विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

'आषाढ़ का एक दिन'-पात्र योजना - डॉ0 सुरंगमा यादव

'आषाढ़ का एक दिन'-पात्र योजना

आधुनिक नाटककारों में मोहन राकेश का विशिष्ट स्थान है। मोहन राकेश ने कुल चार नाटक लिखे हैं-आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे अधूरे और पाँव तले की जमीन। उनके अन्तिम अपूर्ण नाटक को कमलेश्वर ने पूरा किया। सन् 1958 में लिखित 'आषाढ़ का एक दिन' उनकी प्रथम किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति है। कालिदास के जीवन पर आधारित इस ऐतिहासिक नाटक में इतिहास कम साहित्य और कल्पना अधिक है। इसकी कथावस्तु महाकवि कालिदास के जीवन पर आधारित होने के कारण प्रख्यात है। नाटक में कालिदास और मल्लिका के उदात्त प्रेम का चित्रण किया गया है। कालिदास और मल्लिका एक ही गाँव में रहते हैं। दोनों में प्रगाढ़ प्रेम है। कालिदास के काव्य की ख्याति सुनकर उज्जयिनी-नरेश उसे अपना राजकवि बनाना चाहते हैं। कालिदास अनिच्छा व्यक्त करते हैं परन्तु मल्लिका उसे भेज देती है। वहाँ वे अनेक रचनाओं का सृजन करते हैं। उनका विवाह राजकुमारी प्रियंगुमंजरी से हो जाता है। शासन कार्य में अरूचि होने के कारण पलायन कर मल्लिका के पास वापस आ जाते हैं। परन्तु मल्लिका एक अन्य ग्राम पुरूष विलोम के बच्चे की अविवाहित माँ बन चुकी है। कालिदास निराश होकर पुनः पलायन कर जाते हैं।

मोहन राकेश को इस नाटक के प्रणयन की प्रेरणा महाकवि-कालिदास की रचनाओं से मिली है। संस्कृत के महानकवि एवं नाटककार महाकवि कालिदास की समस्त रचनाओं में प्रायः विरह तत्व की प्रधानता है। 'मेघदूत' में मेघ के माध्यम से यक्ष ने अपनी प्रेयसी यक्षिणी को अपना सन्देश प्रेषित किया है तो 'कुमार सम्भव' में हिमालय तथा तापसी उमा का चित्रण है। 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' में दुष्यन्त और शकुन्तलता की मिलनोत्कंठा चित्रित है। कालिदास की रचनाओं में विरह तत्व की प्रधानता से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कालिदास के प्रारम्भिक जीवन का प्रेम उनके साहित्य सृजन का प्रेरणा स्रोत रहा है। यही कारण है कि विदुषी पत्नी को प्राप्त करके भी उनके हृदय में विरहाग्नि प्रज्जवलित रही और जिसे वह अपनी रचनाओं में व्यक्त करते रहे।

'आषाढ़ का एक दिन' नाटक की कथावस्तु तीन अंको में विभाजित है। कथावस्तु का प्रारम्भ 'आषाढ़ के प्रथम दिवस' से होता है। मल्लिका के शब्दों में, ''आषाढ़ का पहला दिन और ऐसी वर्षा माँ। ऐसी धारासार वर्षा। दूर-दूर तक की उपत्यकाएँ भीग गयीं। और मैं भी तो। देखो न माँ कैसी भी गयी हूँ।'' कालिदास और मल्लिका ग्राम प्रान्तर की पर्वत श्रृंखलाओं का स्पर्श करती हुई मेघ-मालाओं को निहार रहे है। मल्लिका कालिदास के साथ पर्वतों की उपत्यकाओं में धारासार बरसते मेघों में भीगकर घर लौटती है, तो माँ से कहती है, ''गयी थी कि दक्षिण से उड़कर आती बकुल-पंक्तियों को देखूँगी और देखो सब वस्त्र भिगो आयी हूँ।'' मल्लिका की माँ अम्बिका कालिदास के साथ उसके भीगने का अनुमान लगाकर क्रुद्ध होती है। वह कालिदास और मल्लिका के विषय में फैले जन अपवाद से व्यथित है। कालिदास के विषय में उनकी धारणा अनुकूल नहीं है, ''तुम्हारे साथ उसका इतना ही सम्बन्ध है कि तुम एक उपादान हो, जिसके आश्रय से वह अपने से प्रेम कर सकता है, अपने पर गर्व कर सकता है।'' वह मल्लिका के भविष्य को लेकर चिन्तित है। कालिदास ने अविवाहित रहने का व्रत लिया है, इस कारण मल्लिका ने भी चिर कुमारी रहने का निश्चय किया है। वह भावना के स्तर पर जीना चाहती है। कालिदास के साथ भीगते हुए प्रकृति के सौन्दर्य का साक्षात्कार उसके हृदय को छू जाता है। वह कहती है, ''माँ आज के वे क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो। मैं उसे छू सकती थी, पी सकती थी। तभी मुझे अनुभव हुआ कि वह क्या है जो भावना को कविता का रूप देता है। मैं जीवन में पहली बार समझ पाई कि क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघ-मालाओं में खो जाता है, क्यों किसी को अपने तन-मन की अपेक्षा आकाश में बनते मिटते चित्रों का इतना मोह हो रहता है।''

कालिदास भावुक हृदय कवि है। उसने 'ऋतु संहार' की रचना की है। उज्जयिनी के सम्राट ने उसे राजकवि का सम्मान देने हेतु आचार्य वररूचि तथा अनेक राज्य कर्मचारियों को भेजा है। स्वाभिमानी कवि राजमुद्राओं का दास नहीं होना चाहता है और माँ जगदम्बा के मन्दिर में चला जाता है। मातुल व्यंग्यपूर्ण शब्दों में कहता है कि अब मेरा भी कालिदास से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। कालिदास के कथन को आधार बनाकर मातुल कहता है'' मैं राजकीय मुद्राओं से क्रीत होने के लिए नहीं हूँ।'' ऐसे कहा जैसे राजकीय मुद्राएँ आपके विरह में घुली जा रही हों, और चल दिए।'' मल्लिका चाहती है कि वह गाँव के अभाव और अपवादपूर्ण जीवन को त्यागकर राजकीय सम्मान को ग्रहण करे ताकि उसकी प्रतिभा चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सके। वह कहती है,'' नहीं उन्हें इस सम्मान का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। यह सम्मान उनके व्यक्तित्व का है। उन्हें अपने व्यक्तित्व को उसके अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए।'' अन्त में वह अपने आग्रह और अनुरोध के द्वारा कालिदास को उज्जयिनी जाने के लिए तैयार कर लेती है।

द्वितीय अंक में कथा का पूर्ण विकास होता है। मल्लिका कालिदास के विरह में क्षीण-काय हो जाती है। उसकी माँ उसकी चिन्ता में अस्वस्थ एवं रूग्ण होती जा रही है। उज्जयिनी जाकर कालिदास 'मेघदूत' तथा 'कुमारसम्भव' जैसे उत्कृष्ट काव्य-ग्रन्थों की रचना करते हैं। मल्लिका कालिदास के सभी ग्रन्थों की प्रतियाँ उज्जयिनी के व्यवसायियों से प्राप्त कर सहेज लेती है। कश्मीर का शासक बनकर कालिदास अपनी पत्नी प्रियंगुमंजरी तथा अन्य राज्य कर्मचारियों के साथ कश्मीर जाते समय ग्राम-प्रदेश में आते हैं। प्रियंगुमंजरी गुप्त वंश की परम विदुषीराजकुमारी और कालिदास की पत्नी है। कालिदास के विवाह का समाचार सुनकर मल्लिका को ठेस पहुँचती है। प्रियंगुमंजरी मल्लिका के घर का जीर्णोद्धार करना तथा उसे उज्जयिनी ले जाना चाहती है। परन्तु स्वाभिमानी मल्लिका इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। कश्मीर जाते समय ग्राम-प्रान्तर में आने पर भी कालिदास किन्हीं कारणों वश मल्लिका से भेंट नहीं कर पाते हैं। कालिदास के इस व्यवहार से मल्लिका को घोर निराशा होती है तथा उसे अपनी माँ तथा विलोम के व्यंग्य भी सुनने को मिलते हैं। उसके त्याग का यह प्रतिफल उसे हताशकर देता है।

तृतीय अंक के प्रारम्भ में ही मातुल कालिदास के सन्यास-ग्रहण की सूचना देता है। मातुल के शब्दों में ''नहीं। उज्जयिनी नहीं गया। वहाँ के लोगों का तो कहना है कि उसने सन्यास ले लिया है और काशी चला गया है। परन्तु मुझे विश्वास नहीं होता। उसका राजधानी में इतना मान है। यदि कश्मीर में रहना सम्भव नहीं था, तो उसे सीधे राजधानी चले जाना चाहिए था। परन्तु असम्भव भी नहीं है। एक राजनीतिक जीवन दूसरे कालिदास। मैं आज तक दोनों में से किसी की भी धुरी नहीं पहचान पाया। मैं समझता हूँ कि जो कुछ मैं समझ-पाता हूँ सत्य सदा उसके विपरीत होता है। और जब मैं उसके विपरीत तक पहुँचने लगता हूँ तो सत्य उस विपरीत से विपरीत हो जाता है। अतः मैं जो कुछ समझ पाता हूँ, वह सदा झूठ होता है। इससे अब तुम निष्कर्ष निकाल लो सत्य क्या हो सकता है कि उसने सन्यास ले लिया है, या नहीं लिया। मैं समझता हूँ कि उसने सन्यास नहीं लिया, इसलिए सत्य यही होना चाहिए कि उसने सन्यास ले लिया है और काशी चला गया है।'' कालिदास के सन्यास का समाचार सुनकर मल्लिका व्यथित हो उठती है। वह आप ही आप कालिदास को उपालम्भ देती है'' नहीं, तुम काशी नहीं गये। तुमने सन्यास नहीं लिया। मैंने इसलिए तुमसे यहाँ से जाने के लिए नहीं कहा था।...........मैंने इसलिए भी नहीं कहा था कि तुम जाकर कहीं का शासन-भार सँभालो। फिर भी तुमने जब ऐसा किया, मैंने तुम्हें शुभकामनाएँ दी- यद्यपि प्रत्यक्ष तुमने वे शुभकामनाएँ ग्रहण नहीं कीं। ........।''

अभाव की स्थिति में अम्बिका की मृत्यु के पश्चात् मल्लिका का विलोम से सम्बन्ध हो जाता है। इस सम्बन्ध से वह एक बालिका की माँ भी बन चुकी होती है। आषाढ़ का फिर वही प्रथम दिवस है, आकाश में मेघ धिरे होते हैं । मूसलाधार वर्षा हो रही है मल्लिका कालिदास के विषय में ही चिन्तन करती है कि अचानक द्वार खोलकर कालिदास आ जाता है। वह मल्लिका के समक्ष स्वीकार करता है कि वह शासन-सत्ता के मोह में पड़ कर अपने पथ से भ्रष्ट हो गया परन्तु अब राजमोह छोड़ आया है। मल्लिका के समक्ष वह फिर अथ से जीवन आरम्भ करना चाहता है। सहसा अन्दर से किसी के रोने का शब्द सुनायी देता है। कालिदास हतप्रभ होकर देखने लगता है। मल्लिका उस बच्ची को अपना वर्तमान बताती है। उसी समय विलोम आकर उस बच्ची तथा मल्लिका पर अपने अधिकार का संकेत देता है। कालिदास यह सच्चाई सुनकर मर्माहत हो जाता है। मल्लिका जब तक बच्ची को लेकर वापस आती है तब तक कालिदास जा चुका होता है। वह द्वार खोलकर उसे पुकारती है परन्तु वह मुड़कर भी नहीं देखता। मल्लिका बच्ची को वक्ष से और अधिक सटाकर सिसकती रह जाती है। आषाढ़ के प्रथम दिवस सब कुछ समाप्त हो जाता है।

नाटक की कथावस्तु कौतूहलवर्धक तथा घटना प्रधान है। कार्य-व्यापार परस्पर सम्बद्ध हैं, कहीं भी शिथिलता नहीं है। कथा-शिल्प तथा नाट्य शिल्प की दृष्टि से भी नाटक सर्वथा सफल है

'आषाढ़ का एक दिन' नाटक पात्र योजना की दृष्टि से भी सफल है। रंगमंच पर कहीं भी किसी भी अंक में चार से अधिक पात्र एकत्र नहीं हो पाते हैं। नाटक के प्रमुख पुरूष पात्र हैं-कालिदास, विलोम, मातुल और निक्षेप और प्रमुख नारी पात्र हैं मल्लिका, अम्बिका, प्रियंगुमंजरी आदि। दन्तुल, रंगिणी, संगिणी, अनुस्वार और अनुनासिक आदि गौण पात्र हैं। आचार्य वररूचि और गुप्त-वंश सम्राट सूच्य पात्र हैं।

कालिदास नाटक का सर्वाधिक प्रमुख पात्र एवं नायक है। कालिदास नाटक में आद्यान्त विद्यमान हैं। उसकी काव्य-प्रतिभा तथा व्यक्तित्व का चर्मोत्कर्ष ही नाटक का प्रमुख उद्देश्य है। अतएव नाटक का सारा घटना-क्रम उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। महाकवि कालिदास चौथी शताब्दी के वही ऐतिहासिक पात्र हैं जिन्होंने संस्कृत में ऋतुसंहार, मेघदूत कुमार सम्भव, रघुवंश और अभिज्ञानशाकुन्तलम् की रचना की है। गुप्त-वंश के सम्राट चन्द्रगुप्त के नवरत्नों में इन्हीं की गणना थी। राजकुमारी विद्योत्तमा के साथ इन्हीं का विवाह हुआ था। नाटककार ने विद्योत्तमा को प्रियंगुमंजरी के रूप में चित्रित किया है। कालिदास के बारे में किंवदन्ती है कि वे प्रारम्भ में महामूर्ख थे परन्तु मोहन राकेश ने अपने नाटक में इसकी ओर संकेत नहीं किया है। नाटककार के अनुसार इनका प्रारम्भिक जीवन ग्राम प्रान्तर में बीता। मामा मातुल ने इनका पालन-पोषण किया। इनकी प्रथम रचना 'ऋतुसंहार' के साथ इनकी काव्य-प्रतिभा प्रस्फुटित हुई। कालिदास का प्रारम्भिक जीवन-विषम परिस्थितियों में गुजरा इसीलिए उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का व्रत ले लिया। कालिदास को ग्रामप्रान्तर की पर्वत-मालाओं, हरिणशावकों तथा वर्षाऋतु में पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघमालाओं से विशेष प्रेम है। वे मेघों के सौन्दर्य में खो जाते हैं, ऐसे दृश्य उनकी भावना को कविता के रूप में परिणत कर देते हैं। मल्लिका के शब्दों में ''मैं जीवन में पहली बार समझ पायी कि क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघ-मालाओं में खो जाता है, क्यों किसी को अपने तन-मन की अपेक्षा आकाश में बनते-मिटते चित्रों का इतना मोह हो रहता है।'' कालिदास का कवि हृदय अत्यन्त कोमल एवं दयापूर्ण है। दन्तुल के बाण से आहत हरिणशावक को वे निःसंकोच भाव से अपनी गोद में उठाकर उसकी प्राण-रक्षा करते हैं। वे उसे दूध पिलाते हैं घृत आदि लगाकर उसका उपचार करते हैं। वे उसके कोमल शरीर को आहत करने वाले की इन शब्दों में भर्त्सना करते हैं- ''न जाने इसके रूई जैसे कोमल शरीर पर उससे बाण छोड़ते बना कैसे?'' घायल हरिणशावक को गोद में लेकर वे उसे सांत्वना देते हुए कहते हैं '' हम जिएँगे हरिणशावक। जिएँगे न ? एक बाण से आहत होकर हम प्राण नहीं देंगे। हमारा शरीर कोमल है, तो क्या हुआ ? हम पीड़ा सह सकते हैं। एक बाण प्राण ले सकता है, तो उँगलियों का कोमल स्पर्श प्राण दे भी सकता है।'' कालिदास दयालु होने के साथ-साथ निर्भीक भी हैं वे सशस्त्र राजपुरूष दन्तुल को आहत हरिणशावक नहीं देते हैं। कालिदास का पीछा करने वाले दन्तुल का वर्जन करती हुई मल्लिका उनकी निर्भीकता का परिचय इन शब्दों में देती हैं'' ठहरो, राजपुरूष। हरिणशावक के लिए हठ मत करो। तुम्हारे लिए प्रश्न अधिकार का है, उनके लिए संवेदना का, कालिदास निःशस्त्र होते हुए भी तुम्हारे शस्त्र की चिन्ता नहीं करेंगे।11 कालिदास नितान्त निर्भीक हैं। वे सशस्त्र राजपुरूष दन्तुल को आहत हरिणशावक नहीं देते हैं और बहुत निर्भीकता से कहते हें'' यह हरिणशावक इस पार्वत्य-भूमि की सम्पत्ति है, राजपुरूष ! और इसी पार्वत्य-भूमि के निवासी हम इसके सजातीय हैं। तुम यह सोचकर भूलकर रहे हो कि हम इसे तुम्हारे हाथ में सौंप देंगे।12

कालिदास में कविसुलभ सहज स्वाभिमान विद्यमान है। आचार्य वररूचि उन्हें राजसम्मान दिलाने ग्राम-प्रान्तर से उज्जयिनी लेने आते हैं किन्तु वे अपने मामा मातुल से स्पष्ट कह देते हैं ''मैं राजकीय मुद्राओं से क्रीत होने के लिए नहीं हूँ।'' वस्तुतः वे ग्राम-प्रान्तर से अनेक सूत्रों से बंधे हैं, वे उसे छोड़कर उज्जयिनी नहीं जाना चाहते। मल्लिका से कहते हैं, ''मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम प्रान्तर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि से जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ है , यहाँ की हरियाली है, हरिणों के बच्चे हैं, पशुपाल है।13 कालिदास प्रतिक्रियावादी पुरूष है। वह सहज स्वाभाविक जीवन न जीकर प्रतिक्रियाओं में जी रहा है। अम्बिका और विलोम उसे अच्छी तरह से जानते हैं। वे जानते हैं कि कालिदास कितना भी इन्कार करे उज्जयिनी जायेगा अवश्य और जाता भी है। यहाँ तक कि प्रियंगुमंजरी से विवाह भी करता है। इन उपलब्धियों को अपने अभाव पूर्ण जीवन की प्रतिक्रिया बतलाते हुए मल्लिका से कहता है,'' मैं नहीं जानता था कि अभाव और भर्त्सना का जीवन व्यतीत करने के बाद प्रतिष्ठा और सम्मान के वातावरण में जाकर मैं कैसा अनुभव करूँगा।............अभावपूर्ण जीवन की वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। सम्भवतः उसमें कहीं उन सबसे प्रतिशोध लेने की भावना भी थी जिन्होंने जब-तब मेरी भर्त्सना की थी, मेरा उपहास उड़ाया था।14

कालिदास दुर्बल चरित्र का व्यक्ति है। वह मल्लिका के प्रति अपने प्रेम को खुलकर स्वीकारने का साहस नहीं दिखाता है। काश्मीर जाते हुये गाँव आकर भी मल्लिका से न मिलना उसे कमजोर और स्वार्थी सिद्ध करता है।

ऐतिहासिक व साहित्यिक ग्रंथों में महाकवि कालिदास और उनकी पत्नी का उल्लेख तो आता है, पर किसी प्रेमिका का नहीं। 'आषाढ़ का एक दिन' की मल्लिका ग्राम कवि कालिदास की प्रेमिका है। डॉ0 लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय के अनुसार, ''नाटककार ने मल्लिका के रूप में एक सुन्दर नारी-पात्र दिया है।'' कालिदास मल्लिका से प्रेम करता है। माँ अम्बिका चाहती है कि यदि कालिदास वास्तव में उससे प्रेम करता है तो विवाह क्यों नहीं कर लेता। परन्तु मल्लिका आर्थिक अभावों की बात कहकर उसे चुप करा देती है। वह उज्जयिनी नरेश का निमन्त्रण आने पर कालिदास को राजकवि बनने के लिए प्रेरित करती है। उज्जयिनी जाकर कालिदास प्रियंगुमंजरी से विवाह कर लेता है। कश्मीर जाते हुए ग्राम-प्रान्तर में आकर भी वह मल्लिका से मिलने नहीं जाता। लेकिन जब कश्मीर का शासन त्याग देता है तो मल्लिका के पास ही जाता है। परन्तु उसे माँ के रूप में देखकर फिर पलायन कर जाता है।

मल्लिका भावुक प्रेमिका है। वह भावना में जीती है। वह कालिदास को प्रेम करती है। उसमे स्वार्थ व प्रतिदान की भावना नहीं है। वह कालिदास की प्रेरणा बनती है। जब कालिदास राजकवि बनने का प्रस्ताव ठुकरा देते हैं, तब मल्लिका उसे प्रेरित करती है,'' यहाँ बैठो। तुम मुझे जानते हो न ? तुम समझते हो कि तुम इस अवसर को ठुकराकर यहाँ रह जाओगे तो मुझे सुख होगा ? मैं जानती हूँ कि तुम्हारे चले जाने से मेरे अन्तर में रिक्तता छा जायेगी। बाहर भी संभवतः बहुत सूना प्रतीत होगा। फिर भी मैं अपने साथ छल नहीं कर रही हूँ। मैं हृदय से कहती हूँ तुम्हें जाना चाहिए।''15

वह स्वयं माँ जगदम्बा के मन्दिर में जाकर कालिदास से आग्रह करती है। वह जानती

है और स्वीकार भी करती है कि कालिदास के अभाव में उसके हृदय में रिक्तता छा जायेगी मगर फिर भी कालिदास को समझाती है- ''तुम यहाँ से जाकर भी मुझसे दूर हो सकते हो...? यहाँ ग्राम-प्रान्तर में रहकर तुम्हारी प्रतिभा को विकसित होने का अवसर कहाँ मिलेगा? यहाँ लोग तुम्हें समझ नहीं पाते। वे सामान्य की कसौटी पर तुम्हारी परीक्षा करना चाहते हैं।''16 इस समय मल्लिका का वही उदात्त नारी रूप प्रकट होता है जो यशोधरा में गुप्त जी ने अंकित किया है-

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में

प्रियतम को प्राणों के पण में

हमीं भेज देती हैं रण मे

क्षात्र-धर्म के नाते।

मल्लिका कालिदास की प्रगति में बाधक नहीं बनती है, बल्कि उसकी प्रेरणा बनकर उस उज्जयिनी जाने के लिए विवश कर देती है। मल्लिका का यह त्याग सर्वथा सराहनीय है। वह कालिदास से ही नहीं अपितु उसके साहित्य से भी अनुराग करती है । उज्जयिनी से आने वाले व्यवसायियों से वह कालिदास की समस्त रचनाएँ प्राप्त कर लेती है। प्रियंगुमंजरी उसके पास कालिदास की रचनाओं को देखकर आश्चर्य व्यक्त करती है । मल्लिका ने कालिदास द्वारा महाकाव्य की रचना कराने के लिए बहुत से कोरे पृष्ठ भी संकलित कर रखे हैं। वर्षों बाद जब कालिदास कश्मीर से पलायन कर लौटता है, तो मल्लिका कहती है- ''ये पन्ने अपने हाथों से बनाकर सिये थे। सोचा था तुम राजधानी से आओगे, तो मैं तुम्हें ये भेंट दूँगी। कहूँगी कि इन पृष्ठों पर अपने सबसे बड़े महाकाव्य की रचना करना। परन्तु उस बार तुम आकर भी नहीं आये और ये भेंट यहीं पड़ी रही। अब तो ये पन्ने टूटने भी लगे हैं, और मुझे कहते संकोच होता है कि ये तुम्हारी रचना के लिए है।''17

मल्लिका का जीवन बिडम्बनाओं से भरा है। माँ अम्बिका की मृत्यु के बाद उसका साहस टूट जाता है। दूसरी ओर ग्राम-प्रान्तर में आकर भी कालिदास का मल्लिका से न मिलना उसे गहरी निराशा में डुबा देता है। भावनाओं में जीने वाली मल्लिका परिस्थितियों से हार जाती है। उसकी विषम परिस्थिति का लाभ विलोम उठाता है। गरीबी और मजबूरी उसे जीने नहीं देती है। वह विवश होकर विलोम के आगे समर्पण कर देती है। एक ओर वह कालिदास की प्रेयसी के रूप में अपवाद झेलती है, तो दूसरी ओर अविवाहित मातृत्व के भार को वहन करती है। कितनी व्यथा से वह कहती है- ''इस जीव को देखते हो ? पहचान सकते हो ? यह मल्लिका है जो धीरे-धीरे बड़ी हो रही है और माँ के स्थान पर अब मैं इसकी देखभाल करती हूँ........... यह मेरे अभाव की सन्तान है। जो भाव तुम थे वह दूसरा नहीं हो सका, परन्तु अभाव के कोष्ठ में किसी दूसरे की जाने कितनी-कितनी आकृतियाँ हैं। जानते हो मैंने अपना नाम खोकर एक विशेषण उपार्जित किया है और अब मैं अपनी दृष्टि में नाम नहीं, केवल विशेषण हूँ। .......परन्तु तुमने वारांगणा का यह रूप भी देखा है ? आज तुम मुझे पहचान सकते हो ?''18 मल्लिका के ऊपर मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं ''अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।'' मल्लिका का जीवन भी अश्रु स्नात है। पहले कालिदास की प्रेमिका के रूप में बदनामी झेली और फिर विलोम के बच्चे की अविवाहित माँ बनने का भार वहन किया।

मल्लिका एक काल्पनिक पात्र है। यह मोहन राकेश की विशिष्ट कला सृष्टि है। वह पवित्र प्रेम को समर्पित होते हुए भी परिस्थितियों वश पुरूष की शोषण-वृत्तियों का शिकार बनती है।

विलोम कभी कालिदास का अभिन्न मित्र रहा है। वह मल्लिका का असफल प्रेमी भी है। वह व्यावहारिक होकर भी दुर्भाग्य से असफल है।मल्लिका के प्रणय को लेकर कालिदास को उससे घृणा रही है ।समय-समय पर उसने कालिदास के विरुद्ध अम्बिका को भी उत्तेजित किया है। वह नाटक का प्रतिनायक है जिसकी भाषा में व्यंग्य और पद्धति कूटनीति रही है । वह स्वयं अपना मूल्यांकन करते हुए एक स्थान पर कहता '' विलोम क्या है ? एक असफल कालिदास। और कालिदास ? एक सफल विलोम।''

अम्बिका मल्लिका की माँ है जिसका पति महामारी में मृत्यु का शिकार हो चुका है। मल्लिका उसकी एकमात्र पुत्री है उसके भविष्य के लिए वह सदैव चिन्तित रहती है और अन्त में रूग्णावस्था में ही मर जाती है। वह स्नेह तथा करुणामयी माँ है जो अपनी बेटी के भविष्य के लिए चिन्तित रहती है। वह मल्लिका और कालिदास के संबंध में ग्राम-प्रान्तर में फैली चर्चाओं से दुःखी है ।वह मल्लिका का विवाह करके उसका भविष्य सुरक्षित करना चाहती है ।अन्त में वह अपनी बेटी की चिन्ता लिए संसार से विदा हो जाती है।

प्रियंगुमंजरी उज्जयिनी नरेश की कन्या और कालिदास की पत्नी है। वह सहृदय, संवेदनशील, पति-परायण और व्यवहार कुशल है।अन्य पात्रों में मातुल,निक्षेप,दन्तुल ,रंगिनी,संगिनी,अनुस्वार और अनुनासिक हैं।

मोहन राकेश ने सभी पात्रों का चरित्रांकन मनोवैज्ञानिक धरातल पर किया है ।

सन्दर्भ सूची

1

'आषाढ़ का एक दिन ', मोहन राकेश

पृ0सं0 6

2

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 6

3

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 24

4

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 8

5

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 29

6

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 33

7

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 91, 92

8

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 92

9

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 08

10

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 15

11

'आषाढ़ का एक दिन '' '' ''

पृ0सं0 20

12

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 18

13

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 45

14

'आषाढ़ का एक दिन' '' '' ''

पृ0सं0 99

15

'आषाढ़ का एक दिन' - मोहन राकेश पृ0सं0 44

 

16 'आषाढ़ का एक दिन' '' '' '' पृ0सं0 44 17 'आषाढ़ का एक दिन' '' '' '' पृ0सं0 104

18 'आषाढ़ का एक दिन' '' '' '' पृ0सं0 94

 

डॉ0 सुरंगमा यादव

विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना,लखनऊ।

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget