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चिटफंड कंपनियों के शिकंजे में निवेशक / अनुज कुमार आचार्य


इन दिनों चिटफंड कंपनियों के हाथों बेतरह लुटे-पिटे निवेशकों की बेचैनी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है तो वहीं इन कंपनियों के ऐजेन्ट अपना चेहरा छुपाते फिर रहे हैं। सी.बी.आई, सेबी और उच्चतम न्यायालय की चिटफंड, पोंजी स्कीमों, बहुस्तरीय विपणन (एम.एल.एम.), मनी सर्कुलेशन और पिरामिड आकार वाली गैर बैंकिंग फाइनांस कंपनियों पर सख्ती और रूपयों की वापसी में हो रही देरी से पी.ए.सी.एल. लिमिटेड, सहारा ग्रुप एवं पश्चिम बंगाल की शारदा ग्रुप जैसी कंपनियों के निवेशकों और ऐजेन्टों में व्यापक असंतोष है।

मजे की बात यह भी है कि हाल ही में भारतीय बैंकिंग तंत्र के बड़े बैंक जहां भारी घाटा दिखा रहे हैं तो वहीं पी.ए.सी.एल. और सहारा ग्रुप की परिसम्पत्तियां अरबों रूपयों में आंकी गई हैं और करोड़ों भारतीय निवेशक अपने अरबों रूपयों की वापसी की बाट जोह रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के मेहनतकश लोग जहां अपनी बचत का अधिकांश भाग बैंकों और डाकघर की बचत योजनाओं में लगाते हैं वहीं कईयों ने करोड़ों रूपया सहारा एवं पी.ए.सी.एल. ग्रुप की स्कीमों में भी लगा रखा है। हिमाचल में भी पी.ए.सी.एल. के धर्मशाला, मण्डी, सोलन, चम्बा, ज्वाली और ऊना स्थित दफ्तरों में रूपया जमा किया जाता रहा है। जबकि 2010-11 की अवधि में पूरे भारतवर्ष में पर्ल ग्रुप के कुल 276 कार्यालयों द्वारा व्यापक स्तर पर भूखंड आबंटित करने के नाम पर रूपये इक्ट्ठे किए जा रहे थे।

पिछले कई वर्षों से अपना कारोबार चला रहीं इन गैर बैंकिंग वित्तिय कंपनियों पर नियामक संस्थानों सेबी और रिजर्व बैंक आफ इंडिया सहित उच्चतम न्यायालय की वक्र दृष्टि के चलते अब इन कंपनियों की सम्पत्तियों की नीलामी की नौबत आन पड़ी है ताकि निवेशकों का रूपया लौटाया जा सके। एक तरफ सहारा ग्रुप के चैयरमेन सुब्रत राय 2 वर्ष तिहाड़ जेल में बिताने के बाद अपनी माताश्री के देहांत की वजह से पैरोल पर धूम रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ सेबी द्वारा उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनुपालना के बाद सहारा समूह की 722 करोड़ रूपयों की संपत्तियों की नीलामी चार जुलाई 2016 को होने जा रही है।

इसी तरह जमीन की खरीद-फरोख्त के व्यवसाय के नाम पर निवेशकों का अरबों रूपया डकारने वाले पी.ए.सी.एल. (पर्ल ग्रुप) के चैयरमेन निर्मल सिंह भंगू, एम.डी. सुखदेव सिंह, डायरेक्टर गुरमीत सिंह और सुब्रता भट्टाचार्या अभी भी तिहाड़ जेल में बंद हैं। उच्चतम न्यायालय के 2 फरवरी 2016 के आदेशों के बाद बाज़ार नियामक संस्था सेबी ने निवेशकों का 49 हजार 100 करोड़ रूपया वापस लौटाने के दृष्टिगत जहां पी.ए.सी.एल. समूह के सभी खातों को सीज़ कर दिया है वहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में पर्ल एग्रोटेक कारपोरेशन लिमिटेड की सम्पत्तियों एवं जमीनों की नीलामी से प्राप्त होने वाली राशि को निवेशकों को वापस लौटाने के मद्देनजर एक समिति का गठन भी किया गया है। जिसमें न्यायमूर्ति एस. रमन और सेबी के चीफ जनरल मैनेजर अमित प्रधान शामिल हैं। इसके अतिरिक्त सेबी ने अपने डिप्टी जनरल मैनेजर राकेश कुमार सिंह को इस समिति का नोडल इंचार्ज कम सेक्रेटरी बनाया है जो उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों के अनुरूप सभी प्रकार के फंड की निगरानी करेंगे।

दिव्य हिमाचल के प्रबुद्ध पाठकों की जानकारी के लिए यहां यह बताना भी जरूरी है कि बैंक और एन.बी.एफ.सी. के बीच में क्या अंतर है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का संचालन  कंपनी एक्ट 1956 के तहत होता है और आर.बी.आई. के साथ-साथ इनका पंजीकरण कंपनी अधिनियम की धारा 609 के तहत नियुक्त कंपनी रजिस्ट्रार (आर.ओ.सी.) जिसके अंतर्गत विभिन्न राज्य और संघ राज्य क्षेत्र आते हैं के पास करवाया जाता है। जबकि बैंकों का संचालन बैंकिंग अधिनियम 1949 के तहत होता है। बैंकों में आम जनता के साथ मौद्रिक लेन-देन का दायरा व्यापक होता है जबकि एन.बी.एफ.सी. छोटे बचतकत्र्ताओं से डिमांड डिपोजिट स्वीकार नहीं कर सकते हैं। इसी तरह एन.बी.एफ.सी. न तो अचल संपतियों के निर्माण में निवेश कर सकती हैं और न ही ये प्राथमिक रूप से कृषि या औद्योगिक गतिविधियों में शामिल हो सकती हैं। जबकि बैंक कृषि एवं उद्योग दोनों क्षेत्रों की वित्त संबंधी जरूरतों की पूर्ति करने के लिए अधिकृत हैं।

कंपनियों को सामूहिक निवेश योजनाओं (सी.आई.एस.) मनी सर्कुलेशन, एम.एल.एम., पोंजी स्कीमों, लकड़ी, भेड़-बकरियों, पशुपालन, ऐमू पालन एवं कृषि कार्यों इत्यादि से धन स्वीकार करने की अनुमति नहीं है और प्राइज चिट और मनी सर्कुलेशन एक्ट-1978 के अंतर्गत एक संज्ञेय अपराध है और इस अधिनियम के प्रावधानों के उल्लघंन पर निगरानी और आवश्यक कानूनी काररवाई राज्य सरकारों द्वारा की जा सकती है। मनी सर्कुलेशन, एम.एल.एम. (बहुस्तरीय विपणन), पोंजी स्कीम ऐसी योजनाएं हैं जो सदस्यों को नामंकित होने पर आसान या त्वरित धन वापसी का वादा करती हैं।

अमूमन इन स्कीमों से उत्पादों की ज्यादा बिक्री नहीं होती है लिहाजा पिरामिड श्रृंखला टूट जाती है और पिरामिड से जुड़ा सबसे निचला सदस्य अधिकतम प्रभावित होता है चूंकि रिटर्न एवं एकत्रित धन राशि का दुरूपयोग एवं अन्यत्र निवेश भी प्रवर्तकों द्वारा किया जाता है, लिहाजा निवेशक को मूल राशि लौटा पाना असंभव हो जाता है और अपराधकत्र्ता धन लेकर भाग जाते हैं। ऐसे मामलों में जहां निवेशकों का जागरूक होना जरूरी है वहीं राज्य एवं केन्द्र सरकार की विभिन्न एजेंसियों की सक्रियता के अलावा, सेबी जैसी नियामक संस्थाओं से समय रहते ऐसी कंपनियों के विरूद्ध सख्त कानूनी काररवाई से भी आम नागरिकों का गाढ़ी कमाई को लुटने से रोका जा सकता है। अब विभिन्न निवेशकों को पी.ए.सी.एल. मामले में न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा समिति की अगस्त 2016 तक अपनी रिर्पोट सौंपने और धन वापसी का इंतजार है।
                 
       
अनुज कुमार आचार्य
बैजनाथ

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