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पखवाड़े की कविताएँ

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देवेन्द्र कुमार पाठक मरहूम

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नवगीत


 
1-वर्षा वनकन्या-सी कर रही विहार
खेत-बाग,नदी-ताल,जंगल-पहाड़;
वर्षा वनकन्या-सी कर रही विहार! 

जन्मी आषाढ़ की, सावन घर पाली, 
भादों ने पहनाई चूनर हरियाली;

ज्वार-मका से करती फिरे छेड़छाड़. 
वर्षा वनकन्या-सी कर रही विहार. 

गले मिले चिरक्वांरी रेवा के पाट, 
गैल-खोर लगी कीच-काई की हाट;

घर-घर चौमास छाये पाहून-त्योहार. 
वर्षा वनकन्या-सी कर रही विहार. 

श्रम के हक़-भाग कोदो-कुटकी का भात;
क़र्ज़ मढ़ा धान-मका,ज्वारी के माथ;

पानी ही पानी दृग-देहरी,दिल-द्वार! 
वर्षा वनकन्या-सी कर रही विहार!

2-बारिश चली बुढ़ाय। बारिश चली बुढ़ाय,
मकड़ियां पूर रहीं जाले; पड़े अब प्राणों के लाले! 

खैर-ख़ुशी के विधि-विधान की पोथी खूब रटी, 
बड़बोले नभ चढ़ें,छाँव अपनी पदतल सिमटी;

छोटी छाया तले विवश हैं छोटे कदवाले. 
पड़े अब प्राणों के लाले! 

बीहड़ मन में प्रेत हताशाओं के विहँस रहे, 
आश-प्यास में जग-जीवन के सपने झुलस रहे. 

लहू बिछाने लगे सड़क पर पैरों के छाले!
पड़े अब प्राणों के लाले! 

--

ग़ज़ल

पूजा पाठ नमाज में रमें न राम रसूल;
मेहनतकश के तन खिलें बन मेहनत के फूल.

खुदा न मस्जिद में मिले मठ में मिले न राम;
जहां श्रमिक श्रमरत वहां रहते आठों याम.

राम रहीम लड़ें नहीं हम ही लड़ें फिजूल;
अक्सर हम देते भुला उनके सबक उसूल. 

मठ मस्जिद से कम नहीं मानव की है जान;
जीवन शाश्वत धरम है जीवन वेद कुरान.

दो पहलू विश्वास के राम और अल्लाह;
बस  इक पहलू देखती है धर्मान्ध निगाह.

जिनके पदतल धी पड़ी मानवता की लाश;
उनकी आकांक्षाओं के ध्वज फहरे आकाश.

सदन सभाओं में मची ताज तख्त की खौंद;
नन्हीं कलियों को रहे रोज दरिन्दे रौंद.

नभ छूने को जब चली तिनकों की औकात;
लाठी खाई पीठ पर और पेट पर लात.

सुख हैं अपने द्वार दर पाहुन बारह मास;
मास दिवस दस फूलते सुख हैं मानो कांस.   

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प्रेषक-देवेन्द्र कुमार पाठक,1315,साईं पुरम कालोनी;रोशननगर,खिरहनी,कटनी;म.प्र.483501;(devendrakpathak.dp@gmail.com)

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श्यामा राय

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देवदासी
सजीव,
एक प्राणिमात्र
एक स्त्री
नारी समाज जिसका समुदाय
स्त्रीत्व जिसका व्यक्तित्व
प्रेम, वात्सल्यता की देवी
नहीं, नहीं,
भूल हो गयी
देवी नहीं, मूरत
देवियों की पूजा होती है
देवी दासी नहीं बन सकती
लेकिन कुछ अधर्मी हैं
जो पूजते हैं
दुर्गा और लक्ष्मी को
पर लक्ष्मी स्त्री हो तो?
तो क्या,
देवियों को भी दासी बनाते हैं
अपमानित करते हैं
उनका शोषण भी करते हैं
फिर लक्ष्मी दासी बन जाती है
पाखण्डियों के घिनौने जाल में
जैसे कि
मछली का शिकार करता बगुला
दुष्कर्मी लक्ष्मी के लज्जा रूपी धन का
हनन करते हैं
बेरोकटोक
अमानवीयता का नंगा नाच दिखाते हुए
देवी दासी बन जाती है
अस्वीकृति बहिष्कृत कर दी गयी है
कण्ठ अवरुद्ध है
तन पर रेशमी वस्त्र है
मग़र लक्ष्मी निर्वस्त्र हो चुकी है
अपनी ही दृष्टि में
स्त्री होने का भूल कर बैठी है
जिस दुःस्वप्न की कल्पना
न की थी
उसे ही अपनी नियति मान चुकी है
सर्वस्व न्यौछावर कर
प्रायश्चित कर रही है
देवी दासी बन गयी है
भोगियों के प्रहार से
आहत हो रही है
फ़िर भी समर्पण कर रही है
देवदासी हो रही है।


देवदासी ही हूँ
दासी हूँ मैं
देवों की नहीं
वरन पुरुषों की
पुकारते सब मुझे
देवदासी
अचम्भित क्यूँ हो?
सदियों से हो रहे छलावे का
प्रमाण हूँ मैं
देवदासी हूँ मैं
ये सुन्दर अम्बर और अलंकार
मोलभाव करते हैं
मेरे मृत्तिक काया की
और मेरे अंतर्मन की भी
पाजेबों की झंकार में
छुपाती फिरती हूँ,
करुण रुदन की सहस्त्रों परतें
पर तनिक न विचलित हूँ
कि
देवदासी हूँ मैं
गजरे की अनेकों पंखुड़ियाँ
जो तुमको लुभाती हैं
उनमें पिरोएं हैं मैंने
वेदना के अनगिनत किस्से
ताकि
रजनीगन्धा की महक में
डूब सको तुम
कि मैं छुपा सकूँ वो
श्वास अवरोधक दुर्गन्ध
जो इस प्रांगण रूपी नर्क से निकलता
हरेक क्षण मुझको बाध्य करता
मृत्यु के समीप धकेलता
स्मरण कराता मुझे
मेरे अस्तित्व का
मेरे व्यक्तित्व का
परिचय कराता है मुझसे
कि देवदासी ही हूँ
मीरा-सी नहीं
कृष्ण-दासी नहीं
वरन,
भोग-विलासिता की दासी हूँ
देवदासी हूँ मैं।


मोबाइल -  +918130668333
मेल आई डी- simmiroy05@gmail.com
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सुशील यादव


ये है निजाम तेरा,


दरवेश के हर हुजरे से अब मेहमां हटाइए
जो लाश ले चलती गरीबी,दरमियाँ हटाइए

बार-ए-गिरेबा को कलफ न मिले जहाँ नसीब में
तहजीब  की अब उस कमीज से गिरेबां हटाइए

ये है निजाम तेरा, सफीना सोच कर उतारना  
चलती हवा दरिया से बे-मकसद तुफां हटाइए

उनको बिछा दो मखमली कालीन मगर साहेब 
उम्मीद  की बुनियाद हों काटे, वहाँ  हटाइए

जाने कोई क्यों खटकता है आँख में दबा-दबा 
अब हो सके मायूस  नजरें  अँखियाँ हटाइए

सुशील यादव
१.९.१६

दरवेश =saint 
हुजरे=private chamber
बार-ए-गिरेबाँ-weight of coller ऑफ़ शर्ट  
निजाम = व्यवस्था ,सफीना=नाव
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प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध

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राजा रघुनाथ शाह एवं शंकरशाह का अमर बलिदान

 

जानते इतिहास जो वे जानते यह भी सभी
राजधानी गौड़ राजाओ की थी त्रिुपरी कभी

उस समय में गौडवाना एक समृद्ध राज्य था
था बड़ा भू भाग कृषि, वन क्षेत्र ,पर अविभाज्य था

सदियों तक शासन रहा कई पीढियों के हाथ में
अनेको उपलब्धियाँ भी रही जिनके साथ में

रायसेन, भोपाल, हटा, सिंगौरगढ में थे किले
सीमा में थे आज के छत्तीसगढ के भी जिले

खंडहर नर्मदा तट मंडला में हैं अब भी खडे
आज भी हैं महल मंदिर रामनगर में कई बड़े

कृषि की उन्नति, वन की सम्पत्ति, राज्य में धनधान्य था
स्वाभिमानी वीर राजाओं का समुचित मान था

दलपति शाह की छबि-कीर्ति जब मनभायी थी
दुर्गा चंदेलो की बेटी बहू बनकर आई थी

बादशाह अकबर से भी लड़ते ना जिसको डर लगा
उसी दुर्गावती रानी- माँ की फैली यशकथा

एक सा रहता कहां है समय इस संसार में
उठती गिरती हैं बदलती लहरें हर व्यवहार में

आए थे अंगेज जो इस देश मे व्यापार को
क्या पता था बन वही बैठेंगे कल सरकार हो

सोने की चिडिया था भारत आपस की पर फूट से
विवश हो पिटता रहा कई नई विदेशी लूट से

उनके मायाजाल से इस देश का सब खो गया
धीरे धीरे यहाँ पर उनका ही शासन हो गया

पल हमारी रोटियों पर हमें ही लाचार कर
मिटा डाले घर हमारे, गहरे अत्याचार कर

जुल्म से आ तंग उनके देश में जो अशांति हुई
अठारह सौ छप्पन में उससे ही भारी क्रांति हुई

झांसी, लखनऊ, दिल्ली, मेरठ में जो भड़की आग थी
उसकी चिंगारी और लपटों में जगा यह भाग भी

तब गढा मंडला में दुर्गावती के परिवार से
दो जो आगे आए वे "रघुनाथशाह व शंकरशाह" थे

बीच चौराहे में उनकी ली गई तब जान थी
क्रूरतम घटना है वह तब के ब्रिटिश इतिहास की

बांध उनको तोप के मुंह से चलाई तोप थी
पर चेहरों में दिखी ना वीरों के छाया खौफ की

देश के हित निडर मन से दोनों अपनी जान दे
बन गए तारे चमकते अनोखे बलिदान से

सुन कहानी उनकी भर आता है मन उनको नमन
प्राण से ज्यादा रहा प्यारा जिन्हें अपना वतन

आती है आवाज अब भी नर्मदा के नीर  से
मनोबल के धनी कम होते हैं ऐसे वीर से

जिनने की ये क्रूरता वे मिट गए संसार सें
नमन पर करते शहीदों को सदा सब प्यार से

यातनाएं कुछ भी दें पर हारती है क्रूरता
विजय पाती आई है इतिहास में नित शूरता

गाता है जग यश हमेशा वीरता बलिदान के
याद सब करते शहीदों को सदा सम्मान से

जबलपुर से जुडा त्रिपुरी नर्मदा का नाम है
उन शहीदों को जबलपुर का विनम्र प्रणाम है।

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी,  रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252


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सुशील कुमार शर्मा


क्षणिकाएं
(वर्तमान व्यवस्था पर )
सुशील कुमार शर्मा

1. "कांधे पर शव।
जीवन विप्लव"।

2.”रोती बेटी पास।
मरी माँ उदास।”

3.”सभ्य समाज घेरे में।
इंसानियत अँधेरे में।”

4.”चीखता पत्रकार।
  मरता विचार।”

5.”सोती सरकारें।
वीभत्स चीत्कारें।”

6.”सुने कौन ?
शब्द मौन।”

7.”M. P. का चमत्कार।
फर्स्ट इन बलात्कार।”

8.”व्यापम।
यम हैं हम।”

9.”नारी के अरमान।
  भोग के सामान।”

10.”स्त्री मन।
  खरा कुंदन।”

11.”बेटी का विचार।
  जीवन का आधार।”

12.”पपीहा सा मन।
  याद आएं साजन।”

13.”बूढ़ा जीवन उदास।
   विदेश बसे बेटे की आस।”

14.”पिता की चिंता सारी।
   बेटे की बेरोजगारी।”

15.”मुफ्तखोरों के वास।
   सरकारी आवास।”

16.”शिक्षा का आकार।
   डिग्री का व्यापार।”

17.”अध्यापकों का हाल।
    जीवन हुआ बेहाल।”

18.”गणना पत्रक।
  इंतजार कब तक।”

19.”छटवां वेतनमान।
   धैर्य का इम्तहान।”

20.”सातवाँ वेतनमान।
जीवन का अवसान।”

21.”सरकारी पाठशाला।
   गरीब बच्चों की गौशाला।”

22.”निजी स्कूल।
  खूब फल फूल।”

23.”मध्यान्ह भोजन।
  गरीबी का समायोजन।”

24.”छोटी सी भूल।
  सरकारी स्कूल।”

25.”शिक्षक अभिन्न।
  सरकारी जिन्न।”

 

जिंदगी संघर्ष तेरी

मंजिलें हैं दूर तेरी रास्ता काँटों भरा है।
जिंदगी संघर्ष तेरी आग से दमन भरा है।
गम के प्याले हैं तुझ को पीना।
जग तुझ को दूर जाना।
है किसे फुर्सत यहाँ
गम बटानें को तेरे।
कौन आएगा यहाँ
आंसू पीने को तेरे।
आंसुओं का ये समंदर आज तुझ को पार करना।
जाग तुझ को दूर जाना।
जिंदगी के हर कदम पर
मौत तेरे पास है।
मौत से ही लड़ कर जीना
अब तुम्हारे हाथ है।
जिंदगी जीना है तो कर मौत का तू सामना।
जाग तुझ को दूर जाना।
जिंदगी का हर गम में
सफलता का  राज  है।
राह का हर एक काँटा
आज की आवाज है।
जिंदगी की हर कठिनता पर विजय तुझ को आज पाना।


*कुछ हाइकू*

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सूखी फसलें
दरकते विश्वास
तुमसे आस
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नोंचते गिद्ध
जिस्म की नुमाइश
खुले पैबंद
--------####----
काला काजल
सुंदरता सौ गुनी
ग़ोरी की मांग
-------####----
ये विषधर
प्रश्नों पे प्रश्नचिन्ह
उत्तर नहीं
--------####----
रेंकते टीवी
ख़बरों की नीलामी
इज्जत बिकी
-------####----
मन है बैरी
याद करता तुम्हें
प्यार के लम्हे
-----####----
मन मयूर
जैसे नाचा हो मोर
उठे हिलोर
---*-----###----
सीधा सरल
निष्कपट निर्दोष
पिया गरल
-------####----
शर्मिंदा हूँ मैं
सभ्य लोगों के बीच
क्यों जिन्दा हूँ मैं
-------###------
गर्व से लदा
तुम्हारा अहंकार
बना व्यापार
------####----
तड़फे बच्चे
माँ है अस्पताल में
पेट में भूख
------####----
कांधे पे लाश
कई मील पैदल
बेटी उदास
------####-----

-----------.


 

स्वराज सेनानी


मुश्किलों की बारिश
चूती हुई छत है
भीगा अब बिछौना है
छतरी ले के बैठे है मियाँ जी
उधड़ा जिस का कोना है
हर बूंद पे मग्गा है
हर धार पे भगौना  है
बारिश भी है कुछ अजीब
औकात देख के आती है
बंगले  कोठी से  बच कर
तंग खोलियों को भिगोना है
अंदेशा तो पहले से ही था
इस  छत के टपकने का
पैसे जो बचाए थे
बीमारी का रोना है
अगली दफा बारिश का
बेहतर इंतजाम करेंगे
चाहे कुछ भी हो
पहले छत का कम करेंगे ....
-------------.
 

मुकेश कुमार

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हम चले थे अपनी ही कश्ती में,
गैरों का बोझ ले आएं....
हम उड़े थे अपनी ही मस्ती में,
हाल ये था क़ि हमारा, पूछो ना,
हौसलों को गैरों के दम छोड़ आए
एक पल, एक मिनट शायद...
एक पूरी शताब्दी में सो गए
हम चलें थे अपना वजूद लेकर,
उन्हें ही रास्तों में खो आये...
गैरों के घरों में आज़ाद थे,
अपने ही घरों में आकर कैद हो गए
@mukeshkumarmku
Mukeshkumarmku@gmail.com
------------------.

रिंकी मिश्रा


हृदय के गहनतम भाव को
बिखेरा मैंने पन्नों पर
तो रच गई संवेदनशील
भावुक अनियंत्रित
भावनाओं के वेग से बलखाती कविता
पन्नों पर बिखर गया उस उन्मादी लड़की का
विशुद्ध प्रेम
दैहिक भुखमरी से परे उसका अपना हीं अलौकिक संसार बसता गया प्रकृति के सर्वोच्च उत्कृष्ट प्रेम की गहनतम भावनाओं की गोद में
वो सवाँरती गई भावनात्मक क्यारियों को अवांछनीय   अतिक्रमण  से बचा कर
वह रचती रही मन के भीतर प्रेम का एक समृद्ध  वैभवशाली संसार
देह के सम्मोहन उत्तेजना कामना से परे
उगा रखे थे उसने सैकड़ों दुर्लभ पारिजात
वह उन्मादी जिद्दी लड़की पाल रही है अपने भीतर प्रेम का एक विशाल पारिजात वृक्ष
बुद्धजीवियों द्वारा विक्षिप्त घोषित वह
तिरस्कार से आहत मनोस्थिति लिए
आज भी सबल है वह मानसिक भावनात्मक और व्यवहारिक।
वह उन्मादी लड़की प्रेम की अनुगामी मुक्त रही दैहिक अवशिष्ट से
उसके  मस्तिष्क प्रेम प्रेम और प्रेम के भावनाएं हिलोरे लेती रही..
हाँ आज वो उन्मादी लड़की थोड़ा थक के बैठी है
सामाजिक व्याख्यायित विश्लेषण से होकर लाचार।
बैठी है वह आज भी सिमटी सिकुड़ी नियति की कोठरी में घुटने टेक कर
प्रतीक्षारत अँजुरी भर दिव्य पारिजात लिए प्रेम पुष्पांजलि को
------------------.

प्रदीप तिवारी

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  चुगली करती प्रदीप तिवारी की बुदेलखंडी गजल

                                      
पान सुपारी हो  गयी कक्‍का
और बियारी हो गयी कक्‍का

                     चार  दिना से  थे खटिया पे
                     ठीक बिमारी हो गयी कक्‍का

                     बीरसींग की भग गयी  मोड़ी
                     जात निकारी हो  गयी कक्‍का

                     फेंक निकारो  डुकरिया  हों
                     बहु  नियारी हो  गयी कक्‍का

                     बारसाती  सें  चूँ रओ पानी
                     भींट दारारी हो गयी कक्‍का

                     कौनऊ उतई राख  लै ऊ ने
                     ब्‍याब तेयारी हो  गयी कक्‍का

                    बीस साल  से सरपंची   थी
                    हार कारारी  हो  गयी  कक्‍का

                    तुररम खाँ बन  रये थे भारी
                    बेन मातारि हो  गयी  कक्‍का

फोन में मर रये घुस रये सबरे
कौन  बिमारी  हो गयी कक्‍का

तीन दिना बचे भाइ दोज के
काल दिवारी हो गयी कक्‍का

                      खुब पियारी  घारवारी  थी
राम पियारी हो गयी कक्‍का

                      चाय  के  पेले  पैसा  चाने
बौत ऊधारी हो गयी कक्‍का

  निकरो अब काये ठलुआ बेठे
  वाह॥ तिवारी हो गयी कक्‍का

 


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अर्जुन सिंह नेगी


नशे का अंध कूप
शहर और गाँव की गलियों में
मिल जाते हैं नौजवान
सिगरेट का दुआं उड़ाते
चरस अफीम गांजा, हो गए हैं आम नशे
अब तो चलती हैं, नशे की गोलियां, इंजेक्शन,
अन्य मादक द्रव्य और सूंघने के नशे
अपने रक्त मे नशे की मिलावट कर
रहते हैं मदहोश
दिन दुनिया से बेखबर, चिंतामुक्त
नशे के अंध कूप में
इस देश का नौजवान
भूलता जा रहा है अपनी शक्तियों को
खो रहा है स्वाभिमान
तन-मन-धन से होता जा रहा
निर्बल और रोगी
भरी जवानी में नशे के लिए कांपता बदन
दिखाता है उसकी लाचारी
और नशे की गुलामी
ऐसी गुलामी जो करवाती है कई अपराध
शक्ति जो सृजन में सहायक होती
बन जाती विध्वंस का कारण
जो हाथ चरण छूने के लिए उठने थे
नहीं कतराते माता पिता की मारपीट से
चोरी, गुंडागर्दी, यौन अपराध
हर बुरा काम करवाती है नशे की गुलामी
माता पिता को कहाँ मालूम
उनके लाडले घर से निकले तो स्कूल-कॉलेज
पर खो गए नशे के गहन गर्त में
जिस आज़ाद देश का युवा
ऐसी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हो 
इससे बड़ी क्षति नहीं हो सकती देश की
आओ मेरे युवा मित्रों! ये आह्वान है मेरा
छोड़ दो ये गुलाम करने वाले नशे
पहचानो अपने अन्दर की शक्ति को
तुम गुलामी के लिए नहीं बने हो
बने हो आज़ाद रहने के लिए
ऐसी आजादी जिसमें ज़िम्मेदारी की कैद भी हो 
आओ नशा करें, जो मेरे तुम्हारे सबके लिए
बेहतर और सुखद हो
देश के लिए कुछ कर गुजरने का नशा
बेहतर इंसान बनने का नशा
जो मिसाल हो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी

अर्जुन सिंह नेगी
नारायण निवास, कटगाँव, तहसील निचार
जिला किन्नौर हिमाचल प्रदेश – 172118

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धर्मेंद्र निर्मल

निर्मल गीत

1.
मिलेगी मंजिल रख विश्वास
आओ कुछ करने चले हम।
कुछ न कर सकने के गम से
अच्छा कुछ करने चले हम।।
बैठ मुंडेर खुजाना छोड़
सस्वर चहक चलाए डैने।
खातिर निज नव - धवल सदी में
नवल सूरज लाने के बहाने।
चलो उड़ान भरने चले हम।।
जग जयकार चकित करता
समता देख हार मनकों की।
रगड़े, खींचे, खरोंचे कहीं
टूटे , फूटी, हँसी तिनकों की।
स्नेह जतन करने चले हम।।
सोने की चिड़िया पर कब से
बैठे बाज लगाये घात।
भागे बिलाव दबे पाँव, मन
पर, करता प्रतिफल आघात।
स्व-वितान बनने चले हम।।


2.
मैं चाहता हूँ हर एक आँखें
खुशी से खिलखिला उठे।
मैं दुख का दरिया बनूँ
एक देह तपे और हूक उठे।।
    नहीं चाहता बुलंदियों पर
    जा अपनों को भूल जाऊँ।
    पैर पीठ पर रखकर चढ़ें
    अच्छा है पीढ़ा बन जाऊँ।।
बल बाहु में भीम सरीख हो
मुट्ठी में ईश प्राण भरे।
मसल डालें शरीर पृथ्वी पर
नहीं नाश, निर्माण करे।
    रख कुदाल कंधे अपने
    आओ संग राह बनाना है।
    महलों के चाँटों की जगह
    मरहम कुटिया का लगाना है।।
लाचारी का पाश तोड़ दो
जीवन यूँ भूना जाता है।
नहीं शेर बलि के लिए
बकरा ही चुना जाता है।।
    मैं सोऊँगा तुम्हें जगाकर
    है मेरा निर्वाण जागृति।
    मेघनाद करो हे सिंहों
    बदल नियति, दो सदगति।।


3.
तन को नंगा कर सकते हो
छीन सकते हो उठे निवाले।
अपना मुख, जुबाँ है अपनी
नहीं लगा सकते तुम ताले।।
    आयेगा सूरज कंदरा तक
    कंगूरों को लांघकर।
    नहीं रोक पायेगा वह भी
    अश्रु, पलक में बाँधकर।
    बह जायेगा बन पसीना
    देख पीठ पर श्रम के छालें।।
तोड़ मोड़ कर अपनी किस्मत
जोड़ रहे हैं दीवारें।
रौंद चुके मन के हर अंकुर
माँगों पर चलती है आरें।
सिर्फ तुम्हारा है एहसास
वांछो को बदरा कर डाले।।
    अत्याचार की जड़ें काटकर
कर डालेंगे बिल्कुल सूखा।
फिर एक ऐसी टक्कर होगी
जल उठेगा वन समूचा।
अब क्या नहा निचोड़े हम
पेट में है केवल ज्वाले।।

 

4
आज लगायेंगे हम जग को
पार प्रेम के नाव से।
मानवता को मुक्त करेंगे
ईर्ष्या द्वेष के घाव से।।
    एक स्वर से संगठित हो
    सिंह सा घोर करेंगे गर्जन,
    मातृभूमि के चरणों में
    धर देंगे काट अरि गर्दन।
    बाँधेंगे बंधुत्व सूत्र में
    एकता के भाव से।।
औरों के आगे हाथ बढ़ाना
नहीं भारतीयों माँ है भाती।
परहित में जीना ही क्या
मरने में लाज नहीं आती।
हम भारत की संतानों की
होती पहचान है भाव से।।
    स्वाधीनता की सूखी रोटी
है स्वीकार सहर्ष हमें,
अनाचार से अटल गिरि बन
आता है संघर्ष हमें।
ढँककर देश प्रेम से तन
चलते हैं स्वदेशी पाँव से।।


00
आओ रे हम मिलकर चीरें
फैला घुप्प अंधेरा।
होगा हाथ आते ही कुनकुना
स्वर्ण सरीख सबेरा।।
    ख्वाब सजाना बहुत दूर है
    नींद हुई आँखों से ओझल।
    पुरखों की इस ऋण रात में
    वर्तमान के कंबल बोझल।
    भरेंगे श्रम से रंग चाँदनी
    कल, बन प्रकृति-चितेरा।।
मैं दधीचि बन अस्थि देता हूँ
वज्र बना तुम करो प्रहार।
गीता की सौगंध है तुमको
अर्जुन सा तुम करो संहार ।
संभव है जग में परिवर्तन
जब कटे शकुनि का फेरा।।
    नहीं समझते गिद्ध काग की
मूक प्रेम की भाषा,
इनको अपनी जेबें प्यारी
अपने हिस्से झूठी दिलासा।
खा जायेंगे देश नोचकर
रहते अपना बसेरा।।
कब तक ताके सोन-चिरैया
परमुख भूखी प्यासी,
बरसे दूध भू उगले सोना
गंगा कल-कल कोकिला-सी।
हिमालय के सख्त प्रहर में
घुस आया है लुटेरा।।


5.
चल चल रे राही अथक चल।
संशय के पिंजरे को तोड़कर निकल।।
    मिलें कहीं ठंडी, घने पेड़ों की छाँव,
    भूल से छलावे में मत धरना पाँव,
    नहीं कभी फिर हाथ आयेगा कल।।
खोदकर पहाड़ को तू बना दे सुरंग,
लड़ना पड़े क्यों न तुम्हें दुनिया से जंग,
मिलेंगी मंजिल, मत रास्ता बदल।।
    न हाथ हाथों में ऐसे धरे बैठ,
    टिकेगा ही पैर कहीं, कर तो घुसपैठ,
    कर दे जमाने में आज हलचल।।
हक कोई भीख नहीं माँगने से मिले,
सीने में दम है तो छीन कर खा-पीले,
गिराकर जो सामने है आगे बढ़ चल।।
    कल के लिए आज का तू है बड़ा सबूत,
    रख ले बनाके नींव निज की मजबूत,
    भावी पीढ़ी की हो सुबह उज्ज्वल।।
00

धर्मेन्द्र निर्मल
ग्राम पोस्ट कुरूद भिलाईनगर दुर्ग
9406096046
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राजेश गोसाईँ


कोहराम
अब शांति पाठ ना होगा
अब युद्ध की तैयारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
सीमा पर मेरी बारी है
ना कोई माफी ना कोई बहाना है
अब पाक को नापाक बनाना है
सफेद कबूतर नहीं उड़ाने हमें
अब बाज की तैयारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
सीमा पर मेरी बारी है
बिरयानी दावत कर
लहू बहुत बहाया है
बदलें में दुश्मन ने
कटा सर जो भिजवाया है
कसम माँ भारती की
लाहोरी गीदड़ों ने खून जो
हमारा खौलाया
अब शेरों की बारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
सीमा पर मेरी बारी है
शांति यात्रा नहीं अब
उनकी शव यात्रा होगी
एक एक गोली पर
अब बारूद की मात्रा होगी
रणचण्डी बन कर उनके
घर में घुस जाऊंगा
लाहोरी चूहों के सिर काट
लाल किले पर लगाऊंगा
माँ तुम तिलक करो मेरा
इक इक इंच लाहौर में
मैं तिरंगा फहराउंगा
तेरे दूध की ताकत से
महाभारत की बारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
सीमा पर कोहराम की बारी है
तेरे चरणों की धूल से
मैं आँधी बन जाउंगा
कफन सियारों का बन
मैं ताण्डव कर आउंगा
मौत के मेले में अब
आजादी की तैयारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
हिन्द में जय हिन्द की बारी है
हिन्द में जय हिन्द की बारी है
माँ तुम तिलक करो मेरा
सीमा पर राजेश की बारी है
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ढूंढ लाओ
कहाँ छुपा दिया वक्त ने ,मेरे
देश के पहरेदारों को
नेहरू गाँधी सुभाष आजाद
भगत पटेल सरदारों को
कौन दिशा में किस दशा में
कहाँ छुपा दिया वक्त ने मेरे
देश के प्यारों को
कहाँ गई इंदरा की वो शक्ति
छुप गई लौ वो जलती
ढू्ंढ ही लाओ कहीं से यारो
रानी झांसी के वारो को
कहाँ छुपा दिया वक्त ने ,मेरे
देश के दुर्गा अवतारों को
कौन पूछेगा क्या हो गया है
इन नेता और सरकारों को
छोड़ जो देते हर अपराधी
क्लीन चिट दे के गद्दारों को
देश भक्तों पे लाठी चलती
केस बना के नारों पे
कौन फहराये यह तिरंगा
लाल हरि सरकारों पे
रक्त रंजित ये देश हुआ है
ले आओ कोई बसन्ति फुहारों को
कहाँ छुपा दिया वक्त ने मेरे
देश की केसर कतारो को
चूम ही लूंगा सर जमी को
मिल जाये जो सम्मान बहारों को
देश के वीर पहरेदारों को
बन जाओ कोई नेहरू गाँधी
भगत सिंह सुभाष सम आँधी
सम्भालो अपना देश ये प्यारा
हरा भरा वतन हमारा
उठा लो अब हथियार वीर प्यारो
जगा लो इन सोयी सरकारों को
नारी बन जाओ तुम आरी
काटो पेड़ इन ठूंठ सरकारों का
ले आओ नई बहारें फिर से
मना लो मिल जुल त्यौहारों को
//राजेश गोसाईं\\
Faridabad
Mob. 9910263300

 

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राकेश रौशन

image
हे प्रभु मुझे एकलव्य बना दो
बिन गुरु पाऊँ ज्ञान ।
फिर गुरु दक्षिणा देकर मैं
गुरु भक्ति का बढ़ाऊं मान ।
गुरु के रूप में द्रोण ही देना
ईर्ष्या से जो जल उठे ।
राजपुत्रो की मान बढ़ाने को
अपनी हथेली मल उठे ।
मैं वन का निपट अनाड़ी
जाति का रहूं भील ।
बिन बोलती पेड़ो के बीच
पकड़े रहूं शिल ।
मेरी ना इच्छा महाभारत की
युद्ध विजेता वीर बनूं ।
रणभूमि का धूल उड़ा
रण का मैं रणधीर बनूं ।
गुरु मांगे हाथ का अंश
पूरा शरीर मैं दे दूं दान ।
ऐसी गुरु दक्षिणा देकर मैं
गुरु भक्ति का बढ़ाऊ मान ।
--
मां संत टेरेसा
प्रेम स्नेह की जौ-जौ आगर
ममतामयी करूणा की सागर
दीन दुखीयो की थी सहारा
परोपकार की छलकती गागर
एक बिनती है इस धरा पर
फिर आ जाओ प्यार बरसाओ ।
सुनी गलियां दीन दुखियों की
तेरे बिन अब कौन सहारा
जग है भागी स्वार्थ के पीछे
सड़क फुटपाथ पे मारा- मारा
तुम ही आओ रास्ता दिखलाओ
सेवा भाव की सीख सिखलाओ
एक है बिनती इस धरा पर
माँ टेरेसा फिर आ जाओ ।
--
प्रेम का स्वरूप बदला ।
कान्हा का रूप बदला ।
इजहार के तरीके बदले ।
प्यार के तरीके बदले ।
बृंदावन का कदंब बदला ।
बरसाने की राधा बदली ।
संदेशवाहक उद्धवजी बदले ।
दोस्त में सुदामा बदले ।
कैसे ?
फेसबुक से शुरू हुई प्रेम की कहानी ।
सब ब्योरा साथ लिखा क्या है निशानी ।
पहचान हुई मुश्किल राजा है या रानी ।
उम्र का पता नहीं बुढ़ापा या जवानी ।
चैटिंग है करते यही पहचान है ।
जिसके अधिक दोस्त वही तो
महान है ।
पूर्वजों ने कहा था अधिक बोलने
वाले को ।
चाट (chat) क्यों रहे हो हमारे
दिमाग को ।
यही चाटना ही चैटिंग का नया रूप है ।
बिना मुश्किल का प्रेम, कहां छाँव
कहां धूप है ।
एक राधा के अनगिनत कान्हा है ।
उन्हें ही पता नहीं कब कहां जाना है ।
स्मार्ट फोन में चाँद तारे स्मार्ट फोन
में वृंदावन है ।
होटल में द्वारका और पार्क में
मधुवन है ।


राकेश रौशन  ( बलवन टोला ) मनेर पोस्ट ऑफिस पटना -801108
मो:09504094811
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एड. नवीन बिलैया


श्रीकृष्ण
जिसने लेकर जन्म जेल में अपने माँ बाबा के मन में एक उम्मीद को जगाया था।
माँ के आँचल सा पिला दूध पूतना ने
उसके इसी कृत्य के कारण उसके लिए स्वर्ग का द्वार खुलवाया था।
मर्दन करके शेषनाग का उसके ऊपर नृत्य कर सारे गाँव को छुटकारा दिलाया था।
बचाने खातिर इंद्र के प्रकोप से अपनी एक उंगली पर गोबर्धन भी उठाया था।
जिसको नहीं दे रहा था कोई सम्मान ऐसी 16000 गोपियों को पत्नी मान उसका मान भी वापिस लौटाया था।
अपने माँ बाबा के खातिर जिसने अपने मामा तक को मार गिराया था।
चीरहरण हो रहा था जब एक नारी का
तो भरी सभा में उसके तन को ढक उसका मान बचाया था।
देने साथ हमेशा सत्य का राजा होकर भी सारथी बन अर्जुन का रथ चलाया था।
सिखाने खातिर पाठ राष्ट्रप्रेम का अर्जुन को
रणक्षेत्र में अर्जुन को गीता पाठ पढ़ाया था।
पाठ पढ़ाने जीवन जीने का मेरा प्रभु स्वंय श्री कृष्ण बन धरती पर आया था।
                      एड. नवीन बिलैया
            सामाजिक एवं लोकतांत्रिक लेखक
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अनिल आरएस राणा


"" दुनियाँ समझती है, फूल हूँ मैं।
माँ तेरे चरणों की, धूल हूँ मैं ॥""
कृपया आप समीक्षा कर के बतायेंगे मैं कहाँ
गलती करता हूँ।
मेरी एक कविता:-
जय दोस्त भाई , जय दोस्त
भाई ।
करते हो तुम , दोस्तों की भलाई ॥
तुमको जो जान जाता है ।
जीवन भर सुख पाता है ॥
आधी रात को तुम बुलाते ।
फिर गप्पें तुम लङाते हो ॥
तुम बिन बेकार है सारी कमाई ।
जय दोस्त भाई , जय दोस्त भाई ॥
मुश्किल मैं साथ देते हो ।
काम हमसे भी लेते हो ॥
तुम्हारी महिमा दुनियाँ जान ना
पाई ।
शिकायत एक घर पहुँच ना पाई ॥
क्या खूब तुम समझाते हो ।
बेईमानों को चूना लगाते हो ॥
बेईमानी तुम्हें खलती है ।
पूरी रात पार्टी चलती है ॥
अलगाव ना कभी दिखाते हो ।
सबूत पार्टी का मिटाते हो ॥
तुम्हारी गाथा 'राना' रहा
सुनाई ।
जय दोस्त भाई...जय दोस्त भाई...॥
तुमसे जो टकराता है ।
चूर-चूर वो हो जाता है ॥
ज्यादा जो इठलाता है ।
घुटने टेकने पर मजबूर वो हो जाता है ॥
दुश्मनों से कभी तुमने मात ना खाई ।
जय दोस्त भाई...जय दोस्त भाई...॥
लौंग ड्राइव पर जब निकल जाते ।
चैन आयेगा जब हो सबसे आगे ॥
धीरे कभी तुमने गाडी ना चलाई ।
जय दोस्त भाई...जय दोस्त भाई...॥
पोल को ना खोलते हो ।
जी चाहे जो बोलते हो ॥
दोस्तों को नहीं लगता बुरा ।
चाहे बात को ना तोलते हो ॥
दोस्त की तुम गाडी उठाते ,
कहते दो मिनट मैं अभी आते ;
दो दिन मैं तुम आते हो ।
पता नहीं कहाँ तुम जाते हो ॥
फिर भी 'राना' करै ना बुराई ।
जय दोस्त भाई... जय दोस्त भाई ॥
अगर रूठ तुम जाते हो ।
मुश्किल से मनाऊं आते हो॥
रुठने का बहाना होता है ।
अन्दर ही अन्दर मुस्कुराते हो ॥
लाख आये तूफान दोस्ती अपनी टूट ना
पाई ।
जय दोस्त भाई...जय दोस्त भाई...॥
----------.
 

राजमल जाट

image


।।। हमें लेना है वादा जग से।।।
हमें लेना है वादा जग से
साथ निभाएंगे इरादा है जग से।
                                    गली- मोहल्ले को आज़माये
                                    घर-घर में आशा जगायें
                                   सबको शब्दों से मिलाएंगे
                                काम इनसे लेना हम सिखाएंगे
                                   जीवन के सागर में हम
                                   शब्दों का नया पुल बनाएंगे।
हमें लेना है वादा जग से
साथ निभाएंगे इरादा है जग से।
                                 'अ' से अनार और 'ई'से इमली
                                  हर घर में तो सब ने सीख ली
                                  शेष है अब चखना वह फल
                                  जिसे ठुकराया था हमने कल
                                 गांव शहर बाँटना ही वह फल
                                जो सजाएगा आने वाला कल।
हमें लेना है वादा जग से
साथ निभाएंगे इरादा है जग से।
                                 अब शिक्षा होगी हर घर में
                          बनाकर उठेगी आशा हर लहार में
                             न कोई फ़ोटो को देखेगा यूं ही
                            न कोई वोटो को देगा यूं ही
                           जन-जन में आन्दोलन जगाएंगे
                          अब न शब्दों से समझौता करेंगे।
हमें लेना है वादा जग से
साथ निभाएंगे इरादा है जग से।।

  
                        ------------.
 

महेंद्र देवांगन माटी

image
हाईकू
***********
बातें कर लो
छोड़ो अब दुश्मनी
माँ की खातिर ।


मोबाइल से
बढ़ रही दूरियां
आंखें भी खोलो ।


केवल चाह
नहीं मिलेगी राह
प्रयास करो ।
*******************
रचना
महेन्द्र देवांगन "माटी"
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  (छ ग )
पिन - 491559
मो नं -- 8602407353
Email - mahendradewanganmati@gmail.com


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मुकुल कुमारी अमलास


प्यार

प्यार एक ऐसा एहसास
जगाती जो जीवन की प्यास
मन मुदित, तन सुरभित
टूट जाती सारी वर्जना
है प्रबल यह भाव इतना
मन करता सिर्फ कल्पना
उम्र सीमा देह सीमा
सबके जाती पार यह
इसके दम पर है ये धरती
इसके दम पर आसमां
प्रेम की सीमा न कोई
प्रेम की नहीं जात है
कहने और सुनने से ऊपर
सिर्फ एक तलाश है
इसकी चाहत हर किसी को
यह नेह की बरसात है
जब किसी के दिल में उठता
आता सब पर प्यार है
मौन की है भाषा इसकी
नैनों का संदेश है
मिट जाती मीलों की दूरी
रहता हरदम कोई पास है
डुबोता यादों का समंदर
भावना को लग जाते हैं पर
मोरपंखी रंग इसके
इंद्रधनुषी कामना
खट्टा- मिठा स्वाद इसका
ख्यालों का यह कारवाँ
जग है सुन्दर सब है सुंदर
फूल कलियाँ, चँद्रमा
इसका नहीं तन है कोई
इसकी बस है आत्मा
जीना मरना एक जैसा
हर कहीं परमात्मा ।
-----------


 

चंद्रलेखा

बरखा रानी  (बाल कविता)

मदमाती इठलाती-सी
आ गई बरखा रानी I
कभी गरजती, कभी लजाती
ता-ता थैया नाच दिखाती
मीठा-मीठा  रस बरसाती
संग में सबके मौज उड़ाती
लो आ गयी, आ गई, आ गई,
आ गई  बरखा रानी।

खेतों -खेतों होकर आई
ताल-तलैया भरती  आई
पगडण्डी पर देखो तो,
हौले-हौले रखती पाँव
मेरे घर के द्वारे पर भी
लो अब आ गई   बरखा रानी।

सबको लुभाती जल बरसाती
दिल में मीठी उमंग जगाती
कभी हंसाती कभी रुलाती
स्कूलों में छुट्टी कर के
गरमा गरम पकौड़े खाती
लो आ गई, आ गई, आ गई,
आ गई  बरखा रानी।

अब के बरस जो आई हो
जाने की न जल्दी करना
सूखे प्यासे जीवन को
नए सपनों से रंगी करना
कुछ सुनना,  सुनाना अपनी
बरखा रानी  प्यारी रानी
लो आ गई, आ गई, आ गई,
आ गई  बरखा रानी।


             @चंद्रलेखा 

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आपने रचना के साथ मेरा नाम छापने में त्रुटि की है मेरा उपनाम 'महरूम' है( वंचित) आपने मरहूम(दिवंगत) छापा है
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इस गंभीर त्रुटि के लिए खेद है. - सं

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