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व्यंग्य और बर्गर / व्यंग्य / शशिकांत सिंह 'शशि'

बाजार में आजकल बर्गर और व्यंग्य की मांग उछाल पर है। झटपट बर्गर और सरपट व्यंग्य खूब बिक़ रहे हैं। ऐसे में एक देशभक्त होने के नाते अपना यह कर्त्तव्य है कि व्यंग्य की रेसिपी बाजर में प्रस्तुत की जाये ताकि नये व्यंग्यार्थी, व्यंग्योत्पाद करके बाजार में व्यंग्यराज की उपाधि धारण कर सकें।

आवश्यक सामग्री-सर्वप्रथम जानें बर्गर बनाने की विधि, आपको चाहिए-दो ताजे ब्रेड या पाव, चैंपिग बोर्ड, तेजधार वाला चाकू, मिलाने के लिए चम्मच, कटोरा, प्लेट, कड़ाही, उम्मीद है आपने जुटा ली होगी। व्यंग्य लिखने के लिए एक लैपटॉप (कलम से मसालेदार व्यंग्य नहीं आ पाते), प्रिंटर, कागज, दो तीन संपादक, चार नग प्रशंसक (कम से कम), दो या तीन आका और थोड़ा-बहुत अक्षर ज्ञान। तो बंधुओं आशा है कि आपने सामग्री जुटा ली है और अब बर्गर बानने और व्यंग्य लिखने के लिए कमर कस के तैयार हो जाइये। कमर अपनी ही हो।

सर्वप्रथम आपको यह तय करना है कि शाकाहारी बर्गर बनाना है या मांसाहारी। मांसाहारी बर्गर बनाने के लिए चिकन लगभग पचासी प्रतिशत, एक अंडे की जर्दी, आधा लाल प्याज, काली मिर्च, तथा नमक स्वादानुसार लीजिये। व्यंग्य में यदि आप राजनीतिक व्यंग्य को मांसाहारी मान लें और शेष को शाकाहारी तो मांसाहारी व्यंग्य लिखने के लिए सत्ताधारी दल को छोड़कर अन्य दलों की कमजोरियां, सत्ताधारी दल के मंत्री के फोन नंबर, सरकार विरोधी नेताओं पर पैनी नजर, समय-समय पर सरकार के द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों की सूची तथा उनकी पात्रता हेतु जुगाड़ या जुगत,। शाकाहारी व्यंग्य हेतू गालियां चालीस प्रतिशत (स्वाद एवं सुविधानुसार घटाया बढ़ाया जा सकता है), जीजा-साली, कबूतर-कबूतरी जैसे शाश्वत विषयों की स्पष्ट समझ।

निर्माण प्रक्रिया- बर्गर बनाने हेतू सर्वप्रथम चिकन को खूब मिलायें। प्रयास करें कि चिकन में वसा पन्द्रह प्रतिशत से अधिक न हो क्योंकि अधिक वसा से पकाते समय आग भड़क सकती है। व्यंग्य लिखते समय सत्ताधारी दल की नीतियों का विरोध हर्गिज न करें। यदि लगे कि पूरे देश को गिरवी रखा जा रहा है फिर भी व्यंग्य में शक्कर डालते रहें ताकि आग न भड़के और उसकी लपटों से आपकी रोटी-रोजी पर आफत न आये। आप सलामत जग सलामत। यह मंत्र व्यंग्य प्रशिक्षु हमेशा याद रखें। व्यंग्य का उद्देश्य वाहवाही बटोरना है। खूब छपें और बडी संख्या में प्रशंसक हों तो समझें कि व्यंग्य लेखन सार्थक हो गया है। समय-असमय पुस्तकें छपती रहें। दस-बीस मित्र मिलकर एक मंडल बना लें तथा एक-दूसरे की प्रशंसा करें इससे व्यंग्य में निखार आता है। आलोचकों के घर आम की डालियां या ताजा दही भेजना न भूलें।

परोसें-खाना बनाने से अधिक कलाकारी खाना परोसने में होती है। साफ झक प्लेट में बर्गर परोसें, ऊपर से धनिया पत्ता आदि डालकर उसे आकर्षक बनायें। आदमी यदि भूखा होगा तो इन्शाल्लाह जरूर खायेगा। व्यंग्य को संपादकों के स्वादानुसार परोसे। व्यंग्य का साईज और शीर्षक संपादक जी से पूछ लें। अलौकिक संपादक लेखकों के नाम की लंबाई भी तय करते हैं उनकी सलाह भी ले लें। लिखने से अधिक जरूरी है व्यंग्य का प्रकाशित होना। इसके लिए किसी भी समाचार पत्र से सांठगांठ करके रखें। पत्रिकाओं के किसी भी विशेषांक को मिस न करें। नियमित प्रकाशन तथा अनियमित लेखन ही महान लेखक की पहचान होती है।

उम्मीद है आप बर्गर बानना सीख गये होंगे।

--

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736

मोबाइल-7387311701

इमेल- skantsingh28@gmail.com

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