ में शिल्प का महत्व कोई कम नहीं। माना, बात (कथन) बुनियादी वस्तु है; किन्तु बात किस ढंग से कही गयी; यह भी विशेष है। कवि सौन्दर्य-तत्त्वों का ज्ञाता होता है। वह अपनी अभिव्यक्ति से पाठकों-श्रोताओं को आनन्दित करता है। सफल-सार्थक कविता के लिए यह गुण अनिवार्य है।

प्रतिबद्धता और स्वतंत्र चिन्तन परस्पर विरोधी नहीं हैं। प्रतिबद्धता मनुष्य को एक अच्छा व्यक्ति बनाती है। प्रश्न है, प्रतिबद्धता किसके प्रति? क्या यह प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक मतवाद या दल के प्रति है। ऐसी संकीर्ण प्रतिबद्धता स्वतंत्रा चिन्तन के लिए नितान्त बाधक है। राजनीति में सहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं। माना लाखों लोगों में राजनीतिक प्रतिबद्धता पायी जाती है; लेकिन जो विचारक हैं, रचनाकार हैं; उनकी दृष्टि पर इस तथाकथित प्रतिबद्धता का पट्टा नहीं बाँधा जा सकता। हमें प्रतिबद्ध होना चाहिए µ मानव-मूल्यों के प्रति, मानवता के प्रति, वसुधैवकुटुम्बकम् के प्रति, सद्भावों-सद्विचारों के प्रति। मनुष्य को यदि पशुता से मुक्त देखना है तो हमें निष्ठापूर्वक इस दिशा में प्रयत्न करने होंगे। साहित्य, कला और विज्ञान का यही उद्देश्य होना चाहिए। आज धर्म तक लोकमंगलकारी नहीं रहा। सर्वत्रा धार्मिक उन्माद नज़र आता है। विभिन्न

धर्मावलम्बियों में परस्पर सहनशीलता के स्थान पर घृणा-भाव दृग्गोचर होता है। धर्म के क्षेत्रा में स्वतंत्र चिन्तन को कदापि सहन नहीं किया जाता। इतिहास साक्षी है, मनुष्य का स्वतंत्र चिन्तन ही उसके विकास में सहायक हुआ है। परिस्थितियों के बदलने पर हमारा सोच भी बदलता है। मनुष्य किसी एक विचारधारा का सदा अनुयायी नहीं रह सकता। स्थिरता प्रगतिशीलता नहीं। हमें अपने हृदय-मस्तिष्क के दरवाज़े खुले रखने चाहिए। हमारी दृष्टि की दिशा एक न हो। हमारी दृष्टि का विस्तार चारों ओर तथा तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) तक हो। वेद-वाक्य या क़ुरान-वाक्य मानव-चिन्तन का अंतिम निष्कर्ष नहीं है।

कला-कृति सामाजिक-यथार्थ की हूबहू अनुकृति नहीं होती। साम्य का बोध तो होता ही है; अन्यथा रचना की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। सम्भावनाओं के अनुरूप रचनाकार अपनी ओर से बहुत-कुछ जोड़ता है। सामाजिक-यथार्थ की अभिव्यक्ति सामाजिक स्वास्थ्य को नज़र-अन्दाज़ नहीं कर सकती। हम आाशावादी बने रहेंगे; तभी समाज का मनोबल बढ़ेगा। साहित्य एवं अन्य ललित कलाओं का प्रमुख उद्देश्य यही होना चाहिए। माना, अपरोक्ष संकेतों से कृति की प्रभविष्णुता में अधिक वृद्धि होती है। यही कलात्मक सौन्दर्य है।

अर्थ-ग्रहण और बिम्ब-ग्रहण दोनों का अपना महत्त्व है। अर्थ-ग्रहण एक सामान्य प्रक्रिया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन से यह तथ्य स्पष्ट है - ‘‘काव्य में अर्थ-ग्रहण मात्र से काम नहीं चलता’’ - बिम्ब (इमेज) ज्ञानेन्द्रियों (दृष्टि, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। मन पर मूर्त्त चित्रों का अंकन ही बिम्ब-विधान है। (मानस-प्रतिमा)। प्रश्न उठता है - बिम्ब-ग्रहण क्या सहज होता है अथवा सायास? कवि क्या बिम्बों की छटा दिखाने के लिए काव्य-रचना करता है? वस्तुतः बिम्ब-विधान के स्वरूप का संबंध कवि-व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। कोई स्थिर-चित्र अंकित करता है तो कोई गतिमान। बिम्ब मूर्त और अमूर्त दोनों प्रकार के होते हैं। निःसंदेह काव्य को रोचक बनाने में बिम्ब-विधान का अपना महत्त्व है। बिम्ब काव्य को उच्च-स्तर प्रदान करते हैं। अनायास और विचारपूर्वक प्रयुक्त दोनों प्रकार के बिम्बों की उपस्थिति आज की हिन्दी-कविता में मिलती है।

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कविता के प्रति आकर्षण बचपन से ही रहा। घर का वातावरण कविता और संगीत से सिक्त रहा करता था; जिसकी छाप मेरे मानस पर पड़ती थी। त्योहारों और उत्सवों पर लोकगीतों के स्वर गूँजते थे। ढोलक और मजीरों पर। फिर, हारमोनियम। इन कार्यक्रमों में मात्र घर-पड़ोस की महिलाएँ-लड़कियाँ ही भाग लेती थीं। माँ प्रतिदिन प्रातः ‘श्रीरामचरित मानस’ का पाठ करतीं। इस सबका एक अज्ञात प्रभाव मेरे मानस पर पड़ता था। हिन्दी की पाठ्य-पुस्तिकाओं में संकलित कविताएँ बड़े चाव से पढ़ता था; गाता था। अनेक कंठस्थ थीं। विद्यालय में जब-तब कवि-सम्मेलन होते थे। कवियों के अभिनययुक्त काव्य-पाठ व कविता-गायन से आनन्दित होता था। उनको मिलने वाली वाहवाही व सम्मान-भावना भी मुझे काव्य-लोक से जुड़ने की प्रेरणा प्रदान करती थी। वैसे तो बचपन झाँसी और मुरार (ग्वालियर का उपनगर) में बीता; किन्तु पिताजी के सबलगढ़ (जिला - मुरैना) स्थानान्तरित हो जाने के कारण सबलगढ़-ग्राम में रहने का अवसर मिला। सबलगढ़-ग्राम के चारों ओर जंगल थे; जहाँ मैं खूब घूमता-फिरता था। वहाँ के प्राकृतिक-सौन्दर्य से प्रभावित हुआ। उन दिनों, शासकीय विद्यालय में, जहाँ मेरे पिताजी प्रधानाध्यापक थे, छठी कक्षा में पढ़ता था। काव्य-रचना की शुरूआत सबलगढ़ से हुई। इन दिनों की काव्य-रचना के बाल-प्रयास प्रकृति-सौन्दर्य द्वारा प्रेरित थे। ज़ाहिर है, इस काल की कविताएँ अस्तित्व में नहीं आयीं; न आ सकती थीं। पिताजी का स्थानान्तरण सबलगढ़ से फिर मुरार (ग्वालियर) हो गया। तब ‘शासकीय उच्च-विद्यालय, मुरार’ में पढ़ने लगा। यहीं से, 15 वर्ष की उम्र में, मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। जुलाई 1941 में, ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में उच्च-अध्ययन हेतु प्रवेश लिया। इन दिनों आसमान का विराट्-सौन्दर्य मेरी काव्य-रचना का प्रमुख प्रेरक तत्व रहा। तारों पर अनेक गीत लिखे (जो सन् 1949 में तारों के गीत’ अभिधान से पुस्तकाकार प्रकाशित हुए।) अंग्रेज़ी और हिन्दी के अतिरिक्त अन्य विषय भूगोल और अर्थशास्त्रा थे। ज्ञान-वृद्धि और बौद्धिक विकास के साथ-साथ मेरी काव्य-दृष्टि समाजोन्मुख होती गयी। समाजार्थिक परिवेश मेरे चिन्तन व लेखन का आधार बना; जो आज भी है। यद्यपि आज जीवन के अंतिम चरण में अन्तर्मुखी भी दिखायी देता हूँ; क्योंकि जीवन में बहुत-कुछ देखा-भोगा है। तीव्र दर्द की बड़ी गहरी अभिव्यक्ति मेरी परवर्ती कविता की पहचान-सी बन गयी है। माना मेरे प्रमुख सरोकार आज भी समाजार्थिक हैं। द्रष्टव्य यह भी है कि प्रकृति को मैं भुला नहीं सका हूँ। जब-तब प्राकृतिक परिवेश में बड़ी तन्मयता से डूब जाता हूँ। आपाधापी की दुनिया से हटकर प्रकृति से जुड़कर कुछ क्षणों को सुकून पाता हूँ।

मेरे पिता श्री. रघुनन्दनलाल जी ग्वालियर-रियासत में अल्प-वेतन-भोगी

अध्यापक थे। हमारा परिवार निर्धन था। पिता जी ने प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में ‘आगरा विश्वविद्यालय’ की स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की थी - इतिहास विषय में। पिता जी शिक्षाविद् होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। ग्वालियर- रियासत शाखा ‘बॉय स्काउट’ से सम्बद्ध थे। मैं भी, उनके साथ एकाधिक केम्पों में शामिल हुआ। ‘आर्य-समाज’ नियमित जाते थे। घर पर, प्रातःकाल ‘हवन’ होता था। वैदिक ऋचाओं के साथ। मैं भी भाग लेता था। वॉली-बॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। फलस्वरूप मैं भी अनेक खेलों में भाग लेता रहा - हॉकी, फुटबॉल, वॉली-बॉल, कबड्डी, खो-खो और ऐथेलेटिक्स में (हाई-जम्प)।

मेरी माँ श्रीमती गोपाल देवी आदर्श गृहिणी थीं। हिन्दी और उर्दू की ज्ञाता थीं। ‘श्रीरामचरित मानस’ का पाठ नियमित करती थीं। वैष्णव थीं। छुआछूत मानती थीं। रसोई में प्याज-लहसुन वर्जित था। बुंदेलखंडी लोकगीतों में उनकी विशेष रुचि थी। बचपन में अनेक लोक-कथाएँ उनसे सुनीं। घर में खूब तीज-त्योहार मनते थे। घर के सांस्कृतिक वातावरण का प्रभाव मेरे मानस पर पड़ना स्वाभाविक था। माँ मूर्तिपूजक थीं; पिता जी आर्य-समाजी। लेकिन परस्पर कभी विवाद नहीं हुआ। घर में माँ की ही चलती थी। पिताजी ने कभी कोई बाधा नहीं डाली। न विरोध किया। उदार और सहनशील वातावरण में मैं पला-बढ़ा।

बारह वर्ष की उम्र से ही कविता ‘करने’ लगा था। कविता लिखने की प्रारम्भिक प्रेरणा पर जब आज विचार करता हूँ तो मेरे सम्मुख सबलगढ़ के जंगल और घास के मैदान, जहाँ मैं हॉकी और फुटबॉल खेलता था, एक चलचित्र के समान झूम उठते हैं ! निश्चय ही, प्रकृति के सौंदर्य और रहस्य ने मुझे उन दिनों बड़ा प्रभावित किया। कविता नामक वस्तु से परिचित था ही - कुछ घर के शैक्षिक वातावरण के कारण, कुछ हिन्दी-अंग्रेज़ी पाठ्यक्रमों के अध्ययन के फलस्वरूप। प्रारम्भिक कविताएँ आज मेरे पास नहीं हैं। वे जंगल, फूल, वर्षा, ऊषा आदि पर लिखी गयी थीं और कोई-कोई तो काफ़ी बड़ी थीं। इन कविताओं में न तो व्यवस्थित तुकें होती थीं और न कोई अर्थ-संगति ! अपने मित्रों तक को ये रचनाएँ नहीं दिखाता था। एक बढ़िया नोट-बुक में, बड़े सुन्दर अक्षरों से, अपनी चुनी हुई कविताएँ लिख रखी थीं। यह क्रम सन् 1941 के जून तक अर्थात पन्द्रह वर्ष की अवस्था तक चला। सन् 1941 में, मैट्रिक-परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में उच्च अध्ययन के लिए प्रविष्ट हुआ और तभी से मेरे कवि-जीवन में महत्त्वपूर्ण मोड़ आया। उन दिनों मेरा उपनाम ‘अज्ञात’ था। यह उपनाम इस बात की स्पष्ट घोषणा करता था कि मैं कवि हूँ ! अतः मित्रों के मध्य कवि-रूप में जाना जाने लगा। पर, मेरी कविता से सभी अनभिज्ञ थे। एक दिन, मेरे एक घनिष्ठ कवि-मित्र (स्व.) श्री रघुनाथसिंह चौहान ने, जो मुझसे एक-दो कक्षा आगे थे, मेरी कविताओं की नोट-बुक देख ली ! इससे मैं क्षणिक संकोच से गढ़-सा गया; क्योंकि यह एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन था, जिसे मैं अभी तक बड़ी तत्परता से छिपाये हुए था। मेरे मित्र मुसकराते हुए, वह नोट-बुक पढ़ने को अपने घर ले गये। अगले रोज़ उन्होंने बताया कि वे कविताएँ, जो मैंने खूब जमा-सजा कर लिखी थीं, सुधार कर अच्छी बनायी जा सकती हैं। पर, इस विचार से मुझे ऐसे लगा मानों मेरी ये रचनाएँ बिलकुल व्यर्थ हैं। अतः कुछ प्रिय रचनाओं को छोड़कर शेष कविताएँ मैंने बड़ी निर्ममता से नष्ट कर दीं।

इन्हीं दिनों ‘मध्यमा’ में बैठने का निश्चय किया और आधुनिक हिन्दी-कविता का विधिवत् अध्ययन भी प्रारम्भ कर दिया। काव्याभ्यास भी करता रहा। पूर्व प्रकृति-प्रेम बना ही हुआ था। इन दिनों, अन्य विषयों के अतिरिक्त तारों पर कुछ विशेष कविताएँ लिखीं; जो ‘तारों के गीत’ में संगृहीत हैं। कॉलेज के अर्थशास्त्र और भूगोल के अध्ययन ने मुझे प्रकृति के क्षेत्रा से मानवी धरातल पर ला खड़ा किया। उस समय द्वितीय महायुद्ध और भारतीय स्वाधीनता-संग्राम अपनी चरम सीमा पर थे; जिनका भावात्मक प्रभाव मेरे मन पर बड़ा गहरा पड़ा। यह असम्भव था कि उसकी अभिव्यक्ति मेरे काव्य में न होती। अभिव्यक्ति मात्र ही नहीं वरन् इन घटनाओें ने मेरे कवि-व्यक्तित्व को ही एकदम नयी दिशा में मोड़ दिया। राष्ट्रीय-उद्बोधन की ओर प्रवृत्त हुआ। गांधी जी राष्ट्रीय आन्दोलनों का नेतृत्व कर रहे थे; एतदर्थ मैं उनसे प्रभावित था और आज भी उनकी नैतिकता का क़ायल हूँ। पर, राजनीति विषयक मेरा ज्ञान कुछ न था। राजनीति से मेरा भावात्मक संबंध ही कहा जा सकता है। राजनीति जब साधारण जनता के जीवन को प्रभावित करने लगती है, तब उससे विलग भी नहीं रहा जा सकता। अतः राजनीतिक चेतना से मैं अपने को नहीं बचा सका। मुझ जैसे निम्न-मध्यम वर्गीय व्यक्ति का उससे बचना असम्भव भी था। इसी समय वामपक्षी विचार-धारा से भी मेरा परिचय हुआ। परिवार की विकट आर्थिक परिस्थितियों के बीच जब मैं ऐसे विचारों के सम्पर्क में आया तो मुझे उनमें अपने मन की बात मिल गयी ! जो मैं सोचता था, वह लोग पहले ही सोच चुके थे - उन विचारों को ग्रंथ-बद्ध कर चुके थे। एतदर्थ यह वैचारिक साम्य पा कर मुझे बड़ा संतोष मिला। सन् 1942 का देश-व्यापी आन्दोलन, बंगाल का अकाल, आज़ाद हिन्द फौज़ का अभियान आदि ऐसी घटनाएँ हैं जिनका जन-साधारण के मन पर प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। इस प्रभाव का राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं है। कोई भी भावुक व्यक्ति, जिसके हृदय में देश तथा मानवता के प्रति प्रेम है, अपने को इन घटनाओं से अछूता नहीं रख सकता। मैं प्रभावित था; अतः मैंने इन विषयों पर लिखा। ‘अभियान’ और ‘बदलता युग’ में इस समय की अनेक रचनाएँ संगृहीत हैं।

सन् 1945 में, बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही नौकरी करनी पड़ी। भारत की स्वाधीनता के साथ-साथ साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये थे। इलाहाबाद में, सफ़र के समय, एक बार सुनसान में घिर गया था - ‘राम-राम’ करके स्टेशन पकड़ा और थोड़ी देर बाद ही किसी ने समाचार दिया कि जिस रास्ते से मैं आया था, छुरेबाज़ी की वारदातें हो गयीं ! कितना बुरा समय था वह ! तिस पर मालवा में अकाल पड़ा। गेहूँ नहीं मिलता था। चावल बहुत मँहगा था। कंट्रोल के घुने-सडे़ जौ और चने कुछ मिल पाते थे। अमरीकी मेलो नामक लाल अनाज खाया नहीं जाता था ! बाद में तो, मूँग की दाल के चीलों और पकौड़ियों पर दिन काटने पड़े ! घर पर पढ़ने, व्यापारियों के जो लड़के आते थे, वे पारिश्रमिक के बदले में थोड़ा-सा गेहूँ दे जाते थे। इस जीवन में मुझे बड़े कटु अनुभव हुए। एक विद्यालय के अध्यापक की यह ज़िन्दगी थी। कल्पना कीजिए, ग़रीब जनता को कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा होगा ! राशन की दूकानें लुट जाया करती थीं! लाठी-चार्ज होते-होते बचता था। इस माहौल में, व्यापारी, पूँजीपति और बड़े अफ़सर मस्त-अलमस्त घूमते थे! यह उनके धन कमाने का समय था! अभिप्राय यह कि ये सारी घटनाएँ, एक-के-बाद-एक, मेरे मन में मौज़ूदा समाज-व्यवस्था के प्रति आक्रोश का भाव भरती गयीं। विद्रोह और क्रांति के भाव-विचार मेरी अपनी भोगी हुई ज़िन्दगी से उपजे हैं। मेरे प्रारम्भिक लेखन-काल का यह आर्थिक परिवेश था।

सन् 1943 तक, स्थानीय क्षेत्र तक सीमित रह लिखता रहा। मित्रों के मध्य और साहित्यिक गोष्ठियों में कविताएँ प्रस्तुत करता था, जहाँ से स्वस्थ आलोचना के कारण बल मिलता था। मेरी प्रथम कविता ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) के मार्च 1944 के अंक में, ‘महेन्द्र’ नाम से प्रकाशित हुई। उन दिनों इस मासिक पत्र के सम्पादक श्री मोहनसिंह सेंगर थे। यह रचना ‘हुँकार’ शीर्षक से ‘टूटती शृंखलाएँ’ नामक कविता-संग्रह में समाविष्ट है। ‘विशाल भारत’ उन दिनों हिन्दी का प्रमुख साहित्यिक पत्र था। प्रसिद्ध समाजवादी कवि श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द की कविताएँ उसके मुख-पृष्ठ पर छपती थीं। मिलिन्द जी को इस पर बड़ा गर्व अनुभव होता था। इन दिनों, ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में बी.ए. का छात्र था, मुरार में रहता था, मिलिन्द जी से प्रायः रोज़ मिलना होता था। प्रतिक्रिया-स्वरूप, मैंने भी ‘विशाल भारत’ में निम्नलिखित पंक्तियाँ लिख कर भेज दीं:

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ !

मैं क्रांति की हुँकार हूँ !

मैं न्याय की तलवार हूँ !

शक्ति जीवन जागरण का

मैं सबल संसार हूँ !

लोक में नव द्रोह का

मैं तीव्रगामी ज्वार हूँ !

फिर नये उल्लास का,

मैं शांति का अवतार हूँ !

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ !

मैं क्रांति की हुँकार हूँ !

आश्चर्य की बात थी कि यह रचना ‘विशाल भारत’ में छप गयी! इस पर मिलिन्द जी भी ज़रा चौंके। प्रथम प्रकाशित कविता होने और ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित होने के कारण, यह कविता उद्धृत करने योग्य बन गयी !

शुरू-शुरू में, सिद्ध कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी ने, ‘महेन्द्र’ नाम से मेरी अनेक कविताएँ ‘कर्मवीर’ में प्रकाशित कीं। इससे प्रकाशन के क्षेत्रा में मेरा उत्साह बढ़ा। मिलिन्द जी ने भी, अपने साप्ताहिक पत्रा ‘जीवन’ (ग्वालियर) में, मेरी कई कविताएँ प्रमुखता से प्रकाशित कीं। आगे चलकर, स्वीडन के किसी लेखक के नाम के ध्वनि-साम्य पर, मैंने अपना नाम ‘महेन्द्रभटनागर’ रख लिया; तब से यही नाम चला आ रहा है! वास्तव में, मेरा नाम या तो ‘महेन्द्र’ है या फिर ‘महेन्द्रभटनागर’! मात्र ‘भटनागर जी’ उचित नहीं! ‘राष्ट्रभारती’ (वर्धा) में प्रकाशित आलेख ‘मेरे कवि-जीवन के पंद्रह-वर्ष’ में मैंने विनोद में लिखा भी, ‘भटनागर’ कार्यस्थों में भी होते हैं !!’

मेरे प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन में, जिन अन्य साहित्यकारों-पत्राकारों ने मुझमें रुचि ली; उनमें - डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, श्री प्रभाकर माचवे, श्री हरिहरनिवास द्विवेदी, ‘हंस’ के सम्पादय-द्वय श्री अमृतराय और श्री त्रिलोचन शास्त्री, ‘जनवाणी’- सम्पादक श्री बैजनाथसिंह ‘विनोद’, आचार्य विनयमोहन शर्मा, डा. रामअवध द्विवेदी (सम्पादक ‘हिन्दी रिव्यू’, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी), श्री उदयशंकर भट्ट, श्री जगदीशचंद्र माथुर, विश्वम्भर ‘मानव’, राहुल सांकृत्यायन, प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त, रांगेय राघव, रामविलास शर्मा, शिवनाथ (शांतिनिकेतन) प्रभृति प्रमुख हैं।

मेरी सार्थक काव्य-रचना का प्रारम्भ सन् 1941 के लगभग अंत से होता है; जब मैं 15 वर्ष का था और ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में प्रथम-वर्ष का छात्रा था। भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। लगभग छह वर्ष का यह समय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का समय था। कांग्रेस और गांधी-नेहरू तथा बाद में सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में स्वाधीनता संग्राम के सैनिक संघर्षरत थे। बलिपंथियों के रोज़ नारे लगाते जत्थे सड़कों पर से गुज़रते थे। देश का ऐसा कोई कारागृह न रहा होगा; जिसमें स्वतंत्राता सैनानी न रहे हों। ऐसे माहौल में मेरा युवा-हृदय कितना आन्दोलित होता होगा; इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इन दिनों मैं मुरार (ग्वालियर) और उज्जैन (मालवा) रहा। मुरार की देशभक्त-टोली में जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द और रघुनाथसिंह चौहान जैसे राष्ट्रीय चेतना-सम्पन्न कवियों के साथ मैं अटूट रहा। ब्रिटिश सत्ता के विरोध में निकलने वाली ‘प्रभात-फेरियों’ में भाग लेता था। मुरार उन दिनों अंग्रेज़ों की सैनिक छावनी थी। तब मैं भी खादी के वस्त्रा धारण करता था। कभी-कभी छावनी की तरफ़ (ठंडी सड़क) निकल जाता था। दूर से, अंग्रेज़ सैनिकों को आक्रोश भाव से देखता था। इन सैनिकों के साथ अंग्रेज़-वेश्याएँ भी थीं; जो जब-तब उनके साथ अशोभन रूप में नज़र आ जाती थीं। यह सब देखकर, अपने मित्रा रघुनाथसिंह चौहान के साथ, विद्रोह करने की अनेक योजनाएँ बनाता था। चूँकि मेरे पिता श्री. रघुनन्दनलालजी भटनागर ग्वालियर-रियासत की नौकरी (अध्यापक-प्रधानाध्यापक) में थे; इस कारण राष्ट्रीय आन्दोलनों में खुले आम भाग नहीं ले सकता था। आर्यसमाजी होने के कारण, पिता जी में राष्ट्रीय भावनाएँ कूट-कूट कर भरी हुईं थीं। विद्यालय बंद करवाने (हड़ताल करवाने) जब विद्यालय में जुलूस प्रवेश करता; पिता जी उसके पूर्व ही, निडर होकर, छुट्टी की घंटी बजवा देते और इस प्रकार अध्यापन-कार्य स्वतः बंद हो जाता था। तोड़-फोड़ नहीं हो पाती थी। उनके उज्जैन स्थानान्तरण के कारण मुझे भी उज्जैन जाना पड़ा। वहाँ ‘माधव महाविद्यालय’ में पढ़ता था (1942-43 / द्वितीय वर्ष का छात्र)। लेखक-कवि श्री. नरेश मेहता मेरे सहपाठी थे। उनके साथ मैं भी सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के छात्रा-जुलूसों में भाग लेता था। पुलिस और सी-आई-डी की नज़र से इसलिए बचा रहा; क्योंकि पिता जी की सरकारी नौकरी होने के कारण, मैंने इन जुलूसों का नेतृत्व नहीं किया। अन्यथा सरकार उन्हें नौकरी से हटा देती।

स्वतंत्रता-प्राप्ति पूर्व-वर्षां में मेरा लेखन राष्ट्रीय विचारधारा से प्रभावित रहा। किसी राष्ट्रीय संस्था का सदस्य बनना तो सम्भव न था; किन्तु अपने को राष्ट्रीय चेतना से अछूता कैसे रख सकता था। हिन्दी-साहित्य में इन दिनों राष्ट्रीय काव्य, उत्तर-छायावादी गीति-रचना और प्रगतिवादी काव्यान्दोलन अपने चरम पर थे। मेरा लेखन इन तीनों काव्य-धाराओं से सम्बद्ध रहा। देश-भक्ति या राष्ट्रीय भावनाओं की अनेक कविताएँ मेरे इस काल के लेखन में द्रष्टव्य हैं; जो तत्कालीन अनेक साप्ताहिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। देश में राष्ट्रीयता के प्रसार में इन ओजस्वी कविताओं की भी अपनी भूमिका है। उन दिनों मैं कवि-सम्मेलनों में भी भाग लेता था। सैकड़ों लोगों ने उन्हें सुना। चूँकि देश परतंत्र था; अतः इन रचनाओं में साम्राज्यवाद-पूँजीवाद के प्रति भी शंखनाद है। आज भी मेरी कविताओं में इन स्वरों की प्रधानता है। राष्ट्रीय एकता को बल पहुँचाना समाजचेता कवि का धर्म है। अपनी सीमाओं में मैं जो कर सकता था; वह मैंने किया। वर्तमान में भी इस उद्देश्य के प्रति सजग हूँ। (देखिए, ‘सामाजिक चेतना के शिल्पी: कवि महेंद्रभटनागर’ में समाविष्ट डा. शीतलाप्रसाद मिश्र का आलेख ‘स्वाधीनता-संग्राम और कवि महेंद्रभटनागर’ / क्र. 9 - पृष्ठ 70)

मेरा जन्म-दिनांक 26 जून 1926 है तथा कविता-रचना-काल नवम्बर 1941 से (‘तारों के गीत’) प्रारम्भ होता है। लगभग छह-वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्रता-पूर्व भारत है; शेष का स्वातंत्र्योत्तर स्पष्ट है, प्रगतिवादी युग की पृष्ठभूमि ने मेरी साहित्यिक चेतना को उद्बुद्ध किया। उत्तर-छायावादी गीति-रचना भी इस बीच समान्तर अस्तित्व में रही। इसका प्रभाव भी मेरी गीति-सृष्टि पर रहा।

स्वच्छंदतावाद-छायावाद यद्यपि बहुत पीछे छूट चुके थे; तथापि छायावादी कवियों (प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी) का ही वर्चस्व इन दिनों साहित्य व शिक्षा जगत पर छाया हुआ था। पंत और निराला प्रगतिवादी काव्यधारा में भी प्रमुख स्थान बना चुके थे।

प्रगतिवादी कवियों में सर्वाधिक चर्चित नाम थे केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, नागार्जुन, त्रिलोचन, नरेंद्र शर्मा, ग.म. मुक्तिबोध, रांगेय राघव, शील, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा आदि।

राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। यथा - मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सियारामशरण गुप्त, रामधारीसिंह ‘दिनकर’ आदि। ‘दिनकर’ का प्रभाव-फलक बहुत आगे तक रहा - ‘उर्वशी’ तक।

‘अज्ञेय’ ने ‘इत्यलम्’ छपवा कर अपने काव्य-लेखन का अंत नहीं किया; वरन् हिन्दी कविता को नयी दिशा दी; उसका सफल-सार्थक नेतृत्व भी किया। हिन्दी कविता-लोक में ‘अज्ञेय’ के पुनर्जन्म ने हिन्दी कविता को आधुनिकता-अत्याधुनिकता का एक नया क्षितिज प्रदान किया। ‘तार-सप्तक’ (1943) युगान्तरकारी संकलन प्रमाणित हुआ। ‘प्रतीक’ पत्रिका द्वारा प्रयोगवाद और नयी कविता के काव्यान्दोलन को जन्म दिया। फिर, नयी कविता की बागडोर जगदीश गुप्त ने सँभाली।

वस्तुतः हिन्दी कविता की प्रमुख विधा गीत रही; जो छायावादी एवं उत्तर-छायावादी युग में सर्वाधिक मुखर रही (द्रष्टव्य बच्चन, नेपाली, शंभुनाथसिंह, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि की गीति-सृष्टि।)

बड़े विस्तृत फलक पर आधुनिक हिन्दी कविता ने अपने पंख पसारे। कवियों की कतार निरंतर बढ़ती गयी/बढ़ती जा रही है। एशिया ही नहीं; विश्व-कविता में हिन्दी कविता का महत्त्व आँका जाना अब ज़रूरी हो गया है।

मेरी कविताओं के प्रकाशन का काल सन् 1944 से शुरू होता है। उन दिनों, मैं बी.ए. का छात्र था। मुरार (ग्वालियर का उपनगर) में रहता था। मुरार के दो यशस्वी साहित्यकार हरिहरनिवास द्विवेदी और जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द के सम्पर्क में आया। इन दोनों ने मेरे लेखन में रुचि ली। मिलिन्द जी ने अपने साप्ताहिक पत्र ‘जीवन’ में मेरी कविताएँ प्रकाशित कीं। हरिहरनिवास द्विवेदी ने अपने सम्पादन में तैयार हो रहे ‘विक्रम स्मृति-ग्रंथ’ में मेरी कविता (‘मालवानां जयः’) को स्थान दिया। इन्हीं दिनों, माखनलाल चतुर्वेदी ‘एक भारतीय आत्मा’ ने ‘कर्मवीर’ (खण्डवा, म.प्र.) में मेरी अनेक कविताएँ प्रकाशित कीं; जिससे मैं प्रोत्साहित हुआ। इंद्रनारायण गुर्टू ने मेरी कविताओं को ‘नवयुग’ साप्ताहिक (दिल्ली) में छापा।

बी.ए. उपाधि प्राप्त कर लेने के पश्चात् मैं ‘मॉडल हाई स्कूल, उज्जैन’ में भूगोल का अध्यापाक नियुक्त हुआ। उज्जैन में प्रभाकर माचवे जी से मेरे संबंध अति-घनिष्ठ रहे। बहुत कम दिन ऐसे गुज़रे होगे कि जब मेरा उनसे मिलना न हुआ हो! प्रभाकर माचवे जी से हिन्दी-साहित्य की विराट्धारा से जुड़ गया। पं. सूर्यनारायण व्यास (उज्जैन) का भी बड़ा स्नेह रहा। उनके सम्पादन में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘विक्रम’ में लिखा भी। इन दिनों मैं ‘महेन्द्र’ नाम से लिखता था। सर्वप्रथम ‘युग और कवि’ शीर्षक कविता (‘नयी चेतना’ में समाविष्ट) ‘हंस’ (वाराणसी) में महेंद्रभटनागर के नाम से अमृतराय ने प्रकाशित की। उन दिनों त्रिलोचन शास्त्री से भी आत्मीयतापूर्ण पत्रा-व्यवहार रहा। बैजनाथसिंह ‘विनोद’ ने ‘जनवाणी’ (वारणसी) में मेरी कविताओं को प्रमुखता से स्थान दिया। आदित्य मिश्र ‘रक्ताभ’ (लखनऊ) में छापते रहे। नागार्जुन ने ‘उदयन’ में छापा। सन् 1948 में ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ से हिन्दी में एम.ए. किया और प्रसिद्ध आलोचक विनयमोहन शर्मा से जुड़ गया। बाद में, उनके निर्देशन में पी-एच.डी. का शोध-प्रबन्ध ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ (सन् 1957) प्रस्तुत किया।

मेरा काव्य-लेखन सन् 1941 के लगभग अंत से प्रारम्भ होता है। इस समय तक हिन्दी-कविता अपनी अनेक मंजिलें तय कर चुकी होती है। सन् 1936 से प्रगतिवाद की दुंदुभी बजने लगी थी। सन् 1943 में ‘तार-सप्तक’ आ गया। हिन्दी-कविता के तत्कालीन परिदृश्य का परिज्ञान मुझे सन् 1945-46 से ही हो पाता है। इसके पूर्व का काल मेरे छात्रा-जीवन का काल रहा। क्रमशः हिन्दी कवियों और उनकी काव्य-उपलब्धियों को जानने-समझने का क्रम चला। छायावादोत्तर हिन्दी-कविता की दो धाराएँ - राष्ट्रीय उद्बोधन और गीति-रचना की - अविच्छिन्न चलती रहीं। लेकिन कविता-क्षेत्र में मेरे प्रवेश के समय प्रगतिवाद प्रतिष्ठित हो चुका था। सन् 1945-46 से मैं प्रगतिवादी कविता की मूल धारा से जुड़ा। ‘हंस’ के माध्यम से। अमृतराय, त्रिलोचन शास्त्री, ग. म. मुक्तिबोध, पहाड़ी, नागार्जुन, बैजनाथसिंह ‘विनोद’ आदि साहित्यिक पत्रों के सम्पादकों ने मेरे काव्य-कर्तृत्व में रुचि ली। प्रगतिवादी कविता का यह दूसरा दौर था। पूर्व के अधिकांश प्रगतिवादी कवि उम्र में मुझसे एक दशक अधिक थे। इसी कारण, कुछ समीक्षकों ने, इस काल की प्रगतिवादी कविता को ‘नवप्रगतिवाद’ के नाम से अभिहित किया है; यद्यपि यह नाम प्रचलित हुआ नहीं। बहुत शीघ्र ‘प्रयोगवाद’ और ‘नयी कविता’ की काव्य-धाराएँ उभर कर आ-छा गयीं। ‘अज्ञेय’ इस लेखन के पुरोधा बने। ‘प्रतीक’ में मैंने भी लिखा। लेकिन सप्तक-परम्परा से अपने को जोड़ना नहीं चाहा। ग.म. मुक्तिबोध और गिरिजाकुमार माथुर ने पहल भी की। (द्रष्टव्य - मुक्तिबोध-लिखित ‘टूटती शृंखलाएँ’ की समीक्षा - ‘‘ इस तरह वह (महेंद्रभटनागर) ‘तार-सप्तक’ के कवियों की परम्परा में आता है; जिन्होंने सर्वप्रथम हिन्दी-काव्य की छायावादी प्रणाली को त्याग कर नवीन भावधारा के साथ-साथ नवीन अभिव्यक्ति शैली को स्वीकृत किया है। इस शैली की यह विशेषता है कि नवीन विषयों को लेने के साथ-साथ नवीन उपकरणों को और नवीन उपमाओं को भी लिया जाता है तथा काव्य को हमारे यथार्थ जीवन से संबंधित कर दिया जाता है। इसे हम वस्तुवादी मनोवैज्ञानिक काव्य कह सकते हैं। ...... किन्तु सबसे बड़ी बात यह है, जो उन्हें पिटे-पिटाये रोमाण्टिक काव्य-पथ से अलग करती है और ‘तार-सप्तक’ के कवियों से जा मिलाती है वह यह है कि अत्याधुनिक भावधारा के साथ टेकनीक और अभिव्यक्ति की दृदृष्टि से उनका (महेंद्रभटनागर का) उत्तरकालीन काव्य मॉडर्निस्टक या अत्याधुनिकतावादी हो जाता है।’’

और श्री. गिरिजाकुमार माथुर का ‘आलोचना’ (जुलाई 1954, पृ. 64) में प्रकाशित आलेख – “ शताब्दी के अर्धचरण तक आते-आते नए कवियों की एक और पीढ़ी उठकर साहित्य-क्षितिज पर आई। धर्मवीर भारती, हरि व्यास, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, शकुन्त माथुर, महेन्द्रभटनागर, सर्वेश्वरदयाल, मदन वात्स्यायन, विजयदेव साही, नामवर सिंह, सिद्धनाथ कुमार, राजनारायण बिसारिया आदि कितने ही नये कवि हमारे सामने हैं।’’ - इनमें से अधिकांश ‘सप्तक’ संकलनों में विद्यमान हैं।

इन्हीं दिनों प्रगतिवादी समीक्षकों में मतभेद उभरे। डा. रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, अमृतराय आदि में सैद्धांतिक वाद-विवाद छिड़ गया। प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त और शिवदानसिंह चौहान पर्याप्त संतुलित रहे। हिन्दी-कविता की मूल धारा से जुड़े रहने के फलस्वरूप मेरा कविता-लेखन विकसित होता रहा। किसी राजनीतिक पार्टी के प्रति मैं कभी प्रतिश्रुत नहीं रहा; यद्यपि समाजवादी-साम्यवादी समाज-व्यवस्था का समर्थक ज़रूर रहा। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘जनवादी लेखक संघ’ की विचार-धारा से मेरा चिन्तन पर्याप्त मेल खाता है; अतः साहित्य के इन आन्दोलनों में मेरी भी अपनी भूमिका रही। कट्टर वामपंथियों ने मुझे समर्थक ;ेलउचंजीप्रमतद्ध समझा; पर मुझे प्रमुखता (ीपही सपहीज) नहीं दी। वाम-विरोधी जान-बूझ कर उदासीन रहे। चूँकि सदैव स्वतंत्र रहा; अतः निर्बाध गति से अपनी भावनाओं-संवेदनाओं-विचारों को काव्याभिव्यक्ति प्रदान करता रहा। कोई क्या कहेगा; ऐसा कभी नहीं सोचा। मेरे काव्य-कर्तृत्व में विषय-वैविध्य के पाये जाने का रहस्य यही है। मेरी विचारणा सचेत अवस्था-अनुस्यूत है; उसमें असंगति-विसंगति का आरोपण करना बेमानी है। स्वतंत्रा रचनाकार एक खूँटे से बँध कर नहीं लिखता। वह ‘पेशेवर’ नहीं होता। अपनी आन्तरिक प्रेरणा को तरजीह देता है।

मेरी काव्य-कृतियों का प्रकाशन सन् 1949 से प्रारम्भ हुआ। प्रकाशक अनायास मिलते रहे। शुरू-शुरू में कुछ गीत-कविताएँ तारों को लक्ष्य करके लिखी थीं। तब मैं लगभग 15 वर्ष का था और ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में अध्ययनरत था। तारे संसार-भर के कवियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। मात्रा तारों पर कविता-संकलन प्रकाशक को विशिष्ट लगा। इस कृति में कुल 21 रचनाएँ समाविष्ट हैं। प्रकाशक ने इसका पैपरबैक संस्करण बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया। ‘तारों के गीत’ की समीक्षा ‘साहित्य संदेश’ के सम्पादक यशस्वी प्रोफ़ेसर-लेखक सत्येन्द्र जी (आगरा) ने आकाशवाणी-केन्द्र दिल्ली से प्रसारित की; जिसे डा. विनयमोहन शर्मा जी ने अपनी सम्पादित आलोचना-पुस्तक ‘महेंद्रभटनागर का रचना-संसार’ में शामिल किया है। प्रारम्भिक रचनाएँ होते हुए भी; तारों के ये गीत, पुस्तकाकार प्रकाशित हो जाने के बाद भी; तत्कालीन स्तरीय पत्रा-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी होते रहे (‘आजकल’ मासिक, दिल्ली, ‘नवयुग’ साप्ताहिक, दिल्ली, आदि में)। कुछ गीत एकाधिक अन्य भाषाओं (तेलुगु, अंग्रेज़ी आदि) में अनूदित व प्रकाशित भी हैं। द्वितीय काव्य-कृति ‘टूटती शृंखलाएँ’ भी सन् 1949 में प्रकाशित हो गयी (60 कविताएँ) इस कृकृति का प्रकाशन मेरे मित्रा श्री. नंदकिशोर मित्तल (कारवाँ प्रकाशन, इंदौर) ने किया। ‘कारवाँ’ कार्यालय में प्रायः काव्य-गोष्ठियाँ होती थीं। डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ के साथ-साथ मैं भी उज्जैन से आमंत्रित होता था। उन दिनों ‘हंस’ आदि अनेक उच्च-स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित हो रही थीं। श्री. नंदकिशोर मित्तल साहित्यिक रुचि के व्यक्ति थे। उन्होंने स्वयं ‘टूटती शृंखलाएँ’ को प्रकाशित करना चाहा। लेकिन प्रूफ़ ध्यानपूर्वक नहीं देखे। कुछ कविताओं में अपनी ओर से किंचित परिवर्तन तक कर डाले - बिना मुझे बताए! अच्छा हुआ, ‘टूटती शृंखलाएँ’ का सही द्वितीय संस्करण सन् 1950 में ही आ गया (स्थानीय साहित्यिक संस्था ‘प्रबुद्ध भारती’, ग्वालियर द्वारा)। ‘टूटती शृंखलाएँ’ में प्रकाशित डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ का वक्तव्य इस प्रकार है - ‘‘मुझे श्री. महेंद्रभटनागर की ‘टूटती शृंखलाएँ’ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। युग की अस्तव्यस्त मानसिक दशा तथा अप्रतिहत संघर्ष की जागरूक वाणी के उन्मेषशील स्वर इसकी झंकार में समाहित हैं। महेंद्रभटनागर की आतुर निर्भीक व्यंजना तथा कलात्मक गढ़न, प्रगतिशील काव्य के स्वर्णिम भविष्य की ओर संकेत करती है। कवि में जन-संस्कृति के नव-निर्माण की जो अदम्य आस्था है वह उसके स्वर को और सबल तथा साधनापरक बनाती है। हिन्दी के वर्तमान कवियों में उसने सहज ही गौरवपूर्ण स्थान बना लिया है। युग की वाणी उसके कंठ में ढलकर जन-जीवन के अश्रु-हास की सजीव गाथा बन गयी है। ‘टूटती शृंखलाएँ’ संक्रमण-युग के युगान्तरकारी काव्य की भूमिका बनकर आयी है और निःसंदेह भावी समाज के अधिकांश भावात्मक उपकरण अंकुर रूप में उसमें देखे जा सकते हैं। मैं माँ-भारती के इस साधक की उर्वर प्रतिभा का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ।’’ ‘टूटती शृंखलाएँ’ बहु-चर्चित काव्य-कृति रही।

खजूरी बाजार, इंदौर में ‘श्रीदीनानाथ बुक डिपो’ लेखकों-कवियों का मिलन-स्थल था। मैं जब भी इंदौर जाता वहाँ कुछ समय ज़रूर व्यतीत करता। ‘श्रीदीनानाथ बुक डिपो’ के मालिक मुझसे बड़े प्रभावित थे। तीसरी काव्य-कृति ‘बदलता युग’ उन्होंने प्रकाशित की। सन् 1953 में। ऐसा ही, चौथी काव्य-कृति ‘अभियान’ के साथ हुआ। ‘आदर्श विद्या मंदिर, इंदौर’ के संचालक ने सन् 1954 में उसे प्रकाशित किया। पाँचवीं काव्य-कृति ‘अन्तराल’ साहित्यिक-संस्था ‘युवक साहित्यकार संघ, धार’ ने सन् 1954 में ही निकाली। ‘स्वरूप ब्रदर्स, इंदौर’; जो मेरी दो-एक पुस्तकें प्रकाशित कर चुके थे; प्रौढ़-शिक्षान्तर्गत ‘विहान’ प्रकाशानार्थ ले गये। सन् 1956 में छपी। सन् 1956 में ही ‘श्रीअजन्ता प्रकाशन, पटना’ से बहु-चर्चित काव्य-कृति ‘नयी चेतना’ का प्रकाशन हुआ। प्रकाशक बिहार के लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार थे। सन् 1959 में ‘किताब घर / साहित्य प्रकाशन , ग्वालियर’ ने प्रेम-कविताओं की कृकृति ‘मधुरिमा’ का प्रकाशन किया। उन्होंने इसके दो संस्करण निकाले। नवीं काव्य-कृति ‘जिजीविषा’ श्रीकृकृष्णचंद्र बेरी जी ने ‘हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी’ से सन् 1960 में प्रकाशित की; जिसकी अधिकांश कविताएँ प्रगतिवादी-जनवादी काव्य-धारा में बहु-उद्धृत हैं। जिस प्रकाशक ने मेरी प्रथम काव्य-कृति ‘तारों के गीत’ छापी थी; उसी ने अपने एक अन्य प्रकाशन-संस्थान ‘कैलाश पुस्तक सदन, ग्वालियर’ से सन् 1963 में, ‘संतरण’ कविता-संकलन प्रकाशित किया। सन् 1972 में, जब मैं ‘शासकीय महाविद्यालय, मंदसौर’ में पदस्थ था, ‘लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद’ के मालिक मुझसे मिलने आए और ‘संवर्त’ नामक मेरा नया कविता-संकलन प्रकाशनार्थ ले गये और सन् 1972 में ही उसे प्रकाशित कर दिया। तदुपरांत, बारहवाँ कविता-संकलन ‘संकल्प’ सन् 1977 में साहित्यिक संस्था ‘प्रबुद्ध भारती’ (ग्वालियर) से निकला। ‘जूझते हुए’ सन् 1984 में ‘किताब महल, इलाहाबाद’ ने प्रकाशित किया। सन् 1990 और 1997 में क्रमशः ‘जीने के लिए’ और ‘आहत युग’ ग्वालियर के ‘सर्जना प्रतिष्ठान’ से प्रकाशित हुए। ‘अनुभूत-क्षण’ सीधे पहले ‘समग्र’ (३) में शामिल हुआ (सन् 2001)। फिर, द्वि-भाषिक (अंग्रेजी-हिन्दी) कृति के साथ, सन् 2001 में ही, प्रस्तुत हुआ। द्वि-भाषिक (अंग्रेजी-हिन्दी) कृतियों के अन्तर्गत ही ‘मृत्यु-बोध: जीवन-बोध’ और ‘राग-संवेदन’ क्रमशः सन् 2002 और 2005 में प्रकाश में आए। इस प्रकार, इस समय तक मेरी अठारह काव्य-कृतियाँ उपलब्ध हैं। ‘समग्र’ खंड 1,2,3 में क्रम से 16 और ‘महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा’ खंड 1,2,3 में सम्पूर्ण 18 काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। इतना लिख चुकने के बाद भी, बहुत-कुछ अभिव्यक्त करने की छटपटाहट है।

सामाजिक सरोकारों को मैंने प्राथमिकता दी है। रचनात्मक लेखन में मेरे प्रवेश के समय, देश और समाज का जो परिदृश्य था उसने मुझे समाजार्थिक चेतना प्रदान की। देश पराधीन था। भारतीय जनता, गांधी जी के नेतृत्व में, स्वतंत्रता-संघर्ष में आन्दोलन-रत थी। भारतीय समाज पुनरुत्थान की दिशा में सक्रिय था । जन-मानस में सुधारवादी प्रवृत्तियाँ पनप रही थीं। समस्त वातावरण आदर्श-प्रेरित था।

कवि केवल सामाजिक विषयों तक ही सीमित नहीं रहता। वह चिन्तक भी होता है। जीवन और जगत के सनातन प्रश्नों पर भी मनन करता है। व्यक्तिगत स्तर पर हर्ष और वेदना का भी अनुभव करता है। कवि का दार्शनिक उसकी रचनाओं में मुखर होता है। रचनाकार के हृदय में जितनी गहराई होगी; उतनी प्रभावान्विति से वह जीवन-मर्म का उद्घाटन कर सकेगा। उत्कृष्ट भावों-विचारों-कल्पनाओं से समृद्ध रचनाकार ही उत्कृष्ट रचना कर सकते हैं। मेरे काव्य में भी जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति हुई है। दर्द की अनुभूतियाँ जीवन-यथार्थ का हिस्सा हैं। वे ‘स्व’ से ‘सामूहिक’ बनती हैं। क्योंकि कवि कोई विशिष्ट अजूबा प्राणी नहीं होता। वह सामान्य जन का जीवन जीता है। उसके निजी हर्ष-विषाद सामान्य मानवता के सुख-दुख बन जाते हैं। इसे ही भाव-तादात्म्य कहते हैं। अतः मेरे काव्य में राग-विराग के स्वर भी सहज ध्वनित हुए हैं।

तीसरे प्रकार की रचनाएँ वे हैं; जो प्रणय-अनुभूतियों से सिक्त हैं। स्त्राी-पुरुष का पारस्परिक आकर्षण व प्रेम स्वाभाविक एवं सनातन है। सृष्टि का अस्तित्व ही इसी से है। मनुष्य में परिष्कृति है; जो अन्य प्राणियों में दृग्गोचर नहीं होती। प्रेम मात्रा शारीरिक क्षुधा या आवश्यकता नहीं है। उसका संबंध आत्मा से है। प्रेम में सर्वस्व न्यौछावर करने में हम नहीं हिचकते। प्रेम एक उदात्त व उदार जीवन-मूल्य है। जीवन-वास्तव है; कोरा काल्पनिक नहीं। माना नैतिक मूल्य सर्वकालिक-सर्वदेशीय नहीं होते। वे बदलते भी रहते हैं। लेकिन मनुष्य का पशु-धरातल पर उतर आना या उससे भे अधिक निकृष्ट बन जाना मानवता को स्वीकार्य नहीं। माना, पूर्व में ही नहीं, आज भी नैतिक गिरावट का बाज़ार गर्म है। शायद, वैज्ञानिक और प्राविधिक विकास के फलस्वरूप पूर्व से भी अधिक। प्रेम और वासना का द्वन्द्व कभी समाप्त होने वाला नहीं। पर, इस सारे माहौल को देख कर हार नहीं मानना है।

मेरे काव्य में जो प्रणय-स्वर हैं; वे ‘स्वकीया’ या किसी काल्पनिक के प्रति हैं। उनकी अभिव्यक्ति संतुलित है। उनके भाव स्वस्थ हैं। प्रणय, समाज अर्थात सामाजिक समस्याओं के प्रति हमें विमुख नहीं करता। वह नितान्त ऐकान्तिक नहीं होता। ऐसा प्रणय-भाव तो सुरा-प्रेमियों के रचना-कर्म में बहुतायत से देखने को मिलता है µ देश में; विदेश में। पत्नी या प्रेमिका बहुत बड़ी जीवन-शक्ति होती है। वह मात्रा विलासिनी नहीं।

प्रेम का जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। संसार का अधिकांश काव्य-साहित्य प्रेम-परक है। यौवन-काल में मेरा भी प्रेम-भाव से सिक्त रहना स्वाभाविक था। अतः मैंने भी जब-तब प्रेम-कविताएँ लिखीं। चूँकि मेरी ख्याति एक प्रगतिशील कवि के रूप में रही; मैं सामाजिक यथार्थ का घोषित कवि रहा; अतः अपनी प्रेम-कविताओं को उजागर करने में मुझे सदैव संकोच रहा। सात संकलन प्रकाशित हो जाने के बाद, मेरी प्रेम-परक कविताओं का संकलन ‘मधुरिमा’ प्रकाशित हुआ; जिसके प्रारम्भिक वक्तव्य में प्रेम के सनातन महत्त्व, उसके स्वस्थ स्वरूप और उसकी उपादेयता पर लिखा। ‘‘ ‘मधुरिमा’ के गीत वैयक्तिक जीवन से संबंध रखते हैं। वैयक्तिकता जीवन का महत्त्वपूर्ण पहलू है। मनुष्य का जीवन व्यष्टि और समष्टि की परिधि में आबद्ध है। पर, वैयक्तिकता, सामाजिक पक्ष के समान उपादेय नहीं मानी जा सकती और एकांत वैयक्तिकता तो समाज-विरोधी तत्त्व ही समझी जाएगी। ऐसी स्थिति में वैयक्तिक भावनाओं की अभिव्यक्ति की एक सीमा होती है; उसका अतिक्रमण सामाजिक दृष्टि से वांछनीय नहीं। इस कारण, वैयक्तिक जीवन की प्रत्येक अनुभूति को काव्य में नहीं उतारा जाना चाहिए। यदि अनुभूतियों की कहीं अनपेक्षित अभिव्यक्ति दिखायी दे तो उसे भावातिरेक की अवस्था ही नहीं, कवि की दुर्बलता भी समझी जाए।

जीवन में प्रेम और प्रणय का महत्त्वपूर्ण स्थान है, माना कि प्रेम और प्रणय ही सब-कुछ नहीं है। एक अवस्था-विशेष पर प्रेम और प्रणय की भावनाएँ प्रत्येक के मानस पर छा जाती हैं - यह तथ्य मनु और श्रद्धा से लेकर आज-तक और भविष्य में प्रलय-काल तक कहीं भी झुठलाया नहीं जा सकता। प्रेम और प्रणय की भावनाएँ अपने स्वस्थ रूप में व्यक्ति और समाज के लिए शिव हैं। ‘मधुरिमा’ के गीतों से यदि भावुक और स्वस्थ व्यक्तियों के हृदय सहज तादात्म्य स्थापित करते हैं तो उनकी उपादेयता स्वयं-सिद्ध है। जहाँ तक मेरा संबंध है, मुझे इन गीतों से मोह भी है और विरक्ति भी।’’ इस स्पष्टीकरण को आलोचकों ने ग़ैर-ज़रूरी ठहराया। मेरी प्रेम-कविताओं में ‘चाँद’ प्रेमिका का प्रतीक है। समस्त प्रेम-कविताओं (109) का विशिष्ट संकलन ‘चाँद, मेरे प्यार!’ अभिधान से इधर प्रकाशित हुआ है। मेरी प्रेम-भावनाएँ किसी कल्पित प्रेमिका या स्वकीया को समर्पित हैं। शृंगार-प्रधान इन गीतों में मांसलता या वासना नहीं; स्वस्थ प्रेमोद्गार अभिव्यक्त हुए हैं।

चौथी प्रकार की कविताएँ प्रकृतिपरक हैं। मनुष्य स्वयं प्रकृति का एक हिस्सा है। माँ के गर्भ से बाहर आते हीय मनुष्य प्रकृति की गोद में पहुँच जाता है। प्रकाश, ताप, हवा, जल, ध्वनि, रंग आदि सबका परिज्ञान उसे होता है। प्रकृति उसे प्रभावित करती है। नाना वस्तुएँ वह देखता है। चाँद, तारे, उषा, वृक्ष, पौधे, घास, फूल, तितली, जुगुनू, वर्षा, आँधी-तूफ़ान, विद्युत, इंद्रधनुष, बीरबहूटी, नदी-नाले, पर्वत, पक्षी, जलचर आदि के साथ वह अपना जीवन जीता है। प्रकृति के मनोरम और भीषण - दोनों प्रकार के दृदृश्यों का प्रभाव उसके तन-मन पर पड़ता है। अतः कविता में प्रकृति का अवतरित होना स्वाभाविक है। प्रकृति-काव्य की भले ही कोई उपयोगिता न हो; किन्तु वह हमारी सौन्दर्य-दृष्टि का परिचायक होता है। यह सौन्दर्य-दृष्टि मात्र मनुष्य के पास है; तथा जिसका वह चित्राण करना भी जानता है। कितने भी समुन्नत कैमरे बन जाएँ; कवि द्वारा उरेहे गये चित्रों से उनकी तुलना नहीं हो सकती। कवि के प्रकृति-चित्राण में मात्रा प्रकृति नहीं होती; रचनाकार की अपनी सौन्दर्य-दृष्टि और अनुभूतियाँ भी होती हैं। ईश्वर की तरह वह भी प्रकृति-स्रष्टा होता है - अक्षरों में; रंगों-रेखाओं में।

मेरी काव्य-सृष्टि में मार्क्सवाद और गांधीवाद दोनों की पृष्ठभूमि स्पष्ट दिखायी देगी। यह कोई अन्तर्विरोध या असंगति नहीं है। सिद्धान्तों की व्याख्या सदा अक्षुण्य बनी रहे; ऐसा कभी हो नहीं सकता। अन्यों के विचारों को समझने और उन्हें आत्मसात करने की हममें भरपूर लचक होनी चाहिए। यही विचार-स्वातंत्रय है। जहाँ जो श्रेष्ठ और उत्तम है; उसे ग्रहण करने में ही बुद्धिमानी है। हमारी दृष्टि जितनी पारदर्शी होगी उतनी ही अधिक सचाई हमें प्रकट होगी। अतः मार्क्सवादियों को गांधीवाद से परहेज़ नहीं करना चाहिए तथा गांधीवादियों को मार्क्स के चिन्तन का पूरा लाभ उठाना चाहिए। वैज्ञानिक एवं यांत्रिकी उपलब्धियों के फलस्वरूप भविष्य में हमारी धारणाएँ भी बदलेंगी। मार्क्सवाद-गांधीवाद में जो प्रासंगिक होगा; वह अवश्य बना रहेगा।

वस्तुतः मार्क्सवाद और गांधीवाद एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन राजनीतिक विचारकों ने उन्हें परस्पर विरोधी प्रचलित कर रखा है। गांधीवाद व्यक्ति का जीवन-दर्शन है; मार्क्सवाद समाजार्थिक मूल्यों पर आधारित है। दोनों में गुण हैं; दोनों की उपादेयता है। दोनों की प्रासंगिकता है। आगे चलकर इन दोनों दर्शनों का यदि विकास होता है तो उनके स्वरूप में परिवर्तन अवश्य होगा। कोई भी विचारणा स्थिर नहीं रहती। समय और परिस्थितियों के अनुरूप उसमें नवीन विचारों का समावेश होता है। पूर्व मान्यताओं-स्थापनाओं को अपरिवर्तनीय मान लेना; हमारे जड़ चिन्तन का प्रमाण है।

मेरा जन्म निम्न-मध्य-वर्गीय परिवार में हुआ। पिता जी अल्प-वेतन-भोगी अध्यापक थे। परिवार में माता-पिता, चार भाई और दो बहन। बड़ी ग़रीबी में बचपन बीता। बी. ए. (1945) करने के बाद, मुझे भी अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। मेरा भी अधिकांश सेवा-काल अल्प वेतन का रहा। एक अत्यधिक निर्धन परिवार की कन्या से विवाह (1952) हुआ। तीन पुत्रा हैं। एक डाक्टर, दूसरा बैंक ब्रांच मैनेजर, तीसरा पार्श्व-गायक। ग़रीबी क्या होती है; इसका बड़ कटु अनुभव हुआ। मेरे काव्य में जो आक्रोश और विद्रोह-भाव है; उसका कारण मेरा व्यक्तिगत जीवन है। उच्चतम शिक्षा प्राप्त होने से (पिता जी इतिहास विषय में एम. ए. थे) हमारे परिवार को दलित तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु आर्थिक विपन्नता सदा बनी रही। स्वातंत्रयोत्तर भारत में सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतनमान कुछ सुधरे। कॉलेज-प्रोफ़ेसर पद से 1 जुलाई 1984 को अल्प-पेंशन पर, 58 वर्ष की उम्र पर, सेवानिवृत्त हुआ। इधर, 84 वर्ष की उम्र में पेंशन-पुनरीक्षणों के फलस्वरूप पर्याप्त पेंशन-वृद्धि ज़रूर हुई। कहने का आशय यही है कि मेरे काव्य का प्रगतिवादी-जनवादी स्वर मेरी स्वयं की ज़िन्दगी से मुखर हुआ है। हर कोई सर्वकालिक लेखक व रचनाकार नहीं होता। आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जिस काम से रोटी-रोज़ी चलती है; उस काम को प्राथमिकता देनी पड़ती है। वहाँ शिथिलता नहीं बरती जा सकती। प्राध्यापक रहा। अधिकांश समय महाविद्यालयों में गुज़रा व अध्यापन एवं अन्य दायित्वों के निर्वाह में। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ रहीं। स्वयं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना पड़ा। सामाजिकता की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। गरज़ यह कि लेखन-कर्म को अधिक समय नहीं मिल पाता। रात-रात भर जगकर पढ़ना-लिखना स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाना है। माना कि अनेक लेखक ऐसा करते हैं। जहाँ तक मेरा संबंध है, लेखन में सर्वाधिक बाधाएँ पारिवारिक परेशानियों के कारण आयीं। त्रास्त मनःस्थितियों में सुचारू रूप से पढ़ना-लिखना सम्भव नहीं। लेकिन लिखने व रचना करने के लिए अवकाश-सुविधा के अतिरिक्त, मन भी बनाना पड़ता है। किसी आन्तरिक प्रेरणावश लघु-विस्तारी कविता-सृष्टि करना अवश्य सहज है। मेरी प्रमुख विधा कविता ही रही। काव्य-रचना मेरे लिए यातना से गुज़रना नहीं है। रचना-सृष्टि के पश्चात अपूर्व तोष की अनुभूति होती है।

मेरी कविताओं में मानव-धर्म तथा जीवन-जगत् के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण अवश्य परिलक्षित है। हमने तो बचपन से ही, तथाकथित धर्म का विकृत रूप देखा। किसी धार्मिक सम्प्रदाय के प्रति कभी आस्थावान नहीं रहा मैं। पिता जी ‘आर्यसमाज’ अध्यात्म के नाम पर किस प्रकार धर्म-प्रवण व ईश्वर-भीरु जनता को ठगा जाता है, यह हमने ख़ूब देखा है; देख रहे हैं। धर्म के भ्रष्ट स्वरूप एवं पुरोहितों के छद्म पर मैंने खुलकर लिखा है।

व्यंग्य बड़ी सशक्त और प्रभावी शब्द-शक्ति है। व्यक्ति और समाज की विरूपताओं को व्यंग्य-द्वारा जब तटस्थ-भाव से निरावृत्त किया जाता है; तब वह कथन मारक सिद्ध होता है। व्यंग्य इसीलिए व्यक्ति और समाज का सुधारक होता है। मेरी काव्य-सृष्टि में व्यंग्य यत्रा-तत्रा आपको उपलब्ध होगा। कुछ कविताएँ तो व्यंग्य-कविताएँ ही हैं। पर, व्यंग्य मेरी काव्य-रचना की प्रमुख विशेषता नहीं है। समीक्षकों ने अभी मेरी व्यंग्योक्तियों पर विमर्श भी नहीं किया है। वस्तुतः व्यंग्य करना मेरा स्वभाव है नहीं। मेरे भावों-विचारों की बेलाग-बेलौस अभिव्यक्तियाँ ही सशक्त-समर्थ हथियारों का काम करती हैं।

मैं समाजार्थिक चेतना-सम्पन्न एक आस्थावान कवि ‘जीवन-त्रासदी का गायक’ समानान्तर मौजूद रहा; देखकर आज आश्चर्यचकित हूँ! यह-सब कैसे हो गया! जीवन में बहुत मानसिक कष्ट झेले, शायद, उनकी अनायास स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति। लिखकर हृदय का बोझ हलका करता रहा। व्यक्तिगत अनुभूतियाँ अंतर-मन का यथार्थ नहीं है क्या? मेरी कविताओं में अभिव्यंजित वेदना और निराशा जीवन का यथार्थ है। इसमें सब्जेक्टीविटी ज़रूर है; किन्तु यह यथार्थ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सम्पृक्त है:

ज़िन्दगी - वीरान मरघट-सी,

ज़िन्दगी - अभिशप्त बोझिल और एकाकी महावट-सी !

ज़िन्दगी - मनहूसियत का दूसरा है नाम,

ज़िन्दगी - जन्मान्तरों के अशुभ पापों का दुखद परिणाम !

ज़िन्दगी - दोपहर की चिलचिलाती धूप का अहसास,

ज़िन्दगी - कंठ-चुभती सूचियों का बोध तीखी प्यास !

ज़िन्दगी - ठहराव, साधन-हीन, रिसता घाव

ज़िन्दगी - अनचहा संन्यास, मात्रा तनाव !

(‘निष्कर्ष’ - ‘जूझते हुए’)

ऐसे अनुभवों का संबंध उम्र से नहीं होता। हाँ, जीवन-संध्या में व्यक्ति वर्तमान के साथ अतीत पर भी नज़र डालता है। मैंने सहज भाव से अपनी निराशा-हताशा को अभिव्यंजित किया है, क्योंकि वह एक सचाई है। मैं जब-जब टूटा hhहूँ, सताया गया हूँ, विश्वास-खंडित हुआ हूँ तो मन-ही-मन रोया हूँ। मेरी कविता में जो दर्द है वह मेरे जीवन-अनुभव का हिस्सा है:

ज़िन्दगी जब दर्द है तो

हर दर्द सहने के लिए मजबूर हैं हम !

राज़ है यह ज़िन्दगी जब

खामोश रहने के लिए मजबूर हैं हम !

है न जब कोई किनारा

तो सिर्फ़ बहने के लिए मजबूर हैं हम !

ज़िन्दगी यदि ज़लज़ला है

तो टूट ढहने के लिए मजबूर हैं हम !

आग में जब घिर गये हैं

अविराम दहने के लिए मजबूर हैं हम !

सत्य कितना है भयावह !

हर झूठ कहने के लिए मजबूर हैं हम !

(‘मजबूर’ - ‘आहत युग’)

बनावटी ज़िन्दगी मैंने कभी नहीं जी। मन को प्रबोध दिया; किन्तु हृदय को रुग्ण नहीं होने दिया। सामाजिकता से मेरा नाता कभी टूटा नहीं:

हृदय में दर्द है तो मुसकुराओ !

दर्द यदि अभिव्यक्त -

मुख पर एक हलकी-सी शिकन के रूप में भी,

या सजगता की तनिक पहचान से उभरे

दमन के रूप में भी,

निंद्य है ! धिक् है ! स्खलित पौरुष्य !

उर में वेदना है तो सहज कुछ इस तरह गाओ

कि अनुमिति तक न हो उसकी किसी को !

सिक्त मधुजा कण्ठ से उल्लास गाओ !

पीत पतझर की तनिक भी खड़खड़ाहट हो नहीं

मधुमास गाओ !

सिसकियों को तलघरों में बन्द कर

नव नूपुरों की गूँजती झनकार गाओ !

शून्य जीवन की व्यथा-बोझिल उदासी भूलकर

अविराम हँसती गहगहाती ज़िन्दगी गाओ !

महत् वरदान-सा जो प्राप्त वह अनमोल

जीवन-गंधमादन से महकता प्यार गाओ !

यदि हृदय में दर्द है तो मुसकराओ !

दूधिया सितप्रभ रुपहली ज्योत्स्ना भर मुसकुराओ !

(‘संवर्त’ - ‘वेदना: एक दृष्टिकोण’)

आज इस उम्र में संन्यास-भाव जागता ज़रूर है; किन्तु वह मुझ पर अभी हावी नहीं हुआ है।

आस्था-आशा-विश्वास के स्वर मेरे काव्य में प्रमुखता से इसलिए ध्वनित हैं क्योंकि मैं इंसानियत पर भरोसा करता हूँ। मेरा सोच सकारात्मक है। मनुष्य में पशुता एक दिन अवश्य समाप्त होगी। माना कि वर्तमान यथार्थ हमें जब-तब हतोत्साहित करता है। मुझमें यह भावना स्वयं उत्पन्न है; आरोपित नहीं।

साहित्य, कविता, कला के प्रति मेरा दृष्टिकोण समाज-सापेक्ष है। कविता मेरे लिए न चमत्कार है; न वाणी-विलास:

आदमी को आदमी से जोड़ने वाली,

क्रूर हिंसक भावनाओं की

उमड़ती आँधियों को मोड़ने वाली,

उनके प्रखर अंधे वेग को - आवेग को

बढ़ तोड़ने वाली सबल कविता -

ऋचा है, / इबादत है !

आदमी को आदमी से प्यार हो,

विश्व ही उसका निजी परिवार हो !

हमारी यह बहुमूल्य वैचारिक विरासत है !

महत् इस मानसिकता से रची कविता -

ऋचा है, इबादत है !

(‘कविता-प्रार्थना’ - ‘जीने के लिए’)

तुकों का करतब दिखाने वाली तथाकथित कविताओं से मनोरंजन हो सकता है; किन्तु वे न तो मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन कर सकती हैं; न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन में कोई भूमिका ही निभा सकती हैं। कविता यदि मानव हृदय और मस्तिष्क को विशाल व उदार बनाने में सहायक नहीं होती तो उसकी क्या उपादेयता! ‘कला-साधना’ का उद्देश्य मैंने इस प्रकार निरूपित किया है:

हर हृदय में स्नेह की दो बूँद ढल जाएँ

कला की साधना है इसलिए !

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गीत गाओ - मोम में पाषाण बदलेगा,

तप्त मरुथल में - तरल रस ज्वार मचलेगा !

गीत गाओ - शांत झंझावात होगा,

रात का साया सुनहरा प्रात होगा !

गीत गाओ - मृत्यु की सुनसान घाटी में

नया जीवन-विहंगम चहचहाएगा !

मूक रोदन भी चकित हो ज्योत्स्ना-सा मुसकराएगा !

हर हृदय में जगमगाए दीप,

महके मधु-सुरिभ चंदन

कला की अर्चना है इसलिए !

गीत गाओ स्वर्ग से सुंदर धरा होगी,

दूर मानव से जरा होगी,

देव होगा नर व नारी अप्सरा होगी !

गीत गाओ त्रस्त जीवन में सरस मधुमास आ जाए,

डाल पर, हर फूल पर उल्लास छा जाए !

पुतलियों को स्वप्न की सौगात आए !

गीत गाओ विश्व-व्यापी तार पर झंकार कर !

प्रत्येक मानस डोल जाए प्यार के अनमोल स्वर पर !

हर मनुज में बोध हो सौन्दर्य का जाग्रत

कला की कामना है इसलिए !

(‘कला-साधना’ ‘संतरण’)

हम गाते हैं; आत्मीय शांति के लिए; विश्व-मानव-समाज के सौहार्द के

लिए:

गाओ कि जीवन गीत बन जाए !

हर क़दम पर आदमी मजबूर है,

हर रुपहला प्यार-सपना चूर है,

आँसुओं के सिन्धु में डूबा हुआ

आस-सूरज दूर, बेहद दूर है,

गाओ कि कण-कण मीत बन जाए !

हर तरफ़ छाया अँधेरा है घना,

हर हृदय हत, वेदना से है सना,

संकटों का मूक साया उम्र भर

क्या रहेगा शीश पर यों ही बना ?

गाओ, पराजय - जीत बन जाए !

साँस पर छायी विवशता की घुटन

जल रही है ज़िन्दगी भर कर जलन

विष भरे घन-रज कणों से है भरा

आदमी की चाहनाओं का गगन,

गाओ कि दुख संगीत बन जाए !

(‘गाओ’ - ‘संतरण’)

कविता और कला मनुष्य में उच्चतर मानव-मूल्यों की स्थापना कर; उसे विकास की ऊँचाइयों पर ले जाती है। वह यदि लोकमंगलकारी नहीं तो मात्रा लफ़्फ़ाज़ी है और कवि-सम्मेलन कोरा तमाशा! कविता हमारे सुख-दुख से सम्पृक्त है। निराशा-हताशा में वह हममें आशा और विश्वास जगाती है। मांगलिक अवसरों पर वह हमें हर्ष-विभोर कर देती है। हमें ईश्वर का आभारी होना चाहिए कि उसने हमारे बीच कवि को जन्म दिया जिससे हमारी ज़िन्दगी स्वस्थ भावों-विचारों-कल्पनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति से गुंजित हो सकी!

धर्म नैतिक मूल्यों से सम्बद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का निर्वाह करना ही चाहिए। सामाजिक स्वास्थ्य के लिए यह अनिवार्य है। अन्यथा मनुष्यों की दुनिया और पशुओं की दुनिया में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। धर्म को ईश्वर से जोड़ने में कोई हानि नहीं है। क्योंकि जब-तक मृत्यु का रहस्य वैज्ञानिक खोज नहीं लेते; ईश्वर का अस्तित्व बना रहेगा। लेकिन धर्म जब सम्प्रदायों और बाह्य आडम्बरों में फँस जाता है तब दूषित हो जाता है। बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक प्रगति के बावज़ूद बाह्य आडम्बरों का त्याग मानव-समुदाय नहीं कर पा रहा है। साम्प्रदायिक वैमनस्य भी सर्वत्रा बढ़ रहा है। आज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य ‘सर्व-धर्म-समभाव’ (सेक्यूलरिज़्म) है; जिसे अपना कर विश्व सुख और शांन्ति से जी सकेगा।

वर्तमान में सबसे भ्रष्ट यदि कोई संस्था है तो वह राजनीति है। माना राज-संचालन के लिए राजनीति अनिवार्य है। अब राजा-महाराजाओं का समय नहीं रहा। आज जनता स्वयं अपने भाग्य की निर्माता है। लेकिन राजनीति करने वाले समृद्ध नेता और उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक दल जनता के प्रति खुलकर खिलवाड़ कर रहे हैं। जनता जाति, धर्म, भाषा के नाम पर बरगलायी जा रही है। धन और पद के प्रलोभनों से शिक्षित जन भी आसानी से ख़रीद लिए जाते हैं। जो अधिकारी और पूँजीपति सत्ताधरियों के काले कारनामों में सहयोग करते हैं; उन्हें राज की ओर से प्रश्रय मिलता है। मात्रा न्यायपालिका से कुछ उम्मीद शेष है; लेकिन असाधरण विलम्ब से न्याय मिलने के कारण सब निरर्थक सिद्ध होता है।

भारत का वर्तमान प्रशासनिक परिदृश्य विश्व के अनेक देशों की तुलना में बेहतर है। संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार शासन चल रहा है। न्यायपालिका भी विश्वसनीय है। लोकतंत्रा की बुनियादी शर्त - समय पर निर्वाचन - का पालन हो रहा है। अतः भारत में लोकतंत्रा को कोई ख़तरा नहीं है। हाँ, भारत में मौज़ूदा राजनीतिक दल पर्याप्त दूषित, भ्रष्ट और घटिया हैं। मतदाताओं की मानसिकता धर्म, सम्प्रदाय और जातिवाद के शिकंजे से अभी मुक्त नहीं हुई है। प्रांत और भाषा का दुष्प्रभाव अवश्य इतना अधिक नज़र नहीं आता है। भले ही, एकाधिक अंचल में प्रांत और भाषा के नाम पर क्रूर हिंसक घटनाएँ जब-तब घटित हो जाती हैं। देश का बहुसंख्यक समाज साम्प्रदायिकता के विरुद्ध है। धर्म-निरपेक्षता की भावना उसमें प्रबल है। भारत सामासिक संस्कृति का देश है। अनेक धर्मों और भाषाओं के बीच भावनात्मक एकता का मज़बूत सेतु भारत की शक्ति और स्थिरता का परिचायक है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मैं क़ायल हूँ। मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं भारत में जन्मा। गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और विवेकानंद की करुणा, अहिंसा और प्रगतिशीलता ने मेरे हृदय और मस्तिष्क की रचना की है। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ मेरा अभिप्रेत है। धर्म-निरपेक्षता (सेक्यूलरिज़्म) को सबसे बड़ा मानवीय मूल्य मानता हूँ। पीड़ित मानवता की सेवा करना अपना धर्म समझता हूँ। एक बेहतर दुनिया देखने की मेरी हार्दिक लालसा है। यह स्वप्न भले ही मेरे जीवन-काल में पूर्ण न हो; किन्तु यह विश्वास मेरी अन्तिम श्वास तक जीवन्त रहेगा।

- महेंद्रभटनागर

110, BALWANT NAGAR, GANDHI ROAD, GWALIOR – 474002 [M.P.]

M-81 097 300 48 / 0751-4092908

E-Mail : drmahendra02@gmail.com

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