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चुटकुले / डॉ. रामवृक्ष सिंह

यदि चुटकुला शब्द का विग्रह करें तो उसके दो हिस्से बनेंगे- चुट+ कुला। इनमें पहला हिस्सा इस शब्द की प्रकृति को लगभग पूरी तरह उजागर करता है, उसकी विशेषता बता देता है। चुट यानी चुटीला, जिसका रसास्वादन करके थोड़ी देर के लिए मन में गुदगुदी हो जाए, प्रफुल्लता आ जाए, हँसी छूट पड़े और यदि चुटीलापन अधिक हो तो बाद में भी उसका स्मरण होने पर होंठों पर मुस्कान उभर आए। जो चुटकुला जितना चुटीला होता है, उसका स्वाद उतनी ही देर तक मन में बना रहता है।

चुटकुले शायद उतने ही पुराने होंगे जितनी पुरानी हमारी मनोरंजन की अवधारणा है। मेरा अनुमान है कि चुटकुले हर भाषा में होते होंगे, किसी में कम तो किसी में अधिक। अंग्रेजी और भारत की अन्य भाषाओं में तो होते हैं- मुझे पक्का पता है। एक थंब-रूल है- जो समाज जितना विनोद-प्रिय होगा, उसमें चुटकुले भी उतने ही अधिक होंगे। हो सकता है किसी शोधार्थी ने इस विषय की आद्योपान्त मीमांसा की हो और कोई शोध-ग्रंथ भी इस पर आया हो। यदि नहीं आया तो हमें लगता है कि आना चाहिए। यह समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, भाषा व साहित्य- सभी विधाओं का शोध-विषय बन सकता है।

पारंपरिक रूप से देखें तो चुटकुले में भाषा का सौष्ठव अधिक मायने नहीं रखता। कई-कई बार तो विषयवस्तु भी अधिक मायने नहीं रखती। चुटकुले में सबसे ज्यादा मायनीखेज़ तत्व है उसकी बयानी, अंदाज़-ए-बयां। कई बार बहुत मजेदार होने पर भी यदि सुनानेवाला ठीक लहज़े में और ठीक शैली में, शब्दों के तान-अनुतान, उतार-चढ़ाव और यथोचित आंगिक अभिनय के साथ चुटकुला नहीं सुनाता तो सारा मज़ा जाता रहता है। वहीं बहुत सामान्य से चुटकुले में अच्छा सुनानेवाला अपनी अभिव्यक्ति-शैली का ऐसा चमत्कार पैदा करता है कि चुटकुला बड़ा मज़ेदार बन जाता है। इस लिहाज से, पारंपरिक रूप से चुटकुले का प्राण-तत्व रहा है उसे सुनाने का तरीका। इसका अभिप्राय यह नहीं कि चुटकुले में विषयवस्तु का कोई महत्त्व नहीं। यदि विषयवस्तु ही नहीं होगी तो चुटकुला बनेगा कैसे? यानी विषयवस्तु चुटकुले की देहयष्टि है, उसका शरीर है। इसे रचने के लिए भाषा का इस्तेमाल होता है। इस लिहाज़ से भाषा वह परिधान है, वस्त्र है जिसे पहनकर चुटकुला देखने योग्य हो जाता है।

किन्तु अब इस अवधारणा में बदलाव करने का वक्त आ गया है। अब चुटकुले कहने-सुनने का लोगों के पास न वक्त है, न अवसर। अब तो चुटकुले एसएमएस अथवा वॉट्सऐप किए जाते हैं। ऐसे वॉट्सऐप किए गए चुटकुलों को ही यार-दोस्त आपस में कह-सुन लेते हैं और उनपर हँस लेते हैं। सच कहें तो आज की भागम-भाग भरी जिन्दगी में चुटकुला कहना-सुनना दूभर हो गया है। इसलिए अब चुटकुलों के लिखित रूप का ही अधिक प्राधान्य है। और इस नाते उनकी कथन-शैली, भाषा आदि का महत्त्व अब अपेक्षाकृत बढ़ गया है।

सवाल यह है कि चुटकुले तैयार कैसे होते हैं? कोई बहुत-ही मज़ेदार संदर्भ हो, बड़ा ही गुदगुदानेवाला, हास्यास्पद प्रसंग हो तो उसके चारों ओर एक भाषिक ताना-बाना बुनकर चुटकुला तैयार हो जाता है। ये प्रसंग काल्पनिक भी हो सकते हैं और वास्तविक भी। आनन्द अथवा मज़े की हर व्यक्ति की अलग-अलग परिभाषा हो सकती है। इसीलिए कई बार जब कोई व्यक्ति चुटकुला सुनाता है तो पता ही नहीं चलता कि उसमें हँसने का अवसर कहाँ था। ऐसे चुटकुले पर जब हँसी नहीं छुटती तो सुननेवाले व्यक्ति हास्य का तत्व पैदा करने के लिए मजे लेते हुए पूछ लेते हैं- चुटकुला खत्म हो गया क्या?

इस लिहाज़ से चुटकुला बहुत-ही व्यक्ति-सापेक्ष होता है। बच्चों के चुटकुले अलग तरह के होते हैं, बड़ों के अलग। पुरुषों के चुटकुले अलग होते हैं, महिलाओं के अलग। चुटकुलों में धर्म, जाति, समाज के विभिन्न आर्थिक वर्गों आदि के अनुसार भी वैभिन्न्य पाया जाता है। बच्चों के चुटकुले मासूमियत भरे होते हैं, हालांकि उनमें भी धर्म, संप्रदाय और जातिगत अतिरंजनाएं और वैमनस्य दिखाई पड़ जाता है। किन्तु बच्चे उसे गहराई से समझे बिना चुटकुले कहते-सुनते हैं, और हँसते-हँसाते हैं। बचपन से हम सरदारजी लोगों, अंग्रेजों, अपने समाज की कतिपय जातियों आदि पर गढ़े गए चुटकुले सुनते-सुनाते चले आए हैं।

वयस्क स्त्री-पुरुषों के चुटकुलों में उपर्युक्त सारी विशेषताएं होती हैं, लेकिन साथ ही साथ, उनमें सेक्स तथा कतिपय वर्जित प्रसंगों का भी समावेश रहता है। इन चुटकुलों में ऐसी-ऐसी स्थितियों की कल्पना एवं वर्णन किया जाता है कि सामान्यतः हम उनके बारे में सोच भी नहीं सकते। एक प्रकार से ये चुटकुले अपने-आप में एक फंतासी होते हैं, स्वैर-कल्पना। यदि उनमें वर्णित स्थितियों को हम अपने वास्तविक जीवन पर लागू करके देखें तो एक दिन भी चैन से नहीं जी पाएँगे। बच्चों के चुटकुले प्रायः ऐसे नहीं होते। उनके पात्र ऊल-जलूल हरकतें करते हैं, किन्तु वे ऐसा कुछ नहीं करते जिसके करने से समाज में अथवा हमारे व्यक्तिगत जीवन में भूचाल आ जाए। मसलन बचपन में हमारे साथी एक चुटकुला सुनाते थे कि दो बच्चे थे-एक हिन्दू एक सिक्ख। दोनों की नाक बह रही थी। रुमाल किसी के पास नहीं था, किन्तु नाक पोंछनी थी, वह भी कमीज की आस्तीन से। तो हिन्दू बच्चा बोला- पता है, हमारे रामजी न..ऐसे तीर चलाते थे..ऐसे.. (और चुटकुला सुनानेवाले ने अभिनय करके बताया कि रामजी कैसे तीर-धनुष चलाते-चलाते अपनी बहती हुई नाक को कमीज की आस्तीन से पोंछ लेते रहे होंगे)। फिर उसने सिक्ख बच्चे का अभिनय करके उसकी ओर से संवाद सुनाया- पता है.. हमारे गुरु गोविन्द सिंह जी ऐसे तलवार चलाते थे..ऐसे (और उसने भी तलवार चलाने का अभिनय करते हुए अपनी आस्तीन से नाक पोंछ ली)। इस चुटकुले में मासूमियत है, जो केवल बच्चों में हो सकती है।

इसके विपरीत बड़ों या वयस्कों के एक चुटकुले की बानगी देखिए। एक बार एक सरदारजी को अपना मूत्र-परीक्षण कराने की आवश्यकता पड़ गई। उन्होंने अपने मूत्र का नमूना शीशी में भरकर शौचालय में एक ओर रख दिया। उनकी पत्नी ने शौचालय साफ किया तो वह शीशी गिर गई और मूत्र बह गया। पत्नी ने डर के मारे अपना मूत्र भरकर शीशी वहीं रख दी। कुछ देर बाद सरदारजी मूत्र को परीक्षण के लिए दे आए। अगले दिन जब परीक्षण-परिणाम आया तो सरदारजी अचंभित रह गए। यों कहिए कि वे डर गए। दरअसल, मूत्र-परीक्षण से पता चला कि जिस व्यक्ति के मूत्र का नमूना लिया गया है, उसे गर्भ ठहर गया है। सरदारजी ने घर आकर पत्नी को खूब डाँट पिलाई और उलाहना दिया- मैं कहता था कि तू मेरे ऊपर ....न कर। अब देख, क्या हो गया!

सेक्स भी वयस्क मानव-जीवन का एक अभिन्न अंग है। इसलिए हमारे बहुत-से चुटकुले उससे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा, कतिपय धर्मों, संप्रदायों आदि के बारे में हमारे मन में बड़ी ही मज़ेदार धारणाएं हैं। कुछ समुदायों या जातियों को हम बिलकुल बौड़म समझते आए हैं। इसलिए बेवकूफी की कोई भी बात हमारे दिमाग में आए तो उसे हम उन समुदायों से जोड़ देते हैं। सरदारजी लोगों के बारे में भी यही धारणा रही है। हालांकि वे सीधे, सच्चे, व्यवहारपटु, अपनी धुन के पक्के, मेहनती और धर्मालु होते हैं। किन्तु बाकी का समाज बेहद चालू और चलता-पुर्जा है। इसलिए उसने सरदारजी लोगों पर चुटकुले गढ़ लिए। रेणुजी के मैला आँचल उपन्यास में एक जाति-विशेष का जिक्र करते हुए कहा गया कि उस जाति का व्यक्ति तो साठ की उम्र में भी नाबालिग ही रहता है। परंपरागत रूप से पशुपालकों की यह जाति अपनी मेहनत और लगन के लिए जानी जाती है। किन्तु बाकी की जातियों वाले उन्हें बौड़म और कूढ-मगज़ समझकर उनपर चुटकुले गढ़ लेते हैं। बहरहाल, हमारा मंतव्य केवल इतना है कि चुटकुले भी हमारी सामाजिक मान्यताओं और धारणाओं से ही उपजते हैं।

हम कैसे चुटकुले सुनते-सुनाते हैं, कैसे चुटकुले वॉट्सऐप पर अपने मित्रों से शेयर करते हैं, यह बताता है कि हमारा सोच कैसा है, हमारी नैतिकता का स्तर क्या है। किसी-किसी चुटकुले में बहुत-ही कुत्सित और घृणित परिकल्पनाएं की गई होती हैं, जबकि कोई-कोई चुटकुला बहुत-ही सौम्यतापूर्ण होता है, जिसे आप चाहें तो चार लोगों के बीच, अपने परिवार के सदस्यों के बीच सुना सकते हैं। हमारे चुटकुले हमारे व्यक्तित्व के अवगुंठन खोलते हैं, हमारी दमित वासनाओं के शाब्दिक शमन का रास्ता देते हैं, और साथ ही, हमारे चरित्र की छाप भी छोड़ते हैं। यदि हम हर समय वर्जित काम संबंधों और सेक्स पर आधारित चुटकुले ही सुनते-सुनाते हैं, तो यह निष्कर्ष सहज ही लगाया जा सकता है कि हम बहुत छिछोरे और उथली सोच वाले व्यक्ति हैं। इसके विपरीत यदि हम जीवन की अन्य विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर चुटकुले सुनते-सुनाते हैं तो हमारे विनोद-प्रिय होने का प्रमाण तो मिलता है, किन्तु वह हलकापन हमारे व्यक्तित्व के साथ नत्थी नहीं होता, जो पूर्ववर्ती परिस्थिति में अनिवार्यतः हो जाता है।

बहुत-से चुटकुले केवल भाषिक अभिव्यक्ति यानी अर्थ के अभिगम और उसके अन्तरण पर आधारित होते हैं। उदाहरण के लिए मैं अपनी बात बताता हूँ। सन् 87 में जब मैं गुंटूर-आन्ध्र प्रदेश में बैंक-अधिकारी था तो मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ने एक अन्य सहयोगी की उपस्थिति में अंग्रेजी में पूछा- व्हेयर डू द विमेन हैव द कर्लियेस्ट हेयर? मेरा दिमाग एक ही जगह गया और मैं केवल मुस्कुरा भर दिया। वरिष्ठ सहयोगी ने मेरी मनोदशा भाँप ली। और तुरन्त बोले- इन साउथ ऐफ्रीका! पता नहीं, यह चुटकुला है या नहीं, किन्तु इसमें अपनी तरह का चुटीलापन है। इसमें जो प्रश्न है वह वयस्क पुरुष को एक खास दिशा में ले जाता है, किन्तु इसका उत्तर तुरन्त उसे याद दिलाता है कि भइए, वयस्कों की दुनिया के सभी चुटकुले काम और कामांगों से जुड़े हुए ही नहीं होते, न होने चाहिए। मैं इसे भाषा कै वैचित्र्य-युक्त अथवा भाषिक चमत्कार-युक्त चुटकुलों की श्रेणी में रखना चाहूँगा।

चुटकुलों की दुनिया बड़ी मज़ेदार है। और मज़े की बात यह कि यह दुनिया हमारे बाकी के कार्य-व्यापार के साथ-साथ, समानान्तर चल रही है, बढ़ रही है और निरन्तर कायम है। इसे मनोरंजन के किसी भी अन्य माध्यम से कोई खतरा नहीं है। हम चाहे जितनी भी तकनीकी तरक्की कर लें, यदि हमें गधे की तरह थोबड़ा लटकाकर गंभीर नहीं बने रहना है, बल्कि जिन्दगी से कुछ लमहे चुराकर हँसना-हँसाना है, हास्य-रस का लुत्फ उठाना है तो निश्चय ही चुटकुले हमारे मनोरंजन के सबसे बड़े और सर्व-सुलभ साथी सिद्ध होंगे।

साहित्य की कम समझ रखने वाले, बिना कुछ मेहनत किए हँसने-हँसाने का मज़ा लेने की इच्छा रखने वाले और तिसपर भी खुद को कविता-मर्मज्ञ समझने-समझाने का मुगालता व शौक पालने वाले बहुत-से लोग चुटकुलेबाजी को ही हास्य-कविता समझ लेते हैं। इसका फायदा उठाकर बहुत-से चुटकुलेबाज आजकल हास्य-व्यंग्य की कविता के नाम पर अपने श्रोताओं को चुटकुले सुना आते हैं और उनसे ढेरों मानदेय, सम्मान, शॉल, श्रीफल आदि बटोर लाते हैं। चलिए यह भी अच्छा है। लेकिन चुटकुलेबाजी और कविता, दो अलग, बिलकुल अलग विधाएँ हैं। इसमें चुटकुले का तो फायदा हुआ, किन्तु कविता की लुटिया डूब गई। लेकिन इस विषय पर फिर कभी...।

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